साफ़ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं

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व्यंग्य



आलोक पुराणिक
चांदनी चौक जाना जैसे कई पीढ़ियों के इतिहास से गुजरना है। मनु कौशल और आलोक पुराणिक का बस चले, तो सुबह से रात तक सुनाते जायें दास्तान ए चांदनी चौक, गौरी शंकर टू गालिब टू दाग टू बेगम समरु टू इकबाल टू नादिर शाह टू अब्दाली टू जाने क्या क्या। कभी मनु कौशल और आलोक पुराणिक अपने अपने घरों से कई दिनों तक फरार पाये जायें और घरवाले ढूंढने आयें, तो पता लगेगा चांदनी चौक में बेगम समरु की हवेली में कई घंटों से दास्तान ए हवेली सुना रहे होंगे और लोगों की मुहब्बत कि लोग सुन रहे होंगे।

खैर जी चांदनी चौक वाक में दाग साहब के बहुत शेर सुनाये जायेंगे, उनकी बहुत दास्तानें सुनायी जायेंगी, फिर भी कई दास्तानें और कई शेर रह ही जायेंगे। दाग साहब कमाल के शायर थे इस अर्थ में वह एक साथ क्लासिक और सहज शायर थे। गालिब क्लासिक शायर हैं, पर सहज नहीं हैं। गालिब बहुत कांपलेक्स शायर हैं। सहज या कांपलेक्स होना अलग मसला है, हर शायर का रंग और ढंग अलग होता है। एक ही वाक में हम दोनों को याद करते हैं, यूं उस दौर के मोमिन भी कमाल शायर हैं, उन्हे याद करने के लिए कहीं और लेकर जायेंगे वाक ए दिल्ली की हेरिटेज-लिटरेचर वाक।

दाग साहब कमाल थे और उनकी मां भी कमाल थीं। उनकी मां का लिटरेचर कनेक्शन भी काबिले जिक्र है। खैर अभी तो यह सुनिये –

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं –उज्र यानी आपत्ति

बाइस-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात बताते भी नहीं –मुलाकात खत्म करने का कारण बताते भी नहीं

क्या कहा फिर तो कहो हम नहीं सुनते तेरी

नहीं सुनते तो हम ऐसों को सुनाते भी नहीं

ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं

साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

देखते ही मुझे महफ़िल में ये इरशाद हुआ

कौन बैठा है उसे लोग उठाते भी नहीं

ज़ीस्त से तंग हो ऐ ‘दाग़’ तो जीते क्यूँ हो

जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं

वाक और भी हैं, बात और भी हैं

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