यूपी, जहां चौबीसों घंटे राजनीतिक पार्टियां चुनावी मोड में रहती है

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बाल मुकुन्द ओझा

देश में यूपी एक मात्र ऐसा राज्य है जहां चौबीसो घंटे राजनीतिक पार्टिया चुनावी मोड़ में रहती है। हालाँकि यूपी विधान सभा के चुनाव अगले साल होने है मगर चुनावी दुंदुभि अभी से बजने लगी है। सियासी पार्टियों ने अपनी अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है। गठजोड़ बनने बिगड़ने शुरू हो गए है। बुलडोज़र के बाद अब ब्रह्मोस की चर्चा सुनाई देने लगी है। बात बात पर नेताओं ने चुनाव में देख लेने की धमकिया देनी शुरू कर दी है। पिछले एक साल से चुनाव की चर्चा सुनी जा रही है। अभी चुनाव में एक साल शेष है मग़र चुनाव की धमाचौकड़ी थमने का नाम नहीं ले रही है। यूपी में नौ साल से भाजपा सत्तारूढ़ है और योगी आदित्यनाथ के पास सत्ता की कमान है। भाजपा तीसरे टर्म के लिए जी तोड़ कोशिश में लगी है। यहाँ भाजपा और समाजवादी पार्टी में सीधी और कांटे की लड़ाई है। कांग्रेस और बसपा समाप्त प्राय है। अन्य छोटी पार्टिया अपने अस्तित्व को बचाने के फेर में है। सपा मुखिया पीडीए बनाकर मतों को एक मुश्त अपनी झोली में डालने के प्रयास में जुटी है वहीँ भाजपा हिन्दू मतों को कटेंगे तो बटेंगे का नारा देकर प्राप्त करने के प्रयास में है। कुछ अन्य जातीय पार्टियां भी जातीय मतों के बुते पर मैदान में डटी है।

उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल तेजी से गहराने लगा है। मिशन-2027 को लेकर भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लखनऊ दौरे ने भी बड़े राजनीतिक संदेश को उजागर किया। भाजपा मिशन-2027 को लेकर ओबीसी वोट बैंक, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर केंद्रित रणनीति अपना रही है। पार्टी ने कुर्मी वोटों को साधने के लिए पंकज चौधरी को प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी के साथ रहा है। सांसद ओवैसी की पार्टी भी दम ख़म के साथ चुनाव में कूद रही है। उसे मुस्लिम मतों पर पूरा भरोसा है। मुस्लिम मत बंटे तो सपा की नुक्सान होगा और भाजपा की राह आसान हो जाएगी। यू पी चुनाव में भाजपा और सपा में कांटे का मुकाबला है। चुनावी संघर्ष में मुख्य राजनीतिक दलों ने चुनाव जीतने के लिए साम, दाम, दंड और भेद का रास्ता अख्तियार किया है। दागी, बागी, जातीय, और दल बदलुओं का सभी दलों में भारी बोलबाला है। ये लोग बाहुबली और धनबली है जिसके कारण यू पी की राजनीति पर उनका जबरदस्त कब्जा है। चुनाव में ऐसे लोगों को उमीदवार बनाया जाता है जिनके खिलाफ रंगदारी, हत्या, गुंडागर्दी आदि के मुकदमें चल रहे है।

यूपी  के चुनाव ही देश की दशा और दिशा निर्धारित करेंगे। सत्तारूढ़ भाजपा ने मोदी और योगी के सहारे जहाँ सत्ता में वापसी की उम्मीद जगाई है वहां अखिलेश की समाजवादी पार्टी ने कुछ छोटे दलों  से गठजोड कर मुकाबला कांटे का खड़ा करने का प्रयास कर रही  है।  उत्तर  प्रदेश  का  चुनाव  जातीय रंग में हर बार रंग जाता है। भाजपा को स्वर्ण के साथ पिछड़े, दलित और राजपूत तथा समाजवादी पार्टी को यादव, मुस्लिम मतों के साथ जाटों पर भरोसा है वहीँ बसपा दलित – मुस्लिम  मतों पर आश्रित है। इससे पूर्व  विभिन्न चैनल-एजेंसियों ने उत्तर प्रदेश की सियासत को लेकर सर्वे किया है। उन सभी ओपिनियन पोल्स में यूपी में भाजपा के जीत की भविष्यवाणी की गई है। सपा को पहले के मुकाबले काफी मज़बूत स्थिति में बताया गया। ये विधान सभा चुनाव जहाँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ मुख्यमंत्री योगी का भविष्य तय करेंगे वहाँ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और  कांग्रेस  बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती और ओवैसी की राजनीति की धार भी देखेंगे। फिलहाल शह और मात का खेल शुरू हो गया है। एक-दूसरे पर घात-प्रतिघात की राजनीति शुरू हो गई है।

उत्तरप्रदेश में वर्तमान में 18 संभाग, 75 जिले, 332 तहसीलें, 742 नगर, तीन लाख से अधिक गांव, 80 लोकसभा और 31 राज्यसभा क्षेत्र हैं। यहाँ विधानसभा की 403 सीटें हैं जो देश में सबसे अधिक हैं।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

D.32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

सृजन, सुविधा और नकल की नई संस्कृति

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– डॉ. सत्यवान सौरभ

कहा जाता है कि हर नई तकनीक अपने साथ सुविधा लेकर आती है, पर कुछ तकनीकें धीरे-धीरे हमारी सोच और आदतों को भी बदल देती हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज ऐसे ही मोड़ पर खड़ी है। उसने लिखने की गति बढ़ाई है, उसे आसान और सुलभ बनाया है; पर उसी अनुपात में उसने सृजन के अर्थ को धुंधला भी किया है। अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि “लिखा कितना अच्छा है”, बल्कि यह बन गया है कि “लिखा किसने है और किस तरह लिखा है।”

जब किसी लेख, कविता या विचार को पढ़ते हुए यह बोध होता है कि वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा रचा गया है, तो पाठक के भीतर कुछ टूट-सा जाता है। शब्द सधे हुए होते हैं, भाव भी उपयुक्त लगते हैं, पर कहीं एक रिक्तता रह जाती है। जैसे सुंदर शरीर हो, पर उसमें प्राण न हों। रचना का वह जादू, जो लेखक और पाठक के बीच एक अदृश्य संबंध बनाता है, अचानक समाप्त हो जाता है। यह केवल सौंदर्य का नहीं, विश्वास का भी प्रश्न है।

समस्या यह नहीं है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता लिख सकती है। समस्या यह है कि वह लिखते समय मनुष्य होने का भ्रम रचती है। वह अनुभव की नकल करती है, पीड़ा की भाषा बोलती है, प्रेम और करुणा के मुहावरे दोहराती है—बिना कभी असफलता, भय या दुविधा से गुज़रे। जब ऐसी सामग्री किसी मनुष्य के नाम से प्रस्तुत की जाती है, तो वह तकनीकी सहायता नहीं रह जाती; वह बौद्धिक नकल का रूप ले लेती है।

यह नकल कोई नई बात नहीं है। हमारी शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से इस मानसिकता को पोषित करती रही है कि अंक सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, प्रक्रिया नहीं। परीक्षा में नकल करके उत्तीर्ण होना, दूसरों की उत्तर पुस्तिकाओं से विचार उठाना, और फिर उसी सफलता का गर्वपूर्वक प्रदर्शन—यह सब समाज में किसी न किसी रूप में स्वीकार्य रहा है। आज वही प्रवृत्ति कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से नई शक्ल में सामने आई है। अंतर केवल इतना है कि अब नकल अधिक चमकदार, अधिक विश्वसनीय और अधिक सुरक्षित दिखाई देती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उत्पन्न सामग्री की एक पहचान बन चुकी है—भाषा की दृष्टि से निर्दोष, संरचना में संतुलित, और भावनात्मक रूप से “उचित”। पर यही परिपूर्णता उसे संदिग्ध भी बनाती है। क्योंकि वास्तविक सृजन प्रायः परिपूर्ण नहीं होता। उसमें झिझक होती है, दोहराव होता है, कभी-कभी असंगति भी होती है। सच्चा लेखक अपने ही विचारों से जूझता है, अपनी ही सीमाओं से संघर्ष करता है। उस संघर्ष की छाया शब्दों में दिखाई देती है, और वही रचना को जीवंत बनाती है।

आज सामाजिक माध्यमों और अंकीय मंचों पर सामग्री की बाढ़ है। हर विषय पर, हर दृष्टिकोण से, तुरंत लेख उपलब्ध हैं। इस भीड़ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक तीव्र यंत्र की तरह काम करती है, जो पहले से मौजूद हज़ारों विचारों को जोड़कर एक नया पैकेज बना देती है। यह पैकेज उपयोगी हो सकता है, जानकारीपूर्ण हो सकता है, पर क्या वह दृष्टि दे सकता है? क्या वह जोखिम उठा सकता है? क्या वह यह स्वीकार कर सकता है कि “मैं गलत भी हो सकता हूँ”?

यहीं मनुष्य और यंत्र के बीच मूल अंतर स्पष्ट होता है। मनुष्य अपनी बात कहते समय डरता है—आलोचना से, अस्वीकार से, असफलता से। और यही डर उसकी आवाज़ को विशिष्ट बनाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को न आलोचना का भय है, न अस्वीकार का। इसलिए वह सुरक्षित भाषा में लिखती है—सबको स्वीकार्य, किसी को असुविधाजनक न लगे ऐसी। परिणामस्वरूप, हम ऐसी रचनाएँ पढ़ रहे हैं जो सब कुछ कहती हैं, पर वास्तव में कुछ भी नहीं कहतीं।

एक और गंभीर प्रश्न श्रेय का है। यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को एक औज़ार की तरह उपयोग किया जाए—शोध, संपादन या भाषा-सुधार के लिए—और यह स्पष्ट कर दिया जाए कि इसमें यंत्र की सहायता ली गई है, तो यह ईमानदारी है। पर जब पूरी रचना यंत्र द्वारा तैयार की जाए और लेखक का नाम किसी मनुष्य का हो, तो यह धोखा है। यह पाठक के साथ भी अन्याय है और सृजन की परंपरा के साथ भी।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि “अंतिम परिणाम ही महत्त्वपूर्ण है, तरीका नहीं।” पर यही तर्क नकल को भी वैध ठहराता है। यदि तरीका अप्रासंगिक होता, तो शिक्षा, प्रशिक्षण और अभ्यास का कोई अर्थ न रह जाता। सृजन केवल परिणाम नहीं है, वह एक प्रक्रिया भी है। लिखते समय जो सोच विकसित होती है, जो आत्मसंघर्ष होता है, वही लेखक को गढ़ता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उस प्रक्रिया को बीच में ही काट देती है।

यह कहना भी आवश्यक है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वयं में शत्रु नहीं है। हर तकनीक की तरह उसका मूल्य उसके उपयोग में निहित है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब सुविधा, सृजन का स्थान लेने लगती है। जब लेखक बनने के स्थान पर “सामग्री उत्पादक” बनने की होड़ लग जाती है। जब पहचान मेहनत और अनुभव से नहीं, बल्कि उत्पादन की मात्रा से तय होने लगती है।

भविष्य में संभवतः दो प्रकार के लेखन स्पष्ट रूप से दिखेंगे। एक, जो तेज़ होगा, चमकदार होगा, हर जगह उपलब्ध होगा—और शीघ्र भुला दिया जाएगा। दूसरा, जो धीमा होगा, सीमित होगा, कभी-कभी असुविधाजनक भी होगा—पर टिकेगा। क्योंकि वह किसी मनुष्य द्वारा चुकाई गई कीमत के साथ लिखा गया होगा।

पाठक भी धीरे-धीरे इस अंतर को समझने लगेंगे। वे केवल यह नहीं पूछेंगे कि “क्या कहा गया”, बल्कि यह भी पूछेंगे कि “किस कीमत पर कहा गया।” रचना की विश्वसनीयता उसके स्रोत से जुड़ जाएगी। लेखक का मूल्य उसके साहस से आँका जाएगा—उस साहस से, जिसे किसी यंत्र से उधार नहीं लिया जा सकता।

अंततः प्रश्न कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नहीं, हमारी ईमानदारी का है। हम क्या बनना चाहते हैं—सुविधा के उपभोक्ता या अनुभव के सृजनकर्ता? क्या हम अपने नाम के साथ यंत्र की आवाज़ जोड़ना चाहते हैं, या अपनी अधूरी, असुविधाजनक, मानवीय आवाज़ को बचाए रखना चाहते हैं?

सृजन सदैव कठिन रहा है और रहेगा। जो उसे अत्यधिक आसान बना देता है, वह अक्सर उसे खोखला भी कर देता है। इसलिए आज, इस तकनीकी कोलाहल के बीच, सबसे आवश्यक प्रतिरोध यही है कि हम लिखते समय यह स्मरण रखें—शब्द केवल जोड़ने के लिए नहीं होते, जीने के लिए होते हैं। और जीवन की सच्ची अनुभूति की नकल कोई भी यंत्र, चाहे वह कितना ही कुशल क्यों न हो, पूर्ण रूप से नहीं कर सकता।

(डॉ. सत्यवान सौरभ, एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

हाथ से लिखना: तेज़ रफ्तार समय में मन का ठहराव

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– डॉ. प्रियंका सौरभ

आज का समय गति का है। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल स्क्रीन चमकने लगती है, सूचनाओं की बाढ़ हमारे भीतर उतरने लगती है और दिन कब शुरू होकर कब थकान में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। ई-मेल, व्हाट्सऐप, नोटिफिकेशन और सोशल मीडिया—सब मिलकर हमारे ध्यान, हमारी भावनाओं और हमारे समय पर लगातार दावा करते रहते हैं। इस डिजिटल युग में संवाद तो बढ़ा है, लेकिन आत्मसंवाद कहीं पीछे छूट गया है। ऐसे में हाथ से लिखने जैसी सरल, शांत और आत्मीय प्रक्रिया का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ जाता है।

हाथ से लिखना सिर्फ़ शब्दों को काग़ज़ पर उतारना नहीं है, यह मन को गति से बाहर निकालकर ठहराव की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। जब हम कलम उठाते हैं, तो शरीर और मस्तिष्क एक लय में आते हैं। उँगलियों की गति, स्याही की धार और काग़ज़ का स्पर्श—ये सब मिलकर हमारे भीतर चल रहे शोर को धीरे-धीरे शांत करने लगते हैं। यही कारण है कि दिन के अंत में, सोने से पहले यदि कोई व्यक्ति अपनी दिनचर्या की पाँच पंक्तियाँ भी लिख लेता है, तो उसे एक अनकहा सुकून मिलता है—ऐसा सुकून जिसे शब्दों में बाँध पाना कठिन होता है।

आज की जीवनशैली में तनाव, चिंता और अनिद्रा आम समस्याएँ बन चुकी हैं। हम दिन भर दूसरों के लिए सोचते हैं—काम के लिए, परिवार के लिए, समाज के लिए—लेकिन अपने मन से बातचीत का समय शायद ही निकाल पाते हैं। लिखना इस कमी को पूरा करता है। जब हम अपने अनुभव, भावनाएँ और विचार काग़ज़ पर उतारते हैं, तो हम उन्हें स्वीकार करते हैं। यह स्वीकार्यता ही मानसिक शांति की पहली सीढ़ी है। मन के भीतर जो बातें उलझन बनकर घूमती रहती हैं, वे लिखते ही स्पष्ट होने लगती हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि हाथ से लिखना मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करता है, जो भावनात्मक संतुलन और स्मृति से जुड़े होते हैं। डिजिटल टाइपिंग की तुलना में हाथ से लिखे शब्दों का प्रभाव अधिक गहरा होता है, क्योंकि इसमें सोच और लिखने के बीच सीधा संबंध बनता है। यही कारण है कि जब हम अपनी परेशानियाँ, डर या थकान लिखते हैं, तो उनका बोझ हल्का महसूस होने लगता है। यह प्रक्रिया एक तरह की आत्मचिकित्सा बन जाती है—बिना किसी दवा, बिना किसी खर्च के।

रात के समय लिखने की आदत विशेष रूप से प्रभावी मानी जाती है। दिन भर की घटनाएँ, भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ मन में जमा रहती हैं। यदि हम उन्हें वहीं छोड़कर सो जाते हैं, तो वे नींद में भी हमारा पीछा करती हैं। लेकिन जब हम सोने से पहले उन्हें लिख देते हैं, तो मन को संकेत मिलता है कि अब दिन पूरा हो चुका है। यह संकेत नींद की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाता है। पाँच पंक्तियाँ ही सही—आज क्या अच्छा हुआ, क्या कठिन लगा, किस बात ने मुस्कुराया, किस बात ने सिखाया—इतना लिखना भी पर्याप्त है।

हाथ से लिखना हमें ईमानदार बनाता है। यहाँ न कोई लाइक है, न कोई टिप्पणी, न कोई बाहरी मूल्यांकन। यह एक निजी स्थान है, जहाँ हम बिना डर के अपने सच को रख सकते हैं। कई बार हम समाज के डर से या दूसरों की अपेक्षाओं के कारण अपनी भावनाओं को दबा लेते हैं। लिखना उन्हें सुरक्षित रास्ता देता है। काग़ज़ हमारा गवाह बनता है—न्याय नहीं करता, बस सुनता है।

आज बच्चों और युवाओं के जीवन में भी यह आदत अत्यंत आवश्यक हो गई है। डिजिटल शिक्षा और स्क्रीन-आधारित मनोरंजन ने उनकी लेखन क्षमता और एकाग्रता को प्रभावित किया है। हाथ से लिखने की आदत न केवल भाषा और अभिव्यक्ति को सशक्त बनाती है, बल्कि धैर्य और अनुशासन भी सिखाती है। जब बच्चा या युवा अपने मन की बात लिखना सीखता है, तो वह भावनात्मक रूप से अधिक संतुलित बनता है। यह मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में एक सशक्त कदम है।

इतिहास गवाह है कि लेखन हमेशा से आत्ममंथन का साधन रहा है। डायरी लिखना, पत्र लिखना या विचारों को नोट करना—ये सब परंपराएँ केवल साहित्यिक नहीं थीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ी थीं। आज जब हम इन परंपराओं से दूर हो रहे हैं, तब अवसाद और अकेलापन बढ़ रहा है। यह संयोग नहीं, बल्कि संकेत है कि हमें फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटने की ज़रूरत है।

यह कहना भी आवश्यक है कि हाथ से लिखना तकनीक का विरोध नहीं है। तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन संतुलन बनाए रखना हमारी ज़िम्मेदारी है। जैसे शरीर के लिए व्यायाम आवश्यक है, वैसे ही मन के लिए लिखना आवश्यक हो सकता है। दिन में भले ही हम डिजिटल माध्यमों पर निर्भर रहें, लेकिन रात को अपने लिए कुछ पल निकालना—काग़ज़ और कलम के साथ—एक स्वस्थ आदत है।

कई लोग यह सोचकर लिखना शुरू नहीं करते कि उन्हें “अच्छा लिखना” नहीं आता। लेकिन लिखने का उद्देश्य साहित्य रचना नहीं, बल्कि मन की सफ़ाई है। यहाँ व्याकरण, शैली या सुंदर शब्दों की आवश्यकता नहीं। जो जैसा महसूस हो, वैसा लिख देना ही पर्याप्त है। कभी-कभी टूटी-फूटी पंक्तियाँ भी मन की सबसे सच्ची आवाज़ होती हैं।

समाज के स्तर पर भी यदि लिखने की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए, तो यह मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। स्कूलों, कार्यस्थलों और परिवारों में यदि आत्मलेखन को प्रोत्साहित किया जाए, तो लोग अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से समझ और व्यक्त कर पाएँगे। इससे संवाद सुधरेगा, तनाव घटेगा और रिश्तों में गहराई आएगी।

अंततः, हाथ से लिखना हमें इंसान बनाए रखता है। यह हमें याद दिलाता है कि हम सिर्फ़ उपभोक्ता या उत्पादक नहीं, बल्कि महसूस करने वाले जीव हैं। दिन के अंत में जब हम अपनी पाँच पंक्तियाँ लिखते हैं, तो हम खुद से कहते हैं—“मैंने आज के दिन को देखा, जिया और स्वीकार किया।” यही स्वीकार्यता सुकून बनकर दिल में उतरती है।

तेज़ रफ्तार समय में ठहरना एक साहस है, और हाथ से लिखना उस साहस का सरल अभ्यास। कलम उठाइए, काग़ज़ खोलिए और खुद से मिलने का यह छोटा सा समय रोज़ दीजिए। हो सकता है दुनिया न बदले, लेकिन आपका मन ज़रूर बदल जाएगा—और यही सबसे बड़ा परिवर्तन है।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ,कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

सीएम ने सपत्नीक महाशिवरात्रि पर्व पर महाकाल का पूजन-अर्चन किया

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भोपाल, 15 फरवरी (हि.स.)। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रविवार शाम को सपत्नीक महाशिवरात्रि पर्व के पावन अवसर पर श्री महाकालेश्वर मंदिर पहुंचकर भगवान श्री महाकाल के दर्शन किए। उन्होंने विधिवत पूजा-अर्चना कर देश-प्रदेश की सुख-समृद्धि, शांति और जनकल्याण की कामना की।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने मंदिर में दर्शन पूजन में सहभागिता की और श्री महाकाल बाबा का आशीर्वाद लिया। इस दौरान मंदिर समिति द्वारा उनका स्वागत किया गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और शिव तत्व से जुड़ने का अवसर है, जो समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। पूजन के बाद मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने श्रद्धालुओं से संवाद किया और मंदिर परिसर में की गई व्यवस्थाओं की जानकारी ली। साथ ही महाशिवरात्रि पर्व की शुभकामनाएं दी।

टी20 वर्ल्ड कप में भारत की पाकिस्तान पर रिकॉर्ड जीत

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61 रन से हराकर सुपर-8 में एंट्री

कोलंबो, 15 फरवरी (हि.स.)। भारतीय क्रिकेट टीम ने आईसीसी पुरुष टी20 विश्व कप 2026 में चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान क्रिकेट टीम को 61 रन से हराकर बड़ी जीत दर्ज की। रनों के अंतर से यह टी20 विश्व कप इतिहास में पाकिस्तान पर भारत की सबसे बड़ी रही। इस जीत के साथ भारत ने सुपर-8 दौर के लिए भी क्वालिफाई कर लिया और लगातार तीन जीत के साथ ग्रुप ए में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया।

आर प्रेमदासा स्टेडियम में खेले गए मुकाबले में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 7 विकेट पर 175 रन बनाए। टीम की ओर से ईशान किशन ने 40 गेंदों पर 77 रन की आक्रामक पारी खेली, जिसमें 10 चौके और 3 छक्के शामिल रहे। सूर्यकुमार यादव ने भी 32 रन का योगदान दिया। पाकिस्तान की ओर से सईम अयूब ने 3 विकेट लिए।

176 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए पाकिस्तान की शुरुआत खराब रही। पहले ही ओवर में हार्दिक पांड्या ने साहिबजादा फरहान को रिंकू सिंह के हाथों कैच कराया। इसके बाद जसप्रीत बुमराह ने शुरुआती झटके देते हुए सईम अयूब और सलमान अली आगा को आउट किया।

पाकिस्तान की पूरी टीम 18 ओवर में 114 रन पर सिमट गई। उस्मान खान ने सर्वाधिक 44 रन बनाए, लेकिन उन्हें दूसरे छोर से पर्याप्त साथ नहीं मिला। भारत की ओर से बुमराह, हार्दिक, अक्षर पटेल और वरुण चक्रवर्ती ने दो-दो विकेट लिए, जबकि कुलदीप यादव और तिलक वर्मा को एक-एक सफलता मिली।

इस जीत से भारत ने न सिर्फ टूर्नामेंट में अपनी दावेदारी मजबूत की है, बल्कि नेट रन रेट में भी बड़ा फायदा हासिल किया है। टीम का आत्मविश्वास ऊंचा है और अब उसकी नजरें सुपर-8 चरण में मजबूत प्रदर्शन पर होंगी।

केदारनाथ धाम के 325वें रावल के नाम पर बनी सहमति

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बीकेटीसी जल्द करेगी घाेषणा

देहरादून, 15 फ़रवरी (हि.स.)। पंचकेदार में प्रमुख भगवान आशुतोष के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ धाम के 325वें रावल पद के लिए नए नाम पर ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में आज हुई बैठक में सहमत बन गई है। नाम की विधिवत घोषणा अब श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति करेगी।

दरअसल, केदारधाम के वर्तमान रावल भीमाशंकर लिंग ने अपने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद के लिए 42 वर्षीय शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) को अपना उत्तराधिकारी चुना है। महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित अपने मठ में केदारनाथ के वर्तमान रावल 70 वर्षीय भीमाशंकर लिंग ने कहा कि वे स्वास्थ्य कारणों से अब केदारनाथ के रावल का पद संभालने में असमर्थ हैं, इसलिए वे अपने शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं।

महाशिवरात्रि के दिन ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में हुई बैठक में रावल भीमाशंकर के लिखित घोषणा पर चर्चा हुई और नए रावल के नाम पर सहमति बन गई है। इस बैठक के दाैरान डंगवाड़ी, भटवाड़ी, चुनी-मंगोली, किमाणा व पचौली डुंगर सेमला के हक-हकूकधारी और दस्तूरधारी ग्रामीण भी मौजूद रहे। इस संबंध में बीकेटीसी के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने बताया कि जल्द नये रावल के नाम की घोषणा कर दी जाएगी।

यह है परंपरा

केदारनाथ के रावल अविवाहित होते हैं। कर्नाटक के वीर शैव संप्रदाय से संबंध रखते हैं और शिव उपासक होते हैं। रावल परंपरानुसार केदारनाथ की पूजा के मुख्य कर्ताधर्ता होते हैं। रावल केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने और कपाट बंद होने पर धाम में मौजूद रहते हैं।

पश्चिम बंगाल में कटवा स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में लगी आग

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बाहर से साजिश की आशंका

पूर्व बर्दवान, 15 फ़रवरी (हि. स.)। पश्चिम बंगाल में पूर्व बर्दवान जिले के कटवा रेलवे स्टेशन पर रविवार तड़के खड़ी अजिमगंज पैसेंजर ट्रेन के एक कोच में लगी भीषण आग लग गई। घटना रविवार सुबह करीब 4:30 बजे की है। प्लेटफॉर्म नंबर-2 पर खड़ी 53435 अप अजिमगंज पैसेंजर ट्रेन सुबह 6 बजे रवाना होने वाली थी। अचानक एक कोच से धुआं निकलता दिखा और देखते-ही-देखते आग की लपटें पूरे कोच को चपेट में ले लिया। कोच पूरी तरह जलकर राख हो गया। राहत की बात यह रही कि उस समय कोच में कोई यात्री मौजूद नहीं था।

रेलवे अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में पता चला है कि ट्रेन पूरी तरह स्थिर थी और गतिहीन अवस्था में खड़ी थी। ऐसे में चलती ट्रेन में होने वाला शॉर्ट सर्किट यहां संभव नहीं लग रहा। जांच अधिकारियों को संकेत मिले हैं कि आग कोच के अंदर से नहीं, बल्कि बाहर से लगाई गई हो सकती है।

पूर्व रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शिवराम माझी ने कहा कि ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। आग लगने का कारण जानना बहुत जरूरी है। प्रारंभिक जांच से लगता है कि आग बाहर से लगाई गई हो सकती है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष विस्तृत जांच के बाद ही आएगा।

सूत्रों के अनुसार, सोमवार काे फॉरेंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंचकर जले हुए कोच, आग के फैलाव के पैटर्न और आसपास के सबूतों की वैज्ञानिक जांच करेगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह दुर्घटना थी या सुनियोजित साजिश।

वहीं, दूसरी ओर जांच में नया मोड़ सामने आ गया है। दमकल विभाग ने शुरुआत में शॉर्ट सर्किट को संभावित कारण बताया था, लेकिन रेलवे की प्रारंभिक जांच ने इस दावे को कमजोर कर दिया है और अब आग बाहर से लगाए जाने की आशंका जोर पकड़ रही है।

इस घटना ने कटवा स्टेशन की सुरक्षा व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आग सचमुच बाहर से लगाई गई थी, तो इसे गंभीर सुरक्षा चूक माना जाएगा।

फिलहाल जांच एजेंसियां सभी पहलुओं की गहन पड़ताल कर रही हैं और अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है।

बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी की कैद में पाकिस्तान के सैनिकों की गुहार

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मांगें पूरी कर हमें छुड़वाओ

क्वेटा (बलोचिस्तान), 15 फरवरी (हि.स.)। पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत में पाकिस्तान के सुरक्षा बलों के कई जवान आजादी के लिए संघर्षरत बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) की कैद से छूटने के लिए छटपटा रहे हैं। बीएलए ने अपने आधिकारिक मीडिया चैनल हुकल पर इन जवानों का वीडियो प्रसारित किया है। वीडियो में वर्दीधारी पाकिस्तानी सेना के जवानों को किसी अज्ञात स्थान पर बलोच लिबरेशन आर्मी के सशस्त्र सदस्यों के बीच दिखाया गया है।

द बलोचिस्तान पोस्ट ने अपनी वेबसाइट पर रिपोर्ट में इस वीडियो से तैयार फोटो को भी अपलोड किया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस वीडियो में एक सैन्य अफसर कह रहा है, ”मेरा नाम शम्स तबरीज है। मैं मोहम्मद कुरैश का बेटा हूं, मैं स्वाबी (खैबर पख्तूनख्वा) का निवासी हूं। मैं अक्टूबर 2012 में पाकिस्तान की सेना में भर्ती हुआ था। मेरा रैंक नायक का है। मैं पाकिस्तान के सेना से बीएलए की मांगों को पूरा करने का अनुरोध करता हूं, ताकि हमें रिहा किया जा सके।”

इस वीडियो में सभी जवान वर्दी में हथियार और अन्य उपकरण के साथ नजर आ रहे हैं। बीएलए ने इनको 21 जनवरी को खुजदार के ओरनाच इलाके में लड़ाई के दौरान दबोचा था। इस लड़ाई में पाकिस्तान सेना के कैप्टन उमर शहीद की मौत हो गई थी और एक कर्नल घायल हो गया था। इनकी बुलेटप्रूफ गाड़ी को आईईडी हमले में निशाना बनाया गया था। उल्लेखनीय है कि बीएलए के प्रवक्ता जियांद बलोच ने एक बयान जारी कर कहा था कि ऑपरेशन हीरो-2 के लड़ाकों ने पाकिस्तान सेना के 10 वरिष्ठ अधिकारियों को हिरासत में लिया था।

जबरन गायब किए गए आठ लोगों के शव मिले

इस बीच बलोचिस्तान के पंजगुर जिले में पिछले एक सप्ताह में आठ लोगों के शव मिले हैं। अब तक जिन शवों की पहचान हुई है, वे सभी जबरन गुमशुदगी के शिकार हैं। ताजा घटनाक्रम में पंजगुर में आज दो और शव मिले हैं। इनमें से एक की पहचान जांगियान के रूप में हुई है। वह अब्दुल राशिद का पुत्र है। जांगियान का गर पंजगुर के प्रोम इलाके में है। दूसरे शव की पहचान अभी तक नहीं हो पाई है।

परिवार के अनुसार, जांग्यान को 26 मई, 2025 को पंजगुर के प्रोम इलाके से पाकिस्तान सेना ने चार अन्य रिश्तेदारों के साथ हिरासत में लिया था। कुछ दिन बाद अन्य लोगों को रिहा कर दिया गया। जांगियान के बड़े भाई मलिक मीरान ने सोशल मीडिया पर एक बयान में कहा कि उसके भाई को पाकिस्तानी सेना और समर्थक सशस्त्र समूह (डेथ स्क्वाड) ने गिरफ्तार किया था। भाई का शव आज मिला है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में पंजगुर से आठ शव बरामद किए गए हैं। इनके गायब होने की शिकायतें दर्ज हैं।

सेना ने गरीबाबाद और सेंट्रल मार्केट को घेरा

इस बीच खबर है कि पाकिस्तान की सेना ने नुश्की के गरीबाबाद और सेंट्रल मार्केट इलाकों में दुकानों को घेरते हुए आवागमन प्रतिबंधित कर दिया है। इलाके में तलाशी अभियान शुरू किया गया है। सरकारी अधिकारियों ने इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।

गौरतलब है कि नुश्की के मेंगल और कादिरबाद गांवों में पिछले दिनों ऐसा ही अभियान चलाया गया था।

पटुयाखाली-3 से नुरुल हक की जीत के बाद अल्पसंख्यकों पर हमले ,तनाव

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कोलकाता, 15 फरवरी (हि.स.)। बांग्लादेश के पटुयाखाली-3 संसदीय क्षेत्र में नव-निर्वाचित सांसद नुरुल हक नूर के समर्थकों पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के साथ मारपीट और धमकी देने के आरोप लगे हैं। यह घटनाएं गालाचिपा और दशमिना उपजिलाओं में सामने आई हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में कई स्थानों पर सनातन धर्मावलंबी परिवारों को निशाना बनाया गया है।

नुरुल हक नूर, जो गणअधिकार परिषद के अध्यक्ष हैं, तेरहवें राष्ट्रीय संसदीय चुनाव में बीएनपी गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में पटुयाखाली-3 सीट से निर्वाचित हुए हैं।

पीड़ित परिवारों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शनिवार रात गालाचिपा उपजिला के चर काजल क्षेत्र में अल्पसंख्यक व्यवसायी नकुल मंडल पर कथित रूप से नूर के समर्थकों ने हमला किया। इसके कुछ समय बाद दशमिना उपजिला के डाकुआर सात नंबर वार्ड में श्यापाल बाला (35) पर भी हमला कर घायल कर दिया गया, जिन्हें बाद में अस्पताल में भर्ती कराया गया।

इसके अतिरिक्त, उलानिया बंदर क्षेत्र में वरिष्ठ पूर्व शिक्षक हीरन लाल शील को उनके घर में घेरकर रखने की भी शिकायत सामने आई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ लोग धारदार हथियार और लाठी-डंडे लेकर उनके घर के आसपास डटे हुए थे।

स्थानीय निवासियों का आरोप है कि लगातार हमलों और धमकियों के कारण क्षेत्र के सनातन धर्मावलंबी परिवारों में भय का माहौल है। महिलाएं और बच्चे विशेष रूप से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं तथा कई लोग घर से बाहर निकलने से भी बच रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, पटुयाखाली-4 क्षेत्र के चर विश्वास, चर अगुस्टी, होगलबुनिया, चिकनिकांदी और बकुलबाड़िया सहित कई इलाकों में भी अल्पसंख्यक परिवारों और बीएनपी कार्यकर्ताओं को धमकियां मिलने की बात सामने आई है। कुछ क्षेत्रों में दुकानें बंद हैं और सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ है।

इस संबंध में नुरुल हक नूर का पक्ष जानने के लिए कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।

गालाचिपा उपजिला के कार्यकारी अधिकारी महमूद हसन ने बताया कि शिकायतों की जांच की जा रही है और स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए अतिरिक्त निगरानी बढ़ा दी गई है।

स्थानीय लोगों ने कानून-व्यवस्था बलों से त्वरित और प्रभावी हस्तक्षेप की मांग करते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

उल्लेखनीय है कि 12 फरवरी को बांग्लादेश में हुए तेरहवें राष्ट्रीय संसदीय चुनाव में नुरुल हक नूर पটুयाखाली-3 सीट से सांसद निर्वाचित हुए। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी बीएनपी के पूर्व केंद्रीय कार्यकारी समिति सदस्य हसन मामून थे।

भारत सद्भावना का केंद्र : सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत

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गोरखपुर, 15 फ़रवरी (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोरक्ष प्रांत की ओर से संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त तारामंडल स्थित बाबा गम्भीरनाथ प्रेक्षागृह में सामाजिक सद्भाव बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में विभिन्न जाति, समाज और पंथ के प्रमुख व प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

सामाजिक सद्भाव बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने कहा कि आज सामाजिक नेतृत्व यहां उपस्थित है। समाज उसे कहते हैं, जिसका परस्पर जुड़ाव हो। अर्थ-स्वार्थ का अपनापन टिकता नहीं है। अन्य देशों में विचार है कि मनुष्य से मनुष्य का संबंध एक सौदा है, किन्तु अपने देश में मनुष्यों के संबंध का विचार ऐसा नहीं है। यहां संबंध अपनेपन का है। हमारे देश में अनेक विविधताएं और अनेक रीति-रिवाज हैं। यहां विविधता में एकता है क्योंकि यहां एक नाता है। भारत को हम माता मानते हैं। एक ही चैतन्य सबमें है। वह भगवान है। हमारी अलग-अलग विशिष्टताओं के बावजूद यही नाता हमें जोड़े रखता है। हमारी संस्कृति में हम महिला को वात्सल्य की दृष्टि से देखते हैं। सदियों के आचरण से हमारा यह स्वभाव बना है। हमारे यहां अलग रंग-रूप और वेशभूषा अलगाव का कारण नहीं बनते। उन्होंने कहा कि हमारे समाज का लक्ष्य जीवन के सत्य को जानना है। जीवन का सत्य भगवान है। यही हमारा समान लक्ष्य और समान संस्कृति है। समाज सद्भाव से चलता है। समाज में यदि सद्भावना नहीं है तो कानून और पुलिस के बावजूद समाज नहीं चलता।

सरसंघचालक ने कहा कि संघ के 100 वर्ष पूरे हुए हैं। यह कोई उत्सव की बात नहीं है। जिसे करने में 100 वर्ष लग गए, वह और पहले हो जाना चाहिए था। हमें करना यह है कि ब्लॉक स्तर पर वर्ष में 2-3 बार बैठें। हम अपनी जाति की चिंता कर रहे हैं, यह अच्छी बात है लेकिन ध्यान रखें कि हम एक बड़े समाज के लोग हैं। हिन्दू समाज में पूर्ण स्वतंत्रता है। हम हिन्दू समाज के अंग हैं। इस दृष्टि से क्या कर रहे हैं और क्या कर सकते हैं, इस पर विचार करें। साथ ही अपनी जाति-समाज की बैठक में भी विचार करें कि ब्लॉक स्तर पर हम हिन्दू समाज के लिए क्या कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत स्वार्थ नहीं देखता। दुनिया के अन्य देशों पर संकट आने पर भारत उनकी सहायता के लिए आगे आता है। भारत सद्भावना का केन्द्र है।

सरसंघचालक डाॅ भागवत के उद्बोधन के पश्चात विभिन्न जाति, पंथों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे। उनकी जिज्ञासाओं पर सरसंघचालक ने कहा कि आवश्यक है कि अपनी जाति-बिरादरी में चर्चा कर बड़े हिन्दू समाज के लिए कार्य करें। ब्लॉक स्तर पर बैठकों के बाद धीरे-धीरे बात आगे बढ़ेगी। समाज स्तर पर कार्य स्वयं करना होगा। संघ के भरोसे नहीं रहना चाहिए। समाज के हर अंग में शक्ति होनी चाहिए। समाज को चलाने के लिए खंड स्तर पर समाज के मुखिया लोगों को कार्य करना होगा। मिलकर विचार करेंगे, मिलकर दायित्व लेंगे और कुछ गड़बड़ होगा तो मिलकर सुधार करेंगे। देश ठीक रहेगा तो हम भी ठीक रहेंगे। यह समाज का काम है। समाज करेगा, संघ सहायता करेगा। सामाजिक सद्भाव बैठक में विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों ने अपने समाज में हो रहे सामाजिक कार्यों के प्रेरक उदाहरण साझा किए।

इस अवसर पर सरसंघचालक ने विविध जाति, पंथ और समाजों के प्रतिनिधियों के साथ पंगत में भोजन किया। मंच पर सरसंघचालक के साथ प्रांत संघचालक डॉ महेंद्र अग्रवाल उपस्थित रहे। बैठक की प्रस्तावना सह प्रान्त सद्भाव प्रमुख शिवाजी राय ने रखी तथा सामाजिक सद्भाव प्रमुख डॉ राकेश कुमार सिंह ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का समापन भारत माता की आरती के साथ हुआ।