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शिवरात्रि विशेष : 52 स्वयंभू लिंगों में से एक लोधेश्वर महादेव का शिवलिंग

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बाराबंकी, 14 फ़रवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले की रामनगर तहसील से तीन किलोमीटर दूर उत्तर भारत का सुप्रसिद्ध तीर्थ स्थल लोधेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। यहां वर्ष में चार बार बड़े मेलों का आयोजन होता है। कुछ वर्ष पहले तक पुजारी की देखरेख में ही मेले निपट जाते थे। विगत लगभग 20 वर्षों से यहां पर लगने वाले मेले प्रशासन की देखरेख में होने लगे हैं। प्रशासन श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाएं भी करता है।

लोधेश्वर महादेव की महिमा इतनी है कि उत्तर भारत के लगभग सभी जिलों के लोग प्रतिदिन यहां दर्शन पूजन अर्चन और जलाभिषेक के लिए आते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जब से यहां काशी विश्वनाथ की तर्ज पर कॉरिडोर के लिए घोषणा की है, तब से यहां की व्यवस्थाएं और भी बेहतर होने लगी हैं। लोधेश्वर महादेव का इतिहास महाभारत कालीन इतिहास को समेटे हुए है। पौराणिक तीर्थ स्थल लोधेश्वर महादेव का शिवलिंग स्वयंभू के लिए प्रसिद्ध है।विद्वानों की ऐसी मान्यता है कि पृथ्वी पर 12 ज्योतिर्लिंग व 52 स्वयंभू लिंगों में से एक लोधेश्वर महादेव का शिवलिंग है। महादेव का शिवलिंग परम शक्ति की महिमा से सृष्टि की उत्पत्ति व निर्माण के लिए हुआ है।

मंदिर के पुजारी कहते हैं कि भगवान शिव ने संसार के कल्याण हेतु लिंग के रूप में प्रकट हुए। इनके लिंगों में द्वादश ज्योतिर्लिंग तथा आवश्यकतानुसार कामद लिंग उत्पन्न हुए हैं। इसी क्रम में जनपद बाराबंकी के तहसील रामनगर में सरयू नदी (घाघरा) के किनारे बाराह क्षेत्र जिसे शूकर क्षेत्र भी कहते हैं। यहां पर सर्वप्रथम सतयुग में भगवान ने धरती का उद्धार करने हेतु गोंडा जिला के पसका क्षेत्र में प्रकट हुए। भगवान बाराह ने शिव अर्चना कर स्वयं को शुद्ध करने हेतु कामना की। तो भगवान सदाशिव गंडकी (सरयू) नदी के किनारे वाराह वन क्षेत्र में स्वयंभू लिंग के रूप में प्रकट हुए। वह प्रथम बार भगवान वाराह रूपी विष्णु द्वारा उनकी पूजा अर्चना की गई और इन्हें गंडकेश्वर का नाम स्वयं भगवान विष्णु ने दिया। कालांतर में सतयुग समाप्त होने पर गंडक नदी व वाराह वन में शिव मूर्ति भूमिगति हो गई। पुनः त्रेता युग में जब भगवान विष्णु ने राक्षसों का नाश करने व पृथ्वी को राक्षसहीन करने अयोध्या में चक्रवर्ती राजा दशरथ के यहां भगवान राम के रूप में अवतार लिए और अपनी लीलाओं को समाप्त कर सरयू नदी के गुप्तार घाट में सशरीर अपने अनुज सहित चले गए। तो यह देख उनके पुत्र लव महाराज को आत्म ग्लानि हुई कि मेरे सम्मुख में पिता व अन्य चले गए। मैं कुछ न कर सका। इस कारण महाराज लव अस्वस्थ रहने लगे। उपचार का कोई लाभ न होने पर वशिष्ठ जी ने उन्हें वाराह क्षेत्र में जाकर गंडक नदी के किनारे भगवान शिव के कामद लिंग के बारे में बताया। जिस पर लव महाराज ने उनकी खोज करके पूजन किया तथा इनका नामकरण अपने ही नाम पर लवेश्वर रखा। कलयुग में यह लोधेश्वर नाम से जाने गए।

महादेवा मठ की सहायक गद्दियां नदवल गुरशडी, भवनियापुर, सेठ मऊ, नागेश्वर, चकदहा, भगौली तीर्थ, ररिया, पटना, मोहम्मदपुर, त्रिलोकपुर, धौखरिया, सरदहा है। इसका एक मठ कैलाशपुरी एवं बिरौली में है। यह सब पूरी नामा गद्दी हैं। उक्त जानकारी मठ के प्रतिनिधियों द्वारा प्राप्त हुई है। क्योंकि वह पुरी पंथ के सन्यासी थे। जो निहंग होते हैं। शादी ब्याह नहीं करते हैं। महंत बनाए गए तब से आज तक इस प्रथा में मंदिर व्यवस्था चल रही है। भगवान लोधेश्वर की यश महिमा चारों दिशाओं में फैली है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक के सुदूर इलाकों से लोग गंगा जल लेकर पैदल कावड़ यात्रा करते बम भोले का उद्घोष करते प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक करते हैं। यहां विशाल मेला लगता है। श्रावण मास में पूरे माह व भादों मास की हरतालिका तीज व अगहन मास में मेले का आयोजन किया जाता है।

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