नई दिल्ली, 13 फरवरी (हि.स)। केंद्रीय नागर विमानन मंत्री के. राममोहन नायडू ने शुक्रवार को कहा कि भारत का लक्ष्य अगले पांच साल में 50 और एयरपोर्ट बनाने का है, जिससे देश के रियल एस्टेट क्षेत्र के लिए बड़े अवसर उत्पन्न होंगे।
केंद्रीय नागर विमानन मंत्री ने यह बात रियल एस्टेट उद्योग निकाय ‘नारेडको’ की ओर से नई दिल्ली में आयोजित ‘राष्ट्रीय शहरी एवं रियल एस्टेट विकास सम्मेलन’ को संबोधित करते हुए कही। राममोहन नायडू ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते नागर विमानन बाजारों में शामिल है और वर्तमान में देश में 165 चालू एयरपोर्ट हैं। नायडू ने कहा कि औसतन हर 33 दिन में एक नया हवाई अड्डा या नया टर्मिनल तैयार किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि विमानन सुरक्षा से समझौता किए बिना हवाई अड्डों के आसपास इमारतों की ऊंचाई से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए वह सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।
देश के रियल एस्टेट क्षेत्र की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए केंद्रीय मंत्री ने बताया कि 2030 तक इस क्षेत्र का आकार करीब 1000 अरब डॉलर के बराबर होने का अनुमान है, जो 2047 तक बढ़कर 5000 से 7000 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। उन्होंने रियल एस्टेट विकास में जीवन स्तर के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही युवाओं को किराये पर दिए जा सकने वाली आवासीय परियोजनाएं विकसित करने का आह्वान किया।
नई दिल्ली, 13 फरवरी (हि.स.)। विपक्षी सांसदों ने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के इस्तीफे की मांग को लेकर शुक्रवार को संसद भवन परिसर में विरोध प्रदर्शन किया।
सांसदों ने हाथों में मंत्री की तस्वीर वाले पोस्टर ले रखे थे। उन्होंने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शन में किशोरी लाल शर्मा, प्रमोद तिवारी और कार्ती चिदंबरम समेत कई विपक्षी सांसद शामिल रहे।
भीलवाड़ा, 13 फ़रवरी (हि.स.)। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के गंगापुर थाना क्षेत्र के आलोली गांव में गुरुवार देररात शादी समारोह से काम करके लौटे मजदूरों ने शराब समझकर बर्तन साफ करने वाला जहरीला केमिकल पी लिया। इस घटना में तीन महिलाओं सहित चार लोगों की मौत हो गई, जबकि एक महिला की हालत गंभीर बनी हुई है। गांव में मातम पसरा है और परिजन सदमे में हैं।
जानकारी के अनुसार, आलोली गांव निवासी रतन पुत्र मसरिया कंजर, उसकी पत्नी सुशीला देवी तथा जमनी देवी और बदामी देवी एक शादी समारोह में बर्तन धोने और साफ-सफाई का काम करने गए थे। शादी वाले घर में बर्तन चमकाने और धोने के लिए विशेष रसायन (केमिकल) मंगवाया गया था। काम खत्म होने के बाद ये सभी मजदूर अपने घर लौटे और उसी दौरान उन्होंने उस केमिकल की बोतलें शराब की बोतल समझकर अपने साथ रख लीं।
घर पहुंचने के बाद सभी ने उस रसायन को शराब समझकर पी लिया। कुछ ही मिनटों में उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। पेट में तेज जलन, उल्टियां और बेहोशी के लक्षण दिखाई देने लगे। घबराए परिजनों और पड़ोसियों ने तुरंत उन्हें गंगापुर अस्पताल पहुंचाया। यहां जमनी देवी (60), शंकर कंजर, रतन (42) पुत्र मिश्रीलाल कंजर और उसकी पत्नी सुशीला (40) ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। दो महिलाओं को गंभीर हालत में भीलवाड़ा रेफर किया गया। रास्ते में बदामी (60) पत्नी जानकीलाल की मौत हो गई, जबकि सनू (22) पत्नी पप्पूलाल कंजर की हालत नाजुक बनी हुई है।
भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल के चिकित्सक ने बताया कि पोस्टमार्टम में सभी के पेट में जहरीला लिक्विड पाया गया है। प्रारंभिक तौर पर यह शराब या कोई तेज रसायन हो सकता है, लेकिन अंतिम पुष्टि एफएसएल रिपोर्ट आने के बाद होगी।
भीलवाड़ा एसपी धर्मेंद्र सिंह यादव ने बताया कि जिस बोतल से केमिकल पीया गया था, उसे पुलिस ने जब्त कर लिया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह केमिकल भीलवाड़ा की ही एक दुकान से खरीदा गया था। पुलिस अब उस दुकानदार से पूछताछ कर रही है कि यह केमिकल किस उद्देश्य से बेचा गया और उस पर चेतावनी का लेबल क्यों नहीं था। एफएसएल टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए हैं और रसायन की प्रकृति का परीक्षण किया जा रहा है।
घटना की सूचना मिलते ही जिला कलेक्टर जसमीत सिंह संधू और पुलिस अधीक्षक धमेंद्र सिंह यादव मौके पर पहुंचे। भारी पुलिस जाप्ता और चिकित्सा विभाग की टीम गांव में तैनात की गई। कलेक्टर ने निर्देश दिए कि पूरे गांव में घर-घर जाकर हेल्थ चेकअप कराया जाए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी अन्य व्यक्ति ने भी उस जहरीले रसायन का सेवन तो नहीं किया है। प्रशासन ने गांव के लोगों को किसी भी संदिग्ध तरल या केमिकल के उपयोग से दूर रहने की अपील की।
कलेक्टर जसमीत सिंह संधू ने कहा कि मृतकों के परिजनों को हर संभव मदद दी जाएगी। प्राथमिक जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि मौत का कारण रसायन को शराब समझकर पीना है। मृतकों के परिवारों को मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना के तहत सहायता दी जाएगी। यदि किसी का पंजीकरण योजना में नहीं है, तो मुख्यमंत्री सहायता कोष से राहत राशि दिलाई जाएगी।
एक ही परिवार के चार सदस्यों की मौत से आलोली गांव में कोहराम मचा हुआ है। घरों में चूल्हे नहीं जले और हर आंख नम है। ग्रामीणों का कहना है कि गरीबी और जागरूकता की कमी के कारण मजदूरों ने यह घातक भूल कर दी, जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
नई दिल्ली, 13 फ़रवरी (हि.स.)। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने संसद भवन परिसर स्थित कार्यालय में देशभर के किसान संगठनों के नेताओं से शुक्रवार को मुलाकात की। उन्होंने बैठक में किसानों से भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर मक्का, सोयाबीन, कपास, फल और मेवा जैसी फसलों पर किसानों के पक्ष को सुना।
राहुल गांधी ने कहा कि इस व्यापार समझौते से कृषि आयात के दरवाजे खुल गए हैं और जल्द ही अन्य फसलें भी इसके दायरे में आ सकती हैं। उन्होंने किसानों और खेत मजदूरों की आजीविका बचाने के लिए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय आंदोलन की आवश्यकता पर जोर दिया।
बैठक में शामिल किसान नेताओं में ऑल इंडिया किसान कांग्रेस के सुखपाल एस. खैरा, जीकेएस राजस्थान के रंजीत एस संधू, भारतीय किसान मजदूर यूनियन हरियाणा के एडवोकेट अशोक बल्हारा, केएमएम केरल के पीटी जॉन, बीकेयू क्रांतिकारी के बलदेव एस जीरा, प्रोग्रेसिव फार्मर्स फ्रंट के आर नंदकुमार, बीकेयू शहीद भगत सिंह के अमरजीत एस मोहरी, ऑल इंडिया किसान कांग्रेस के अखिलेश शुक्ला, आम किसान यूनियन के केदार सिरोही, किसान कांग्रेस पंजाब के किरनजीत एस. संधू, गुरप्रीत एस संगा (राज्यसभा), किसान मजदूर मोर्चा-इंडिया के गुरमनीत एस. मंगट, जम्मू-कश्मीर ज़मींदारा फोरम के हमीद मलिक, केएमएम के तेजवीर सिंह, हरियाणा किसान संघर्ष समिति के धरमवीर गोयत, कृषक समाज के ईश्वर सिंह नैन और दक्षिण हरियाणा किसान यूनियन के सतबीर खटाना शामिल रहे।
नई दिल्ली, 13 फ़रवरी (हि.स.)। कांग्रेस ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) कार्यालय द्वारा 7 फरवरी को किए गए उस सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) और चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन समेत पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।
कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा ने शुक्रवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का एक वीडियो साझा कर कहा कि पाकिस्तान ने इस पोस्ट को हटवाने का श्रेय लिया है। इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से अब तक कोई बयान क्यों नहीं आया?
खेड़ा ने कहा, “मैंने पहले भी पूछा है और फिर पूछ रहा हूं कि विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर आखिर करते क्या हैं? क्या उनका काम सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भाषण देना है या भारत के हितों के लिए ठोस काम करना भी है?”
अमेरिका द्वारा जारी किया गया नक्शा भारत के आधिकारिक नक्शे से मेल खाता था और उसमें पीओके एवं अक्साई चिन को विवादित क्षेत्र के रूप में दिखाने की पुरानी अमेरिकी परंपरा से अलग रुख अपनाया गया था। यह ग्राफिक भारत-अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते की घोषणा का हिस्सा था, जिसमें भारत द्वारा अमेरिकी निर्यात पर टैरिफ में कमी को दर्शाया गया था। हालांकि कुछ दिन के बाद उस पोस्ट को हटा दिया गया था।
उल्लेखनीय है कि पीओके विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच 1947 से चला आ रहा है। विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर एक रियासत थी, जिसके महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तान के हमले के बाद इसका भारत में विलय का निर्णय लिया। इस दौरान पाकिस्तान ने पश्चिमी और उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसे आज पीओके कहा जाता है। पाकिस्तान इसे “आजाद कश्मीर” कहता है और वहां अपनी तरह की सरकार चलाता है। अक्साई चिन क्षेत्र लद्दाख के उत्तर-पूर्व में स्थित है। चीन ने 1950 के दशक में यहां सड़क निर्माण कर कब्जा जमा लिया था। साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीन ने लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखा। भारत इसे लद्दाख का हिस्सा मानता है।
14 फरवरी भारत के इतिहास में एक बेहद दुखद दिन के रूप में दर्ज है, जब जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस दिन आतंकियों ने सीआरपीएफ के काफिले को निशाना बनाया। जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरे वाहन से जवानों की बस को टक्कर मार दी थी।
इस भीषण विस्फोट में कम से कम 39 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए थे, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए। यह हमला हाल के वर्षों में सुरक्षाबलों पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमलों में गिना जाता है। घटना के बाद पूरे देश में शोक और आक्रोश की लहर दौड़ गई थी।
पुलवामा हमला आज भी देश की स्मृति में एक गहरे घाव की तरह मौजूद है। हर वर्ष इस दिन शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी जाती है और उनके बलिदान को याद किया जाता है। यह घटना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सतर्कता और एकजुटता की आवश्यकता की भी याद दिलाती है।
महत्वपूर्ण घटनाक्रम
1537 – गुजरात के बहादुर शाह को पुर्तग़ालियों ने धोखे से गिरफ़्तार करने की कोशिश की और भागने के चक्कर में वह डूब गया।
1556 – पंजाब के गुरदासपुर जिले के कलानौर में अकबर की ताजपोशी हुई।
1628 – शाहजहां आगरा की गद्दी पर बैठा।
1658 – दिल्ली की सत्ता हथियाने के लिए मुग़ल वंश के आपसी संघर्ष में दारा ने वाराणसी के पास बहादुरपुर की लड़ाई में शुजा को पराजित किया।
1663 – कनाडा फ्रांस का एक प्रान्त बना।
1670 – रोमन कैथोलिक सम्राट लियोपोल्ड प्रथम ने यहूदियाें को वियना से बाहर किया।
1743 – हेनरी पेलहम ब्रिटेन के वित्त विभाग के पहले प्रमुख बने।
1846 – क्राको गणराज्य का विद्रोह पूरे पोलैंड में फैल गया।
1876 – अलैक्जैंडर ग्राहम बेल ने टेलीफोन के पेटेंट के लिए आवेदन किया।
1881 – भारत के पहले होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज की कोलकाता में स्थापना।
1899 – अमेरिकी कांग्रेस ने संघीय चुनाव में वोटिंग मशीन के इस्तेमाल को मंजूरी दी।
1893 – हवाई अमेरिका का हिस्सा बना।
1912 – इंग्लैंड में पहली बार डीजल इंजन वाली पनडुब्बी का जलावतरण किया गया।
1920 – शिकागो में महिला मतदाता लीग की स्थापना की गयी।
1931 – महान क्रान्तिकारी भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को लाहौर के एक जेल में फांसी दे दी गयी।
1943 – सोवियत फौजों ने जर्मन फौजों से रोस्तोव पुन: छीन लिया।
1945 – पेरू, पराग्वे, चिली और इक्वाडोर संयुक्त राष्ट्र के सदस्य बने।
1958 – ईराक और जार्डन को मिलाकर बने फ़ेडरेशन के मुखिया शाह फ़ैजल बने।
1972 – अमेरिका ने चीन के साथ व्यापार प्रतिबंधों में ढील की घोषणा की।
1978 – अमेरिका ने मिस्र, सऊदी अरब और इसरायली को अरबों डॉलर के हथियार बेचने की घोषणा की।
1979 – काबुल में अमेरिकी राजदूत एडोल्फ़ डक्स की मुस्लिम उग्रवादियों द्वारा हत्या।
1988 – फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के तीन वरिष्ठ अधिकारी बम विस्फोट से साइप्रस में मारे गए।
1989 – बेल्जियम के पूर्व प्रधानमंत्री पाल्क वाडेन को एक माह बाद फिरौती देने के बाद छोड़ा गया।
1989 – उच्चतम न्यायालय ने भोपाल गैस त्रासदी सम्बन्धी याचिका पर सुनवाई बंद की।
1989 – ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम पर आधारित पहला उपग्रह अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा के पास स्थापित किया गया।
1989 – ईरान के धार्मिक नेता आयतुल्लाह खुमैनी ने भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रूश्दी की किताब ‘सेटेनिक वर्सेज’ को ईशनिंदा करार देते हुए रूश्दी के खिलाफ फतवा जारी किया और उनकी जान लेने वाले को इनाम देने का ऐलान किया।
1990 – बंगलौर में इंडियन एयरलाइंस 605 पर सवार 92 लोग विमान दुर्घटना में मारे गये।
1992 – सोवियत संघ से अलग हुए गणराज्यों में आधे से अधिक ने अलग सेना बनाने की घोषणा की।
1993 – कपिल देव ने 400 विकेट और 5000 रनों का रिकार्ड बनाया।
1999 – इम्फाल में पांचवे राष्ट्रीय खेलों की शुरुआत हुई।
2000 – अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रबंध निदेशक माइकल कैमडेसस ने अपने 13 वर्षीय कार्यकाल के बाद अवकाश ग्रहण किया।
2001 – अल सल्वाडोर में भूकम्प, 225 मरे।
2002 – उमर शेख़ ने कहा, पर्ल जीवित नहीं, किन्तु तलाश जारी।
2003 – श्रीलंका के तेज गेंदबाज चामिंडा वास ने बांग्लादेश के ख़िलाफ़ खेलते हुए आठवें विश्व कप की पहली हैट्रिक बनाई।
2004 – जर्मन निदेशक की ‘हेड आन’ फ़िल्म को गोल्डन बीयर पुरस्कार मिला।
2005 – प्रसिद्ध साहित्यकार डाक्टर विद्यानिवास मिश्र की सड़क दुर्घटना में मृत्यु।
2005 – वीडियो- शेयरिंग वेबसाइट यूट्यूब की शुरूआत हुई।
2005 – लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी की बेरूत में एक कार बम विस्फोट में मौत।
2006 – न्यायाधीशों के विरोध में सद्दाम हुसैन भूख हड़ताल पर गये।
2007 – मध्य प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे श्यामाचरण शुक्ल का निधन हुआ।
2008 – नैया मसूद को उनके कहानी संग्रह तऊस चमन की मैना के लिए वर्ष 2007 का ‘सरस्वती सम्मान’ प्रदान किया गया।
2008 – सिद्धार्थ सिन्हा की लघु भोजपुरी फ़िल्म उधेड़बुन की प्रतिष्ठित बर्लिन महोत्सव सिल्वरबेयर पुरस्कार प्रदान किया गया।
2009 – सानिया मिर्ज़ा ने पटाया ओपन टेनिस के फाइनल में प्रवेश किया।
2019 – जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में सुरक्षाकर्मियों की बस पर बम हमले में 39 सुरक्षाकर्मियों की मौत और बहुत से घायल।
जन्म
1483 – बाबर – मुगल सम्राट (मृत्यु- 1530)
1875 – अलेक्जेन्डर मडीमैन – राज्य परिषद के अध्यक्ष थे।
1885 – सैयद ज़फ़रुल हसन – प्रमुख मुस्लिम दार्शनिक (भारतीय/पाकिस्तानी) (मृत्यु- 1949)
1908 – के. हनुमंथैय्या – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिज्ञ थे।
1921 – दामोदरम संजीवय्या – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता, जो आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
1925 – मोहन धारिया, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता।
1927 – शिव चरण माथुर – राजस्थान के दसवें मुख्यमंत्री थे।
1933 – मधुबाला – भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री (मृत्यु- 1969)
1937 – दिलीपभाई रमणभाई पारिख – भारतीय राजनीतिज्ञ थे, जो गुजरात के भूतपूर्व 13वें मुख्यमंत्री रहे।
1938 – कमला प्रसाद- हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक
1952 – सुषमा स्वराज – भारतीय जनता पार्टी की शीर्ष महिला राजनीतिज्ञ।
1962 – सकीना जाफरी – भारतीय अभिनेत्री
निधन
1834 – सर जॉन शोर – सन 1793 से 1798 ई. तक भारत का गवर्नर-जनरल रहा।
1964 – वी.टी. कृष्णमाचारी – भारतीय सिविल सेवक और प्रशासक थे।
2005 – विद्यानिवास मिश्र – हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार, सफल सम्पादक, संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् और जाने-माने भाषाविद।
2007 – श्यामा चरण शुक्ल – मध्य प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री थे।
फैज़ अहमद फैज़ केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि वे दबे-कुचले लोगों की धड़कन और सत्ता के अहंकार के सामने एक बुलंद ललकार थे। उनकी शायरी में जो नफ़ासत है, वही बगावत भी है। ‘इंकलाब की आवाज़’ की थीम पर आधारित यह लेख फैज़ के जीवन, उनकी विचारधारा और उनकी उन अमर रचनाओं का विश्लेषण है जिन्होंने सरहदों की दीवारें गिरा दीं।
फैज़ अहमद फैज़: इंकलाब की रूहानी आवाज़
फैज़ अहमद फैज़ का जन्म 1911 में सियालकोट (अविभाजित भारत) में हुआ था। उनकी परवरिश एक ऐसे माहौल में हुई जहाँ साहित्य और राजनीति का संगम था। लेकिन फैज़ की असली पहचान तब बनी जब उन्होंने अपनी कलम को केवल ‘महबूब के हुस्न’ तक सीमित न रखकर ‘इंसानियत के दर्द’ से जोड़ दिया। उन्होंने उर्दू शायरी की पारंपरिक विधा ‘ग़ज़ल’ को एक नया राजनीतिक आयाम दिया। उनके लिए इंकलाब केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं था, बल्कि रूह की आज़ादी और बराबरी का सपना था।
इश्क से इंकलाब तक का सफर
फैज़ की शुरुआती शायरी में रोमानियत थी, लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हुआ कि जिस दुनिया में भूख, नफ़रत और गुलामी हो, वहाँ केवल हुस्न की बातें करना बेईमानी है। उनकी मशहूर नज़्म “मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग” इसी वैचारिक परिवर्तन का दस्तावेज है। इसमें वे साफ़ कहते हैं:
”अनगिनत सदियों के तारीक (अंधेरे) बहीमाना तिलिस्म, रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़ाब में बुनवाए हुए, जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म…”
यहाँ से फैज़ का महबूब बदल गया। अब उनका महबूब वह मजलूम इंसान था जो कारखानों और खेतों में पिस रहा था।
क्रांतिकारी रचनाएं और उनका प्रभाव
फैज़ की रचनाओं ने जेल की सलाखों को भी संगीत में बदल दिया। उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा कैद में गुजारा, लेकिन उनकी आवाज़ कभी कमज़ोर नहीं पड़ी।
1. हम देखेंगे (नज़्म-ए-बगावत)
यह फैज़ की सबसे ताकतवर और मशहूर रचना मानी जाती है। इसे उन्होंने जनरल जिया-उल-हक के तानाशाही शासन के खिलाफ लिखा था। इसमें इस्लामी बिम्बों (Metaphors) का इस्तेमाल करके उन्होंने लोकतंत्र की वापसी का आह्वान किया।
प्रमुख पंक्तियाँ: ”लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से, सब बुत उठाए जाएंगे, हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे…”
”लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से, सब बुत उठाए जाएंगे, हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे…”
यह नज़्म आज भी दक्षिण एशिया में हर उस आंदोलन का हिस्सा होती है जहाँ लोग अपने हक की लड़ाई लड़ रहे होते हैं।
2. सुबह-ए-आज़ादी (बँटवारे का दर्द)
1947 में जब भारत और पाकिस्तान आज़ाद हुए, तो खुशियों के साथ-साथ खून-खराबा भी हुआ। फैज़ ने उस अधूरी आज़ादी पर कटाक्ष करते हुए लिखा:
”ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गजीदा सहर, वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं…”
यह नज़्म बताती है कि फैज़ के लिए आज़ादी का मतलब सिर्फ झंडा बदलना नहीं था, बल्कि आम आदमी के जीवन में उजाला लाना था।
3. बोल (अभिव्यक्ति की आज़ादी)
जब जुल्म बढ़ता है, तो सबसे पहले ज़ुबान पर ताले लगाए जाते हैं। फैज़ की नज़्म ‘बोल’ हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो सच कहने से डरता है।
”बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बाँ अब तक तेरी है…”
सलाखों के पीछे से इंकलाब
1951 में फैज़ को ‘रावलपिंडी साजिश केस’ में गिरफ्तार किया गया और उन्हें मौत की सजा तक सुनाई जा सकती थी। लेकिन जेल की तन्हाई ने उनकी शायरी को और धार दे दी। ‘ज़िंदाँ-नामा’ और ‘दस्त-ए-सबा’ जैसी कृतियाँ इसी दौर की उपज हैं। वे लिखते हैं:
”मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है, कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उँगलियाँ मैंने…”
उनकी यह जिजीविषा उन्हें दुनिया के महान क्रांतिकारी कवियों जैसे पाब्लो नेरुदा और नाज़िम हिकमत की कतार में खड़ा करती है। उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार से भी नवाजा गया, जो उनके अंतरराष्ट्रीय कद को दर्शाता है।
फैज़ के इंकलाब की प्रासंगिकता
आज के दौर में भी, जब दुनिया वैचारिक मतभेदों और तानाशाही प्रवृत्तियों से जूझ रही है, फैज़ की आवाज़ प्रासंगिक बनी हुई है। उनकी शायरी हमें सिखाती है कि इंकलाब केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि सोच में भी होना चाहिए। वे नफरत के दौर में मोहब्बत और उम्मीद की बात करते हैं:
”दिल ना-उम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है, लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है।”
फैज़ की महानता इस बात में है कि उन्होंने कभी भी हथियार नहीं उठाए, लेकिन उनकी कलम ने जो घाव और जो मरहम दिए, वे किसी भी क्रांति से कम नहीं थे। वे उर्दू अदब के वह सूरज हैं जिसकी रोशनी कभी कम नहीं होगी।
निष्कर्ष
फैज़ अहमद फैज़ केवल एक शायर नहीं थे, वे एक जज्बा थे। उन्होंने दिखाया कि कैसे एक कलाकार अपनी कला को समाज के प्रति जवाबदेह बना सकता है। उनकी ‘इंकलाब की आवाज़’ में न तो कड़वाहट थी और न ही व्यक्तिगत रंजिश; उसमें तो बस एक बेहतर दुनिया की ख्वाहिश थी। जब तक दुनिया में नाइंसाफी रहेगी, फैज़ की नज़्मों की गूँज सुनाई देती रहेगी
बेंगलुरु, 13 फरवरी (हि.स.)। बेंगलुरु के बाहरी क्षेत्र में स्थित होसकोटे तालुक के एम. सत्यवर गांव के निकट शुक्रवार सुबह हुए सड़क हादसे में मृतकों की संख्या बढ़कर सात हो गई है।
पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, होसकोटे से देवनहल्ली की ओर तेज रफ्तार से जा रही एक एक्सयूवी कार ने पहले एक मोटरसाइकिल को टक्कर मारी। टक्कर के बाद वाहन अनियंत्रित होकर डिवाइडर से जा टकराया और फिर सामने से आ रहे कैंटर से भिड़ गया। हादसा इतना भीषण था कि वाहन के परखच्चे उड़ गए और घटनास्थल पर ही उसमें सवार छह लोगों की मौत हो गई, जबकि बाद में एक अन्य घायल ने दम तोड़ दिया, जिससे मृतकों की संख्या सात हो गई है।
कार में सवार मृतकों की पहचान अश्विन, अयान अली, भरत, अरहान, इतन जॉर्ज और गगन के रूप में हुई है।
पुलिस के अनुसार, वाहन में सवार सभी युवक छात्र थे और उनके नाबालिग होने की भी आशंका जताई जा रही है। परिजनों ने बताया कि वे आर.वी. कॉलेज और सीएमआर कॉलेज में अध्ययनरत थे। सभी मृतक बेंगलुरु के कोत्तनूर क्षेत्र के निवासी बताए गए हैं।
दुर्घटना की सूचना मिलते ही सूलिबेले पुलिस थाना की टीम तुरंत घटनास्थल पर पहुंची और राहत एवं जांच कार्य शुरू किया। इस दौरान पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) लाभूराम भी मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया।
पुलिस ने इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज कर ली है और मामले की जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जांच में तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाने को हादसे का मुख्य कारण माना जा रहा है। पुलिस दुर्घटना के सभी पहलुओं की गहन जांच कर रही है।
आजकल विशेषाधिकार की चर्चा कुछ ज्यादा ही हो रही है। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी पर इन दिनों विशेषाधिकार हनन की तलवार लटकी हुई है। 1978 में लोकसभा में पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव पारित किया गया। इसके बाद इंदिरा गांधी की सदस्यता भी चली गई और कुछ दिन के लिए जेल भी जाना पड़ा था। हालांकि फिलहाल भाजपा ने इसे टाल दिया बताया। सरकार ने अब अपनी रणनीति बदल ली है। कहा जाता है राहुल गाँधी का यही रवैया रहा तो आज नहीं तो कल उन्हें विशेषाधिकार हनन का सामना करना पड़ सकता है। आइये आज हम विशेषाधिकार और उसके हनन के बारे में चर्चा करते है। भारत में संसद, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से पालन सुनिश्चित करने के लिए कुछ विशेष अधिकार और छूट प्रदान की गई हैं। जब इन विशेषाधिकारों का उल्लंघन होता है या किसी भी तरह से सदन या उसके सदस्यों की गरिमा को ठेस पहुंचाई जाती है, तो उसे विशेषाधिकार हनन कहा जाता है। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव की शुरुआत स्पीकर को लिखित नोटिस दिए जाने से होती है। नोटिस मिलने पर स्पीकर तय करेंगे कि मामला विशेषाधिकार हनन का बनता है या नहीं। अगर लोकसभा अध्यक्ष नोटिस स्वीकार करते हैं तो उसे विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जा सकता है। लोकसभा में यह समिति आम तौर पर 15 सांसदों की होती है, जबकि राज्यसभा में 10 सांसदों की। जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंपेगी। इसके बाद रिपोर्ट को सदन में रखा जाएगा और फिर सदन तय करेगा कि क्या कार्रवाई होनी चाहिए। अगर स्पीकर मामले को विशेषाधिकार समिति को सौंपते हैं। अपनी जांच पूरी करने के बाद समिति एक रिपोर्ट तैयार करती है और उसे सदन के पटल पर रखती है। दोषी पाए जाने पर भी समिति खुद सजा नहीं देती बल्कि सजा की सिफारिश करती है।
विशेषाधिकार समिति दोषी पाए जाने पर दोषी सदस्य को चेतावनी देने या फटकार लगाने की सिफारिश कर सकती है। अगर ज्यादा गंभीर नहीं लगे तो समिति उन्हें सदन में बिना शर्त माफी मांगने या खेद जताने का निर्देश दे सकती है। मामला गंभीर लगने पर समिति उन्हें कुछ दिनों या पूरे सत्र के लिए सदन की कार्यवाही से अलग रखने की सिफारिश कर सकती है। बेहद गंभीर मामलों में समिति सदस्यता रद्द करने की भी सिफारिश कर सकती है। इसे सदन में वोटिंग के जरिए लागू किया जाता है। जेल की बेहद ही गंभीर मामलों में सदन संबंधित सांसद को कारावास की सजा भी सुना सकता है। हालांकि ऐसा दुर्लभ मामलों में ही होता है।
पहले भी विशेषाधिकार हमले की गाज कई लोगों पर गिर चुकी है। इनमें देश के प्रधानमंत्री जैसे बड़े नेता भी शामिल है।
लोकसभा की विशेषाधिकार समिति ने इंदिरा गांधी को 1975 के एक मामले में सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन का दोषी पाया था। इस मामले में न सिर्फ उनकी सदस्यता रद्द की गई बल्कि सत्र खत्म होने तक उन्हें जेल भी भेजा गया था। इमरजेंसी के दौरान सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पर आरोप लगा कि उन्होंने विदेश में रहकर भारत विरोधी प्रचार किया और सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाई। विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें राज्यसभा से निष्कासित कर दिया गया था। संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेने के स्टिंग में फंसे 11 सांसदों की सदस्यता एक झटके में खत्म कर दी गई थी। विशेषाधिकार समिति और पवन बंसल समिति की सिफारिशों के आधार पर सदन ने इसे सदन की अवमानना माना था। सदन के अंदर दिए गए बयानों पर अदालती कार्यवाही नहीं होती, लेकिन विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही की जा सकती है। इस मामले में अध्यक्ष का निर्णय सर्वोपरि होता है।
कोटा में एक और छात्रा की आत्महत्या—यह कोई साधारण खबर नहीं है और न ही किसी एक परिवार की निजी त्रासदी भर। यह उस शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक मानसिकता और तथाकथित “सफलता मॉडल” पर गहरा प्रश्नचिह्न है, जिसे हमने पिछले दो दशकों में बिना सवाल किए स्वीकार कर लिया है। आत्महत्या करने वाली छात्रा कृति का सुसाइड नोट केवल व्यक्तिगत पीड़ा का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि वह एक आरोपपत्र की तरह हमारे पूरे समाज के सामने खड़ा होता है—माता-पिता, कोचिंग संस्थान, स्कूल और नीति-निर्माता सभी इसके दायरे में आते हैं।
कृति ने अपने सुसाइड नोट में भारत सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय से अपील की थी कि अगर वे सच में चाहते हैं कि कोई बच्चा न मरे, तो कोचिंग संस्थानों को जल्द से जल्द बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ये संस्थान छात्रों को भीतर से खोखला कर देते हैं। यह कथन किसी क्षणिक आवेग का परिणाम नहीं था, बल्कि उस लंबे मानसिक उत्पीड़न की अभिव्यक्ति थी, जिसे आज लाखों छात्र रोज़ झेल रहे हैं। असली सवाल यह नहीं है कि कृति ने ऐसा क्यों लिखा, बल्कि यह है कि क्या वह ग़लत थी।
आज भारत में कोचिंग शिक्षा का सहायक माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि एक विशाल और मुनाफ़े पर आधारित उद्योग बन चुकी है। कोटा, सीकर, हैदराबाद, दिल्ली और पटना जैसे शहर “एजुकेशन हब” कहलाते हैं, जहाँ हर साल लाखों किशोर अपने माता-पिता के सपनों का बोझ उठाए पहुँचते हैं। इन सपनों के केंद्र में कुछ सीमित शब्द होते हैं—आईआईटी, एम्स, नीट, रैंक और सेलेक्शन। कोचिंग संस्थान बच्चों को यह यक़ीन दिलाते हैं कि यदि वे चयनित नहीं हुए, तो वे असफल हैं। सफलता की यह परिभाषा इतनी संकीर्ण है कि उसमें औसत छात्र के लिए कोई जगह नहीं बचती, और असफलता से उबरने की कोई मानवीय प्रक्रिया भी नहीं होती।
कृति का यह कथन कि “90+ अंक लाने वाली लड़की भी आत्महत्या कर सकती है” हमारे उस भ्रम को तोड़ता है, जिसमें हम यह मान लेते हैं कि मानसिक संकट केवल कमजोर या असफल छात्रों तक सीमित है। यह सोच न सिर्फ़ ग़लत है, बल्कि ख़तरनाक भी है। आज का दबाव केवल परीक्षा पास करने या अच्छे अंक लाने का नहीं रह गया है, बल्कि माता-पिता, शिक्षकों और समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का बन गया है। हर बच्चा अपने भीतर एक काल्पनिक ‘परफेक्ट स्टूडेंट’ की छवि ढो रहा है, जिससे वह लगातार हारता चला जाता है। ऊँचे अंक और बेहतर प्रदर्शन भी अब मानसिक शांति की गारंटी नहीं रहे, क्योंकि समस्या पढ़ाई की नहीं, बल्कि उस माहौल की है जिसमें पढ़ाई कराई जा रही है।
कृति द्वारा अपनी माँ के लिए लिखी गई पंक्तियाँ इस पूरे संकट की जड़ को उजागर करती हैं। वह बताती है कि उसे विज्ञान पसंद करने के लिए मजबूर किया गया, जबकि उसकी वास्तविक रुचि अंग्रेज़ी साहित्य और इतिहास में थी। यह कहानी किसी एक घर तक सीमित नहीं है। यह देश के हज़ारों, बल्कि लाखों घरों की सच्चाई है, जहाँ बच्चे की रुचि से ज़्यादा समाज की अपेक्षा मायने रखती है। माता-पिता अक्सर यह भूल जाते हैं कि बच्चा उनकी अधूरी महत्वाकांक्षाओं का विस्तार नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है। सामाजिक तुलना—कि फलाँ का बेटा डॉक्टर बन गया या फलाँ की बेटी आईआईटी में पहुँच गई—हमें इतना अंधा कर देती है कि हम बच्चों की इच्छाओं, क्षमताओं और सीमाओं को अनदेखा कर देते हैं।
कृति ने अपनी छोटी बहन को लेकर जो चेतावनी दी, वह इस सुसाइड नोट को और भी मार्मिक बना देती है। वह चाहती है कि उसकी बहन को वही पढ़ने दिया जाए, जो वह पढ़ना चाहती है, और वही बनने दिया जाए, जो वह बनना चाहती है। यह विडंबना है कि मरते समय भी वह किसी और की ज़िंदगी बचाने की कोशिश कर रही थी। यह चेतावनी केवल एक माँ के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है, जो बच्चों को सुनने के बजाय उन पर अपने सपने थोपता है।
आज के स्कूल और कोचिंग संस्थान बच्चों को गणित के सूत्र, रसायन के समीकरण और प्रतियोगी परीक्षाओं की रणनीतियाँ तो सिखा रहे हैं, लेकिन जीवन के सबसे ज़रूरी पाठ सिखाने में पूरी तरह असफल हो रहे हैं। वे बच्चों को यह नहीं सिखा पा रहे कि असफलता से कैसे निपटना है, मानसिक तनाव को कैसे समझना है और मदद माँगना कमजोरी नहीं है। प्रतिस्पर्धा को प्रेरणा के बजाय भय का औज़ार बना दिया गया है। रैंक लिस्ट, मॉक टेस्ट और लगातार तुलना बच्चों के मन में स्थायी हीनभावना भर देती है, जिससे वे खुद को केवल अंकों और चयन के चश्मे से देखने लगते हैं।
हर ऐसी मौत के बाद सरकार की ओर से औपचारिक बयान आते हैं, जाँच के आदेश दिए जाते हैं और कुछ दिनों तक बहस चलती है। इसके बाद सब कुछ फिर सामान्य हो जाता है। न कोचिंग संस्थानों के कामकाज पर सख़्त निगरानी होती है, न उनके घंटे सीमित किए जाते हैं, न मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाता है। यदि सरकार सच में गंभीर है, तो कोचिंग उद्योग के लिए सख़्त नियमन, छात्रों के लिए सुलभ मानसिक स्वास्थ्य सहायता और स्कूल स्तर पर करियर की विविध संभावनाओं को स्वीकार करने की ठोस नीति बनानी होगी।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि हम सफलता को किस रूप में परिभाषित करते हैं। क्या एक अच्छा इंसान बनना, मानसिक रूप से स्वस्थ रहना और अपनी रुचि के क्षेत्र में संतुष्ट जीवन जीना सफलता नहीं है? यदि नहीं, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो चयनित तो होगी, लेकिन भीतर से टूटी हुई और असंतुष्ट होगी। कृति की मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं हम अपने बच्चों को ज़िंदा रहते हुए ही तो नहीं मार रहे—उनकी इच्छाओं को, उनके सपनों को और उनकी स्वतंत्रता को।
कृति का सुसाइड नोट केवल एक छात्रा की अंतिम अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी है। अगर अब भी हमने नहीं सुना, नहीं समझा और नहीं बदले, तो ऐसी घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं। सवाल यह नहीं है कि अगला बच्चा कौन होगा। असली सवाल यह है कि क्या हम अगले बच्चे को बचा पाएँगे।