Home खास खबर बांग्लादेश में नई सरकार, भारत को क्या दरकार

बांग्लादेश में नई सरकार, भारत को क्या दरकार

0
185

-डॉ. प्रभात ओझा

बांग्लादेश में चुनाव नतीजों से साफ हो गया कि वहां बीएनपी की सरकार होगी और तारिक रहमान देश के नये प्रधानमंत्री होंगे। किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यह सहज ही है कि आंतरिक और बाह्य राजनीतिक ताकतें चुनाव परिणाम को सकारात्मक ढंग से लें। बांग्लादेश के लिए भी यह परंपरा मान्य होनी चाहिए, हालांकि इसको लेकर कुछ संशय चुनाव के साथ ही शुरू हो चुके हैं। इसे समझने के लिए दो बिंदुओं पर विचार करना होगा। पहला यह कि चुनाव प्रक्रिया पर देश के अंदर से ही सवाल उठाये गये हैं। दूसरा बिंदु पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का भारत में आश्रय लेना है। यह स्थिति सामान्य नहीं कही जा सकती कि पूर्व प्रधानमंत्री की पार्टी बांग्लादेश में बैन कर दी गई। फिर जिन्होंने चुनाव में हिस्सा लिया, वे ही निर्वाचन प्रक्रिया से ही संतुष्ट नहीं हैं। भारत के लिए तो यह निर्वाचन इसलिए मायने रखता है कि प्रधानमंत्री के रूप में जो नेता उसके अनुकूल रहीं, उन्हें बांग्लादेश से निर्वासित होकर आना पड़ा। बात इतनी ही होती तो चिंता न होती। उन्हें शरण देने के पहले से ही बांग्लादेश में भारत विरोधी माहौल रहा है।

फिलहाल तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की जीत पर पार्टी अध्यक्ष तारिक रहमान को बधाई दी। उन्होंने इसे रहमान के नेतृत्व पर बांग्लादेश की जनता का भरोसा बताया। मोदी ने खुद भरोसा दिया कि भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के समर्थन में खड़ा रहेगा। उन्होंने दोनों देशों के बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने और साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए तारिक रहमान के साथ काम करने के लिए उत्सुकता जताई।

स्वाभाविक कि एक बड़े लोकतांत्रिक देश और पड़ोसी होने के नाते भारत यह रुख अपनाये। इसके विपरीत हाल के घटनाक्रम आगे की राह आसान नहीं होने के ही संकेत देते हैं। भारत के राजनयिक पड़ोस में हो रहे चुनाव के दौरान जमात-ए-इस्लामी के प्रदर्शन पर नजर रखे हुए थे। भारत का मानना रहा है कि बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रभाव में रहती है। जमात इस चुनाव में अपने को सत्ता हासिल करने के करीब मानकर चल रहा था। उसने 11 दलों के साथ गठबंधन बनाया था। स्वाभाविक है कि ये छोटे दल हैं और पूरी तरह से जमात की ही पकड़ में रहे हैं। जमात ने चुनाव प्रचार के दौरान अपने भारत विरोधी रुख को छिपाया भी नहीं। अब हार के बाद उसकी हताशा चुनाव प्रक्रिया पर सवाल के रूप में सामने आई है। यहीं नहीं, साल 2024 में शेख हसीना को सत्ता से हटाने के लिए आंदोलन करने वाली नेशनल सिटीजन्स पार्टी ने भी चुनाव नतीजों में हेरफेर के आरोप लगाये हैं।

सच है कि बांग्लादेश में अति कट्टरपंथियों की हार खुद अपने लोगों और भारत के अनुकूल है। जिस तरह के हालात से बांग्लादेश गुजरा है, नई सरकार को स्थिति सामान्य करने में समय लगेगा। शेख हसीना के देश से बाहर आ जाने के बाद अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बना माहौल भारत के खिलाफ ही रहा। हालात यह हो चले थे कि हिन्दू नागरिकों की लींचिंग के दौरान हत्या तक हुई। यह वही क्षेत्र है, पूर्वी पाकिस्तान के रूप में जहां लोकतांत्रिक आंदोलन को भारत ने न सिर्फ समर्थन दिया बल्कि बांग्लादेश के उदय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बांग्लादेश के नायक शेख मुजीब की हत्या के बाद से भारत को अपने इस पड़ोसी के साथ रिश्तों को लेकर सजग रहना पड़ा है। सुरक्षा सहयोग, विदेश नीति और आर्थिक साझेदारी के बूते भारत ने इसे सम्भाले रखा।

यह भी देखना होगा कि जिस पाकिस्तान से निकल कर बांग्लादेश अस्तित्व में आया, शेख हसीना के दौर में वहां पाकिस्तान की दाल नहीं गली। पाकिस्तान अब बांग्लादेश में भारत विरोधी रुख बने रहने की उम्मीद ही नहीं, कोशिश भी करेगा। शेख हसीना के हटने के बाद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार में उसे अपने मकसद में कामयाबी मिलती दिखी। यूनुस पाकिस्तान के साथ रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में तेजी से चल रहे थे।

देखना होगा कि अब जबकि बीएनपी सत्ता में होगी, चीन के साथ ही पाकिस्तान के साथ वह अपने रिश्ते कैसा रखती है। भारत ने तो शेख हसीना को शरण देने के साथ बीएनपी से भी रिश्ते सुधारने की कोशिश की है। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बीमार होने पर चिंता जताना और उनके निधन के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर का उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने को खास माना जा सकता है। खुद खालिदा जिया के शासनकाल में भारत का उनके देश के साथ रिश्ते को बहुत अच्छा नहीं, तो खराब भी नहीं कह सकते। तारिक रहमान उन्हीं के बेटे हैं, युवा हैं, अभी पिछले साल के अंत में ही लंबे समय बाद स्वतः निर्वासन की स्थिति से लौटे हैं। उम्मीद की जाती है कि वे भारत से अपने देश के रिश्तों को बदलती दुनिया के हिसाब से देखेंगे। हमेशा की तरह भारत तो बेहतर रिश्ते ही चाहेगा।

-डॉ. प्रभात ओझा

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

en_USEnglish