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मदर ऑफ ऑल डील्स और भारत का उभरता वैश्विक आत्मविश्वास

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत और यूरोपीय संघ के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति आज बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की सुदृढ़ होती भूमिका का स्पष्ट संकेत दे रही है। देखा जाए तो राष्ट्रीय राजधानी में मंगलवार को हुआ यह समझौता उस भारत की तस्वीर पेश करता है, जिसे आज आप विश्‍व की उभरती हुई अर्थव्यवस्था से आगे वैश्विक आर्थिक विमर्श को दिशा देने वाली शक्ति के रूप में पहचानते हैं।

वस्‍तुत: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इसे ऐतिहासिक बताया जाना और वैश्विक मंचों पर इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जाना भारत की इसी बदली हुई हैसियत को रेखांकित करता है। यूरोपीय संघ के 27 देशों और भारत के बीच हुआ यह एफटीए दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं को गहरे आर्थिक और रणनीतिक सूत्र में बांधता है। यह समझौता वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 25 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के करीब एक तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। दो अरब से अधिक की सम्मिलित जनसंख्‍या वाला यह बाजार आने वाले वर्षों में उत्पादन, निवेश और उपभोग का विशाल केंद्र बनने जा रहा है। यही कारण है कि इसे व्यापारिक करार नहीं, साझा समृद्धि का खाका तक कहा जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने गोवा में आयोजित ‘इंडिया एनर्जी वीक’ के उद्घाटन सत्र में इस समझौते की घोषणा करते हुए जिस आत्मविश्वास का परिचय दिया, वह भारत की आर्थिक स्थिरता और नीतिगत स्पष्टता का परिणाम है। उनके अनुसार समझौता भारत के 140 करोड़ नागरिकों और यूरोपीय देशों के करोड़ों लोगों के लिए नए अवसरों का द्वार खोलेगा। कहना होगा कि आज जब दुनिया संरक्षणवाद और व्यापार अवरोधों की ओर झुकती दिख रही है, तब भारत और यूरोपीय संघ का मुक्त व्यापार के पक्ष में खड़ा होना बहुपक्षवाद और नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था को मजबूती देता है।

आर्थिक आंकड़े इस समझौते की महत्ता को और स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2024-25 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच 136 अरब डॉलर का वस्तु व्यापार हुआ। भारत यूरोप से मशीनें, परिवहन उपकरण और रसायनों का आयात करता है, जबकि भारत से मशीनें, रसायन, लोहा, एल्यूमिनियम, तांबा, खनिज उत्पाद, कपड़ा और चमड़े के सामान का निर्यात होता है। एफटीए लागू होने के बाद शुल्क और गैर शुल्क बाधाओं में कमी आएगी, जिससे भारतीय उत्पादों को यूरोपीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी। इसका सीधा लाभ किसानों, लघु एवं मध्यम उद्योगों तथा श्रम प्रधान क्षेत्रों को मिलेगा।

सेवा क्षेत्र इस समझौते का एक और बड़ा लाभार्थी है। सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल सेवाएं, वित्तीय सेवाएं, अनुसंधान एवं विकास और स्टार्टअप इकोसिस्टम को यूरोप के बाजारों में नई संभावनाएं मिलेंगी। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय निवेश की योजना बना रहे मुख्य कार्याधिकारियों की नजर में भारत तेजी से ऊपर चढ़ा है। पीडब्ल्यूसी के 29वें ग्लोबल सीईओ सर्वे के अनुसार 13 प्रतिशत सीईओ भारत को निवेश के लिए पसंदीदा गंतव्य मानते हैं, जबकि पिछले वर्ष भारत इस सूची में पांचवें स्थान पर था। यह उछाल भारत की आर्थिक नीतियों और बाजार क्षमता पर बढ़ते वैश्विक भरोसे का प्रमाण है।

आर्थिक वृद्धि के मोर्चे पर भी भारत की स्थिति मजबूत बनी हुई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार वित्त वर्ष 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था 7.4 प्रतिशत की दर से बढ़ने की संभावना है, जो वित्त वर्ष 2025 की 6.5 प्रतिशत वृद्धि से अधिक है। यह दर वैश्विक औसत से ऊंची है और प्रमुख विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से भी बेहतर है। भारतीय उद्योग जगत का विश्वास भी इसी दिशा में संकेत करता है। सर्वे के अनुसार 77 प्रतिशत भारतीय सीईओ देश की आर्थिक वृद्धि को लेकर आशावादी हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 55 प्रतिशत है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आंकड़े भारत की इस मजबूती को और स्पष्ट करते हैं। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन की रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में भारत में एफडीआई में 73 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई और कुल 47 अरब डॉलर का निवेश आया। यह वृद्धि मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र में बड़े निवेशों से प्रेरित रही, हालांकि उत्पादन क्षेत्र में भी निवेश का प्रवाह बढ़ा है। साल 2014 से 2025 के बीच एफडीआई इक्विटी प्रवाह 7.27 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा, जो पिछले दौर की तुलना में लगभग दोगुना है। यह आंकड़े बताते हैं कि भारत अब दीर्घकालिक निवेश के लिए एक भरोसेमंद गंतव्य बन चुका है।

कहना होगा कि सरकार की नीतिगत पहलों ने इस निवेश उछाल की नींव रखी है। ‘मेक इन इंडिया’ अभियान ने भारत को वैश्विक विनिर्माण हब बनाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए। एफडीआई नियमों का सरलीकरण, रक्षा, रेलवे और बीमा जैसे क्षेत्रों में निवेश की सीमा बढ़ाना और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत की ओर आकर्षित किया। परिणामस्वरूप ऐपल, सैमसंग, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन जैसी दिग्गज कंपनियों ने भारत में अरबों डॉलर के निवेश की घोषणाएं की हैं। ये निवेश तकनीक, कौशल और रोजगार के नए अवसर भी पैदा करते हैं।

वैश्विक परिदृश्य में भारत का प्रदर्शन इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि कई अन्य बड़े देशों में निवेश में गिरावट देखी गई है। चीन में लगातार तीसरे वर्ष एफडीआई में कमी आई है, जबकि भारत इस प्रवृत्ति का अपवाद बनकर उभरा है। सेमीकंडक्टर मिशन, चिप्स निर्माण को बढ़ावा देने वाली नीतियां और नवीकरणीय ऊर्जा में 500 गीगावाट का महत्वाकांक्षी लक्ष्य भारत को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार कर रहे हैं। इन पहलों ने यूरोप, जापान और अन्य देशों से निवेश आकर्षित किया है। भारत ने साल 2026 के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का लक्ष्य 100 अरब डॉलर तय किया है। साथ ही डिजिटल अर्थव्यवस्था से उम्मीद है कि वह आने वाले वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 20 प्रतिशत योगदान देगी।

आज भारत पारंपरिक विकास मॉडल से आगे बढ़कर नवाचार और तकनीक आधारित विकास की ओर अग्रसर है। ऐसे में यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत द्वारा यूरोप के साथ पहले किए गए अन्य व्यापारिक करारों को मजबूती देता है। इससे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की भूमिका और सशक्त होगी। वैसे भी महामारी और भू राजनीतिक तनावों के बाद दुनिया आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता तलाश रही है और भारत एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभर रहा है। ऐसे में यूरोपीय संघ के साथ एफटीए इस विश्वास को संस्थागत रूप देता है।

भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ यह एफटीए इसी व्यापक आर्थिक परिवर्तन को आज व्‍यापक स्‍तर पर दर्शा रहा है। यह समझौता भारत के बढ़ते आत्मविश्वास, वैश्विक जिम्मेदारी और साझेदारी आधारित विकास मॉडल को भी दिखाता है। यदि वर्तमान गति और नीतिगत निरंतरता बनी रही, तो साल 2030 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य भारतवासियों के लिए कोई सपना नहीं रहेगा। निःस्संदेह यह समझौता भारत के वैश्विक आर्थिक उत्थान की यात्रा में मील का पत्थर है।

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