कौन संत कौन ‘असंत’ ? सांसत में भक्तजन                                                                         

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−निर्मल रानी

कहने को तो ‘बांटो और राज करो ‘ की नीति अंग्रेज़ों की बनाई हुई थी। परन्तु आज सत्ता हासिल करने के लिये या सत्ता में बने रहने के लिये यही नीति लगभग दुनियाभर के राजनीतिज्ञों द्वारा अपनाई जा रही है। ज़ाहिर है हमारा देश और यहाँ की राजनीति भी इससे अछूती नहीं है। और कहना ग़लत नहीं होगा कि ‘बांटो और राज करो ‘ की नीति का अनुसरण भले ही मौक़ा मिलने पर सारे ही दल क्यों न करते हों परन्तु देखा यही जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी व इसकी सरकारों को इस मामले में कुछ ज़्यादा ही महारत हासिल है। आप देखिये कि स्वयं को मज़बूत व विपक्ष को कमज़ोर करने के लिये विपक्षी दलों ख़ासकर कांग्रेस के कितने ही नेता भाजपा ने अपने पाले में कर लिये। चाहे वह भ्रष्टाचार का आरोपी हो,आरोपी हो,अपराधी हो या भ्रष्ट हो परन्तु भाजपा में शामिल होते ही उसे ‘मिस्टर क्लीन ‘ का प्रमाण पत्र दे दिया जाता है। ऐसे कितने ही भ्रष्ट लोग आज मंत्री सांसद व विधायक यहाँ तक कि मुख्यमंत्री तक बने हुए हैं। 

                        इसी तरह जब भारत में इतिहास का सबसे प्रमुख किसान आंदोलन 9 अगस्त 2020 से 11 दिसंबर 2021 तक चला था !इसमें केंद्र सरकार के तीन विवादित कृषि क़ानूनों के विरोध में देश के किसान दिल्ली बॉर्डर पर बैठे थे। उस समय भी भाजपा सरकार ने तरह तरह के हथकंडे अपनाये थे। उनमें एक हथकंडा किसान आंदोलन में शामिल संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल किसान संगठनों में फूट डालना भी शामिल था। चूँकि इस आंदोलन में पंजाब व हरियाणा के सिख बड़ी संख्या में शामिल थे इसलिये भाजपा सरकार के कई मंत्रियों ने इसे ‘ख़ालिस्तानी समर्थक’ आंदोलन बताने की भी कोशिश की। परन्तु किसानों की एकजुटता के आगे यह सरकारी एजेंडा फुस्स हो गया। याद कीजिये जब कभी सत्ता के ख़िलाफ़ देश की विशिष्ट हस्तियां या पूर्व जज अथवा पूर्व आई ए एस एकजुट हुये या फ़िल्म जगत के लोग,लेखक,साहित्यकार आदि ने सत्ता की नाकामियां उजागर करने के लिये आवाज़ें उठाएँ उसी वक़्त सत्ता ने भी इन्हीं वर्ग विशेष से सम्बद्ध अपने समर्थकों को खड़ा कर दिया। पिछली बार तो सत्ता को अपनी इन कोशिशों में उस समय शर्मिंदा भी होना पड़ा जबकि सत्ता के समर्थन में खड़े होने वाले कई तथाकथित ‘विशिष्ट ‘ लोगों के भ्र्ष्ट व काले कारनामों का रिकार्ड भी विपक्ष ने ढूँढकर सार्वजनिक कर दिया। 

                   बहरहाल अफ़सोस यह है कि भाजपा की ‘बांटो और राज करो ‘ की नीति की ज़द में अब साधु संत भी आ चुके हैं। जो भी संत भाजपा की किसी भी नीति की आलोचना करते हैं या एक संत के नाते शास्त्र सम्मत बातें करते हैं या कुछ ऐसी व्यवस्था देते हैं जो कि राजनैतिक होने के बजाये शुद्ध धार्मिक हो, उसे भाजपा सहन नहीं कर पाती। देश में अनेकानेक ऐसे योग्य संत हैं जो धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहते हैं वह भाजपा की सत्ता या उसके प्रभाव में क़तई नहीं आते। परन्तु भाजपा की तो राजनीति ही धर्म के नाम पर चलती है। इसलिये भाजपा सत्ता समर्थक संतों को तरजीह देती है और उन्हें बढ़ावा भी देती है। उदाहरण के तौर पर सोशल मीडिया की ‘कृपा ‘ से इनदिनों बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर और कथावाचक पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री का नाम चर्चा में है। दूसरों का भविष्य बताने वाले इस नवोदित संत ने कुछ वर्ष पूर्व ही सोशल मीडिया द्वारा ‘अवतार’ लिया है। इन्हें लोग ‘बाबा बागेश्वर’ या ‘बागेश्वर धाम सरकार’ के नाम से भी जानते हैं। वे मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के गढ़ा गांव में स्थित बागेश्वर धाम के प्रमुख हैं। शंकराचार्य स्तर के कई संत धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री की ज्योतिष विद्या और उनके ‘पर्ची ‘ निकालने को ढोंग व शास्त्र विरोधी बता चुके हैं। परन्तु चूँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके ‘हिन्दू राष्ट्र निर्माण मिशन ‘ के समर्थक हैं तथा उन्हें  प्रधानमंत्री का संरक्षण हासिल है लिहाज़ा उनकी गिनती सत्ता के दुलारे संतों में की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री की निकटता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नरेंद्र मोदी ने 23 फ़रवरी 2025 को बागेश्वर धाम का दौरा किया। यहाँ धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने बड़ी ही चतुराई से मोदी के गले में अपना नाम लिखा हुआ पटका तक डाल दिया। यहाँ  मोदीने एक कैंसर अस्पताल का शिलान्यास किया। प्रधानमंत्री से  इस ‘घनिष्ट निकटता’ के बाद अब धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री को किसी वरिष्ठ संत या शंकराचार्य से किसी तरह का प्रमाण पत्र लेने की ज़रुरत ही क्या ?

                            इसी तरह सत्ता के एक और प्रिय संत हैं स्वामी रामभद्राचार्य जी। भारत सरकार ने उन्हें 2015 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया है। यह भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। इसके बाद उन्हें साहित्य के क्षेत्र में 2023 के लिए सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार भी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 16 मई 2025 को प्रदान किया गया । ज्ञानपीठ भारत का सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार है। देश के सम्मानित संतों में गिनती होने के बावजूद स्वामी रामभद्राचार्य जी अपने बयानों के कारण कभी कभी विवादों में भी घिर जाते हैं। उदाहरण के तौर पर रामभद्राचार्य स्वयं को श्रेष्ठतम ब्राह्मण बता चुके हैं क्योंकि उनके अनुसार वे ‘वशिष्ठ वंशीय सरयू पारण ब्राह्मण हैं। इनका परिवार परंपरागत रूप से विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा देता रहा है। जबकि उन्होंने चौबे,उपाध्याय, त्रिगुणायत, दीक्षित, पाठक उपनामों के ब्राह्मणों को “नीच” या “अधम” कहा, क्योंकि वे विद्यार्थियों से शुल्क लेकर पढ़ाते हैं, जिसे वे गोमांस के समान पापपूर्ण मानते हैं। रामभद्राचार्य जी के अनुसार ऐसे “उच्च कुल” ब्राह्मण अपनी बेटियां अधम ब्राह्मणों को नहीं देते। रामभद्राचार्य जी के इस बयान से ब्राह्मण समाज में आक्रोश फैल गया था। वे अपने ब्राह्मण होने पर गर्व जताते हुए कहते हैं कि पहले वे ब्राह्मण हैं, फिर सन्यासी और जगद्गुरु। रामभद्राचार्य जी के कई बयानों को दलित विरोधी भी माना गया है। ख़ासकर उनके द्वारा की गयी आरक्षण, अंबेडकर और जातिगत टिप्पणियों को लेकर । वे मेरठ में अपनी एक कथा में अंबेडकर को संस्कृत न जानने वाला तथा मनुस्मृति को पहला संविधान भी बता चुके हैं। वे यह भी कह चुके हैं कि “जो राम को नहीं भजता वह चमार है”। उनके इस तरह के बयानों को उनकी जातिवादी सोच के नज़रिये से देखा गया।

                                परन्तु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी ने तो रामभद्राचार्य जी को विकलांग बताकर उनके संन्यासी होने के अधिकार को ही चुनौती दे डाली है ? शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी ने कहा कि नारद परिव्राजक उपनिषद और संन्यास उपनिषद जैसे धर्म शास्त्रों के अनुसार कोई भी शारीरिक रूप से अक्षम, जैसे नेत्रहीन अर्थात विकलांग व्यक्ति संन्यास नहीं ले सकता। वे रामभद्राचार्य को शास्त्र-विरुद्ध बताते हुए ‘ढोंगी’ और ‘संन्यास का अधिकार न होने वाला’ व्यक्ति कहते हैं। उनका तर्क है कि विकलांग व्यक्ति संन्यासी नहीं हो सकता, इसलिए रामभद्राचार्य (जो जन्म से नेत्रहीन हैं) खुद को जगद्गुरु या संन्यासी कहकर घूम रहे हैं, जो शास्त्र-विरुद्ध है। अब भक्तों को कैसे पता चले कि अविमुक्तेश्वरानंद जी ठीक कह रहे हैं या रामभद्राचार्य जी ? उधर रामभद्राचार्य जी भी अविमुक्तेश्वरानंद जी को शंकराचार्य मानने से इंकार करते हैं। ज़ाहिर है इन हालत में भक्तजन इस बात को लेकर सांसत में हैं कि कौन संत है और कौन असंत ?                                                               

      निर्मल रानी 

योगी सरकार ने नौ लाख 12 हजार 696 करोड़ से अधिक का बजट पेश किया

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लखनऊ, 11 फरवरी (हि. स.)। उत्तर प्रदेश सरकार के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने बुधवार को विधानसभा में 09 लाख 12 हजार करोड़ 696 करोड़ 35 लाख रुपये का बजट पेश किया। वित्तीय वर्ष 2025-26 की तुलना में लगभग 12.9 प्रतिशत अधिक है। इस बजट में पूंजीगत परिव्यय 19.5 प्रतिशत है। शिक्षा तथा चिकित्सा के लिए आवंटन कुल बजट का क्रमशः 12.4 प्रतिशत एवं 6 प्रतिशत है। कृषि और सम्बद्ध सेवाओं के लिए आवंटन कुल बजट का नौ फीसदी है।

वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि इस बजट में 43 हजार 565 करोड़ 33 लाख रुपये की नई योजनाएं सम्मिलित की गयी हैं। वित्तीय वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटा की सीमा तीन फीसदी रखी गयी है जो 2030-31 तक लागू रहेगी। वर्ष 2016 के मुकाबले डकैती, लूट, हत्या, बलवा और फिरौती के लिए अपहरण के मामलों में क्रमशः 89 फीसदी, 85 प्रतिशत, 47 फीसदी, 70 फीसदी और 62 फीसदी की कमी आई है।

उन्हाेंने बताया कि चिकित्सा शिक्षा के लिए 14 हजार 997 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी है। चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के लिए 37 हजार 956 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। यह पिछले साल की तुलना में 15 फीसदी अधिक है। आयुष सेवाओं के लिए लगभग दो हजार 867 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी है। अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास की योजनाओं के लिए 27 हजार 103 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। यह पिछले साल की तुलना में 13 फीसदी अधिक है।

बजट में एमएसएमई सेक्टर की योजनाओं के लिए तीन हजार 822 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी है। यह पिछले साल से 19 फीसदी अधिक है। हतकरघा एवं वस्त्रोद्योग की योजनाओं के लिए लगभग पांच हजार 41 करोड़ की व्यवस्था की गयी है। यह पिछले साल की तुलना में पांच गुना अधिक है। आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक की योजनाओं के लिए 2059 करोड रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। पिछले साल की तुलना में या 76 प्रतिशत अधिक है। सड़कों एवं सेतु के निर्माण, चौड़ीकरण एवं अनुरक्षण के लिए 34 हजार 468 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण योजनाओं के लिए 18 हजार 290 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। यह वर्ष 2025-26 की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक है। नमामि गंगे एवं ग्रामीण जलापूर्ति हेतु लगभग 22 हजार 676 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।

बजट में ऊर्जा क्षेत्र की योजनाओं के लिए 65हजार 926 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। यह पिछले साल के मुकाबले आठ फीसदी अधिक है। आवास एवं शहरी नियोजन के लिए सात हजार 705 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। नगर विकास के लिए लगभग 26हजार 514 करोड़ रुपये की व्यवस्था का प्रस्ताव है। एक जनपद एक व्यंजन के लिए 75 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। नागरिक उड्डयन हेतु दो हजार 111 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।पंचायती राज की योजनाओं के लिए लगभग 32 हजार 90 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। यह पिछले साल की तुलना में 67 फीसदी अधिक है। छुट्टा गोवंश के रखरखाव के लिए 2000 करोड़ रुपये तथा वृहद को संरक्षण केदो की स्थापना के लिए 100 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत पुरुष एवं महिला घटक हेतु क्रमशः 195 करोड़ तथा 115 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है।

उन्हाेंने बताया कि बेसिक शिक्षा के लिए 77 हजार 622 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। माध्यमिक शिक्षा के लिए 22 हजार 167 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है। पिछले साल से 15 फीसदी अधिक है। उच्च शिक्षा के लिए लगभग 6591 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। प्राविधिक शिक्षा के लिए दो हजार 365 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। व्यावसायिक शिक्षा के बजट में पिछले साल के मुकाबले 88 फ़ीसदी की वृद्धि करते हुए लगभग तीन हजार 349 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। महिला एवं बाल विकास की योजनाओं के लिए लगभग 18 हजार 620 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। पिछड़ा वर्ग कल्याण की योजनाओं के लिए तीन हजार 402 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। वहीं अल्पसंख्यक कल्याण की योजनाओं के लिए दो हजार 058 करोड़ रुपये की व्यवस्था प्रस्तावित है।

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महान चिंतक, समाज-सुधारक और देशभक्त स्वामी दयानन्द सरस्वती

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बाल मुकुन्द ओझा

उन्नीसवीं शताब्दी के महान समाज-सुधारकों में स्वामी दयानंद सरस्वती का नाम अत्यंत श्रध्दा के साथ लिया जाता है। स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक, महान चिंतक, समाज-सुधारक और देशभक्त थे। स्वामी जी का जन्म 12 फरवरी 1824 को हुआ। जिस समय भारत में चारों ओर पाखंड और मूर्ति -पूजा का बोल-बाला था। स्वामी जी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने भारत में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए 1876 में हरिव्दार के कुंभ मेले के अवसर पर पाखण्डखंडिनी पताका फहराकर पोंगा-पंथियों को चुनौती दी। उन्होंने फिर से वेद की महिमा की स्थापना की। उन्होंने एक ऐसे समाज की स्थापना की जिसके विचार सुधारवादी और प्रगतिशील थे। 

हिंदू पंचांग के अनुसार, स्वामी दयानंद सरवती का जन्म फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को होता है। स्वामी जी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में दयानंद सरस्वती जयंती मनाई जाती है। उन्होंने अपने समय में समाज में फैली बाल विवाह, सती प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों के प्रति न केवल समाज को जागरूक किया बल्कि इन्हें दूर करने में भी काफी योगदान दिया। अपने परिवार से प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद, वह एक महान वैदिक विद्वान के रूप में उभरे। उन्होंने सांसारिक जीवन को त्याग दिया और ज्ञान और सत्य की खोज में भारत के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में चले गए। स्वामी दयानंद अपना सर्वस्व जीवन राष्ट्रहित के उत्थान, समाज में प्रचलित अंधविश्वासों और कुरीतियों को दूर करने के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी ओजस्वी विचारों से समाज में नव चेतना का संचार जागृत किया।  उन्होंने वेदों को सर्वोच्च माना और वेदों का प्रमाण देते हुए समाज में फैली कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने सन् 1874 में अपने कालजयी ग्रन्थ ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ की रचना की। वर्ष 1908 में इस ग्रन्थ का अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किया गया। इसके अलावा उन्होंने कुल मिलाकर उन्होंने 60 पुस्तकें, 14 संग्रह, 6 वेदांग, अष्टाध्यायी टीका, अनके लेख लिखे जिनमें ‘ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका’, ‘संस्कार-विधि’, आर्याभिविनय आदि अनेक विशिष्ट ग्रन्थों की रचना की।

अपने 59 वर्ष के जीवन में महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने राष्ट्र में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ लोगो को जगाया और अपने ज्ञान प्रकाश को देश में फैलाया। उन्होंने अपने कार्यो से समाज को नयी दिशा एवं उर्जा दी। महात्मा गाँधी जैसे कई महापुरुष स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचारों से प्रभावित थे। धर्म सुधार हेतु अग्रणी रहे दयानंद सरस्वती ने 1875 में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की थी। वेदों का प्रचार करने के लिए उन्होंने पूरे देश का दौरा करके पंडित और विद्वानों को वेदों की महत्ता के बारे में समझाया।

दयानंद सरस्वती जी ने अंग्रेजों के खिलाफ भी कई अभियान चलाए। जिससे अँग्रेजी सरकार स्वामी दयानंद से बुरी तरह तिलमिला गयी और स्वामीजी से छुटकारा पाने के लिए, उन्हें समाप्त करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचे। 1857 की क्रांति में भी स्वामी जी ने अपना अमूल्य योगदान दिया अंग्रेजी हुकूमत से जमकर लोहा लिया, स्वामी दयानंद सरस्वती वैदिक धर्म में विश्वास रखते थे उन्होंने राष्ट्र में व्याप्त कुरीतियों एवम अन्धविश्वासो का सदैव विरोध किया । उन्होंने ही सबसे पहले वर्ष 1876 में ‘स्वराज‘ का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जी ने आगे बढ़ाया।

दयानन्द सरस्वती जी ने विधवा नारियों के पुनर्विवाह के लिये अपना मत दिया और लोगो को इस ओर जागरूक किया। स्वामी जी ने सदैव नारी शक्ति का समर्थन किया उनका मानना था कि नारी शिक्षा ही समाज का विकास हैं। पति के साथ पत्नी को भी उसकी मृत्यु शैया पर अग्नि को समर्पित कर सती करने की अमानवीय सतीप्रथा का भी उन्होने विरोध किया। उन्होंने नारी को समाज का आधार कहा और कहा उनका शिक्षित होना जरुरी हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिन्दी भाषा को अपनाया। उनकी सभी रचनाएं और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश’ मूल रूप में हिन्दी भाषा में लिखा गया।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपु

 क्यों गायब हो रहे बच्चे?

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(हरियाणा में हर दिन औसतन 12 बच्चे लापता—क्या यह सिर्फ गुमशुदगी है या संगठित मानव तस्करी का खामोश जाल?)

घर से निकले बच्चे जब वापस नहीं लौटते, तो सवाल सिर्फ “कहां गए” का नहीं रहता—सवाल यह भी होता है कि किसने उन्हें गायब किया। आंकड़े बता रहे हैं कि गुमशुदगी अब व्यक्तिगत हादसा नहीं, बल्कि एक गहराता सामाजिक और आपराधिक संकट बन चुकी है।

-डॉ. प्रियंका सौरभ

हरियाणा में गुमशुदगी के बढ़ते मामले अब केवल पुलिस रजिस्टरों या अख़बारों की सुर्खियों तक सीमित नहीं रहे हैं। ये मामले उन हजारों परिवारों की अनकही पीड़ा हैं, जिनके घरों से कोई सदस्य काम, पढ़ाई या रोज़मर्रा के काम के लिए निकला और फिर कभी वापस नहीं लौटा। हर दिन औसतन 12 बच्चों का लापता होना और वर्ष 2025 में 17,500 से अधिक गुमशुदगी के मुकदमों का दर्ज होना, किसी भी संवेदनशील समाज के लिए गहरी चिंता का विषय होना चाहिए। यह स्थिति न सिर्फ कानून-व्यवस्था की चुनौती है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

गुमशुदगी का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसके पीछे अब केवल व्यक्तिगत विवाद, घरेलू कारण या आकस्मिक घटनाएं नहीं रहीं। जांच में बार-बार यह संकेत मिल रहे हैं कि कई मामलों की जड़ें मानव तस्करी जैसे संगठित अपराधों से जुड़ी हुई हैं। पुलिस के अनुसार करीब 75 प्रतिशत मामलों को ट्रेस कर लिया गया है, लेकिन शेष 25 प्रतिशत अधूरे मामले ही असली चिंता का कारण हैं। यही वे मामले हैं जिनमें लापता व्यक्ति का कोई सुराग नहीं मिलता और जिनके पीछे अंतरराज्यीय गिरोह, अवैध प्लेसमेंट एजेंसियां और आर्थिक शोषण के नेटवर्क काम कर रहे होते हैं।

विशेष चिंता इस बात की है कि महिलाएं और नाबालिग बच्चे इस संकट का सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं। बेहतर रोजगार, उज्ज्वल भविष्य या शिक्षा का सपना दिखाकर बच्चों और युवाओं को उनके घरों से दूर ले जाया जाता है। कई बार माता-पिता खुद मजबूरी में बच्चों को ऐसे एजेंटों के हवाले कर देते हैं, जिन्हें वे भरोसेमंद समझते हैं। बाद में वही भरोसा परिवारों के लिए जीवनभर का पछतावा बन जाता है। बिहार, झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्यों से जुड़े नेटवर्क इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह समस्या स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फैले संगठित अपराध का हिस्सा है।

हरियाणा में भिक्षावृत्ति और बालश्रम से मुक्त कराए गए 350 से अधिक बच्चों के मामले इस सच्चाई को और उजागर करते हैं। चौक-चौराहों, बस अड्डों और धार्मिक स्थलों पर दिखाई देने वाले ये बच्चे किसी संयोग का परिणाम नहीं हैं। ये एक सुनियोजित तंत्र के तहत यहां लाए जाते हैं, जहां उनसे काम कराया जाता है या उन्हें भिक्षावृत्ति में धकेला जाता है। इनसे होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा गिरोह या प्लेसमेंट एजेंसियों के पास चला जाता है, जबकि बच्चों को अमानवीय परिस्थितियों में जीने को मजबूर किया जाता है।

यह भी गौर करने योग्य है कि मानव तस्करी अब अकेला अपराध नहीं रहा। पुलिस और जांच एजेंसियों का मानना है कि नशा तस्करी, साइबर अपराध, एक्सटॉर्शन और मानव तस्करी जैसे अपराध अब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक ही नेटवर्क कई तरह के अवैध कामों को अंजाम दे रहा है। यही कारण है कि गुमशुदगी के मामलों की जांच अब संगठित अपराध के नजरिये से की जा रही है। यह बदलाव सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इसके लिए संसाधनों, तकनीक और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी उतनी ही जरूरत है।

हरियाणा पुलिस द्वारा वर्ष 2026 के लिए तैयार किया गया अपराध नियंत्रण रोडमैप उम्मीद की एक किरण जरूर दिखाता है। संगठित अपराधियों पर कड़ी निगरानी, तकनीक के माध्यम से पहचान और ट्रैकिंग, अंतरराज्यीय समन्वय और समयबद्ध जांच जैसे कदम निस्संदेह आवश्यक हैं। पुलिस महानिदेशक का यह स्पष्ट संदेश कि बच्चों और महिलाओं से जुड़े मामलों में किसी भी स्तर पर देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी, भरोसा पैदा करता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल प्रशासनिक सख्ती से इस गहरी समस्या को पूरी तरह सुलझाया जा सकता है?

सच्चाई यह है कि गुमशुदगी और मानव तस्करी जैसी समस्याएं केवल कानून-व्यवस्था के दायरे में सुलझने वाली नहीं हैं। इनके पीछे गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसे कारण भी काम करते हैं। जब परिवारों के पास रोजगार के सीमित अवसर होते हैं और बेहतर जीवन का सपना उन्हें हर दिन बेचैन करता है, तब वे अक्सर गलत हाथों में फंस जाते हैं। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी केवल अपराधियों को पकड़ने तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि उन परिस्थितियों को बदलने की भी होनी चाहिए, जो लोगों को असुरक्षित बनाती हैं।

समाज की भूमिका यहां सबसे अहम हो जाती है। अक्सर लोग लापता बच्चों या संदिग्ध गतिविधियों को देखकर भी चुप रह जाते हैं। “यह किसी और का मामला है” जैसी सोच अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। यदि समय रहते संदिग्ध प्लेसमेंट एजेंसियों की सूचना दी जाए, भिक्षावृत्ति में लगे बच्चों को नजरअंदाज न किया जाए और लापता होने की सूचना तुरंत पुलिस तक पहुंचाई जाए, तो कई मामलों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है। जागरूक समाज ही किसी भी अपराध के खिलाफ सबसे मजबूत दीवार बन सकता है।

बाल अधिकार विशेषज्ञों का यह कहना बिल्कुल सही है कि बच्चों को तस्करी से मुक्त कराना केवल पहला कदम है। असली चुनौती उनके पुनर्वास, शिक्षा और मानसिक काउंसलिंग की है। तस्करी का शिकार हुए बच्चे गहरे मानसिक आघात से गुजरते हैं। यदि उन्हें समय पर सही देखभाल और अवसर नहीं मिले, तो वे दोबारा उसी अंधेरे चक्र में फंस सकते हैं। सरकार और समाज दोनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे बच्चों का भविष्य सुरक्षित और सम्मानजनक हो।

हरियाणा में गुमशुदगी के मामले हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि विकास और आर्थिक प्रगति के दावों के बीच कहीं हम मानवीय मूल्यों को तो नहीं खोते जा रहे। यह समस्या केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि हर उस परिवार की कहानी है, जो आज भी किसी दरवाजे की आहट पर उम्मीद लगाए बैठा है। यदि अब भी इसे केवल एक खबर या एक प्रशासनिक चुनौती समझकर नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले वर्षों में इसकी कीमत कहीं ज्यादा भारी होगी।

समय की मांग है कि गुमशुदगी को अपराध के साथ-साथ मानवीय संकट के रूप में देखा जाए। सरकार, पुलिस, समाज और नागरिक—सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। तभी यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कोई बच्चा, कोई महिला या कोई नागरिक यूं ही गुम न हो जाए और उसका परिवार जिंदगी भर इंतजार करने को मजबूर न रहे।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, , कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

भगवंत यूनिवर्सिटी के विदेशी छात्र की करंट लगने से मौत

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अजमेर, 10 फरवरी (हि.स.)। अजमेर के भगवंत यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले विदेशी छात्र की करंट लगने से मौत हो गई। शव को पुलिस ने जेएलएन अस्पताल की मॉर्चरी में रखवाया है। परिजनों के आने या परिजनों की ओर से एम्बेसी के जरिए सहमति पत्र भेजे जाने के बाद छात्र का पोस्टमार्टम करवाया जाएगा।

कृष्णगंज पुलिस थाना के एसएचओ अरविंद सिंह चारण ने बताया कि छात्र मोहम्मद ईलमुतसिर 22 कोस्टी, सूडान का रहने वाला था। वह यूनिवर्सिटी में बैचलर आफ फॉर्मेसी बी फार्मा के सेकंड इयर में पढ़ रहा था। वह अजमेर में जनाना अस्पताल रोड स्थित अरावली होम्स 2 फ्लैट नंबर 106 में रहता था। छात्र सोमवार रात 11 बजे बाथरूम में रॉड लगाकर बाल्टी में पानी गर्म कर रहा था। उससे छात्र को करंट लग गया। उसकी चीख सुनकर उसके अन्य साथी वहां पहुंचे। छात्र को अचेत हालात में वे जनाना अस्पताल ले गए। जहां स्टाफ ने महिला अस्पताल होने का हवाला देकर दूसरे हॉस्पिटल ले जाने को कहा। साथी छात्र युवक को एक अन्य निजी अस्पताल ले गए, जहां जांच के बाद डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। इस​के बाद छात्रों ने यूनिवर्सिटी के हॉस्टल वार्डन विनोद कंजानी को जानकारी दी। पुलिस मामले में आगे जांच कर रही है।

सर्राफा बाजार में चमकी चांदी, सोने के भाव में गिरावट का रुख

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नई दिल्ली, 10 फ़रवरी (हि.स.)। घरेलू सर्राफा बाजार में आज सोने के भाव में गिरावट का रुख नजर आ रहा है। सोना आज 840 रुपये प्रति 10 ग्राम से लेकर 920 रुपये प्रति 10 ग्राम तक सस्ता हो गया। दूसरी ओर, चांदी ने आज 16,200 रुपये प्रति किलोग्राम की छलांग लगाई है। कीमत में आई गिरावट के कारण देश के ज्यादातर सर्राफा बाजारों में 24 कैरेट सोना आज 1,57,920 रुपये से लेकर 1,58,070 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है। इसी तरह 22 कैरेट सोना आज 1,44,760 रुपये से लेकर 1,44,910 रुपये प्रति 10 ग्राम के बीच बिक रहा है। जबकि चांदी की कीमत में उछाल आने के कारण ये चमकीली धातु दिल्ली सर्राफा बाजार में आज 3,01,100 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर बिक रही है।

दिल्ली में आज 24 कैरेट सोना 1,58,070 प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है, जबकि 22 कैरेट सोने की कीमत 1,44,910 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई है। मुंबई में 24 कैरेट सोना 1,57,920 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना 1,44,760 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है। अहमदाबाद में 24 कैरेट सोने की रिटेल कीमत 1,57,970 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोने की कीमत 1,44,810 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई है। चेन्नई में 24 कैरेट सोना आज 1,57,920 रुपये प्रति 10 ग्राम की कीमत पर और 22 कैरेट सोना 1,44,760 रुपये प्रति 10 ग्राम की कीमत पर बिक रहा है। कोलकाता में 24 कैरेट सोना 1,57,920 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना 1,44,760 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है। भोपाल में 24 कैरेट सोने की कीमत 1,57,970 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर है, जबकि 22 कैरेट सोना 1,44,810 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है।

लखनऊ के सर्राफा बाजार में 24 कैरेट सोना आज 1,58,070 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर और 22 कैरेट सोना 1,44,910 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है। पटना में 24 कैरेट सोने की कीमत 1,57,970 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर है, जबकि 22 कैरेट सोना 1,44,810 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है। जयपुर में 24 कैरेट सोना 1,58,070 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना 1,44,910 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है।

देश के अन्य राज्यों की तरह कर्नाटक, तेलंगाना और ओडिशा के सर्राफा बाजार में भी आज सोने के भाव में कमजोरी दर्ज की गई है। इन तीनों राज्यों की राजधानियों बेंगलुरु, हैदराबाद और भुवनेश्वर में 24 कैरेट सोना 1,57,920 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है। इसी तरह इन तीनों शहरों के सर्राफा बाजारों में 22 कैरेट सोना 1,44,760 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है।

घरेलू बाजार में विदेशी निवेशकों की वापसी,फरवरी में 2 अरब डॉलर की खरीदारी

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नई दिल्ली, 10 फ़रवरी (हि.स.)। साल 2025 के दौरान लगातार बिकवाल (सेलर) की भूमिका में बने रहे विदेशी निवेशकों की भारतीय शेयर बाजार में एक बार फिर दिलचस्पी बढ़ती हुई नजर आने लगी है। फरवरी के महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने अभी तक दो अरब डॉलर से अधिक की खरीदारी की है। शेयर बाजार की चाल में आई तेजी की एक बड़ी वजह विदेशी निवेशकों की वापसी को भी माना जा रहा है।

1 फरवरी 2026 से लेकर आज तक के कुल आठ कारोबारी दिनों में सिर्फ दो दिन ऐसे रहे हैं, जब विदेशी संस्थागत निवेशकों ने घरेलू शेयर बाजार में बिकवाली की है। दूसरी ओर, शेष छह दिन विदेशी निवेशकों ने जम कर खरीदारी की। विदेशी निवेशकों की ये खरीदारी ऐसे समय पर हो रही है, जब भारतीय बाजार बिकवाली के भारी दबाव से गुजर चुके हैं। पिछले दिनों हुई जोरदार बिकवाली के कारण घरेलू शेयर बाजार का वैल्यूएशन दूसरे एशियाई बाजार की तुलना में अधिक आकर्षक हो गया है।

मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि सेंसेक्स अपने एक साल फॉरवर्ड के प्राइस-टू-अर्निंग (पीई) मल्टीपल के 20.50 गुना के स्तर पर कारोबार कर रहा है। इसी तरह निफ्टी 20.10 गुना के स्तर पर बना हुआ है। ये स्तर सेंसेक्स और निफ्टी दोनों के 10 साल के औसत के बराबर है। वहीं ब्रॉडर मार्केट में बीएसई का मिडकैप इंडेक्स अपने एक साल के फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग के करीब 28 गुना के स्तर पर है। हालांकि इसका लॉन्ग टर्म एवरेज 27.3 गुना के आसपास माना जाता है।

धामी सिक्योरिटीज के वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत धामी के अनुसार जापान को छोड़ कर एशिया के दूसरे बाजार की तुलना में भारत का फॉरवर्ड पीई प्रीमियम अपने लॉन्ग टर्म एवरेज पर लौट आया है। दरअसल, पिछले एक दशक के दौरान मार्केट में कोरियाई और चीनी के स्टॉक्स के कमजोर प्रदर्शन की वजह से भारत का प्रीमियम वैल्यूएशन लगातार बढ़ा था। हालांकि, 2025 के दौरान भारतीय बाजार में लगातार हुए उतार-चढ़ाव और एशिया के अन्य शेयर बाजार में आई मजबूती की वजह से भारत का प्रीमियम वैल्यूएशन घट कर 40.10 प्रतिशत रह गया है, जो इसके 15 साल के एवरेज वैल्यूएशन 39.20 प्रतिशत के काफी करीब है। प्रशांत धामी का कहना है कि प्राइस-टू-बुक वैल्यू (पी/बीवी) के आधार पर भी इसी तरह का रुझान दिखता है। फिलहाल भारतीय स्टॉक मार्केट का 12 महीने का फॉरवर्ड प्राइस-टू-बुक वैल्यू अपने ऐतिहासिक एवरेज से ऊपर जरूर बना हुआ है, लेकिन एशिया के दूसरे बाजार के मुकाबले इसके स्तर में अधिक अंतर नहीं है।

इसी तरह जेरोधा कैपिटल्स एंड इन्वेस्टमेंट्स के सीईओ विक्रम मूलचंदानी का कहना है कि अक्टूबर 2024 से लगातार बिकवाली का दबाव बनाने के बाद विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार को लेकर अपने कारोबारी रुख में बदलाव किया है। सिर्फ साल 2025 के दौरान ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 18.88 अरब डॉलर की बिकवाली की थी। मूलचंदानी का कहना है कि विदेशी निवेशकों की घरेलू शेयर बाजार में फरवरी के महीने में हुई वापसी कितनी टिकाऊ होगी, इसको लेकर अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील के पूरी तरह से लागू हो जाने के बाद ही विदेशी निवेशकों की भविष्य की रणनीति का अनुमान लगाया जा सकेगा।

खासकर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मनमाने अंदाज में भारत पर टैरिफ लादे जाने की वजह से विदेशी निवेशकों की नजर में भारतीय बाजार की स्थिति लगातार गिरती चली गई थी। इसके साथ ही हाई वैल्यूएशन, वीक अर्निंग्स और डॉलर की मजबूती ने विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार में नकारात्मक माहौल बना दिया था। हालांकि भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील ने अमेरिका के साथ होने वाले परस्पर व्यापार की अनिश्चितता को कम करने का काम किया है। इसके साथ ही इस ट्रेड डील ने अमेरिकी बॉन्ड यील्ड्स को स्थिरता देने के साथ ही जोखिम लेने की क्षमता में भी सुधार करने का काम किया है।

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‘तेरे नाम’ की री-रिलीज़ से पहले सलमान खान का पुराना इंटरव्यू वायरल

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सलमान खान की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘तेरे नाम’ 27 फरवरी 2026 को एक बार फिर सिनेमाघरों में रिलीज़ होने जा रही है। इसी बीच अभिनेता का एक पुराना इंटरव्यू सोशल मीडिया पर दोबारा वायरल हो रहा है, जिसने फैंस के बीच नई चर्चा छेड़ दी है। यह वीडियो न केवल फिल्म की यादें ताज़ा कर रहा है, बल्कि सलमान खान के सादगी भरे व्यक्तित्व को भी सामने ला रहा है।

वायरल क्लिप में सलमान खान फिल्म की सफलता का श्रेय खुद लेने के बजाय निर्देशक, लेखकों और कहानी को देते नजर आते हैं। वह साफ तौर पर कहते हैं कि राधे मोहन जैसा यादगार किरदार उनके अभिनय की वजह से नहीं, बल्कि मजबूत पटकथा और निर्देशन की बदौलत अमर हुआ। इंटरव्यू में सलमान का कहना है, “मैंने फिल्म में कुछ भी नहीं किया है,” और वह इस बात पर जोर देते हैं कि किरदार की ताकत उसकी लिखावट और परिस्थितियों में छिपी होती है।

सलमान के मुताबिक, राधे मोहन का भावनात्मक सफर, उसकी खामोशियां और उसके फैसले पहले से ही कहानी का हिस्सा थे। उन्होंने माना कि किरदार की गहराई इस बात से आई कि उसे किन हालातों में रखा गया। यह बयान इसलिए भी खास है क्योंकि ‘तेरे नाम’ ने अपने समय में जबरदस्त सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ा था। सलमान का हेयरस्टाइल युवाओं के बीच ट्रेंड बन गया था।

करीब दो दशक बाद फिल्म की री-रिलीज़ के साथ सलमान खान के ये शब्द इसकी विरासत को और मजबूत बनाते हैं। यह एक ऐसे स्टार की झलक पेश करते हैं जो स्टारडम से ज्यादा कहानी और टीमवर्क को महत्व देता है। ‘तेरे नाम’ की वापसी सिर्फ नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि एक बार फिर उस भावनात्मक कहानी को बड़े पर्दे पर जीने का मौका है, जो आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है।

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राजपाल यादव के समर्थन में उतरे सोनू सूद

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राजपाल यादव का भावुक बयान आया सामने

चेक बाउंस मामले में तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण करने के बाद अभिनेता राजपाल यादव को अब बॉलीवुड से समर्थन मिलने लगा है। अभिनेता सोनू सूद खुलकर उनके पक्ष में सामने आए हैं। उन्होंने राजपाल को ‘बेहद प्रतिभाशाली और गिफ्टेड एक्टर’ बताते हुए न सिर्फ उनका हौसला बढ़ाया, बल्कि उन्हें अपनी आने वाली फिल्म में कास्ट करने का भी ऐलान किया है। सोनू ने यह भी कहा कि वह भविष्य के काम के बदले अभी उन्हें साइनिंग अमाउंट देंगे, ताकि इस कठिन समय में उन्हें सहारा मिल सके।आत्मसमर्पण से ठीक पहले राजपाल यादव की मानसिक स्थिति बेहद डगमगाई हुई थी। उन्होंने जेल अधिकारियों से कहा, “क्या करूं? मेरे पास पैसे नहीं हैं। और कोई उपाय नहीं दिखता… सर, यहां हम सब अकेले हैं। कोई दोस्त नहीं है। मुझे इस संकट से खुद ही निपटना है।”

सोनू सूद का भावुक संदेश

सोनू सूद ने सोशल मीडिया पर लिखा, “राजपाल यादव एक टैलेंटेड एक्टर हैं, जिन्होंने सालों तक इंडस्ट्री को यादगार काम दिया है। कभी-कभी जिंदगी हमारे साथ अन्याय कर देती है। यह प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि वक्त की मार होती है। वह मेरी फिल्म का हिस्सा होंगे।” उन्होंने आगे इंडस्ट्री से अपील करते हुए कहा कि यह समय निर्माताओं, निर्देशकों और सहकर्मियों के एकजुट होकर साथ खड़े होने का है। सोनू ने साफ किया कि साइनिंग फीस किसी तरह की मदद नहीं, बल्कि राजपाल के सम्मान का प्रतीक है। उन्होंने आगे लिखा, “जब अपना कोई मुश्किल दौर से गुजर रहा हो, तो उसे याद दिलाना जरूरी है कि वह अकेला नहीं है।”

क्या है पूरा मामला?

यह मामला साल 2010 से जुड़ा है, जब राजपाल यादव ने अपनी फिल्म ‘अता पता लापता’ के लिए 5 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। फिल्म के फ्लॉप होने के बाद वह रकम नहीं चुका पाए और जारी किया गया चेक बाउंस हो गया। मामला अदालत में पहुंचा, जहां कई बार राहत मिलने के बावजूद बकाया न चुकाने पर अदालत ने उन्हें तिहाड़ जेल में सरेंडर करने का आदेश दिया। सरेंडर से पहले राजपाल भावुक हो गए थे और उन्होंने अपनी आर्थिक तंगी का जिक्र किया था। अब सोनू सूद के समर्थन के बाद इंडस्ट्री की नजरें इस पर टिकी हैं कि आगे और कौन उनके साथ खड़ा होता है।

राजपाल यादव का भावुक बयान आया सामने

प्रसिद्ध कॉमेडी अभिनेता राजपाल यादव इन दिनों चेक बाउंस मामले को लेकर कानूनी संकट का सामना कर रहे हैं। 5 फरवरी को दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद अभिनेता ने खुद को तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण कर दिया था। अब सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने जेल जाने से पहले जो भावुक बयान दिया, वह सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

जेल अधिकारियों के सामने फूट-फूटकर रोए राजपाल यादव

रिपोर्ट के मुताबिक, आत्मसमर्पण से ठीक पहले राजपाल यादव की मानसिक स्थिति बेहद डगमगाई हुई थी। उन्होंने जेल अधिकारियों से कहा, “क्या करूं? मेरे पास पैसे नहीं हैं। और कोई उपाय नहीं दिखता… सर, यहां हम सब अकेले हैं। कोई दोस्त नहीं है। मुझे इस संकट से खुद ही निपटना है।” अभिनेता की आंखों में आँसू और हिचकियाँ स्पष्ट दिखीं, जिससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि वह अपनी स्थिति से गहरे परेशान हैं। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोग बॉलीवुड सितारों को भी इस मुश्किल समय में मदद न करने पर निशाने पर ले रहे हैं।

चेक बाउंस मामला क्या है?

यह शेर 2010 के समय का है जब राजपाल यादव ने अपनी पहली निर्देशित फिल्म ‘अता पता लापता’ के लिए मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से 5 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही और आर्थिक तंगी ने अभिनेता को दबोच लिया। कर्ज न चुका पाने के कारण उन्होंने बकाया राशि के भुगतान के लिए चेक दिए थे, जो बाद में बाउंस हो गए।

2024 में अदालत ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी, जब अभिनेता ने पूरा बकाया चुकाने का आश्वासन दिया था। लेकिन वह आश्वासन पूरा नहीं कर सके और परिणामस्वरूप उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा। अब राजपाल अपनी मुश्किल आर्थिक स्थितियों और कानूनी दांव-पेचों से जूझ रहे हैं, जिससे फिल्म उद्योग और आम दर्शक दोनों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

कानूनी सहायता के लिए विक्रांत जेटली से बात करना जरुरीः हाई कोर्ट

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– यूएई में हिरासत में लिए गए सेलिना जेटली के भाई से जुड़े मामले में अगली सुनवाई 12 फरवरी को

नई दिल्ली, 10 फ़रवरी (हि.स.)। दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या वो अभिनेत्री सेलिना जेटली को संयुक्त अरब अमीरात में कैद में रखे गए उनके भाई सेवानिवृत्त मेजर विक्रांत कुमार जेटली से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये कोर्ट से बात करा सकती है। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की बेंच ने कहा कि कानूनी सहायता के लिए विक्रांत जेटली से बात करना जरुरी है। मामले की अगली सुनवाई 12 फरवरी को होगी।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जीवन और स्वतंत्रता सबसे ज्यादा जरुरी है। भारतीय नागरिक को दुबई में हर संभव सहायता दी जानी चाहिए। केंद्र सरकार हर संभव सहायता करे। कोर्ट ने पूछा कि क्या कोर्ट से विक्रांत कुमार जेटली की बात हो सकती है। कोर्ट ने इसके लिए केंद्र सरकार के वकील से निर्देश लेकर कोर्ट को सूचित करने को कहा। बतादें कि तीन फरवरी को उच्च न्यायालय ने केंद्र को निर्देश दिया था कि वो मेजर विक्रांत कुमार जेटली का प्रतिनिधित्व करने के लिए दुबई के लॉ फर्म को अधिकृत करे। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर गौर किया था कि दुबई के एक लॉ फर्म ने मेजर विक्रांत जेटली को मुफ्त में अपनी सेवाएं देने का ऑफर किया है। दुबई के इस लॉ फर्म के ऑफर का मेजर विक्रांत जेटली ने भी विरोध नहीं किया है।

दरअसल, सेलिना जेटली ने याचिका दायर कर कहा है कि उनके सेना से रिटायर्ड भाई मेजर विक्रांत कुमार जेटली का संयुक्त अरब अमीरात में अपहरण कर लिया गया और वो करीब एक साल से कैद में हैं। याचिका में मांग की गई है कि मेजर विक्रांत कुमार जेटली को विदेश मंत्रालय की ओर से कानूनी सहायता, चिकित्सा सुविधा और राजनयिक सहायता उपलब्ध करायी जाए।

याचिका में कहा गया है कि मेजर विक्रांत ने भारतीय सेना और लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन को अपनी सेवाएं दी हैं। वे संयुक्त अरब अमीरात में एक कंसल्टेंसी फर्म को अपनी सेवाएं दे रहे थे। वहां उनका एक मॉल से तब अपहरण कर लिया गया जब उनकी पत्नी उनके साथ थीं। उनके अपहरण की सूचना मिलने के बाद सेलिना जेटली ने केंद्र सरकार के मदद पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज करायी। शिकायत दर्ज कराने के बावजूद उन्हें अपने भाई के बारे में कोई अपडेट नहीं मिली। सेलिना जेटली ने संयुक्त अरब अमीरात स्थित भारतीय दूतावास से भी संपर्क किया था, लेकिन कोई लाभ नहीं मिला। उसके बाद उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।