नरकासुर पर विजय का पर्व है नरक चतुर्दशी

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आज नरक चतुर्दशी है जिसे लोक में छोटी दीवाली भी कहा जाता हैं। मेरी समझ से यह पांच-दिवसीय दीप पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि यह दिन एक स्त्री के अदम्य साहस और शौर्य को समर्पित है। इस उत्सव की पृष्ठभूमि में एक बहुत खूबसूरत पौराणिक कथा है। कथा के अनुसार प्राग्ज्योतिषपुर के एक शक्तिशाली असुर सम्राट नरकासुर ने देवराज इन्द्र को पराजित करने के बाद देवताओं तथा ऋषियों की सोलह हजार से ज्यादा कन्याओं का अपहरण कर लिया था। देवताओं की भीड़ उसके आगे असहाय थी क्योंकि नरकासुर को अजेय होने का वरदान प्राप्त था। कोई भी देवता या मनुष्य उसकी हत्या नहीं कर सकता था। कोई स्त्री ही उसे मार सकती थी। उससे त्रस्त और भयभीत देवताओं ने अंततः कृष्ण से सहायता की याचना की। कोई रास्ता न देखकर कृष्ण स्वयं चिंता में डूबे हुए थे। नरकासुर की कैद में हजारों स्त्रियों की पीड़ा सुन और पति की चिंता देखकर कृष्ण की एक पत्नी सत्यभामा सामने आई। कृष्ण के रनिवास की वह एकमात्र योद्धा थीं जिनके पास कई कई युद्धों का अनुभव था। उन्होंने नरकासुर से युद्ध की चुनौती स्वीकार की। कृष्ण उनके सारथि बनें। कृष्ण की प्रेरणा और अपने युद्ध कौशल के बल पर उन्होंने नरकासुर को पराजित कर मार डाला।उसका अंत हो जाने के बाद सभी सोलह हजार बंदी कन्याओं को मुक्त करा लिया गया। वीरांगना सत्यभामा जब कृष्ण के साथ द्वारका लौटीं तो पूरे नगर में दीये जलाकर उनके शौर्य और स्त्रियों की मुक्ति का उत्सव मनाया गया। इस उत्सव की परंपरा आज तक ज़ारी है मगर इसका अर्थ और संदेश हम भूल चुके हैं।विजय का उल्लास मनाने के साथ साथ आज का दिन हमारे लिए खुद से यह सवाल पूछने का अवसर है कि क्या उस घटना के हजारों साल बाद भी हम पुरुष अपने भीतर मौजूद वासना और पुरूष – अहंकार जैसे नरकासुरों की कैद से स्त्रियों को मुक्ति दिला पाए हैं ?

धुरूदत्त

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