वर्दी का सौदा: जब कानून ब्लैकमेल की भाषा बोलने लगे

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(एफआईआर न्याय पाने का दस्तावेज़ कम और डराने का औज़ार ज़्यादा) 

— डॉ० प्रियंका सौरभ

हरियाणा पुलिस की एक महिला इंस्पेक्टर का निलंबन महज़ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह उस सड़ांध की ओर इशारा करता है जो वर्दी के भीतर चुपचाप फैल रही है। आरोप है कि एक कॉलोनाइज़र को तंत्र-विद्या के जाल में फँसाकर, एफआईआर रद्द कराने के बदले शारीरिक संबंध बनाए गए और बाद में डर व ब्लैकमेल के सहारे एक लाख रुपये की “मंथली” माँगी गई। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल व्यक्तिगत नैतिकता या चरित्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे आपराधिक न्याय तंत्र की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल खड़ा करता है।

यह घटना इसलिए भी अधिक खतरनाक है क्योंकि इसमें तीन ताकतवर हथियार एक साथ इस्तेमाल हुए—वर्दी की सत्ता, अंधविश्वास का भय और कानून का डर। भारत में तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका और अंधविश्वास आज भी केवल अशिक्षा या पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं हैं। बड़े शहरों, पढ़े-लिखे समाज और आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग में भी डर के क्षणों में विवेक कमजोर पड़ जाता है। जब इस डर को कोई वर्दीधारी अधिकारी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करे, तो पीड़ित व्यक्ति मानसिक, सामाजिक और कानूनी रूप से पूरी तरह असहाय हो जाता है।

यह मान लेना भूल होगी कि यह कोई अकेला या अपवादात्मक मामला है। देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर पुलिस और प्रभावशाली तंत्रों की साँठ-गाँठ के मामले सामने आते रहे हैं। कहीं जमीन विवाद में केस दर्ज करने की धमकी देकर पैसे वसूले जाते हैं, कहीं रेप या धोखाधड़ी के मामलों में “सेटिंग” के नाम पर सौदेबाज़ी होती है। कई बार आरोपी और फरियादी दोनों ही थाने के चक्कर काटते हैं, यह जानते हुए कि न्याय नहीं, समझौता ही अंतिम रास्ता है।

इस मामले में एक अहम बात यह भी है कि आरोप एक महिला अधिकारी पर हैं। समाज अक्सर यहीं आकर भटक जाता है। बहस अपराध की बजाय महिला-पुरुष, नैतिकता और चरित्र पर केंद्रित हो जाती है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि आरोपी महिला है या पुरुष। सवाल यह है कि क्या वर्दी पहनते ही कोई व्यक्ति कानून से ऊपर हो जाता है? कानून का तकाज़ा यह नहीं कि हम आरोपी के लिंग पर बहस करें, बल्कि यह है कि सत्ता के दुरुपयोग को बिना किसी संकोच के बेनकाब किया जाए।

कानून के सामने लिंग, जाति, पद या प्रभाव नहीं—सिर्फ़ अपराध मायने रखता है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह अपराध सिर्फ़ ब्लैकमेल या भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि न्याय की अवधारणा पर सीधा हमला है। यह उस भरोसे का कत्ल है, जो आम नागरिक पुलिस और प्रशासन पर करता है।

आज एफआईआर आम आदमी के लिए सुरक्षा की गारंटी कम और डर का प्रतीक ज़्यादा बनती जा रही है। एक काग़ज़, कुछ धाराएँ और कुछ हस्ताक्षर—और पूरा जीवन शक, बदनामी और भय में बदल जाता है। नौकरी खतरे में पड़ जाती है, सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल हो जाती है और परिवार मानसिक दबाव में आ जाता है। जब इसी डर को सौदे की शक्ल दे दी जाती है, तब कानून न्याय का माध्यम नहीं, बल्कि बाज़ारू हथियार बन जाता है।

इस मामले में एक लाख रुपये की मंथली माँग यह साफ़ करती है कि यह कोई भावनात्मक या क्षणिक चूक नहीं थी, बल्कि सुनियोजित वसूली का तंत्र था। भारत में ऐसे ‘मंथली सिस्टम’ किसी से छिपे नहीं हैं। अवैध शराब, खनन माफिया, कॉलोनाइज़र, सट्टा-जुआ—हर जगह एक तय रेट, एक तय तारीख और यह भरोसा कि “सब मैनेज है।” अगर आरोप सही हैं, तो यह मानना कठिन है कि यह सब एक व्यक्ति के बूते पर हो रहा था। असली परीक्षा इस बात की है कि जाँच कितनी निष्पक्ष, कितनी गहरी और कितनी ईमानदार होती है।

दुर्भाग्य से, ऐसे मामलों में निलंबन को ही सबसे बड़ी कार्रवाई बताकर पेश कर दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि निलंबन कोई सज़ा नहीं, बल्कि सिर्फ़ एक अस्थायी विराम है। कई बार जांच लंबी चलती है, सबूत कमजोर पड़ते हैं और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। ज़रूरत इस बात की है कि जाँच समयबद्ध हो, कॉल डिटेल्स, बैंक लेनदेन, संपत्ति और संपर्कों की पूरी पड़ताल की जाए और दोष सिद्ध होने पर बर्खास्तगी के साथ आपराधिक मुकदमा भी चले।

यह मामला केवल पुलिस सुधार या प्रशासनिक जवाबदेही तक सीमित नहीं है। यह समाज को भी आईना दिखाता है। जब हम अंधविश्वास को पालते हैं, जब हम डर के आगे विवेक गिरवी रख देते हैं और जब हम “किसी तरह बच निकलने” की मानसिकता को सामान्य मान लेते हैं, तब ऐसे सौदे पनपते हैं। कानून तभी मज़बूत होगा, जब नागरिक डर के बजाय अधिकार की भाषा बोलना सीखेंगे।

आज डर एक कॉलोनाइज़र को था। कल यह डर किसी शिक्षक, किसी कर्मचारी, किसी छोटे व्यापारी या किसी आम नागरिक को हो सकता है। अगर कानून के रक्षक ही डर का व्यापार करने लगें, तो समाज न्याय नहीं, समझौते खोजने लगता है। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।

यह मामला चेतावनी है कि वर्दी जितनी ऊँची होती है, जवाबदेही उतनी ही भारी होनी चाहिए। वर्दी सम्मान का प्रतीक है, सौदेबाज़ी का लाइसेंस नहीं। अगर समय रहते ऐसे मामलों पर सख़्ती नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब थानों में कानून की भाषा नहीं, बल्कि ब्लैकमेल की बोली आम हो जाएगी। और तब सवाल यह नहीं रहेगा कि दोषी कौन है, बल्कि यह होगा कि क्या इस देश में सचमुच न्याय नाम की कोई चीज़ बची है?

डॉ. प्रियंका सौरभ
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

आर्थिक चुनौतियों से अवसर तक की रणनीतिक यात्रा है भारत-अमेरिका ट्रेड डील

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुई ट्रेड डील (व्यापार समझौता) को लेकर देश की राजनीति में बहस तेज है। कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जैसे विपक्षी दल इस समझौते को भारत विरोधी करार दे रहे हैं, किंतु आर्थिक तथ्यों और हालिया परिस्थितियों का विश्लेषण यह संकेत देता है कि यह समझौता भारत के हितों को ध्यान में रखकर किया गया एक रणनीतिक और व्यावहारिक कदम है। विशेष रूप से उस समय जब अमेरिका द्वारा बढ़ाए गए टैरिफ ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया। वस्‍तुत: यह समझौता नुकसान की भरपाई और भविष्य की स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।

टैरिफ का आर्थिक झटका और भारत की चुनौती

अमेरिका द्वारा पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर भारत के कई उत्पादों पर 25 फीसद से 50 फीसद तक टैरिफ बढ़ाए जाने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा पड़ा। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार रहा है, जहां से भारत को लगभग 86.5 अरब डॉलर का वार्षिक निर्यात मिलता है। मई से अक्टूबर 2025 के बीच निर्यात में 28.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जोकि 8.83 अरब डॉलर से घटकर 6.31 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

टेक्सटाइल, ज्वेलरी, इंजीनियरिंग सामान और स्टील जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर इसका सीधा असर पड़ा। विशेष रूप से टेक्सटाइल, जूते, मणि-मोती और सीफूड जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में गिरावट अधिक रही, क्योंकि इन उत्पादों का बड़ा हिस्सा 50 फीसद टैरिफ के दायरे में आ गया। अनुमान है कि 60.2 अरब डॉलर के निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लागू होने से लगभग 30 अरब डॉलर यानी करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष नुकसान हुआ।

यदि व्यापक आर्थिक प्रभावों का आकलन किया जाए तो यह नुकसान शेयर बाजार में गिरावट, विदेशी निवेश का पलायन, रुपये की कमजोरी और जीडीपी वृद्धि में कमी जैसे कई अप्रत्यक्ष नुकसान के रूप में भी सामने आया। जुलाई 2025 में 25 फीसद टैरिफ की घोषणा के बाद निफ्टी और सेंसेक्स में 3–5 प्रतिशत की गिरावट आई। विदेशी निवेशकों ने नौ दिनों में 27,000 करोड़ रुपये और पूरे महीने में 42,000 करोड़ रुपये तक निकाले। वर्ष 2025 में कुल एफआईआई आउटफ्लो 1.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।

रुपये की गिरावट और बढ़ता आयात बोझ

टैरिफ का एक और बड़ा असर भारतीय रुपये पर पड़ा। अगस्त 2025 में रुपया 88.31 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। यदि पहले के स्तर 83–84 रुपये प्रति डॉलर से तुलना की जाए, तो लगभग 5 रुपये की गिरावट ने भारत के आयात बिल पर सालाना 4–5 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डाल दिया। फरवरी 2026 तक रुपये की गिरावट से जुड़े कुल नुकसान का अनुमान लगभग 8.3 लाख करोड़ रुपये तक लगाया गया। यह स्थिति सिर्फ विदेशी व्यापार तक सीमित नहीं रही, इसका असर घरेलू महंगाई, उत्पादन लागत और उपभोक्ता मांग पर भी पड़ा। गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे औद्योगिक राज्यों के एमएसएमई सेक्टर पर विशेष दबाव देखा गया, जहां लाखों नौकरियां जोखिम में आ गईं।

जीडीपी पर असर और कुल आर्थिक नुकसान

भारत की जीडीपी 2024-25 में 330.68 लाख करोड़ रुपये थी और 2025-26 में इसके 7.4 प्रतिशत की दर से बढ़कर 357.14 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। लेकिन बढ़े हुए टैरिफ के कारण जीडीपी वृद्धि में 0.4 फीसद से एक प्रतिशत तक की कमी का अनुमान लगाया गया। 0.5 फीसद की कमी का मतलब लगभग 1.8 लाख करोड़ रुपये का सीधा नुकसान है। यदि निर्यात हानि (2.5 लाख करोड़ रुपये), एफआईआई आउटफ्लो (1.7 लाख करोड़ रुपये), रुपये की गिरावट (4 लाख करोड़ रुपये) और जीडीपी नुकसान (करीब 2 लाख करोड़ रुपये) को जोड़कर देखा जाए, तब उस स्‍थ‍िति में फरवरी 2026 तक कुल आर्थिक नुकसान लगभग 10 लाख करोड़ रुपये के आसपास आंका गया है। यह एक बड़ा संकेत है कि वैश्विक व्यापार नीतियों में बदलाव का असर भारत जैसे विकासशील देश पर कितना गहरा हो सकता है।

ऐसे समय में समझौते का महत्व

यही वह संदर्भ है जिसमें भारत-अमेरिका ट्रेड डील का महत्व समझा जाना चाहिए। आज ये समझौता व्यापार बढ़ाने का माध्यम तो है ही, साथ में आर्थिक नुकसान को रोकने और स्थिरता लाने की रणनीति भी है। खास बात यह है कि भारत ने यह समझौता अपनी शर्तों पर किया है, विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में। अमेरिका लंबे समय से चाहता था कि भारत अपने कृषि बाजार को अधिक खोल दे, किंतु भारत ने अपने किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए उन शर्तों को स्वीकार नहीं किया। वस्‍तुत: यह दृष्टिकोण इस बात का संकेत है कि भारत व्यापारिक समझौतों में अपनी प्राथमिकताओं को प्राथमिकता दे रहा है। यह नई आत्मनिर्भरता की परिभाषा है।

निवेश, तकनीक और नए अवसर

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस समझौते को दोनों देशों के लिए संभावनाओं से भरा बताया है। उनका मानना है कि अगले 5–6 वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार 500 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह तकनीक और निवेश के नए रास्ते खोलने वाला कदम है। विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटर जैसे उभरते क्षेत्रों में इस डील से बड़े निवेश की संभावना है। इससे भारत वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत कर सकेगा और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई गति मिलेगी।

एमएसएमई और रोजगार पर सकारात्मक असर

कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) का मानना है कि इस समझौते से एमएसएमई सेक्टर को अमेरिकी बाजार में नए अवसर मिलेंगे। कपड़ा, चमड़ा, ज्वेलरी, सस्ती दवाइयां, ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग सामान जैसे क्षेत्रों में भारतीय उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे। इससे उत्पादन बढ़ेगा और युवाओं व महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। एमएसएमई भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यदि इस सेक्टर को स्थिर और बड़ा बाजार मिलता है, तो इसका असर सीधे तौर पर रोजगार और आय पर पड़ेगा।

रणनीतिक संतुलन और आत्मनिर्भरता

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य संजीव सान्याल ने स्पष्ट किया है कि भारत अब हर चीज खुद बनाने के पुराने मॉडल से आगे बढ़ चुका है। अब आत्मनिर्भरता का मतलब है कि जो चीजें रणनीतिक रूप से जरूरी हैं, उन्हें देश में मजबूत किया जाए और बाकी क्षेत्रों में वैश्विक सहयोग लिया जाए। यह दृष्टिकोण बताता है कि भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका को समझते हुए व्यवहारिक और संतुलित निर्णय ले रहा है। सस्ती ऊर्जा, सस्ते संसाधन और मजबूत व्यापारिक संबंध भारत की प्राथमिकता हैं। इसलिए जब हम आर्थिक आंकड़ों और वास्तविक परिस्थितियों को देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि यह ट्रेड डील भारत के लिए एक रक्षात्मक और आक्रामक दोनों तरह की रणनीति का हिस्सा है।

ऐसे में कहना यही होगा कि एक ओर यह टैरिफ से हुए भारी नुकसान को कम करने का प्रयास है, तो दूसरी ओर यह भविष्य में निवेश, तकनीक और निर्यात के नए अवसर खोलने वाला कदम है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने अपने कृषि हितों से समझौता किए बिना यह समझौता किया है, इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि यह डील व्यापारिक समझौता से अधिक भारत की आर्थिक कूटनीति का परिपक्व उदाहरण है, जहां देश ने अपने हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक अवसरों को अपनाने का संतुलित मार्ग अपनाया है।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

वेलेंटाइन वीक में खाटू श्याम बाबा का चॉकलेट से किया गया श्रृंगार

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रामगढ़, 09 फ़रवरी (हि.स.)।

अभी वेलेंटाइन वीक चल रहा है। हर दिन एक विशेष स्थान रखता है। रामगढ़ के नेहरू रोड स्थित खाटू श्याम मंदिर में भी बाबा का सोमवार को चॉकलेट डे पर विशेष श्रृंगार किया गया। बाबा को चॉकलेट से सजाया गया। इस श्रृंगार को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। बाबा के श्रृंगार में लगाए गए चॉकलेट को बाद में प्रसाद के रूप में भक्तों के बीच वितरित किया गया। मंदिर पहुंचे भक्तों ने बाबा का अद्भुत श्रृंगार देखा और अपने कुशल जीवन की कामना की।

फरीदाबाद जेल में आतंकी अब्दुल रहमान की हत्या

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-जम्मू-कश्मीर से शिफ्ट होने के बाद हुई घटना

फरीदाबाद, 09 फरवरी (हि.स.)। फरीदाबाद की जेल में रविवार देर रात कैदियों के बीच हुई मारपीट के दौरान आतंकी अब्दुल रहमान की हत्या कर दी गई। मृतक आतंकी को कुछ समय पहले ही जम्मू-कश्मीर से फरीदाबाद जेल में शिफ्ट किया गया था। हत्या का आरोप इसी जेल में बंद अरूण चौधरी नामक कैदी पर लगा है।घटना के बाद सभी कैदियों को बैरकों में बंद कर दिया गया है। आतंकी अब्दुल रहमान की हत्या की खबर जेल प्रबंधन को सोमवार की सुबह गिनती के दौरान मिली। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर अगली कार्रवाई शुरू कर दी है।
फरीदाबाद पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, आंतकी अब्दुल रहमान को गुजरात एटीएस की मदद से आईबी ने 2 मार्च 2025 को दो हैंड ग्रेनेड के साथ पाली गांव के पास पकड़ा था। उसने अयोध्या को दहलाने की साजिश रची थी। अब्दुल रहमान अलकायदा इन इंडियन सब-कांटिनेंट (एक्यूआईएस) के कुख्यात आतंकी अबू सूफियान के संपर्क में था।
अब्दुल रहमान यूपी के मिल्कीपुर का रहने वाला था। उसके पास कुछ विडियो भी मिले थे, जिनमें राम मंदिर से जुड़ी कुछ डिटेल थी। जांच पता चला था कि करीब डेढ़ साल से अब्दुल रहमान सोशल मीडिया अकाउंट पर भड़काऊ वीडियो अपलोड करता था। पुलिस प्रशासन अभी इस मामले में कुछ नहीं बोल रहा है। पुलिस तथा जेल विभाग के आला अधिकारियों ने जेल में पहुंचकर जांच शुरू कर दी है।

शांति का पाठ पढ़ाने वाली ब्रह्माकुमारी संस्था के आंतरिक ढांचे में कुछ ‘शांत’ नहीं

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– आध्यात्मिक संस्था ब्रह्माकुमारी की कार्यप्रणाली पर सवाल

– राजस्थान के ब्रह्मकुमारी आश्रम में क्या हुआ उस रात?

– कई परिवारों के बिखरने का दावा, निष्पक्ष जांच की मांग

– साेशल मीडिया पर वीडियाे वायरल, पीड़िताें ने लगाई गुहार

लखनऊ, 09 फरवरी (हि.स.)। दुनिया भर में शांति, पवित्रता और अहिंसा का संदेश देने वाली ब्रह्माकुमारी संस्था एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। जिस संस्था ने आत्मिक उत्थान और संयम का मार्ग दिखाने का दावा किया, उसी के भीतर अब हिंसा, भय और टूटते रिश्तों की कहानियां सामने आ रही हैं। ब्रह्माकुमारी जैसी अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था को लेकर यह आरोप लगातार गहराता जा रहा है कि उसके आंतरिक ढांचे में सब कुछ ‘शांत’ नहीं है।

हाल ही में माउंट आबू स्थित पांडव भवन से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि संस्था की एक सीनियर बीके दीदी (पीड़िता) के साथ उसी परिसर में रहने वाली एक अन्य बीके बहन (कथित आरोपी) ने मारपीट की। बताया जा रहा है कि विवाद के दौरान पीड़िता को इतनी बुरी तरह पीटा गया कि उनके शरीर पर कई स्थानों पर गंभीर चोट के निशान आ गए। यह घटना कथित तौर पर जनवरी 2026 के अंतिम सप्ताह की बताई जा रही है।

वहीं राजस्थान के सिरोही जिले के आबू रोड स्थित ब्रह्मकुमारी आश्रम पर गुजरात की एक चर्चित मॉडल एक्टर ने दुष्कर्म, ब्लैकमेलिंग, मानसिक उत्पीड़न और संस्थागत दबाव जैसे संगीन आरोप लगाए हैं। पीड़िता का दावा है कि आश्रम से जुड़े एक व्यक्ति अमित राठौड़ ने उसके साथ दुष्कर्म किया। जबकि सिक्योरिटी इंचार्ज सती समेत अन्य लोगों ने मामले को दबाने, धमकाने और करियर खत्म करने की धमकी दी। युवती ने यह आरोप प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया के सामने सार्वजनिक रूप से लगाए हैं। हालांकि, इस पूरे मामले में ब्रह्मकुमारी संस्था की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

‘जो नहीं होना चाहिए था, वो हुआ’

पीड़िता का कहना है कि आश्रम से जुड़े लोगों के संपर्क में आने के बाद उसे एक कार्यक्रम के दौरान प्रसाद (टोली) दिया गया, जिसके बाद उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई, दृष्टि धुंधली होने लगी और शारीरिक नियंत्रण कमजोर पड़ गया। उसका आरोप है कि इसी अवस्था का फायदा उठाकर उसके साथ जबरदस्ती की गई। बाद में जब उसने सवाल उठाए तो आरोपी ने घटना से इनकार किया, लेकिन फिर वीडियो कॉल, मैसेज और धमकियों के जरिए उसे चुप रहने को मजबूर किया गया। पीड़िता के अनुसार, उसे वीडियो और फोटो वायरल करने की धमकी दी गई। संस्था के सर्कल में घुमाने और बीवी की तरह ट्रीट करने जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। विरोध करने पर जान से मारने और झूठे केस में फंसाने की धमकी दी गई।

पुलिस पर भी सवाल

पीड़िता का दावा है कि उसने पुलिस में शिकायत की, लेकिन वहां से भी उसे संरक्षण नहीं मिला। आरोप है कि शिकायत पर गंभीरता से कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा उसे चेतावनी दी गई कि संस्था के खिलाफ बोलने पर अंजाम बुरा होगा। यह मामला अब महिला सुरक्षा बनाम संस्थागत प्रभाव की बहस को जन्म दे रहा है।

परिवार टूटने के आरोप और ‘कल्ट’ का सवाल

इस विवाद के बीच कई ऐसे पूर्व अनुयायी भी सामने आए हैं जो ब्रह्मकुमारी संस्था को आध्यात्मिक संगठन से अधिक एक नियंत्रित कल्ट सिस्टम बताते हैं। एक पूर्व अनुयायी अरुण (नाम परिवर्तित) का दावा है कि उनकी पत्नी और परिवार संस्था से जुड़ने के बाद उनसे अलग हो गया। बच्चों तक को प्रभावित किया गया। आर्थिक, मानसिक और सामाजिक दूरी पैदा कर दी गई। उनका आरोप है कि संस्था में सवाल पूछना अपराध माना जाता है। ईश्वरीय आदेश के नाम पर मानसिक दबाव बनाया जाता है। दान और समर्पण को मोक्ष से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है।

न पुलिस कार्रवाई, न आधिकारिक बयान

फिलहाल इस घटना को लेकर किसी पुलिस कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही ब्रह्माकुमारी संस्था की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने आया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आध्यात्मिकता के आवरण में सच्चाई को दबाया जा रहा है? और क्या टूटते परिवारों, आंतरिक हिंसा और शिकायतों की कभी निष्पक्ष जांच हो पाएगी? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक शांति और अहिंसा का दावा करने वाली इस संस्था पर उठे ये आरोप आस्था से अधिक संदेह पैदा करते रहेंगे।

खेजड़ी कटेगी तो थार सूखेगा

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-डॉ. सत्यवान सौरभ

राजस्थान का थार मरुस्थल केवल रेत का विस्तार नहीं है, बल्कि यह एक जटिल और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसकी जीवनरेखा खेजड़ी (Prosopis cineraria) जैसे देशज वृक्षों से जुड़ी है। हाल के वर्षों में पश्चिमी राजस्थान—विशेषकर जोधपुर, बाड़मेर, नागौर और बीकानेर—में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के तीव्र विस्तार ने इस पारिस्थितिकी को गंभीर संकट में डाल दिया है। इसी पृष्ठभूमि में उभरा खेजड़ी बचाओ आंदोलन केवल एक स्थानीय विरोध नहीं रह गया, बल्कि यह विकास के मौजूदा मॉडल, पर्यावरणीय न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी पर एक व्यापक और गहन बहस को जन्म देता है।

खेजड़ी को राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया जाना केवल प्रतीकात्मक नहीं था। यह वृक्ष थार की शुष्क और कठोर जलवायु में जल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता, पशुपालन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जैव विविधता का आधार रहा है। इसकी फलियाँ पशुओं के लिए पोषक चारे का कार्य करती हैं, पत्तियाँ हरित आहार प्रदान करती हैं और इसकी गहरी जड़ें भूजल को थामे रखती हैं। मरुस्थलीय समाज की लोकसंस्कृति में खेजड़ी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और सम्मान का प्रतीक है, जिसे लोकवाणी में कहा गया—“सिर साटै रूख रहे, तो भी सस्तो जाण।” ऐसे वृक्षों का बड़े पैमाने पर कटना केवल पर्यावरणीय क्षति नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे मानव और प्रकृति के सहजीवन को तोड़ने जैसा है।

भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की महत्वाकांक्षा के साथ सौर ऊर्जा को विकास की धुरी बनाया है। राजस्थान को उसकी भौगोलिक स्थिति के कारण सोलर हब के रूप में विकसित किया जा रहा है और राज्य सरकार लगभग 90 गीगावाट सौर ऊर्जा लक्ष्य का पीछा कर रही है। किंतु यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या हरित ऊर्जा का विस्तार हरियाली के विनाश की कीमत पर किया जा सकता है। पश्चिमी राजस्थान में स्थापित सोलर पार्क्स के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है, जिसमें खेजड़ी जैसे संरक्षित वृक्षों की रातोंरात कटाई की गई। अनेक मामलों में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन या तो किया ही नहीं गया, या उसे महज़ औपचारिक प्रक्रिया बनाकर छोड़ दिया गया। इसके परिणामस्वरूप पारंपरिक चरागाह भूमि नष्ट हुई, पशुपालकों की आजीविका प्रभावित हुई और मरुस्थलीय क्षेत्र में मिट्टी क्षरण की प्रक्रिया और तेज़ हो गई।

यह स्थिति सतत विकास की उस अवधारणा से सीधा टकराव है, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय को समान रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। खेजड़ी बचाओ आंदोलन इसी विरोधाभास को उजागर करता है। यह आंदोलन 2024 में स्थानीय स्तर पर उभरा, किंतु 2026 तक आते-आते एक संगठित जनांदोलन का स्वरूप ले चुका है। 2 फरवरी 2026 को बीकानेर के पॉलिटेक्निकल कॉलेज में आयोजित महापड़ाव इस संघर्ष का निर्णायक क्षण सिद्ध हुआ। बाज़ार बंद रहे, शैक्षणिक संस्थानों में अवकाश घोषित हुआ और हज़ारों की संख्या में लोग—संत, साधु, महिलाएँ और युवा—एक साझा मंच पर एकत्र हुए। यह दृश्य स्पष्ट करता है कि यह संघर्ष केवल किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक सरोकार का विषय बन चुका है।

आंदोलन के संयोजकों ने सरकार के समक्ष यह स्पष्ट चेतावनी रखी कि यदि राज्य स्तर पर सख्त वृक्ष संरक्षण कानून नहीं लाया गया, तो आंदोलन और तीव्र होगा। क्रमिक अनशन, कैंडल मार्च और कलेक्ट्रेट घेराव जैसे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक उपायों के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाया गया। 4 फरवरी तक सैकड़ों अनशनकारी दर्ज किए गए, जिनमें महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी इस आंदोलन को नैतिक और सामाजिक शक्ति प्रदान करती है। मातृशक्ति की यह भागीदारी केवल विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण आजीविका, लोकसंस्कृति और भविष्य की पीढ़ियों की चिंता को भी व्यक्त करती है।

यह आंदोलन बिश्नोई समाज की उस ऐतिहासिक चेतना से गहराई से जुड़ा है, जिसकी जड़ें 1730 के खेजड़ली कांड में मिलती हैं। अमृता देवी बिश्नोई और उनके साथ 363 लोगों द्वारा खेजड़ी के संरक्षण के लिए दिया गया बलिदान विश्व इतिहास में पर्यावरण रक्षा का प्रथम संगठित उदाहरण माना जाता है। लगभग तीन सौ वर्ष बाद उसी भूमि पर खड़ा यह आंदोलन ऐतिहासिक स्मृति और वर्तमान संघर्ष को जोड़ता है। यह निरंतरता आंदोलन को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि नैतिक वैधता भी प्रदान करती है, जो इसे सामान्य पर्यावरणीय विरोध से अलग बनाती है।

राजस्थान सरकार ने खेजड़ी को राज्य वृक्ष घोषित किया है, किंतु इसके संरक्षण के लिए प्रभावी और बाध्यकारी कानूनी ढांचे का अभाव लंबे समय से महसूस किया जा रहा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वृक्ष संरक्षण को लेकर दिए गए निर्देशों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर उनका अनुपालन कमजोर रहा है। आंदोलनकारियों की मुख्य मांग है कि पूरे राज्य के लिए एक सशक्त राजस्थान वृक्ष संरक्षण अधिनियम लागू किया जाए, जो विकास परियोजनाओं में वृक्षों की कटाई को अंतिम विकल्प बनाए, न कि पहली शर्त। कुछ जिलों में अस्थायी रोक या आंशिक आदेश इस संरचनात्मक समस्या का समाधान नहीं कर सकते।

यद्यपि आंदोलन स्वयं को अराजनीतिक बताता है, किंतु इसका प्रभाव राजनीति पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। “नो ट्री, नो वोट” जैसे नारों ने पर्यावरण को एक निर्णायक चुनावी मुद्दे के रूप में सामने ला दिया है। स्थानीय विधायक और सांसदों की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं और सामाजिक बहिष्कार जैसी चेतावनियाँ लोकतांत्रिक दबाव के नए रूप को दर्शाती हैं। यह संकेत करता है कि भारत में पर्यावरण अब केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का प्रश्न बनता जा रहा है, जिसका प्रभाव आने वाले चुनावों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

यह आंदोलन सौर ऊर्जा या विकास के विरोध में नहीं है। आंदोलनकारियों का तर्क स्पष्ट है कि ऊर्जा संक्रमण आवश्यक है, किंतु वह वन विनाश का पर्याय नहीं बन सकता। समाधान के रूप में राज्य स्तर पर सख्त वृक्ष संरक्षण कानून, सोलर परियोजनाओं में अनिवार्य हरित पट्टी, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, बंजर भूमि और रूफटॉप सोलर को प्राथमिकता तथा पुनर्वनीकरण अभियानों की मांग रखी गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन और अमेरिका जैसे देशों में अपनाए जा रहे ऐसे मॉडल, जहाँ सोलर पार्क्स के साथ जैव विविधता संरक्षण को जोड़ा गया है, भारत के लिए भी अनुकरणीय हो सकते हैं।

अंततः खेजड़ी बचाओ आंदोलन यह स्मरण कराता है कि विकास का अर्थ केवल ऊर्जा उत्पादन, निवेश और आंकड़ों तक सीमित नहीं हो सकता। यह आंदोलन लोकतंत्र की उस शक्ति को रेखांकित करता है, जिसमें साधारण नागरिक संगठित होकर नीतियों की दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं। एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि खेजड़ी बचाओ आंदोलन भारतीय पर्यावरण आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बनने की क्षमता रखता है। यदि सरकार संवाद, संतुलन और संवेदनशील नीति का मार्ग अपनाती है, तो यह संघर्ष टकराव के बजाय सतत विकास का उदाहरण बन सकता है। खेजड़ी को बचाना केवल एक वृक्ष को बचाना नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की पहचान, थार की पारिस्थितिकी और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है।

−डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत ने दलहन आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाये कदम

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बाल मुकुन्द ओझा

अंतर्राष्ट्रीय दलहन दिवस हर साल 10 फरवरी को मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम विश्व की दलहन: सादगी से उत्कृष्टता की ओर रखी गई है। यह दिवस पहली बार वर्ष 2016 में मनाया गया था। बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 फरवरी को विश्व दाल दिवस के रूप में मनाने के लिए प्रस्ताव पारित किया था। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि दालें न केवल पोषक हैं बल्कि विश्व की भूख और गरीबी को मिटाने की दिशा में स्थायी खाद्य प्रणालियों के विकास में भी योगदान दे सकती हैं। विश्व दलहन दिवस मनाने के पीछे का मकसद मिट्टी की उत्पादकता में सुधार और दालों की उत्पादकता, कृषि प्रणालियों में लचीलापन, किसानों के लिए बेहतर जीवन और खेती के सही तरीकों को बढ़ावा देना है। साथ ही दालों की उपयोगिता से जन जन को अवगत करना है।

विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आत्मनिर्भर भारत आवश्यक है और दलहन में आत्मनिर्भरता इसकी एक अहम कड़ी है। आज दालें आयात करना हमारे लिए गर्व का विषय नहीं, बल्कि शर्म की बात है। हमारा लक्ष्य है कि भारत आने वाले समय में दालों का निर्यातक देश बने।  दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के तहत बीज से लेकर बाज़ार तक पूरी वैल्यू चेन पर सरकार की निगरानी रहेगी, ताकि उत्पादन बढ़े और किसानों को बेहतर मूल्य मिल सके। भारत दलहन का सबसे बड़ा उत्‍पादक देश है। भारत में सालाना दलहन की मांग करीब 250 लाख मीट्रिक टन से अधिक है। भारत विश्‍व में पैदा होने वाली कुल दालों का लगभग 25 फीसदी उत्‍पादन करता है। दालों की सबसे ज्यादा खपत भी भारत में होती है। दालें खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण हैं। यह देश और दुनिया की एक बड़ी आबादी का प्रमुख भोजन हैं। दालों की खेती करने वाले किसानों के लिए यह आय का महत्वपूर्ण स्त्रोत है। हमारी बदलती लाइफ स्टाइल और फास्ट फूड के बेहद प्रचलन के कारण आहार में दालों का सेवन कम हो गया है। दाल की कमीं से शरीर को पूरा पोषण नहीं मिलता है। दाल के सेवन से हमें प्रोटीन मिलता है और हमारा शरीर मजबूत बनता है। दाल के सेवन से कई बीमारियों से छुटकारा पा सकते हैं। दाल कई तरह की होती हैं जैसे चना दाल, अरहर दाल, मसूर दाल , सोया दाल आदि। विभिन्न किस्मों की दालों का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। इसमें मूंग दाल को सबसे ज्यादा उपयोगी बताया जाता है। मूंग दाल में कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम और कई विटामिन्स पाए जाते हैं  जो कई बीमारियों को रोकने में सहायक होते हैं।  आहार विशेषज्ञों के अनुसार मूंग दाल में फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है जो बदहजमी और जलन की समस्या को दूर करने में मदद करता है। इसके सेवन से पाचन शक्ति मजबूत हो सकती है। इसके अलावा कुलथी की दाल को सेहत का खजाना कहा जाता है। यह दाल दक्षिण भारत में अधिक पाई जाती है। इस दाल में पाए जाने वाले पौष्टिक तत्व बवासीर, कोलेस्ट्रॉल, मोटापा समेत कई बीमारियों को दूर भगाने की क्षमता रखते हैं। अरहर की दाल में कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, जिंक, कॉपर, सिलेनियम, मैंगनीज, प्रोटीन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। अरहर की दाल का पानी डायबिटीज के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। इसी भांति मसूर दाल के सेवन से डायबिटीज़, मोटापा, कैंसर और हार्ट प्रॉब्लम्स जैसे समस्याएं दूर रहती हैं। चना दाल में जिंक, प्रोटीन, कैल्शियम व फोलेट पाया जाता है। उड़द दाल में  भरपूर मात्रा में फाइबर होता है

हमारे जीवन में दालों का बहुत महत्त्व है। अमूमन प्रत्येक घर में रोजाना दाल बनती है। जिसे बच्चे से बुजुर्ग तक बड़े चाव से सेवन करते है। लंच हो या फिर रात का डिनर।  दाल के बिना खाना कुछ अधूरा सा लगता है और दाल में भी मूंग, अरहर और मसूर की दाल को सबसे पौष्टिक माना जाता है। लेकिन अब आपको सतर्क होने की जरूरत है क्योंकि जिस दाल को आप हेल्दी समझकर खा रहे हैं वह आपके शरीर के लिए जहरीली साबित हो सकती है। दाल को स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। चिकित्सकों के अनुसार छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और विभिन्न बीमारियों के दौरान मरीजों को दाल का पानी पीने की सलाह दी जाती है। हम दलहन दिवस जरूर मना रहे है और एक कटोरी दाल के ढेर सारे फायदे भी बता रहे है। मगर दालों के भाव आसमान को छू रहे है। यह गरीबों की थाली में तभी आएगी जब सस्ती होगी। हमें इस और भी ध्यान देना होगा, तभी इस दिवस की सार्थकता प्रकट होंगी।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32 मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

भाजपा राज में सावरकर को भारत रत्न क्यों नहीं मिला

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                                                   बाल मुकुन्द ओझा

हिंदुत्व के प्रबल पैरोकार वीर सावरकर एक बार फिर चर्चा में है। इस बार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संघ चालक मोहन भागवत के एक बयान के बाद सावरकार को भारत रत्न से सम्मानित करने की जोरदार मांग की जा रही है। सावरकर कभी संघ के स्वयंसेवक नहीं रहे है। वे हिंदू महासभा के नेता थे। बकौल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सावरकर संघ की आलोचना भी करते रहते थे। इसके बावजूद संघ स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान और हिंदुत्व के प्रबल पैरोकार के रूप में उनका जोरदार समर्थन करती रही है। भाजपा शासन और संघ की मांग के बावजूद सावरकर को भारत रत्न नहीं मिलना विचारणीय है। यहाँ तक की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने भी सावरकर पर डाक टिकट जारी कर उनके स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान पर मुहर लगाई थी। मगर उनके पोते राहुल गाँधी सावरकर के माफ़ी वाले बयान पर उद्वेलित रहते है। देश की कई अदालतों में इस पर उनके खिलाफ मुक़दमे भी चल रहे है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि सावरकर को किसी पुरस्कार की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे पहले ही देशवासियों के दिलों में स्थान बना चुके हैं। हालांकि यदि उन्हें भारत रत्न दिया जाता है तो यह सम्मान खुद इस पुरस्कार की गरिमा बढ़ाएगा। मुंबई में आयोजित ‘संघ यात्रा के 100 साल : नए क्षितिज’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने भारत रत्न दिए जाने में हो रही देरी पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “मैं उस समिति का हिस्सा नहीं हूं जो इस पर फैसला करती है, लेकिन अगर किसी से मुलाकात होगी तो जरूर पूछूंगा कि इसमें देरी क्यों हो रही है।  अगर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है तो यह पुरस्कार के लिए ही सम्मान होगा और उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ेगी। बिना किसी सम्मान के भी सावरकर जनता के दिलों पर राज करते हैं। देश में पिछले ग्यारह वर्षों से भाजपा का शासन है, इसके बावजूद सावरकर को अब तक भारत रत्न नहीं देना भी चर्चा का विषय बना है।

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे सावरकर । हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को जाता है। 1924 से 1937 का समय इनके जीवन का समाज सुधार को समर्पित काल रहा। वीर-विनायक दामोदर सावरकर, ऐसे महान क्रांतिकारी जिनकी पुस्तकें मुद्रित और प्रकाशित होने से पहले ही जब्त घोषित कर दीं, सावरकर वे पहले कवि थे, जिसने कलम-कागज के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं वो विश्व के एकमात्र ऐसे शक्स थे, जिन्हें दो जन्मो की काले पानी की सजा एक साथ दी गयी थी। तब उन्होंने जज को बधाई देते हुए कहा की चलो अच्छा है की आपने हिंदुत्व के पुनर्जन्म को माना फिर जज ने जब कहा की मिस्टर सावरकर अब आप मरते दम तक अंदमान की बदनाम सेलुलर जेल में बंद रहेंगे तब पुरे आत्मविश्वास से सावरकर के कहा की मै तब तक नही मरूँगा जब तक मेरी मातृभूमि गुलाम है । मै आजादी का सूरज देखे बिना नही मर सकता ..और उनकी ये बात सत्य हुई।

आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व त्यागने वाले महान देशभक्त विनायक दामोदर सावरकर देश में व्याप्त गन्दी सियासत के शिकार हुए है, ऐसा मानने वालों की देश में कमी नहीं है। सावरकर ने अपनी पूरी जवानी अंग्रेजों की जेल में जुल्म ज्यादती में गंवा दी। सावरकर को दो जन्मों की काले पानी की सजा एक साथ दी गयी थी। यहाँ सावरकर ने लगभग बीस साल बिताये थे। यही उनकी त्याग और तपस्या का उजला पक्ष कहा जायेगा। दादी ने जिसको सम्मानित किया पोता उसे अपमानित करने पर तुला है। इंदिरा गाँधी ने वीर सावरकर को स्वतंत्रता आंदोलन का आधारस्तंभ और भारत का सदा याद रहने वाला सपूत कहती है। वहीँ राहुल गाँधी सावरकर को अंग्रेजों से माफ़ी मांगने वाला और सर्वेंट के रूप में प्रस्तुत करने वाला बताते है। इंदिराजी ने सावरकर पर डाक टिकट जारी कर उनके स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान पर मुहर लगाई थी। यह भी अकाट्य सत्य है की सावरकर को काले पानी की सजा हुई थी। सावरकर सेल्युलर जेल या अंग्रेजों की सख्त नजरबंदी में रहे। ऐसी सजा बहुत कम सेनानियों को मिली थी। गांधीजी भी ऐसा मानते थे। गाँधी जी ने कभी उनकी देश भक्ति पर सवाल नहीं उठाए। मगर जब से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सावरकर का गुणगान शुरू किया तब से कांग्रेस ने सावरकर के खिलाफ अपनी मुहीम तेज़ कर दी जिसके परिणाम स्वरुप राहुल सावरकर की मौत के 57 साल बाद  भी उन पर हमला करते रहते है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

इतिहास में 10 फरवरी : 1952 में जब भारत के लोकतंत्र ने भरी पहली उड़ान

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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में आज चुनाव एक सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन आजादी के तुरंत बाद यह राह आसान नहीं थी। 1952 में हुए पहले आम चुनाव ने यह तय करना था कि भारत लोकतांत्रिक व्यवस्था को व्यवहार में कितना सफल बना पाता है।

1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू अंतरिम सरकार का नेतृत्व कर रहे थे, पर देश को एक स्थायी, जनता द्वारा चुनी गई सरकार चाहिए थी। संसाधनों की कमी, व्यापक अशिक्षा और विशाल भौगोलिक विस्तार जैसी चुनौतियों के बीच चुनाव कराना अपने आप में एक ऐतिहासिक प्रयोग था।

10 फरवरी 1952 का दिन इसलिए खास बन गया क्योंकि इस दिन लोकसभा चुनाव के नतीजों ने लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती दी। नेहरू के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 489 में से 249 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया, जबकि कई सीटों के परिणाम अभी आने बाकी थे।

इन चुनावों ने दुनिया को संदेश दिया कि नया आजाद भारत लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गंभीर है। यही वह क्षण था जब भारतीय लोकतंत्र ने अपनी पहली ठोस उड़ान भरी, जो आज भी लगातार आगे बढ़ रही है।

महत्वपूर्ण घटनाचक्र

1495 – इंग्लैंड में सर विलियम स्टैनली को मौत के घाट उतार दिया गया।

1616 – ब्रिटेन के राजदूत सर थॉमस रो मुग़ल शासक जहांगीर के दरबार अजमेर में आये।

1763 – पेरिस संधि के तहत फ़्रांस ने कनाडा ब्रिटेन को दे दिया।

1763 – पेरिस की संधि से फ्रांसीसी – भारतीय युद्ध की समाप्ति।

1811 – रूसी सैनिकों ने बेलग्रेड पर कब्ज़ा किया।

1817 – ब्रिटेन, प्रसिया, आस्ट्रिया और रूस ने फ़्रांस से अपनी फ़ौजें हटाने की घोषणा की।

1818 – अंग्रेजों तथा मराठा के बीच तीसरा तथा अंतिम युद्ध रामपुर में लड़ा गया।

1828 – दक्षिण अमेरिकी क्रान्तिकारी साइमन बोलिवार कोलंबिया के शासक बने।

1846 – अंग्रेजों ने सोबरांव की लड़ाई में सिखों को पराजित किया।

1848 – फर्नीनांड प्रथम ने नया संविधान लागू किया।

1879 – अमेरिका के कैलिफोर्निया थियेटर में पहली बार रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल किया गया।

1890 – रूसी लेखक बोरिस पेस्टरनाक का जन्म।

1904 – जापान तथा रूस ने युद्ध की घोषणा की।

1912 – ब्रिटेन के किंग जार्ज पंचम तथा क्वीन मैरी भारत से रवाना।

1916 – ब्रिटेन में सैन्य भर्ती शुरू हुआ।

1918 – सोवियत नेता लियो ट्रोटस्की ने रूस के प्रथम विश्व युद्ध से हटने की घोषणा की।

1921 – काशी विद्यापीठ का उद्घाटन गांधी जी ने किया।

1921 – ड्यूक ऑफ कनॉट ने इंडिया गेट की नींव रखी।

1929 – जे.आर.डी. टाटा पायलट लाइसेंस पाने वाले पहले भारतीय बने।

1931 – दिल्ली भारत की राजधानी बनी।

1933 – जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने मार्क्सवाद के समाप्त होने की घोषणा की।

1939 – जापानी सैनिकों ने हेनान द्वीप, चीन पर अधिकार कर लिया।

1947 – नीदरलैंडस रेडियो यूनियन की स्थापना।

1943 – द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सैनिक टयूनिशिया की सीमा पर पहुंचे।

1952 – आजादी के बाद पहले लोकसभा चुनाव में पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने बहुमत का आंकड़ा पार कर देश में लोकतंत्र की स्थापना का शंखनाद किया।

1959 – अमेरिका के सेंट लुईस में तूफान से 19 की मौत 265 घायल।

1961 – अमेरिका ने वेस्टइंडीज में अनेक स्थानों पर अपना दावा छोड़ा।

1961 – कनाडा में नियाग्रा जल प्रपात की पनबिजली परियोजना से बिजली का उत्पादन शुरू।

1966 – यूरोपीय देश बेल्जियम में हारमेल की सरकार ने इस्तीफ़ा दिया।

1969 – पश्चिम बर्लिन यात्रा पर जर्मन प्रतिबंध को अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस ने अस्वीकार कर दिया।

1972 – सोवियत संघ ने पूर्वी कजाखस्तान में परमाणु परीक्षण किया।

1974 – इराक ने सीमा संघर्ष में 70 ईरानी सैनिकों को मारने का दावा किया।

1979 – ईटानगर को अरुणाचल प्रदेश की राजधानी बनाया गया।

1981 – खगोलविद राय पेंथर द्वारा धूमकेतु की खोज।

1984 – सोवियत राष्ट्रपति यूरी आंद्रोपोव का देहांत।

1989 – अमेरिका ने नवादा परीक्षण-स्थल पर परमाणु परीक्षण किया।

1990 – बृहस्पति की ओर जाते हुए अंतरिक्ष यान गैलीलियो शुक्र ग्रह के सामने से गुजरा।

1991 – पेरू में हैजे से 51 लोगों की मौत।

1991 – सोवियत संघ से आजादी के लिए यूरोपीय देश लिथुआनिया में मतदान।

1992 – अंडमान और निकोबार द्वीप विदेशी पर्यटकों के लिए खुला।

1996 – आईबीएम सुपर कम्प्यूटर ‘डीप ब्ल्यू’ ने शतरंज में गैरी कास्परोव को हराया।

1998 – पर्यावरण सुधार कार्यक्रमों के लिए 35 देशों द्वारा ‘ग्लोबल इनवायरमेंट फेसिलिटी’ पर अंतरराष्ट्रीय समझौता सम्पन्न।

1998 – पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ द्वारा ‘पाकिस्तान-2000’ नामक कार्यक्रम की घोषणा।

2001 – होनोलूलू में अमेरिकी आणविक पनडुब्बी जापानी नौका से टकराई, 10 छात्र लापता।

2004 – बगदाद में पुलिस स्टेशन के बाहर हुए कार बम विस्फोट में 45 लोगों की मौत हो गई।

2005 – सुरक्षा परिषद की भारतीय दावेदारी के समर्थन में डेमोक्रेट सांसद फ़्रैंक पालोन ने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक पेश किया।

2006 – नेपाल के नगर-निगम चुनाव में राजा समर्थकों ने जीत दर्ज की।

2008 – श्रीलंका के उत्तर में सैनिकों व लिट्टे के बीच हुए संघर्ष में 42 विद्रोही मारे गये।

2009 – सोमालिया तट पर भारत-रूस की नौसेनाओं का संयुक्त अभ्यास प्रारम्भ हुआ।

2009 – प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित भीमसेन जोशी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

2010 – पाकिस्तान में पेशावर के नजदीक खैबर दर्रा इलाके में पुलिस अधिकारियों के काफिले पर आत्मघाती हमला। 13 पुलिस अधिकारियों सहित 17 लोगों की मौत हुई।

2013 – इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में कुंभ मेले के दौरान भगदड़ मचने से 36 लोगों की मौत हो गई जबकि 39 अन्य लोग घायल हो गए।

जन्म

1805 – कुरिआकोसी इलिआस चावारा – केरल के सीरियन कैथॉलिक संत तथा समाज सुधारक।

1915 – सुरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव -प्रसिद्ध लेखक थे।

1916 – दरबारा सिंह – पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्री थे।

1935 – परमानन्द श्रीवास्तव – हिन्दी के शीर्ष आलोचकों में गिने जाने वाले प्रतिष्ठित साहित्यकार थे।

1970 – कुमार विश्वास- हिन्दी मंच के कवि।

निधन

1858 – राजा बख्तावर सिंह – मध्य प्रदेश के धार जिले के अमझेरा कस्बे के शासक थे।

1975- सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ – प्रसिद्ध हिन्दी कवि।

1995- गुलशेर खां शानी – प्रसिद्ध साहित्यकार

उत्तरी नाइजीरिया में ट्रक पलटा, 30 लोगों की मौत

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अबुजा (नाइजीरिया), 09 फरवरी (हि.स.)। उत्तरी नाइजीरिया के कानो में यात्रियों से भरा एक ट्रक दुर्घटनाग्रस्त होकर सड़क पर पलट गया। हादसे में कम से कम 30 लोगों की मौत हो गई। अधिकारियों ने रविवार को बताया कि ड्राइवर के लापरवाही से ट्रक चलाने के कारण यह हादसा हुआ। हादसे में कम से कम 30 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। घायलों को कानो के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

अमेरिका के चैनल एबीसी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, इस हादसे पर कानो के गवर्नर के कार्यालय ने बयान जारी किया है। इसमें कहा गया है कि यह ट्रक कानो के गेजावा लोकल गवर्नमेंट एरिया के क्वानार बार्डे शहर में एक हाइवे पर रविवार सुबह अनियंत्रित होकर पलट गया। ट्रक में गुजुंग शहर के यात्री सवार थे।

कानो के गवर्नर अब्बा कबीर यूसुफ के प्रवक्ता सुनुसी बटुरे डावाकिन टोफा ने कहा कि घायलों में से कई की हालत गंभीर हैं। बयान में कहा गया है, “गवर्नर ने इस घटना को दिल दहला देने वाला और न केवल प्रभावित परिवारों के लिए बल्कि पूरे कानो राज्य के लोगों के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।”

इससे पहले दिसंबर में नाइजीरिया में हुए कार हादसे में ब्रिटिश हेवीवेट चैंपियन एंथनी जोशुआ घायल हो गए थे और उनके दो करीबी सहयोगियों की मौत हो गई थी। उनके ड्राइवर ने लागोस – इबादान एक्सप्रेस-वे पर एक खड़े ट्रक से कार टकरा दी थी।

टीआरटी वर्ल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, कानो के गवर्नर अब्बा कबीर यूसुफ ने जीवित बचे लोगों के लिए मुफ्त मेडिकल देखभाल का आदेश दिया है। नाइजीरिया में सड़क दुर्घटनाएं अकसर होती रहती हैं। सड़कों का नेटवर्क खराब है। हाइवे नियमों का शायद ही कभी पालन किया जाता है। 2023 में देश की फेडरल रोड सेफ्टी बॉडी ने कहा था कि देश भर में 9,570 सड़क दुर्घटनाओं में 5,421 लोगों की मौत हुई।