जूते से अधिक मारक वस्तु भी कोई है क्या?

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व्यंग्य

सोच रहा हूँ, इस संसार में जूते से अधिक मारक वस्तु भी कोई है क्या? कभी कभी गोली दम्बूक भी उतना प्रभाव नहीं छोड़ते जीतना एक अदना सा जूता छोड़ जाता है।

सोचिये न! लाठी चलाये जाने पर किसी व्यक्ति का नुकसान तभी होता है जब लाठी उसे लगे। लेकिन जूते के केस में ऐसा नहीं है। जूता निशाने पर लगे या न लगे, वह अपना प्रभाव छोड़ देता है। कभी कभी तो जूता उछलता भी नहीं, धारक बस उसे पैर से निकाल कर हाथ में उठा लेता है और इतने भर से उसका काम सिद्ध हो जाता है। है न अद्भुत?

पुराने युद्ध वाले सीरियल याद कीजिये। बड़े से बड़ा अस्त्र भी केवल उसी व्यक्ति का नुकसान करता है जिस पर प्रहार किया जाता है। जूते के मामले में यहाँ भी अंतर है। जूता चलता एक व्यक्ति पर है, पर चोटिल अनेकों को करता है। कभी कभी तो एक जूता लाखों लोगों को चोट पहुँचा जाता है। है न कमाल?

संसार के सारे अस्त्र शस्त्र शरीर को चोटिल करते हैं। जितना तेज प्रहार, उतनी पीड़ा उतनी हानि। जूता ऐसा नहीं करता। उससे शरीर को कोई नुकसान नहीं होता। आपने कभी नहीं सुना होगा कि जूते के प्रहार से फलाँ का हाथ टूट गया, टांग टूट गयी। एक बौद्धिक व्यक्ति दस बज कर बाइस मिनट पर जूता खाने के बाद दस बज कर तेईस मिनट पर मुस्कुराते हुए अरिजीत सिंह का रोमांटिक सांग गा सकता है। कहने का अर्थ यह है कि जूता शरीर को अल्पतम नुकसान पहुँचाता है। लेकिन, किंतु, परंतु… उसकी असली चोट हृदय पर पड़ती है। चोटिल व्यक्ति के हृदय में जूते की याद सदैव बनी रहती है।

जूतों की दुनिया में अद्भुत साम्यवाद है। आप देखिये, जूता लेदर का हो या प्लास्टिक का, दस हजार का एडिडास हो या तीन सौ का नेपाली गोल्डस्टार, असर बराबर ही छोड़ता है। ऐसा नहीं कि बुर्जुआ का जूता ज्यादा मारक और सर्वहारा का कम। जूता बाभन का हो या यादव का, ठाकुर का हो या कुशवाहा का, उसकी चोट उसका असर बराबर ही होता है।

इस देश में प्रतिदिन अनेकों लोगों को गोली लगती है, अनेक लाठी डंडों से मार दिए जाते हैं। इन घटनाओं पर देश कभी नहीं उबलता। लेकिन एक जूता चल जाय तो देश हिल जाता है। सोचिये तो, क्या खा कर अंदुक बंदुक जूते की बराबरी करेंगे?

हर साल आपराधिक घटनाओं में मरे हजारों लोगों के परिजन बीस बीस साल तक कचहरियों में दौड़ते दौड़ते थक कर चुप हो जाते हैं, पर उनके साथ कोई नहीं आता। लेकिन जूते के मामले में देखिये, जूता फेंकने वाले के साथ भी हजारों खड़े होते हैं और खाने वालों के साथ भी लाखों… सोचो दोस्त! जूता बहुत बड़ी चीज है कि नहीं?

आप मान लीजिये कि लोकतंत्र में जूते से अधिक महत्वपूर्ण और कुछ भी नहीं। वह दिन दूर नहीं जब हर पैर में जूता हो न हो, हर हाथ में जूता अवश्य होगा।

जूता वाले बाबा।

मङ्गल ग्रह से लाइव…

(सोशल मीडिया से)

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