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बोर्ड परीक्षा देने जा रहे छात्रों की बाइक ट्रैक्टर-ट्रॉली से टकराई

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तीन की मौत, मुख्यमंत्री ने जताया दुख

लखनऊ, 23 फ़रवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के जनपद रामपुर में साेमवार एक सड़क हादसे में बोर्ड परीक्षा देने जा रहे तीन परीक्षार्थियों की मौत हो गई, जबकि एक साथी छात्र घायल हुआ है। इस हादसे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गहरा दुख जताते हुए मृतकों के शोक संतप्त परिजनों के प्रति संवेदना की व्यक्त की है।

जानकारी के अनुसार सोमवार सुबह दढ़ियाल क्षेत्र के चार छात्र बोर्ड परीक्षा देने बाइक से दढ़ियाल से टांडा परीक्षा केंद्र की ओर जा रहे थे। रास्ते में आगे चल रहे ट्रैक्टर चालक ने अचानक ब्रेक लगा दिया। जिससे पीछे आ रही बाइक सवार छात्र ट्रैक्टर-ट्रॉली से भिड़ गये। इस हादसे में तीन छात्रों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, जबकि चौथे छात्र बादल की हालत नाजुक बताई जा रही है। सूचना मिलने पुर

पुलिस माैके पर पहुंची और छात्रों की पहचान अरुण, विनय और मनु के रूप में हुई है। विनय और मनु दढ़ियाल क्षेत्र के निवासी थे। दोनों पड़ोसी और किसान परिवार से थे। एक साथ दोस्तों की मौत से गांव में मातम पसरा है। पुलिस ने दुर्घटनाग्रस्त बाइक और ट्रैक्टर

ट्राॅली काे कब्जे में लेकर उसके चालक की तलाश शुरू कर दी है। पुलिस मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है।

मुख्यमंत्री योगी ने व्यक्त की संवेदना

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रामपुर के थाना टांडा क्षेत्र में हुए सड़क हादसे पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने आधिकारिक माध्यमों से मृतकों के शोक संतप्त परिजनों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त की। मुख्यमंत्री ने कहा कि “छात्रों का इस तरह असमय जाना अत्यंत कष्टदायक है। सरकार इस दुख की घड़ी में परिजनों के साथ खड़ी है।” मुख्यमंत्री ने प्रशासन को निर्देशित किया है कि इस मामले में त्वरित कानूनी कार्रवाई की जाए।

अधिकारियों को घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश

मुख्यमंत्री योगी ने रामपुर के जिला प्रशासन और पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद राहत कार्यों में तेजी लाई गई है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट कहा है कि वे परिजनों से संपर्क कर उन्हें ढांढस बंधाएं और पोस्टमार्टम व अन्य कानूनी प्रक्रियाओं को बिना किसी विलंब के पूरा कराएं।

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वेद और बुद्ध के बीच संवाद की परंपरा

दीपक कुमार द्विवेदी

पश्चिम, क्रिश्चियनिटी और वामपंथी बौद्धिक प्रवृत्तियों में बुद्ध के प्रति जो विशेष आकर्षण दिखाई देता है, उसे केवल आध्यात्मिक या नैतिक कारणों से समझना पर्याप्त नहीं है। यह आकर्षण एक बड़े बौद्धिक परिप्रेक्ष्य में खड़ा है—सृष्टि की अवधारणा, काल-दृष्टि, इतिहास-लेखन की पद्धति, औपनिवेशिक विमर्श और आधुनिक वैचारिक राजनीति के संदर्भ में। इस प्रश्न को भावनात्मक प्रतिक्रिया की बजाय तर्क और संदर्भ के साथ देखना आवश्यक है।

सबसे पहले यह स्पष्ट कर लेना चाहिए कि बौद्ध मत को सनातन वैदिक धर्म से पृथक या विरोधी धारा के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से संतुलित दृष्टि नहीं है। गौतम बुद्ध उस सांस्कृतिक और दार्शनिक वातावरण में प्रकट हुए जहां उपनिषदों में आत्मा, ब्रह्म, कर्म और पुनर्जन्म पर गहन विमर्श पहले से चल रहा था। बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य आत्मा की अनंतता पर विचार करते हैं। कठोपनिषद में नचिकेता मृत्यु के पार के सत्य को जानना चाहता है। छांदोग्य उपनिषद “तत्त्वमसि” का उद्घोष करता है। भगवद्गीता में आत्मा की अनश्वरता और कर्मफल का सिद्धांत प्रतिपादित है। बुद्ध ने कर्म और पुनर्जन्म की अवधारणा को नकारा नहीं। उन्होंने यज्ञकर्म और वेद-प्रामाण्य की अनिवार्यता पर प्रश्न उठाए, पर उनका चिंतन उसी दार्शनिक धरातल पर विकसित हुआ जिसे सनातन वैदिक परंपरा कहा जाता है।

भारतीय दर्शन की परंपरा में सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा (वेदांत), जैन, बौद्ध और चार्वाक जैसे दर्शनों का उल्लेख मिलता है। यह सूची इस बात का संकेत है कि बौद्ध दर्शन को भारतीय बौद्धिक परंपरा से बाहर नहीं रखा गया। चार्वाक जैसे भौतिकवादी मत को भी स्थान मिला, जिसे परंपरा देवगुरु बृहस्पति से जोड़ती है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय दार्शनिक संरचना में मतभेद को संवाद के रूप में स्वीकार किया गया, संघर्ष के रूप में नहीं। श्रमण और वैदिक धाराएँ एक ही दार्शनिक भूमि की अभिव्यक्तियां थीं।

अब पश्चिमी सृष्टि-दृष्टि पर विचार करें। यूरोप में लंबे समय तक बाइबिल-आधारित कालगणना प्रभावी रही। सत्रहवीं शताब्दी में आयरलैंड के आर्चबिशप जेम्स अशर ने बाइबिल की वंशावलियों के आधार पर सृष्टि की तिथि 4004 ईसा पूर्व निर्धारित की। इस प्रकार मानव इतिहास को कुछ हजार वर्षों की रेखीय समयरेखा में सीमित कर दिया गया। यह दृष्टि एक आरंभ-बिंदु से प्रारंभ होकर क्रमिक विकास और अंत की ओर बढ़ती रेखा पर आधारित थी।

उन्नीसवीं शताब्दी में चार्ल्स डार्विन की “On the Origin of Species” (1859) प्रकाशित हुई। विकासवाद ने जीवों के क्रमिक परिवर्तन की परिकल्पना दी। डार्विन ने यह कहा कि मनुष्य और आधुनिक वानरों का एक साझा पूर्वज रहा है। लोकप्रिय समझ में यह विचार इस रूप में बैठा कि मनुष्य बंदर से उत्पन्न हुआ। आज भी सामान्य स्तर पर यह प्रश्न उठता है कि यदि ऐसा है तो बंदर अभी भी क्यों हैं। वैज्ञानिक उत्तर यह देता है कि विकास शाखाओं में हुआ, एक सीधी रेखा में नहीं। फिर भी समग्र ढाँचा रेखीय जैविक विकास पर आधारित है।

इसके विपरीत सनातन वैदिक ग्रंथों में सृष्टि की अवधारणा बहुस्तरीय और चक्रीय है। पुराणों में मानसिक सृष्टि का उल्लेख है—ब्रह्मा द्वारा संकल्प से उत्पत्ति। उसके पश्चात मैथुनिक सृष्टि का क्रम है। यह संकेत करता है कि सृष्टि को केवल भौतिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि चेतना और प्रकृति के संयुक्त आयाम में देखा गया। विष्णु पुराण में सृष्टि और प्रलय को चक्र में वर्णित किया गया है। श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध में ब्रह्मा के एक दिन की गणना 4.32 अरब वर्ष कही गई है। महाभारत के शांति पर्व में कल्पों और मन्वंतरों का विस्तार मिलता है। योगवासिष्ठ में असंख्य ब्रह्मांडों की चर्चा है। यहाँ समय अनादि और चक्रीय है।

यदि इस चक्रीय काल-दृष्टि को स्वीकार किया जाए तो सृष्टि को कुछ हजार वर्षों में सीमित करने की धारणा चुनौती के घेरे में आ जाती है। औपनिवेशिक काल में भारत के इतिहास को इसी रेखीय ढाँचे में ढालने का प्रयास हुआ। जेम्स मिल की “History of British India” (1817) ने भारतीय परंपरा को अंधविश्वासी और अविकसित बताया। मैक्स मूलर ने वेदों का काल सीमित किया। उन्नीसवीं शताब्दी में आर्य आक्रमण सिद्धांत प्रस्तुत हुआ—यह सिद्ध करने के लिए कि वैदिक संस्कृति स्वदेशी नहीं थी। इससे भारतीय परंपरा की प्राचीनता और निरंतरता पर प्रश्न उठे।

इसी पृष्ठभूमि में “बौद्ध बनाम ब्राह्मण” का आख्यान विकसित हुआ। कुछ मिशनरी लेखनों और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने यह प्रतिपादित किया कि बौद्ध मत सामाजिक विद्रोह था और वैदिक परंपरा दमनकारी। इससे दार्शनिक निरंतरता को खंडित दिखाया गया और बुद्ध को एक वैकल्पिक नैतिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। बुद्ध को “ईश्वर-निरपेक्ष नैतिक शिक्षक” के रूप में चित्रित करना पश्चिमी बौद्धिकता के लिए अनुकूल था। इससे बाइबिल-आधारित ढाँचे को सीधी चुनौती नहीं मिलती और वामपंथी चिंतन को एक ऐतिहासिक प्रतीक मिल जाता है।

ऐतिहासिक स्रोत इस सरलीकरण का समर्थन नहीं करते। सम्राट अशोक के शिलालेखों में वैदिक परंपरा के विरुद्ध कोई धार्मिक युद्ध का उल्लेख नहीं मिलता। हर्षवर्धन ने बौद्ध विहारों और ब्राह्मणों दोनों को संरक्षण दिया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने “The Buddha and His Dhamma” में संकेत किया कि भारत में बौद्ध संस्थानों के पतन में विदेशी आक्रमणों की भूमिका रही। नालंदा और विक्रमशिला के विनाश का उल्लेख विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखों में है। अतः बौद्ध मत के लोप को केवल “ब्राह्मणीय दमन” की कथा में सीमित करना एकांगी दृष्टि है।

पश्चिम, क्रिश्चियनिटी और वामपंथी चिंतन में बुद्ध के प्रति विशेष आग्रह का एक कारण आध्यात्मिक आकर्षण हो सकता है, पर उससे अधिक वह वैचारिक सुविधा है जो बुद्ध को सनातन से पृथक प्रस्तुत करने में निहित है। यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि बौद्ध मत उसी दार्शनिक परंपरा की धारा है, कि श्रमण और वैदिक विचार एक ही बौद्धिक भूमि के अंग हैं, तो यह कृत्रिम द्वंद्व समाप्त हो जाता है।

बुद्ध और सनातन के बीच विभाजन स्थापित करना ऐतिहासिक जटिलता को सरल बनाना है। समस्या बुद्ध में नहीं है; समस्या उस व्याख्या में है जो उन्हें सनातन के विरुद्ध खड़ा करती है। जब सृष्टि-दृष्टि, काल-दृष्टि और दार्शनिक निरंतरता के संदर्भ में विषय को देखा जाता है, तो स्पष्ट होता है कि दोनों को अलग करके देखना ही मूल भ्रम है।

(लेखक, स्तम्भकार हैं।)

अमेरिकी शुल्क में बदलाव के असर पर टिप्पणी करना अभी जल्दबाजी

केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट मामलों की निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा

नई दिल्ली, 23 फरवरी (हि.स)। केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट मामलों की निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि अमेरिकी शुल्क में किए गए बदलावों के प्रभाव पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि वाणिज्य मंत्रालय इस स्थिति की समीक्षा कर रहा है।

नई दिल्ली में प्रेस को संबोधित करते हुए सीतारमण ने अमेरिकी टैरिफ पर कहा कि भारत का व्यापार समझौतों के प्रति स्पष्ट रुख है। वह ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, ओमान, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ समझौते कर चुका है। उन्होंने कहा कि देशों के साथ व्यापार समझौते करने का हमारा प्रयास जारी रहेगा। सीतारमण ने साथ ही कहा कि भारत चाहता है कि उसकी अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर व्यापार करने और वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाने का लाभ मिले।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोना की कीमत में उछाल के बारे में सवाल पर कहा कि मार्केट से आने वाला सारा सोना आयात किया जाता है। इस देश में कीमती धातुओं पर निर्भरता बहुत ज्यादा बाहर से ही है…हमारे पास सोना खोजने और निकालने का अपना कोई सोर्स नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि इसके लिए कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन हमारी डिमांड पूरी करने के लिए काफी नहीं हैं। हमारे घरेलू खपत के लिए सोने और चांदी की कीमतों में ग्लोबल बढ़ोतरी के कारण असर पड़ता है। उन्होंने बताया कि आज अधिकांश देश खासकर उनके सेंट्रल बैंक, सोना और चांदी खरीद रहे हैं और उन्हें स्टोर कर रहे हैं, लेकिन अब यह उछाल काफी हद तक सेंट्रल बैंकों के खरीदने और स्टोर करने की वजह से है।

इससे पहले केंद्रीय वित्त और कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने नई दिल्ली में केंदीय बजट के बाद होने वाली आम बैठक में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी और रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा के साथ आरबीआई के केंद्रीय निदेशक मंडल को संबोधित किया।

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बढ़ता ही जा रहा है बंजरपन का रकबा

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बाल मुकुन्द ओझा

                                                                                              भूमि के बंजर होने की समस्या ने आज दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है। भारत की बात करें तो यहां उपजाऊ भूमि के बंजर होने का खतरा निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में मात्र 11 प्रतिशत जमीन ही उपजाऊ है। मरुस्थलीकरण का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है। भारत की कुल भूमि का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से प्रभावित है। भारत में कुल 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर जमीन में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर बताई जा रही है। बंजरपन का रकबा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है जिसे सख्ती से रोका नहीं गया तो देश में अनाज का संकट खड़ा हो सकता है। जलवायु परिवर्तन सहित सूखा, बाढ़,जहरीले कीटनाशकों के तेजी से इस्तेमाल, वनों की कटाई, अधिक चराई, खराब सिंचाई और अत्यधिक जल दोहन के कारण भू-जल स्तर में निरंतर गिरावट आने से उपजाऊ धरती मरुस्थल का रूप धारण करती जा रही है। विश्व के समक्ष यह एक बड़ी समस्या है जो दिन प्रतिदिन गहराती जा रही है। हमारे लाख प्रयासों के बावजूद मरुस्थल का फैलाव रोका नहीं जा सका है। इस समस्या की जड़ में एक वजह मानवजनित कारणों को बताया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया हर साल 24 अरब टन उपजाऊ भूमि खो देती है। भूमि की गुणवत्ता खराब होने से राष्ट्रीय घरेलू उत्पाद में हर साल आठ प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। भूमि क्षरण और उसके दुष्प्रभावों से मानवता पर मंडराते जलवायु संकट के और गहराने की आशंका है। मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा बड़े खतरे हैं जिनसे दुनिया भर में लाखों लोग, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, प्रभावित हो रहे हैं। इससे निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों की महती जरुरत है। मरुस्थल या रेगिस्तान ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों को कहा जाता है जहां जलपात (वर्षा तथा हिमपात का योग) अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा काफी कम होती है। मरुस्थलीकरण की परिभाषा के अनुसार यह जमीन के खराब होकर अनुपजाऊ हो जाने की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें जलवायु परिवर्तन तथा मानवीय गतिवधियों समेत अन्य कई कारणों से शुष्क, अर्द्ध-शुष्क और निर्जल अर्ध-नम इलाकों की जमीन रेगिस्तान में बदल जाती है। इससे जमीन की उत्पादन क्षमता में कमी और ह्रास होता है। एशियाई देशों में मरुस्थलीकरण पर्यावरण सम्बन्धी एक प्रमुख समस्या है। मरुस्थलीकरण शुष्क, अर्द्ध शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भूमि का क्षरण है। मुख्य रूप से, यह मानवीय गतिविधियों और फिर जलवायु परिवर्तन के कारण होता है। इसका मतलब मौजूदा रेगिस्तानों का विस्तार नहीं है, बल्कि यह शुष्क भूमि पारिस्थितिक तंत्र, वनों की कटाई, अधिक चराई, खराब सिंचाई कार्य प्रणाली आदि के कारण होता है जो भूमि की उत्पादकता को प्रभावित करता है।

स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (एसएसी) द्वारा मरुस्थलीकरण और भूमि की गुणवत्ता के गिरते स्तर पर बनाये  देश के पहले एटलस के अनुसार भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का तकरीबन 30 फीसदी हिस्सा मरुस्थल में तब्दील हो चुका है। इसके अलावा देश के 69 फीसदी हिस्से को शुष्क क्षेत्र के तौर पर वर्गीकृत किया गया है। देश के सामने उपजाऊ भूमि के क्षरण का यह एक बड़ा खतरा है जिसे रोकने के लिए सामूहिक प्रयासों की महती जरुरत है।

देश में बढ़ रहे मरुस्थलीकरण के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले है। बंजरपन बढ़ रहा है और साथ ही मिट्टी का कटाव भी बढ़ रहा है। देश का 30 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र  मरुस्थलीकरण की चपेट में है। तीन मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि पिछले 15 वर्षों में ख़राब हुई है। देश में प्रति मिनट 23 हेक्टेयर शुष्क भूमि सूखे और मरुस्थलीकरण की चपेट में आ जाती है जिसकी वजह से 20 मिलियन टन अनाज का संभावित उत्पादन प्रभावित होता है। देश का 70 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र शुष्क भूमि के रूप में है जबकि 30 प्रतिशत जमीन भूक्षरण और 30 प्रतिशत भूमि मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया से गुजरती है। भारत सरकार द्वारा विभिन्न योजनाएँ शुरू की गई हैं जैसे प्रधानमंत्री आवास बीमा योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना प्रति बूंद अधिक फसल, आदि। ये सब भूमि क्षरण को कम करने में मदद कर रहे हैं।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

कांग्रेस का चुनावी ब्रह्मास्त्र है प्रियंका गांधी

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बाल मुकुन्द ओझा

असम, बंगाल और केरल सहित पांच राज्यों में शीघ्र विधानसभा चुनाव होने जा रहे है।  कांग्रेस पार्टी इन चुनावों में गाँधी परिवार की बेटी प्रियंका में चुनावी संभावनाएं तलाश रही है। लोकसभा में अपने पॉजिटिव रवैये के चलते उन्होंने पक्ष और विपक्ष का दिल जीत लिया। कांग्रेस इसी का फायदा उठाकर सत्तारूढ़ पार्टी पर प्रियंका रुपी ब्रह्मास्त्र दागना चाहती है। केरला से सांसद प्रियंका लोगों को सहज ही अपनी और आकर्षित करने की क्षमता रखती है। राहुल गाँधी की नकारात्मक सोच पर प्रियंका की पॉजिटिव सोच भारी पड़ रही है। संसद के शीतकालीन सत्र में सांसद प्रियंका गांधी की सक्रियता ने यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस को सही नेतृत्व प्रदान करने की भरपूर क्षमता उनमें है। लोग प्रियंका में इंदिरा गाँधी को देखती है। वे अपना पहनावा भी इंदिरा की तरह दिखाती है। नाक नक्शा वैसे भी इंदिरा की तरह है। प्रियंका गांधी ने ऐसे समय अपनी सक्रिय राजनीति का आगाज किया है जब कांग्रेस की अगुवाई वाला इंडिया गठबंधन में नेतृत्व को लेकर घमासान मचा हुआ है।

कई विपक्षी नेता प्रियंका गांधी को दमदार और बेहतर चेहरा मान रहे हैं। प्रियंका वाड्रा इन दिनों सोशल मीडिया पर बहुत अधिक चर्चित है। फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर प्रियंका लगातार मोदी सरकार पर हमलावर है और नित्य प्रति कोई न कोई पोस्ट डाल कर मोदी सरकार को कटघरे में डालने से नहीं चुकती। 2014 के बाद मोदी युग का आगाज होने के बाद बाद चुनाव-दर चुनाव कांग्रेस को मिलती हार के बाद जहां राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठे वहीं भाजपा ने राहुल गांधी को एक असफल राजनेता साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। ऐसे में अब प्रियंका गांधी की चुनावी राजनीति में एंट्री के साथ उनकी संसदीय पारी का आगाज कांग्रेस संगठन और उसके कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक सकता है।

प्रियंका यदि पीएम फेस बनती है तो ममता बनर्जी, केजरीवाल और स्टालिन जैसे नेता भी मान जायेंगे। राहुल के मुकाबले प्रियंका गांधी की राजनीति कई मायनों में अलग है। प्रियंका गांधी अपनी सरलता और बेधड़क अंदाज से लोगों से तुरंत कनेक्ट कर लेती हैं। इन दिनों कांग्रेस के भीतर भी प्रियंका गांधी को विपक्ष की और से पीएम फेस बनाने की चर्चा जोर शोर से होने लगी है। प्रियंका में आज भी लोग इंदिरा गाँधी की छवि ढूंढते है। प्रियंका गांधी ने मोदी पर हमलावर होकर रैलियों से ही कांग्रेस के पक्ष में माहौल बना दिया। कांग्रेस के अंदर ही नहीं कांग्रेस के बाहर भी प्रियंका गांधी की नेतृत्व क्षमता की प्रशंसा जोरों पर हैं। यही कारण है कि पार्टी के अंदर से अब प्रिंयका को कांग्रेस का प्रधानमंत्री फेस बनाने की मांग उठने लगी है।

प्रियंका इंदिरा गांधी की तरह बहुत जल्दी महिलाओं से घुल मिल जाती है। उनके हावभाव में इंदिराजी की झलक देखने को मिल जाती है। ऐसे में आगामी लोकसभा चुनावों में प्रियंका के करिश्माई व्यक्तित्व का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। मोदी के खिलाफ कांग्रेस अपने सारे हथियार आजमाएगी और प्रियंका उसके तरकश का सबसे धारदार तीर साबित हो सकता है। प्रियंका के खिलाफ केवल एक ही बात जाती है वह है यूपी में उनके नेतृत्व में कांग्रेस की करारी हार। इस प्रदेश में प्रियंका ने कांग्रेस के पक्ष में जबरदस्त प्रचार किया था मगर लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया। मगर यूपी में कांग्रेस की हार के और भी कई कारण  रहे है। सब से बड़ा कारण धरातल पर संगठन का नहीं होना। इसके बाद प्रियंका बहुत आगे बढ़ गई। हिमाचल और कर्नाटक में कांग्रेस की जीत से प्रियंका के हौसले बुलंद हुए अब असम, केरल और बंगाल  में प्रियंका की अग्नि परीक्षा है। यदि इस परीक्षा में प्रियंका पास हो जाती है तो प्रियंका को आगे बढ़ने से कोई भी नहीं रोक पायेगा।  मोदी की लोकप्रियता के सामने वह टिक पायेगी या नहीं यह भविष्य के गर्त में छिपा है। कांग्रेस को प्रियंका गांधी में नई उम्मीद और राह दिखाई दे रही है और देखना होगा क्या प्रियंका गांधी कांग्रेस की सत्ता में वापसी करा पाएगी।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी .32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

     

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अप्रैल में लागू होने की संभावना: गोयल

नई दिल्‍ली, 20 फरवरी (हि.स)। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते पर मार्च में हस्ताक्षर होने और अप्रैल में इसके लागू होने की संभावना जताई है।

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) निर्यात को बढ़ावा देने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करने के लिए एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन को लॉन्च किया। इस मौके पर उन्होंने बताया कि भारत के ब्रिटेन और ओमान के साथ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) अप्रैल में लागू होने की उम्मीद है। पीयूष गोयल ने कहा कि न्यूजीलैंड के साथ समझौता सितंबर में लागू हो सकता है। भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) पर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मुझे लगता है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि ईयू के सभी 27 देश इस बात के लिए उत्सुक हैं कि एफटीए को जल्द ही फाइनल किया जाए और आगे बढ़ाया जाए। गोयल ने कहा कि यह समझौते 140 करोड़ भारतीयों की ताकत है।

भारत और अमेरिका के अधिकारियों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के कानूनी मसौदे को अंतिम रूप देने के लिए तीन दिवसीय बैठक 23 फरवरी से अमेरिका में शुरू होगी। इस महीने की शुरुआत में भारत-अमेरिका ने एक संयुक्त बयान में घोषणा की थी कि अंतरिम व्यापार समझौते के लिए रूपरेखा तय कर ली गई है।

अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव से कच्‍चे तेल की कीमत 6 महीने के उच्‍चतम स्‍तर पर

नई दिल्‍ली, 20 फरवरी (हि.स)। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमत छह महीने के रिकॉर्ड उच्‍च्‍त स्‍तर के करीब पहुंच गई है। पिछले दो दिनों में इसमें 6–7 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो जनवरी के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड का भाव करीब 72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड 67 डॉलर प्रति बैरल पर है। पिछले सत्र में दोनों के कीमतों में करीब 1.9 फीसदी की तेजी आई थी, जो आज अपने ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। फिलहाल ब्रेंट क्रूड 21 सेंट की बढ़त के साथ 71.87 डॉलर प्रति बैरल कारोबार कर रहा है। अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड 66.66 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेंड कर रहा है।

पिछले सेशन में ब्रेंट क्रूड 1.9 फीसदी बढ़कर 71.66 डॉलर प्रति बैरल पर पर बंद हुआ था, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी 1.9 फीसदी चढ़कर 66.43 डॉलर प्रति बैरल पर था।

शिक्षण संस्थानों में फूहड़ मनोरंजन : शिक्षा और मर्यादा पर बढ़ता राष्ट्रीय प्रश्न

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(डीजे संस्कृति और अशोभनीय प्रस्तुतियों के बीच बच्चों के संस्कार, अनुशासन और शिक्षा के मूल उद्देश्य पर गंभीर चिंता) 


-डॉ. प्रियंका सौरभ

विद्यालय किसी भी राष्ट्र की आत्मा का निर्माण करते हैं। यही वे स्थान हैं जहाँ से समाज की दिशा तय होती है और आने वाली पीढ़ियों के विचार, मूल्य तथा व्यवहार गढ़े जाते हैं। एक सभ्य समाज की पहचान उसके विद्यालयों से होती है, क्योंकि यहीं बच्चों को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं, बल्कि अनुशासन, नैतिकता, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का बोध कराया जाता है। ऐसे में यदि विद्यालय परिसरों में अशोभनीय गीतों पर नृत्य, फूहड़ मनोरंजन और मर्यादा-विहीन प्रस्तुतियाँ सामने आती हैं, तो यह केवल किसी एक संस्था की चूक नहीं, बल्कि पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।

हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे दृश्य सामने आए हैं, जहाँ विद्यालयों में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान ऐसे गीत और नृत्य प्रस्तुत किए गए, जिनका शिक्षा और संस्कार से कोई संबंध नहीं है। ये घटनाएँ यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम विद्यालयों को भी उसी बाज़ारू संस्कृति के हवाले कर रहे हैं, जिसने मनोरंजन को मर्यादा से ऊपर रख दिया है? क्या बच्चों की मासूम मानसिकता को हम अनजाने में ऐसे प्रभावों के हवाले कर रहे हैं, जिनका दीर्घकालिक असर उनके चरित्र और सोच पर पड़ सकता है?

आज यह सत्य है कि डीजे संस्कृति, सोशल मीडिया और त्वरित लोकप्रियता की दौड़ ने समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया है। गीतों और मनोरंजन की भाषा बदली है, प्रस्तुति का स्तर बदला है और ‘वायरल’ होने की होड़ ने विवेक को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन विद्यालय कोई सार्वजनिक मंच या मनोरंजन स्थल नहीं है। यह वह स्थान है जहाँ बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि क्या उचित है और क्या अनुचित, क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं। यदि विद्यालय ही इस भेद को मिटाने लगें, तो बच्चों के मन में नैतिक सीमाओं की समझ कैसे विकसित होगी?

इस पूरे प्रश्न का एक पक्ष यह भी है कि कई बार ऐसे कार्यक्रमों में बाहरी डीजे या आयोजनकर्ताओं की भूमिका होती है। संभव है कि किसी विद्यालय में ऐसा संगीत बिना पूर्व योजना के बज गया हो या बच्चों ने उत्साह में कोई अनुचित गीत चुन लिया हो। परंतु ऐसे हर परिदृश्य में सबसे बड़ी जिम्मेदारी विद्यालय प्रशासन और शिक्षकों की होती है। शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ाने वाले कर्मचारी नहीं होते; वे आदर्श, अनुशासन और मर्यादा के जीवंत उदाहरण होते हैं। उनकी चुप्पी या लापरवाही बच्चों के लिए मौन स्वीकृति बन जाती है।

विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उद्देश्य बच्चों की रचनात्मकता को सकारात्मक दिशा देना होता है। नृत्य, संगीत और नाटक बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं, उनकी प्रतिभा को मंच देते हैं और उन्हें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। लेकिन जब यही मंच फूहड़ता का माध्यम बन जाए, तो उसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। लोकनृत्य, देशभक्ति गीत, शास्त्रीय या सुगम संगीत, प्रेरक नाटक—ये सब न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। इसके विपरीत, अश्लीलता आधारित प्रस्तुतियाँ केवल क्षणिक तालियाँ तो बटोर सकती हैं, पर वे किसी भी तरह से बच्चों के व्यक्तित्व को समृद्ध नहीं करतीं।

यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि समाज और अभिभावकों की भूमिका क्या है। आज कई बार अभिभावक भी विद्यालयों से केवल परिणाम और प्रतियोगिता की अपेक्षा रखते हैं, जबकि मूल्य-आधारित शिक्षा पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। यदि किसी विद्यालय में ऐसी घटनाएँ होती हैं, तो केवल शिक्षकों या प्रशासन को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं। समाज को भी यह तय करना होगा कि वह अपने बच्चों को किस तरह का वातावरण देना चाहता है। क्या हम चाहते हैं कि विद्यालय भी उसी संस्कृति को अपनाएँ, जो टीवी और मोबाइल स्क्रीन पर परोसी जा रही है, या हम उनसे कुछ बेहतर, कुछ अधिक जिम्मेदार अपेक्षा रखते हैं?

दूसरी ओर, यह भी आवश्यक है कि हर घटना पर प्रतिक्रिया संतुलित हो। किसी एक चूक के आधार पर पूरे शिक्षक समुदाय को कठघरे में खड़ा करना या कठोर दंड की माँग करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। शिक्षक भी इंसान हैं और उनसे भी भूल हो सकती है। यदि कोई घटना पहली बार हुई है और उसमें दुर्भावना नहीं थी, तो सुधारात्मक चेतावनी, स्पष्ट दिशा-निर्देश और संवेदनशील प्रशिक्षण अधिक प्रभावी हो सकता है। लेकिन यदि ऐसी गतिविधियाँ बार-बार हों, या जानबूझकर मर्यादा को तोड़ा जाए, तो सख्त कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है, ताकि अनुशासन की मर्यादा बनी रहे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि पूरे देश में विद्यालयों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए स्पष्ट और एकरूप दिशा-निर्देश हों। ये दिशा-निर्देश केवल कागज़ों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका ईमानदारी से पालन हो। कार्यक्रमों की पूर्व स्वीकृति, गीतों और प्रस्तुतियों की समीक्षा, वेशभूषा की मर्यादा और मंच संचालन की जिम्मेदारी—इन सभी बिंदुओं पर स्पष्ट नियम होने चाहिए। साथ ही शिक्षकों के लिए नियमित प्रशिक्षण भी आवश्यक है, ताकि वे बदलते सामाजिक प्रभावों को समझते हुए बच्चों को सही मार्गदर्शन दे सकें।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि नैतिकता और संस्कृति का अर्थ कठोरता या रचनात्मकता का दमन नहीं है। बच्चों को आधुनिकता से काटना समाधान नहीं, बल्कि उन्हें विवेक के साथ आधुनिकता को अपनाना सिखाना अधिक आवश्यक है। विद्यालयों को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जहाँ बच्चे खुलकर अपनी प्रतिभा दिखा सकें, पर साथ ही यह भी समझें कि हर मंच की अपनी मर्यादा होती है। स्वतंत्रता और अनुशासन का संतुलन ही स्वस्थ शिक्षा व्यवस्था की पहचान है।

यदि हम व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह मुद्दा केवल विद्यालयों तक सीमित नहीं है। यह उस सामाजिक दिशा का प्रतिबिंब है, जिसमें हम आगे बढ़ रहे हैं। जब समाज में फूहड़ता सामान्य होती जाती है, तो उसका असर संस्थानों पर भी पड़ता है। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल नियमों से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से भी जुड़ा है। मीडिया, मनोरंजन उद्योग और डिजिटल प्लेटफॉर्म—सभी की जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों और युवाओं के लिए जिम्मेदार सामग्री प्रस्तुत करें।

भारत जैसे विविधता और सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध देश में विद्यालयों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यहाँ की शिक्षा व्यवस्था केवल रोजगार सृजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक निरंतरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की वाहक है। यदि विद्यालयों में ही मर्यादा और संस्कार कमजोर पड़ने लगें, तो इसका असर केवल कुछ कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धीरे-धीरे समाज के ताने-बाने को भी प्रभावित करेगा।

अंततः, यह आवश्यक है कि हम इस विषय को न तो अतिशयोक्ति में बदलें और न ही हल्के में लें। यह समय आत्ममंथन का है—शिक्षकों के लिए, प्रशासन के लिए, अभिभावकों के लिए और समाज के लिए। विद्यालयों को फिर से उस स्थान के रूप में स्थापित करना होगा, जहाँ ज्ञान के साथ-साथ संस्कार भी दिए जाते हैं। जहाँ मनोरंजन हो, पर मर्यादा के साथ; जहाँ स्वतंत्रता हो, पर जिम्मेदारी के साथ।

विद्यालय वास्तव में मंदिर हैं—ऐसे मंदिर जहाँ भविष्य की पीढ़ियाँ गढ़ी जाती हैं। इन मंदिरों की गरिमा बनाए रखना किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम यह जिम्मेदारी ईमानदारी से निभा पाए, तभी हम आने वाली पीढ़ियों को एक संतुलित, संस्कारी और जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित कर सकेंगे।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान है मातृभाषा

बाल मुकुन्द ओझा

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को हर साल मनाया जाता है। यह दिवस देश और दुनिया में भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता व बहुभाषिता को प्रोत्साहन देने के साथ मातृभाषाओं से जुड़ी जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। यूनेस्को के मुताबिक देश और दुनिया में 40 प्रतिशत आबादी को उस भाषा में शिक्षा प्राप्त नहीं है जिसे वे बोलते या समझते हैं। फिर भी, बहुभाषी शिक्षा में इसके महत्व की बढ़ती समझ के साथ प्रगति हो रही है, विशेषकर प्रारंभिक स्कूली शिक्षा में, और सार्वजनिक जीवन में इसके विकास के प्रति अधिक प्रतिबद्धता के साथ। आज, 250 मिलियन बच्चे और युवा अभी भी स्कूल नहीं जाते हैं और 763 मिलियन वयस्क बुनियादी साक्षरता कौशल में निपुण नहीं हैं। मातृभाषा शिक्षा सीखने, साक्षरता और अतिरिक्त भाषाओं के अधिग्रहण का समर्थन करती है। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस प्रत्येक भाषा की गरिमा को स्वीकार करने के लिए मनाया जाता है। यह दिवस हमको इस बात का ध्यान दिलाता है कि भाषा अभिव्यक्ति का साधन मात्र नहीं है यह सांस्कृतिक सेतु भी बनाती है। यूनेस्को द्वारा दुनिया भर के विभिन्न देशों में उपयोग की जाने वाली (पढ़ी, लिखी और बोली जाने वाली) 7 हज़ार से अधिक भाषाओं की पहचान की गई है। इसी बहुभाषीवाद को मनाने के लिए 21 फरवरी का दिन चुना गया है। यूनेस्को के मुताबिक दुनियाभर में 6000 भाषाएं  बोली जाती हैं। यूनेस्को अनुसार वर्तमान में कम से कम 2680 देशी भाषाओं के लुप्त होने का खतरा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग दो हज़ार भाषाएं या बोलिया बोली जाती हैं। इनमें से 42.2 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिंदी है। 

यह सही है की भाषाओँ की दृष्टि से भारत एक समृद्ध देश है। उत्तर भारत के राज्यों को छोड़कर देश में जितने भी राज्य है वहां की मातृ भाषा हिंदी नहीं है हालाँकि हिंदी को हमने राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकारा है। बंगाल में बंगला, असम में असमी, कर्णाटक में कन्नड़, तमिलनाडु में तमिल ,केरल में मलयालम आंध्र में तेलगु और उड़ीसा में उड़िया का बोलबाला है। कुछ अन्य राज्यों की भाषा भी वहां की स्थानीय  भाषा है और वहां हिंदी नहीं बोली जाती। आजादी के बाद यदि हमने अपनी निज भाषा के विकास पर ध्यान दिया होता तो आज हिंदी सम्पूर्ण देश में सर्वत्र मातृ भाषा के रूप में अपना स्थान बना लेती। हमारी गुलाम मानसिकता का ही यह परिणाम था की हिंदी मातृ भाषा का अपना दर्जा हासिल नहीं कर पाई। क्षेत्रीय भाषाओँ से हमारा कतई विरोध नहीं है। यदि देश के नागरिक अपनी स्थानीय  भाषा को मातृ भाषा के रूप में स्वीकारते है तो यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है।  हमारा  विरोध तो विदेशी भाषा से है जिसने हिंदी को आगे नहीं बढ़ने दिया। आज आवश्यकता इस बात की कि हम विश्व मातृ भाषा दिवस जरूर मनाएं लेकिन हिंदी को उसका हक अवश्य दिलाये। दक्षिण के प्रदेश अपनी  निज बोली या भाषा को अपनाये इसमें किसी को आपत्ति नहीं है मगर राष्ट्रभाषा के स्थान पर अंग्रेजी को अपनाये यह हमे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं है। वे तमिल ,कनड  या बंगला को अपनाये हमे खुशी होगी मगर हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी थोपे तो यह बर्दाश्त नहीं होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है की हम देश की मातृ और जन भाषा के रूप में हिंदी को अंगीकार करे। अपनी अपनी निज भाषा के साथ हिंदी को स्वीकार कर देश को प्रगति पथ और  एक सूत्र में पिरोने के लिए अपने स्वार्थ त्यागे और देश के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा का परिचय दें। अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस की सार्थकता इसीमें है कि हम अपनी क्षेत्रीय भाषाओँ की अस्मिता को स्वीकार करने के साथ हिंदी को व्यापक स्वरुप प्रदान कर देश को एक नई पहचान दें। यह देश की सबसे बड़ी सेवा होगी।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

इतिहास में 21 फरवरी : 2013 में हैदराबाद में हुए बम धमाकों में 17 की जान गई

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21 फरवरी 2013 को हैदराबाद शहर में हुए बम धमाकों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। यह विस्फोट दिलसुखनगर इलाके में हुए, जो उस समय एक व्यस्त व्यावसायिक और रिहायशी क्षेत्र था। शाम के समय हुए इन धमाकों में 17 लोगों की मौत हो गई, जबकि 119 से अधिक लोग घायल हुए थे।

धमाके भीड़भाड़ वाले स्थानों—बस स्टॉप और एक सिनेमा हॉल के पास—कम समय के अंतराल में किए गए, जिससे अफरा-तफरी मच गई। घायलों को तत्काल नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया और राहत-बचाव कार्य कई घंटों तक चलता रहा।

जांच की जिम्मेदारी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपी गई। जांच में प्रतिबंधित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन की संलिप्तता सामने आई। बाद में इस मामले में कई आरोपितों को गिरफ्तार किया गया और विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया।

यह हमला देश में शहरी इलाकों को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमलों की कड़ी में एक और गंभीर घटना थी। इस घटना के बाद देशभर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई और खुफिया तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

हैदराबाद धमाकों की बरसी पर आज भी पीड़ितों को याद किया जाता है और आतंकवाद के खिलाफ एकजुट रहने का संकल्प दोहराया जाता है।

महत्वपूर्ण घटनाक्रम

1795- डचों ने सीलोन, श्रीलंका अंग्रेजों को सौंप दिया।

1842- अमेरिका में सिलाई मशीन का पेटेंट कराया गया।

1907 – अंग्रेजी भाषा के कवि आडेन का जन्म।

1914 – बर्दुन का युद्ध प्रारम्भ।

1916 – प्रथम विश्व युद्ध में फ्रांस में बर्डन की लड़ाई भड़की।

1919 – बावारेवा के प्रधानमंत्री कुर्तरिजनर की हत्या म्यूनिख में हुई।

1919 – बार्सिलोना में क्रान्ति।

1925 – न्यूयॉर्कर मैगजीन के प्रथम संस्करण का प्रकाशन।

1943 – ब्रिटेन नरेश जार्ज षष्ठ ने रूसियों को सम्मानित किया।

1946 – मिस्र में ब्रिटेन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन।

1948 – स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप संविधान सभा के अध्यक्ष के समक्ष रखा गया।

1952 – ढाका (उस समय पूर्वी पाकिस्तान) में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर तब गोलियां चलाईं जब वे बांग्ला को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग कर रहे थे। बाद में आधिकारिक दर्जा दिया गया और बांग्लादेश में इसके बाद से यह दिन भाषा आंदोलन के स्मारक के रूप में मनाया जाने लगा। यूनेस्को ने इसे बाद में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया।

1959 – प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की नई दिल्ली में स्थापना।

1963 – सोवियत संघ ने अमेरिका को चेतावनी दी कि क्यूबा पर हमला विश्वयुद्ध में बदल सकता है।

1974 – युगोस्लाविया ने संविधान स्वीकार किया।

1975 – राष्ट्रसंघ मानवाधिकार आयोग ने अधिकृत अरब क्षेत्रों में दमनात्मक कार्रवाई के लिए इस्रायल की कड़ी निंदा की।

1981 – नासा ने सेटेलाइट कोमस्टर-4 का प्रक्षेपण किया।

1986 – दक्षिण अफ़्रीका सरकार ने जोहान्सबर्ग और डरबन अश्वेतों के लिए खोल दिए।

1990 – कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने राजकुमार सिंहानुक से बैंकाक में शांतिवार्ता की।

1991 – अल्बानिया में राष्ट्रपति ने पुलिस विद्रोह के बाद नई सरकार के गठन की घोषणा की।

1992 – चीन से शंघाई शेयर बाज़ार में विदेशियों को कामकाज की अनुमति दी।

1996 – हब्बल अंतरिक्ष द्वारा भेजे गये चित्रों की सहायता से ‘ब्लेक होल’ के अस्तित्व का पता चला।

1996 – अंतरिक्ष यान सोयूज टीएम 23 कक्षा में स्थापित।

1998 – सं.रा. सुरक्षा परिषद ने इराक को 5.2 अरब डालर का तेल बेचने की अनुमति दी।

1999 – पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ के बीच लाहौर घोषणा पर समझौता।

2000 – भारतीय मूल के 52 वर्षीय उज्जल दोसांझ कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया प्रान्त के नये मुख्यमंत्री (प्रीमियर) बने।

2001 – इजराइल में एहुक बराक का गठबंधन सरकार में शामिल होने से इंकार, राजनीति छोड़ने की घोषणा।

2001 – सहस्रशताब्दी के महाकुंभ का समापन।

2004 – लॉन टेनिस में सानिया मिर्जा डब्ल्यूटीए खिताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनी।

2005 – स्पेन के निवासियों ने जनमत संग्रह में यूरोपियन संघ के संविधान का व्यापक समर्थन किया।

2008 – अनिल अंबानी की ‘रिलायंस कम्यूनिकेशन’ ने यूगांडा की कंपनी ‘अनुपम ग्लोबल सॉफ्ट’ का अधिग्रहण किया।

2008 – भारत की प्राइवेट एयरलाइंस जेट एयरवेज ने एयर कनाडा के साथ स्ट्रेटिजी गठजोड़ किया।

2008 – पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता आसिफ़ अली जरदारी और मुस्लिम लीग (एन) के नेता व पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने हाथ मिलाया।

2009 – हिन्दुस्तान मोटर्स ने अपने प्रबन्धकों की तनख़्वाह घटाई।

2010 – सऊदी अरब की सरकार ने महिलाओं को वकालत करने की अनुमति देने संबंधी कानून लाने का फैसला किया। यह कानून महिलाओं को परिवार से जुड़े तलाक जैसे मुकदमों की पैरवी का अधिकार देगा।

2010 – बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ने दुनिया की नंबर आठ खिलाड़ी झोउ मि को 14-21, 21-10, 23-21 से 50 मिनट में पराजित कर दिया। इसके साथ ही भारतीय टीम ने थाइलैंड के नार्कोनराचशिमा में खेले जा रहे उबेर कप (एशिया जोन क्वॉलिफायर) में अपने पहले मैच में हॉन्गकॉन्ग को 3-2 से हरा दिया।

जन्म

1923 – विश्वनाथ नारायण लवांडे – ‘गोवा मुक्ति संग्राम’ के प्रमुख नेता एवं स्वतंत्रता सेनानी थे।

1878 – दा मदर मिर्रा अलफ़ासा, भारतीय आध्यात्मिक नेता (मृत्यु- 1973)

1904 – एलेक्सी कोज़ीगिन – सोवियत संघ के प्रधानमंत्री थे।

1894 – शान्ति स्वरूप भटनागर – भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक।

1896 – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, एक कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार।

1980 – प्रतिभा सुरेशवारन, भारतीय रेसिंग ड्राइवर।

1952 – टी. आर. जेलियांग – नागालैंड के 10वें मुख्यमंत्री।

निधन

2024 – फली एस. नरीमन – भारत के जाने-माने कानूनविद और उच्चतम न्यायालय के अनुभवी वरिष्ठ अधिवक्ता थे।

1991 – नूतन, हिन्दी सिनेमा की सबसे प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं।

1996 – प्रकाश चंद्र सेठी – मध्य प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री थे।

1990 – जोहराबाई अम्बालेवाली – हिन्दी सिनेमा की पार्श्वगायिका और भारतीय शास्त्रीय गायिका थीं।

1970 – हरि विनायक पाटस्कर – भारतीय राजनीतिज्ञ तथा मध्य प्रदेश के भूतपूर्व राज्यपाल।

1829 – रानी चेन्नम्मा – झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के समान कर्नाटक की वीरांगना और स्वतंत्रता सेनानी।

महत्वपूर्ण दिवस

अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस