प्रधानमंत्री मोदी ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट का किया उद्घाटन

अश्विनी वैष्णव ने की नई दिल्ली फ्रंटियर एआई इम्पैक्ट प्रतिबद्धताओं की घोषणा

नई दिल्ली, 19 फरवरी (हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को भारत मंडपम में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट का उद्घाटन करते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य पारदर्शिता, जवाबदेही और मानव-हित पर आधारित होना चाहिए। एआई कुछ देशों या कंपनियों का साधन नहीं बने, बल्कि यह “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का माध्यम बने। प्रधानमंत्री ने एआई के लिए मानव विजन पेश करते हुए कहा कि अवसरों के साथ जोखिम भी हैं, इसलिए इसे मानव-केंद्रित और जिम्मेदार तरीके से विकसित करना जरूरी है।

इस मौके पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव, वैश्विक तकनीकी कंपनियों के प्रमुख और उद्योग जगत के दिग्गज मौजूद रहे। सम्मेलन के दौरान ‘नई दिल्ली फ्रंटियर एआई इम्पैक्ट प्रतिबद्धताओं’ की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य एआई को समावेशी, बहुभाषी और वैश्विक विकास का साधन बनाना है।

प्रधानमंत्री ने डीप फेक जैसी चुनौतियों का जिक्र किया और कहा कि जैसे खाने की चीजों पर लेबल लगता है कि उसमें क्या है, वैसे ही डिजिटल कंटेंट पर भी लेबलिंग जरूरी है ताकि लोग सच-झूठ पहचान सकें। इसकी स्पीड और स्केल इतनी बड़ी है कि इसके अच्छे और बुरे दोनों प्रभाव हो सकते हैं। इसलिए सावधानी बरतनी होगी। एआई को खुली छूट मिलनी चाहिए, लेकिन कमान हमारे हाथ में होनी चाहिए । विकासशील देशों के लिए एआई को लोकतांत्रिक बनाना जरूरी है। मनुष्यों को सिर्फ डेटा का स्रोत नहीं बनने देना चाहिए, बल्कि एआई को सशक्तिकरण का माध्यम बनाना होगा।

प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया में दो तरह के लोग हैं। कुछ एआई से डरते हैं, कुछ इसमें भाग्य देखते हैं। भारत गर्व से कहता है कि हमें एआई में भय नहीं, भाग्य और भविष्य दिखता है। भारत सेमीकंडक्टर चिप मैन्युफैक्चरिंग, क्वांटम कंप्यूटिंग तक मजबूत इकोसिस्टम बना रहा है। सुरक्षित डेटा सेंटर, मजबूत आईटी ढांचा और डायनामिक स्टार्टअप कल्चर भारत को किफायती, स्केलेबल और सुरक्षित एआई का हब बना सकता है। भारत की विविधता, युवा आबादी और लोकतंत्र इसे खास बनाते हैं। यहां सफल एआई मॉडल पूरी दुनिया में काम कर सकता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि जैसे स्कूल का सिलेबस बच्चों के लिए सुरक्षित और परिवार के मार्गदर्शन में होता है, वैसे ही एआई भी बच्चों के लिए सुरक्षित होनी चाहिए। समिट में 3 भारतीय कंपनियों ने अपने एआई मॉडल्स और ऐप्स लॉन्च किए, जो युवाओं की प्रतिभा और भारत की विविधता को दिखाते हैं। प्रदर्शनी में कृषि, सुरक्षा, दिव्यांगों की मदद, बहुभाषी समाधान जैसे क्षेत्रों में ‘मेड इन इंडिया’ के सॉल्यूशंस ने सबका ध्यान खींचा। प्रधानमंत्री ने कहा कि नई तकनीकों को शुरू में संदेह झेलना पड़ता है, लेकिन युवा एआई को कितनी तेजी से अपना रहे हैं, वो अभूतपूर्व है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि भारत ने वो हासिल किया है जो कोई और देश नहीं कर पाया। भारत के 1.4 अरब लोगों के लिए डिजिटल पहचान, यूपीआई से हर महीने करोड़ों लेनदेन, डिजिटल स्वास्थ्य प्रमाण, ये एक सभ्यता की कहानी है। एआई अब रणनीतिक क्षेत्र बन गया है। यहां प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है। हमें एकजुट होना होगा। वरना पीछे रह जाएंगे। कोई देश या कंपनी किसी देश को सिर्फ बाजार या डेटा सोर्स नहीं समझ सकती। एआई उत्पादकता बढ़ाएगी, लेकिन सबके लिए उपलब्ध होनी चाहिए। एआई को भाषाई विविधता वाला बनाना होगा ताकि हर कोई इस्तेमाल कर सके।

मैक्रों ने कहा कि डिजिटल दुरुपयोग से बच्चों को बचाना जरूरी है। फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की प्रक्रिया चल रही है। कई यूरोपीय देश इसमें शामिल हैं। भारत और प्रधानमंत्री मोदी भी इसमें साथ आएंगे। फ्रांस और भारत मिलकर एआई को मानवता के लिए इस्तेमाल करेंगे। भाषण के अंत में उन्होंने ‘जय हो’ कहा।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने प्रधानमंत्री मोदी आयोजित करने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ में पहला ऐसा एआई समिट भारत ने किया है, ये खास है। एआई का भविष्य कुछ मुट्ठी भर देशों या कुछ अरबपतियों के हाथ में नहीं छोड़ सकते। ये पूरी मानवता का मुद्दा है, सभी देशों की भागीदारी जरूरी है। गुटेरेस ने पिछले साल यूएन महासभा के दो बड़े कदमों का जिक्र किया एक, एआई पर स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पैनल बनाना, जो अब नियुक्त हो गया है। 40 विशेषज्ञ इसमें शामिल हैं। दूसरा, यूएन के अंदर एआई गवर्नेंस पर वैश्विक संवाद शुरू करना।

उन्होंने कहा कि एआई को हर किसी तक पहुंचानी होगी। इसके लिए एक वैश्विक कोष बनाना चाहिए। इसके लिए हमारा 3 अरब डॉलर का टारगेट है। ये किसी एक टेक कंपनी के सालाना रेवेन्यू का 1 फीसदी से भी कम है। ये पैसा कौशल, डेटा, किफायती कंप्यूटिंग और समावेशी वातावरण बनाने में लगेगा। एआई से टिकाऊ विकास लक्ष्य पूरे हो सकते हैं। दवा रिसर्च तेज होगी, शिक्षा बढ़ेगी, खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी, जलवायु कार्रवाई बेहतर होगी। लेकिन, एआई असमानता बढ़ा सकती है। पूर्वाग्रह बढ़ा सकती है। हानि पहुंचा सकती है। डेटा सेंटरों को क्लीन एनर्जी पर चलना होगा। कामगारों में निवेश करना होगा ताकि एआई इंसानों की जगह न ले। बच्चों को अनरेगुलेटेड एआई का टेस्ट सब्जेक्ट नहीं बनने देना चाहिए। समिट का संदेश साफ है कि असली प्रभाव वाली तकनीक वो है जो जिंदगियां बेहतर बनाए और पृथ्वी की रक्षा करे।

केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ‘नई दिल्ली फ्रंटियर एआई इम्पैक्ट प्रतिबद्धताओं’ की घोषणा की। ये दो मुख्य लक्ष्यों पर आधारित हैं । पहला, डेटा से रोजगार और आर्थिक बदलाव के लिए साक्ष्य-आधारित नीतियां बनाना। दूसरा, एआई को बहुभाषी और सांस्कृतिक रूप से मजबूत बनाना। ये ग्लोबल साउथ के लिए एआई को समावेशी बनाने में भारत का नेतृत्व दिखाती हैं। कई बड़ी एआई कंपनियां और भारतीय इनोवेटर्स इसमें स्वैच्छिक संकल्प ले रहे हैं। भारत का एआई गवर्नेंस विजन जिम्मेदार नवाचार के लिए मार्गदर्शक है। सात विषयगत कार्यकारी समूब के निष्कर्ष ढांचा तैयार करेंगे। आईटी सचिव एस कृष्णन ने कहा कि हमारा दृष्टिकोण ‘सतर्क उत्साह’ का है। जोखिमों से सजग रहते हुए वैश्विक मानकों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

टाटा ग्रुप के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने कहा कि भारत एआई को लेकर बहुत आशावादी है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की ताकत देखी है, अब एआई अगला बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा। ये भाप इंजन, बिजली और इंटरनेट जैसा बदलाव लाएगा। एआई सिर्फ आर्टिफिशियल नहीं, डेटा से सीखने वाली असली तकनीक है। ये सभी इंडस्ट्रीज को प्रभावित करेगी।

रिलायंस के मुकेश अंबानी ने कहा कि ये समिट भारत के तकनीकी इतिहास का निर्णायक पल है। एआई विकसित भारत 2047 के सपने को पूरा करने की ताकत बनेगा। सही इस्तेमाल से दुनिया से गरीबी खत्म हो सकती है, पूरी मानवता के लिए समृद्धि ला सकता है। एआई इंसानों की तरह सीख सकती है, बोल सकती है, काम कर सकती है। उन्होंने एआई को महाभारत के अक्षय पात्र से जोड़ा। उन्होंने कहा कि दुनिया एक मोड़ पर है। एक रास्ता जहां एआई सीमित रहेगा, दूसरा जहां सबके लिए अवसर पैदा करेगा। भारत दूसरे रास्ते में विश्वास करता है। भारत के पास मजबूत आधार है। सबसे ज्यादा मोबाइल डेटा यूज, सस्ता डेटा, आधार, यूपीआई, स्टार्टअप इकोसिस्टम। जियो अब एआई परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभाएगा।

ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने कहा कि भारत में एआई का काम और अपनाना दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। भारत एआई का सबसे बड़ा बाजार बनेगा। रोजगार पर असर पड़ेगा, लेकिन नए अवसर भी आएंगे।

एलियांस इंडिया के महाप्रबंधक सर्ज रैफार्ड ने कहा कि एआई सबके लिए उपलब्ध होना चाहिए ताकि पूरी दुनिया ऊपर उठे। ये समिट उम्मीद से कहीं बड़ा है।

एन्थ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई ने कहा कि भारत एआई के भविष्य में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। कंपनी ने बेंगलुरु में ऑफिस खोला है और इंफोसिस जैसी कंपनियों से पार्टनरशिप की है। भारत में एआई को लेकर जबरदस्त ऊर्जा और उत्साह है। निर्माण और नवाचार की भावना यहां अलग लेवल पर है। एआई के दुरुपयोग, आर्थिक प्रभाव और स्वायत्त व्यवहार जैसे मुद्दों में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ का टाइटल लिया वापस

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फिल्म निर्माता का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा

नई दिल्ली, 19 फरवरी (हि.स.)। फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के निर्माता ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि उनका इरादा किसी की भावनाओं को आहत करने का नहीं था और फिल्म का टाइटल वापस ले लिया गया है। कोर्ट ने इससे संबंधित याचिका का निबटारा करते हुए कहा कि अब इस फिल्म को लेकर कोई नई एफआईआर दर्ज नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस फिल्म पर जारी विवाद अब बंद किया जाना चाहिए।

फिल्म के निर्माता नीरज पांडे ने उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दायर कर कहा है कि मेरा या मेरे प्रोडक्शन हाउस का किसी धर्म, जाति या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था। फिल्म एक काल्पनिक पुलिस ड्रामा है, जो एक अपराध की जांच पर आधारित है। फिल्म में किसी भी जाति, धर्म, समुदाय का अपमान नहीं दिखाया गया है। हलफनामे में कहा गया है कि फिल्म का पुराना नाम ‘घूसखोर पंडत’ वापस ले लिया गया है। अभी नया नाम नहीं तय हुआ है, लेकिन नया नाम बिल्कुल अलग होगा, ताकि फिर कोई विवाद न हो। अभी इस फिल्म के नाम से जुड़ी सभी प्रचार सामग्री, पोस्टर और ट्रेलर वापस ले लिए गए हैं।

उच्चतम न्यायालय ने 12 फरवरी को फिल्म घूसखोर पंडत के निर्माता को फटकार लगाते हुए कहा था कि आप अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी समुदाय को नीचा नहीं दिखा सकते हैं। सुनवाई के दौरान फिल्म के निर्माता ने कहा था कि फिल्म का नांम बदला जाएगा। तब कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में आप हलफनामा दाखिल कीजिए।

कोर्ट ने कहा था कि जब समाज में पहले से इतनी अशांति है, तो इस तरह के नाम माहौल को और खराब कर सकते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार अपने आप में कोई असीमित अधिकार नहीं है। उस पर भी वाजिब प्रतिबंध लागू होते हैंं। आप उसकी आड़ में किसी समुदाय को यूं टारगेट नहीं कर सकते हैं। इस संबंध में याचिका अतुल मिश्रा ने दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि इस फिल्म के जरिये एक समुदाय विशेष को टारगेट करने की कोशिश की जा रही है।

मुफ्त की रेवड़ियों पर सुप्रीम प्रहार

बाल मुकुंद ओझा 

फ्रीबीज यानी मुफ्त सुविधाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कड़ी फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि घाटे में चल रहे राज्य मुफ्त भोजन, बिजली और साइकिल जैसी योजनाएं बांट रहे हैं, जिससे देश का आर्थिक विकास बाधित हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियां तमिलनाडु विद्युत वितरण निगम बनाम केंद्र सरकार मामले की सुनवाई के दौरान की है। सीजेआई ने कहा कि राज्य को रोजगार के अवसर खोलने के लिए काम करना चाहिए। अगर आप सुबह से ही मुफ्त भोजन देना शुरू कर दें, फिर मुफ्त साइकिल, फिर मुफ्त बिजली और अब हम उस स्थिति तक पहुंच रहे हैं, जहां हम सीधे लोगों के खातों में नकद राशि स्थानांतरित कर रहे हैं।  मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि फ्रीबीज की  फिजूलखर्ची से देश का आर्थिक विकास बाधित होगा। हम केवल तमिलनाडु के संदर्भ में ही बात नहीं कर रहे हैं।  हम इस तथ्य पर विचार कर रहे हैं कि चुनाव से ठीक पहले योजनाएं क्यों घोषित की जा रही हैं। सभी राजनीतिक दलों समाजशास्त्रियों को अपनी विचारधारा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर चुनावों के दौरान मुफ्त की रेवड़ियों पर कड़ा प्रहार किया है।  चुनावों के दौरान सियासी पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए तरह −तरह के वादे और प्रतिवादे करती है। सरकार बनने के बाद चुनावी वादे पूरा करने में पार्टियों के पसीने छुट जाते है। कई राज्यों की अर्थव्यवस्था तो चौपट तक हो जाती है जिसके कारण  सम्बध सरकारों को अपने कर्मचारियों के वेतन आदि  चुकाने के लाले पड़ जाते है। राजनैतिक पार्टियों द्वारा मत हासिल करने के लिए राजकीय कोष से मुफ्त सुविधाएं देने का प्रकरण सियासी हलकों में गर्माने लगा है। देश की प्रबुद्ध जमात का मानना है इससे हमारे लोकतंत्र की बुनियाद हिलने लगी है। राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के दौरान इस तरह के वादे करने का चलन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक पार्टियां आम लोगों से अधिक से अधिक वायदे करती हैं। इसमें से कुछ वादे मुफ्त में सुविधाएं या अन्य चीजें बांटने को लेकर होती हैं। यह देखा गया है कुछ सालों से देश की चुनावी राज

नीति में मुफ्त बिजली—पानी, मुफ्त राशन, महिलाओं को नकद राशि, सस्ते गैस सिलेंडर आदि आदि अनेक तरह की घोषणाओं का चलन बढ़ गया है। विशेषकर चुनाव आते ही वोटर्स को लुभाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। मुफ्त का मिल जाये तो उसका जी भर उपयोग करना। ये मुफ्त की नहीं है अपितु जनता के खून पसीनें की कमाई है जो राजनीतिक दलों और सरकारों द्वारा दी जा रही है ताकि चुनाव की बेतरणी आसानी से पार की जा सके। देश के प्रधानमंत्री रेवड़ी कल्चर का विरोध कर चुके है मगर चुनावों में उनकी पार्टी भाजपा सहित कांग्रेस और आप सहित सभी पार्टियां रेवड़ी कल्चर में डुबकियां लगा रही है।

देखा गया है चुनावों में सभी दल लोकलुभावन वादों के जरिए दूसरे दलों से आगे निकलने की जुगत में हैं। आम आदमी पार्टी मुफ्त सुविधाएं देने के वादों में सबसे आगे है। यह पार्टी मतदाताओं को मुफ्त बिजली पानी आदि लुभावनी घोषणाएं कर दिल्ली और पंजाब में सत्ता हासिल कर चुकी है। जिन्हें मुफ्त की योजनाएं मिल रही हैं वो कहते हैं कि फ्रीबीज या रेवड़ी कल्चर सही है, लेकिन जो टैक्सपेयर हैं और जिनकी कमाई का कुछ हिस्सा टैक्स में जाता है वो इसे गलत बताते हैं। पिछले अनेक चुनावों में मुफ्त उपहार और सुविधाएं देने की एक परंपरा सी पड़ गई। मतदाता भी ऐसी घोषणाओं का इंतज़ार करते है जो किसी भी स्थिति में लोकतंत्र के हितकारी नहीं कहा जा सकता।

बताते है चुनावी लोकतंत्र में मुफ्त उपहार की परंपरा तमिलनाडु से शुरू हुई थी। तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक की नेत्री जय ललिता ने मुफ्त उपहार बाँट कर द्रमुक से सत्ता छीनी थी। वहां पहले मोबाइल, टीवी सेट, डिनर सेट, हैदराबादी मोती के सेट बंट चुके हैं। पिछले अनेक चुनावों में मुफ्त उपहार और सुविधाएं देने की एक परंपरा सी पड़ गई। मतदाता भी ऐसी घोषणाओं का इंतज़ार करते है जो किसी भी स्थिति में लोकतंत्र के हितकारी नहीं कहा जा सकता।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

इतिहास के पन्नों में 20 फरवरी : मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश बना भारत का 23वां और 24वां राज्य

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भारत के संघीय ढांचे में 1987 का वर्ष विशेष महत्व रखता है, जब पूर्वोत्तर के दो क्षेत्रों को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। इस वर्ष मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश क्रमशः भारत के 23वें और 24वें राज्य बने।

इससे पहले ये दोनों क्षेत्र केंद्र शासित प्रदेश के रूप में प्रशासित होते थे। मिजोरम में लंबे समय तक चली अस्थिरता और विद्रोही गतिविधियों को शांत करने के लिए 1986 में मिजो शांति समझौता हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप अगले वर्ष मिजोरम को राज्य का दर्जा दिया गया।

वहीं, अरुणाचल प्रदेश की भौगोलिक और सामरिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसे भी पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया। इससे पूर्वोत्तर क्षेत्र में प्रशासनिक ढांचे और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूती मिली।

भारत में इन दो राज्यों के गठन को संघीय संरचना के विस्तार और देश के लोकतांत्रिक ढांचे में समावेशिता को बढ़ावा देने वाला कदम माना जाता है। यह घटना आज भी पूर्वोत्तर क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में मील का पत्थर है।

महत्वपूर्ण घटनाक्रम

1547 – एडवर्ड षष्ठम का इंग्लैंड के शासक के पद पर वैस्टमिनिस्टर ऐबे में राज्याभिषेक हुआ।

1798 – लुई एलेक्जेंडर बर्थियर ने पोप पायस षष्ठम को पदच्युत किया।

1833 – मिस्र के साथ युद्ध में तुर्की की मदद के लिए रूसी जहाज़ बास्फ़ोरस की खाड़ी में पहुँचे।

1835 – कलकत्ता मेडिकल कॉलेज आधिकारिक तौर पर खुला।

1846 – अंग्रेजों ने लाहौर पर कब्जा किया।

1847 – रॉयल कलकत्ता टर्फ क्लब की स्थापना।

1868 – ‘अमृत बाजार पत्रिका’ का बांग्ला में साप्ताहिक रूप में प्रकाशन शुरू हुआ।

1872 – न्यूयार्क शहर में ‘मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट्स’ खुला।

1873 – कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी ने सैन फ़्रांसिस्को में अपने पहले मेडिकल कॉलेज की शुरुआत की।

1933 – एडॉल्फ हिटलर ने चुनावों में नाजी पार्टी को सहयोग देने के लिए गुप्त तौर पर जर्मन उद्योगपतियों से मुलाकात की।

1935 – कैरोलाइन मिकेल्सन अंटार्कटिक पहुँचने वाली पहली महिला बनीं।

1940 – इंग्लैंड में दक्षिण अफ़्रीका में नए निवेशों पर लगी पाबंदियाँ उठा लेने की घोषणा की।

1942 – द्वितीय विश्वयुद्ध में जापानी सैनिकों ने डच ईस्ट इंडीज में बाली पर हमला कर दिया।

1947 – ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने भारत को आज़ादी देने के बारे में घोषणा की।

1962 – जान एच ग्लेन अमेरिका के प्रथम अंतरिक्ष यात्री बने।

1965 – नासा द्वारा प्रक्षेपित रेंजर आठ चांद पर उतरा, फोटो और जरूरी डेटा भेजे।

1968 – मुंबई के के.ई.एम. अस्पताल के डाक्टर पी.के. सेन ने हृदय प्रत्यारोपण का पहला ऑपरेशन किया।

1975 – मार्गरेट थैचर ब्रिटिश कंजर्वेटिव पार्टी की नेता निर्वाचित हुई।

1976 – मुंबई हाई में कच्चे तेल का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन शुरू हुआ।

1982 – कन्हार नदी जल पर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में समझौता।

1986 – सोवियत संघ द्वारा ‘सेल्युत-7’ की अपेक्षा अधिक विकसित अंतरिक्ष स्टेशन ‘मीर’ (शान्ति) का प्रक्षेपण।

1986 – कंप्यूटर से रेलवे टिकट आरक्षण प्रणाली की शुरुआत।

1987 – मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश क्रमश: 23वां एवं 24वां राज्य बना।

1988 – रियो डी जेनेरो में बाढ़ से 65 लोग मारे गये और एक अस्पताल के 100 से अधिक लोग लापता हुए।

1989 – आईआरए द्वारा किये गए एक घमाके में टर्नहिल में ब्रिटिश सेना की एक बैरक घ्वस्त।

1999 – भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की ऐतिहासिक बस यात्रा की।

1999 – दूरदर्शन पर खेल चैनल शुरू हुआ।

2001 – लिथुवानिया के राष्ट्रपति एडमकस भारत पहुँचे, दोनों देशों में तीन समझौते।

2001 – भाकपा के वरिष्ठ नेता इन्द्रजीत गुप्त का निधन।

2000 – भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी ने ब्रिटेन छोड़कर न्यूयार्क में बसने का निश्चय किया।

2002 – काहिरा (मिस्र) में चलती ट्रेन में आग लगने से 373 मरे।

2003 – ईरान में विमान दुर्घटना में 302 लोग मारे गये।

2007 – यूरोपीय संघ कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन को 2010 तक 20 प्रतिशत कम करने को सहमत।

2008 – रक्षा सौदे में ऑफसेट नीति को मंजूरी मिली।

2008 – भारतीय स्टेट बैंक की अगुवाई में चार सरकारी बैंको ने प्राथमिकी ॠण दरों में 0.25.-0.50% तक कटौती की।

2008 – अमेरिका में राष्ट्रपति पद के दावेदार बराम ओबामा ने अपनी नौवीं जीत दर्ज की।

2009- भ्रष्टाचार के आरोप में कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायधीश सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग चला।

2015 – स्विट्जरलैंड के राफ्ज शहर में दो ट्रेनों की टक्कर में 49 लोगों की मौत।

जन्म

1909 – अजय घोष – भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे।

1921 – राव वीरेन्द्र सिंह – हरियाणा के दूसरे मुख्यमंत्री थे।

1932 – भबेन्द्र नाथ सैकिया – भारतीय उपन्यासकार, लघु कथा लेखक तथा फिल्म निर्देशक थे।

1932 – के. वी. सुबन्ना- प्रसिद्ध कन्नड़ नाटककार।

1935 – एन. जनार्दन रेड्डी – भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिज्ञ थे, जो आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।

1936 – जरनैल सिंह – फ़ुटबॉल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक हैं।

1945 – अनु कपूर, भारतीय अभिनेता

1946 – पंकज बिष्ट – हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित पत्रकार, कहानीकार, उपन्यासकार व समालोचक है।

1947 – जयन्त कुमार मलैया – ‘भारतीय जनता पार्टी’ के नेता, मध्य प्रदेश।

1955 – रघुवेंद्र तंवर – भारतीय साहित्यकार हैं।

1976 – रोहन गावास्कर- क्रिकेटर

1988 – जिया खान- भारतीय अभिनेत्री

निधन

1707 – औरंगजेब – मुगल शासक।

1934 – स्वामी शिवानन्द – रामकृष्ण मिशन के दूसरे संघाध्यक्ष थे।

1950 – शरत चन्द्र बोस – स्वतन्त्रता सेनानी।

1972 – शिवनारायण श्रीवास्तव – हिन्दी साहित्य के अध्ययनशील एवं मननशील रचनाकार।

1985 – भवानी प्रसाद मिश्र – हिन्दी के प्रसिद्ध कवि तथा गांधीवादी विचारक।

2024 – अमीन सयानी – ‘आवाज के जादूगर’ और रेडियो के इतिहास में पहले जॉकी थे।

महत्वपूर्ण दिवस

अरुणाचल प्रदेश दिवस

मिजोरम दिवस

विश्व सामाजिक न्याय दिवस

टी20 विश्व कप 2026: भारत ने नीदरलैंड्स को 17 रन से हराया

अहमदाबाद, 18 फरवरी (हि.स.)। आईसीसी पुरुष टी20 विश्व कप 2026 में टीम इंडिया का विजयी अभियान जारी है। नरेन्द्र मोदी स्टेडियम में खेले गए मुकाबले में भारतीय टीम ने नीदरलैंड्स को 17 रनों से हराकर टूर्नामेंट में अपनी लगातार चौथी जीत दर्ज की और अजेय रहने का सिलसिला कायम रखा।

भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 193/6 का मजबूत स्कोर खड़ा किया। कप्तान सूर्यकुमार यादव ने 34 रन बनाए, जबकि Tilak Varma ने उपयोगी 31 रन जोड़े। हार्दिक पांड्या ने भी 30 रनों का योगदान दिया, लेकिन असली तूफान शिवम दुबे के बल्ले से आया। दुबे ने 31 गेंदों में 66 रनों की विस्फोटक पारी खेली, जिसमें 4 चौके और 6 छक्के शामिल रहे। उनकी आक्रामक बल्लेबाजी से भारत ने आखिरी ओवरों में तेजी से रन बटोरे।

194 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए नीदरलैंड्स की शुरुआत धीमी रही। शुरुआती 8 ओवरों में रनगति लगभग 6 रही। इसके बाद कॉलिन एकरमैन और बास डी लीडे ने 49 रनों की तेज साझेदारी कर मैच में जान फूंकी। एकरमैन ने 23 और डी लीडे ने 33 रन बनाए। 15.5 ओवर में स्कोर 125/6 होने के बाद मुकाबला भारत की ओर झुक गया।

लेकिन जैच लायन-कैशेट और नूह क्रोज ने आखिरी ओवरों में जोरदार प्रहार करते हुए उम्मीदें जिंदा रखीं। दोनों ने 23 गेंदों में 47 रन जोड़ दिए। अंतिम दो ओवरों में 46 रन चाहिए थे—19वें ओवर में 18 रन आए। आखिरी ओवर में 28 रन की दरकार थी, लेकिन दुबे ने शानदार गेंदबाजी करते हुए सिर्फ 10 रन दिए और एक विकेट भी लिया। इससे पहले स्पिनर वरुण चक्रवर्ती ने 3 विकेट लेकर डच बल्लेबाजी की कमर तोड़ दी थी।

इस जीत के साथ भारत ग्रुप चरण में अजेय बना हुआ है। अब टीम इंडिया 22 फरवरी को सुपर-8 में साउथ अफ्रीका के खिलाफ अपना पहला मुकाबला खेलेगी। मौजूदा फॉर्म को देखते हुए भारतीय टीम खिताब की मजबूत दावेदार नजर आ रही है।

रोबोडॉग से परे: भारतीय उच्च शिक्षा का खोखलापन

(प्रमाणन की होड़ में दम तोड़ती अकादमिक गुणवत्ता) 

— डॉ. प्रियंका सौरभ

गलगोटिया यूनिवर्सिटी में रोबोडॉग के प्रदर्शन से जुड़ा हालिया विवाद सोशल मीडिया और मुख्यधारा मीडिया में व्यापक चर्चा का विषय बना। सतह पर यह मामला उपयुक्तता, प्राथमिकताओं या कैंपस संस्कृति से जुड़ा प्रतीत होता है, लेकिन वास्तविकता में यह भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में वर्षों से पनप रहे एक गहरे और संरचनात्मक संकट का केवल एक लक्षण है। समस्या रोबोडॉग नहीं है। समस्या यह है कि हमारे विश्वविद्यालय धीरे-धीरे क्या बनते चले गए हैं।

पिछले दो दशकों में भारत में उच्च शिक्षा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। निजी विश्वविद्यालयों, स्ववित्तपोषित कॉलेजों और डिग्री संस्थानों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। इस विस्तार को अक्सर “शिक्षा तक पहुँच बढ़ने” और “जनसांख्यिकीय लाभ” के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन जब यह विस्तार समानांतर नियमन, अकादमिक कठोरता और जवाबदेही के बिना हुआ, तो इसकी क़ीमत गुणवत्ता को चुकानी पड़ी। परिणाम यह हुआ कि मात्रा बढ़ी, पर गुणवत्ता लगातार गिरती चली गई।

आज देश के अधिकांश—हालाँकि सभी नहीं—निजी विश्वविद्यालय और डिग्री कॉलेज शिक्षा के केंद्र कम और डिग्री वितरण केंद्र अधिक बन गए हैं। शिक्षा एक बौद्धिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लेन-देन बनती जा रही है—पैसे के बदले डिग्री। उपस्थिति, अकादमिक भागीदारी, प्रयोगशाला कार्य और बौद्धिक अनुशासन जैसी बातें अब अनिवार्य नहीं रहीं, बल्कि समझौते के दायरे में आ गई हैं। जो कभी उच्च शिक्षा में गैर-समझौतावादी हुआ करता था, वह अब लचीला, कमजोर और विकृत हो चुका है।

यह गिरावट विशेष रूप से उन विषयों में चिंताजनक है जहाँ कठोरता अनिवार्य है। सैद्धांतिक पढ़ाई का कमजोर होना एक बात है, लेकिन विज्ञान शिक्षा का खोखला हो जाना कहीं अधिक गंभीर है। आज स्थिति यह है कि छात्र बिना नियमित कक्षाओं में गए और बिना प्रयोगशाला में व्यावहारिक प्रशिक्षण लिए विज्ञान जैसे विषयों में स्नातक और परास्नातक डिग्रियाँ प्राप्त कर रहे हैं। प्रयोगात्मक कार्य—जो कभी वैज्ञानिक प्रशिक्षण की रीढ़ हुआ करता था—अब औपचारिकता बनकर रह गया है। डिग्रियाँ तो दी जा रही हैं, लेकिन दक्षता सुनिश्चित नहीं की जा रही।

इस खोखलेपन के परिणाम तब स्पष्ट होते हैं जब छात्र नौकरी के लिए सामने आते हैं। रसायन विज्ञान में परास्नातक छात्र बुनियादी वैज्ञानिक अवधारणाएँ नहीं समझा पाता। कॉमर्स स्नातक डेबिट और क्रेडिट की मूल अवधारणा स्पष्ट नहीं कर पाता। प्रबंधन की डिग्री रखने वाला छात्र समस्या-समाधान और आलोचनात्मक सोच में कमजोर दिखाई देता है। ये कोई इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं, बल्कि उद्योग जगत द्वारा बार-बार देखी जा रही सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं।

स्वाभाविक रूप से इससे छात्रों और अभिभावकों में निराशा पैदा होती है। वर्षों की पढ़ाई और भारी आर्थिक निवेश के बावजूद जब रोजगार नहीं मिलता, तो सवाल उठते हैं। माता-पिता यह पूछने में बिल्कुल सही होते हैं कि पढ़ाई के बाद भी बच्चा बेरोज़गार क्यों है। अक्सर इस असंतोष का निशाना सरकार बनती है, जिस पर रोजगार सृजन न कर पाने का आरोप लगाया जाता है। हालाँकि रोजगार सृजन एक नीतिगत चुनौती है, लेकिन यह विमर्श एक असहज सच्चाई को नज़रअंदाज़ कर देता है—कि बड़ी संख्या में स्नातक वास्तव में रोजगार-योग्य ही नहीं हैं।

यहीं से मूल प्रश्न जन्म लेता है। यदि छात्रों में आवश्यक ज्ञान और कौशल नहीं है, तो उन्हें योग्य घोषित करने वाली डिग्रियाँ उन्हें कैसे मिल गईं? ऐसी संस्थाओं को बिना अकादमिक गुणवत्ता सुनिश्चित किए प्रमाणपत्र बाँटने की अनुमति किसने दी? इसका उत्तर हमें उच्च शिक्षा के नियामक ढाँचे में मिलता है।

भारत में उच्च शिक्षा की देखरेख कई मंत्रालयों, विभागों और नियामक संस्थाओं द्वारा की जाती है, जिनका घोषित उद्देश्य मानकों की रक्षा, गुणवत्ता सुनिश्चित करना और अकादमिक ईमानदारी बनाए रखना है। मान्यता प्रणालियाँ, निरीक्षण, मूल्यांकन और अकादमिक ऑडिट इसी उद्देश्य से बनाए गए थे। लेकिन व्यवहार में ये प्रक्रियाएँ अक्सर वास्तविक मूल्यांकन की बजाय औपचारिक अनुष्ठान बनकर रह गई हैं।

निरीक्षण प्रायः पूर्व-निर्धारित होते हैं। दस्तावेज़ औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए सजाए जाते हैं। इमारतों और बुनियादी ढाँचे को शिक्षण गुणवत्ता पर प्राथमिकता दी जाती है। अनुपालन को सीखने के परिणामों से ऊपर रखा जाता है। छात्रों का वास्तविक अकादमिक अनुभव, शिक्षण की गुणवत्ता, परीक्षा की कठोरता और जिज्ञासा की संस्कृति—इन पर गंभीर और निरंतर निगरानी शायद ही होती है। नतीजतन, संस्थान शिक्षा सुधारने के बजाय नियामकों को “मैनेज” करना सीख लेते हैं।

इस नियामक शिथिलता ने एक दुष्चक्र को जन्म दिया है—संस्थान न्यूनतम अकादमिक जवाबदेही के साथ चलते रहते हैं, नियामक निगरानी का आभास बनाए रखते हैं, और डिग्रियाँ लगातार जारी होती रहती हैं। इस व्यवस्था की क़ीमत न तो संस्थान चुकाते हैं, न ही नियामक—बल्कि छात्र, नियोक्ता और समाज चुकाता है।

विडंबना यह है कि एक ओर उद्योग जगत योग्य मानव संसाधन की कमी की शिकायत करता है, वहीं दूसरी ओर देश शिक्षित बेरोज़गारी के गंभीर संकट से जूझ रहा है। यह कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम है जहाँ प्रमाणपत्र को क्षमता से ऊपर रखा गया है। कंपनियाँ नए कर्मचारियों को फिर से प्रशिक्षित करने पर भारी ख़र्च करने को मजबूर हैं, जबकि युवा पेशेवर आत्मविश्वास की कमी और करियर ठहराव से जूझते हैं।

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार वे ईमानदार और प्रतिभाशाली छात्र हैं, जो अक्सर विकल्पों की कमी या भ्रामक ब्रांडिंग के कारण औसत संस्थानों में दाख़िला ले लेते हैं। वे मेहनत करते हैं, सीखना चाहते हैं, लेकिन अंततः उन्हें अपनी काबिलियत से ज़्यादा अपनी मार्कशीट पर दर्ज संस्थान के नाम का बोझ उठाना पड़ता है। उनकी व्यक्तिगत योग्यता संस्थागत विश्वसनीयता की कमी में दब जाती है। यह केवल अन्याय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा की बर्बादी है।

यह स्वीकार करना होगा कि भारत में आज भी कुछ उच्च-गुणवत्ता वाले संस्थान मौजूद हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करते हैं। लेकिन वे अपवाद हैं, नियम नहीं। उल्लेखनीय है कि बारहवीं तक की स्कूली शिक्षा आज भी अपेक्षाकृत अधिक संरचित और नियंत्रित है। जैसे ही छात्र उच्च शिक्षा में प्रवेश करता है, निगरानी ढीली पड़ जाती है और अपेक्षाएँ धुंधली हो जाती हैं।

यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो इसके दीर्घकालिक परिणाम गंभीर होंगे। डिग्रियों का सामाजिक और आर्थिक मूल्य घटेगा। उच्च शिक्षा पर सार्वजनिक विश्वास कमजोर होगा। योग्यता और औसतपन के बीच का अंतर और अधिक अस्पष्ट होता जाएगा। “हर गली में विश्वविद्यालय” जैसे वाक्य व्यंग्य नहीं, बल्कि यथार्थ का वर्णन बन जाएंगे—जहाँ विश्वविद्यालय तो हर जगह होंगे, पर शिक्षा नहीं।

अब सुधार का समय है—और वह सुधार ईमानदार और कठोर होना चाहिए। नियामक संस्थाओं को बॉक्स-टिकिंग से आगे जाकर परिणाम-आधारित, पारदर्शी और अप्रत्याशित मूल्यांकन अपनाना होगा। शिक्षण की गुणवत्ता, सीखने के परिणाम, छात्र सहभागिता और मूल्यांकन की ईमानदारी को इमारतों और विज्ञापनों से ऊपर रखना होगा।

संस्थानों की जवाबदेही तय करनी होगी। जो कॉलेज और विश्वविद्यालय लगातार अकादमिक रूप से असफल हो रहे हैं, उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई होनी चाहिए—सीटों में कटौती, पाठ्यक्रम निलंबन या मान्यता रद्द करने तक। उच्च शिक्षा ऐसा व्यवसाय नहीं हो सकता जहाँ असफलता की कोई क़ीमत न चुकानी पड़े।

छात्रों और अभिभावकों को भी अधिक सजग होना होगा। केवल मार्केटिंग, बुनियादी ढाँचे और ब्रांडिंग के आधार पर निर्णय लेना भविष्य के साथ समझौता है। शिक्षा कोई साधारण ख़रीद नहीं, बल्कि बौद्धिक और व्यावसायिक विकास में निवेश है—और ग़लत निर्णयों के दूरगामी परिणाम होते हैं।

अंततः, उच्च शिक्षा का उद्देश्य डिग्री बाँटना नहीं, बल्कि सोचने-समझने वाले, सक्षम और ज़िम्मेदार नागरिक तैयार करना है। जब तक यह मूल उद्देश्य पुनः स्थापित नहीं होता, तब तक रोबोडॉग जैसे विवाद आते रहेंगे—कुछ समय के लिए शोर मचाएँगे और फिर शांत हो जाएँगे—जबकि असली संकट जस का तस बना रहेगा।

हमें सजावटी सुधार नहीं, बल्कि प्रणालीगत आत्ममंथन चाहिए। क्योंकि शिक्षा का संकट कभी केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहता—वह चुपचाप राष्ट्र का भविष्य गढ़ता है।

 डॉ. प्रियंका सौरभ

कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

टी20 वर्ल्ड कप 2026 के सुपर 8 में पहुंची टीमों को 2028 टी20 विश्व कप का सीधा टिकट

दुबई, 18 फरवरी (हि.स.)। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने स्पष्ट किया है कि टी20 विश्व कप 2026 के सुपर 8 स्टेज में जगह बनाने वाली सभी टीमों ने 2028 में होने वाले अगले टी20 विश्व कप के लिए स्वतः क्वालीफाई कर लिया है। अगला टूर्नामेंट आईसीसी पुरुष टी20 विश्व कप 2028 ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की संयुक्त मेजबानी में खेला जाएगा।

सुपर 8 की तस्वीर तब पूरी हुई जब पाकिस्तान ने नामीबिया को हराकर अगले दौर में प्रवेश किया। ग्रुप ए से पाकिस्तान के साथ भारत आगे बढ़ा। ग्रुप बी से श्रीलंका और जिम्बाब्वे, ग्रुप सी से वेस्टइंडीज और इंग्लैंड, जबकि ग्रुप डी से साउथ अफ्रीका और न्यूजीलैंड ने जगह बनाई।

2028 संस्करण के सह-मेजबान होने के कारण ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को पहले ही स्वतः प्रवेश मिल चुका था। अब नियमों के तहत सुपर एट्स में पहुंची सभी टीमें भी सीधे क्वालीफाई कर चुकी हैं।

12 स्वतः क्वालीफायर टीमों की सूची आईसीसी रैंकिंग के आधार पर पूरी होगी। तय कट-ऑफ तारीख तक रैंकिंग में शीर्ष पर रहने वाली अगली तीन टीमें भी जगह बनाएंगी। मौजूदा स्थिति में बांग्लादेश, अफगानि्तान और आयरलैंड इन स्थानों के प्रबल दावेदार हैं, क्योंकि कट-ऑफ से पहले उनके कोई अंतरराष्ट्रीय मैच निर्धारित नहीं हैं।

शेष आठ स्थान क्षेत्रीय क्वालीफिकेशन के जरिए भरे जाएंगे, जहां अलग-अलग क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धात्मक मजबूती के आधार पर कोटा तय होगा। इस तरह 20 टीमों वाला 2028 टी20 विश्व कप एक बार फिर वैश्विक प्रतिस्पर्धा का बड़ा मंच बनने जा रहा है।

यूपी बोर्ड परीक्षा के पहले दिन तीन लाख से अधिक परीक्षार्थी रहे अनुपस्थित

प्रयागराज, 18 फ़रवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की हाईस्कूल एवं बारहवीं की पहले दिन दोनों पालियों की परीक्षा सकुशल संपन्न हुई। हालांकि हाईस्कूल में तीन बच्चे नकल करते हुए पकड़े गए। कुल 5 छदम परीक्षार्थी पकड़े गए। परीक्षा के दौरान पांच प्रथम सूचना रिपोर्ट की गई है। यह जानकारी बुधवार को बोर्ड के सचिव भगवती सिंह ने दी।

उन्होंने बताया कि प्रथम पाली में हाईस्कूल में कुल 2754376 पंजीकृत थे। जिसमें से 2583055 उपस्थित हुए। जबकि 171321 परीक्षा में अनुपस्थित रहे। इसी तरह द्वितीय पाली में बारहवीं में कुल 2499370 पंजीकृत हुए थे। लेकिन परीक्षा में 2356983 छात्र उपस्थित हुए, जबकि 142387 परीक्षा में शामिल नहीं हुए। जिन्हें अनुपस्थित कहेंगे। इस तरह हाईस्कूल एवं बारहवीं में कुल 5253746 पंजीकृत हुए थे। जबकि 4940038 ही परीक्षा में शामिल हुए। वहीं कुल दोनों पालियों में 313708 परीक्षा में अनुपस्थित मिले। परीक्षा के दौरान तीन हाईस्कूल के छात्र अनुचित साधनों का प्रयोग करते हुए पकड़े गए। हापुड़ जिले में दो और बरेली में नकल करते एक छात्र पकड़ा गया है। पांच ऐसे परीक्षार्थी पकड़े गए जो दूसरे के स्थान पर परीक्षा देते हुए पकड़े गए। प्रदेश के आगरा, फतेहपुर, कन्नौज, कौशाम्बी, एवं इटावा में एक-एक नटवर लाल पकड़े गए।

सपा प्रतिनिधिमंडल ने वोट काटने की शिकायत उप्र चुनाव आयोग से की

लखनऊ, 18 फ़रवरी (हि.स.)। समाजवादी पार्टी (सपा)के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुधवार को बताया कि चुनाव आयोग के उप्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से आज हमारे प्रतिनिधिमंडल ने मिलकर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिए वोट काटने को लेकर ज्ञापन सौंपा है। यह एक ऐसी आशा है जो हर इंसान के अंदर बैठे ईमानदार जमीर से दुनिया हमेशा करती आई है। सदैव ये नहीं होता कि लोग कुछ गलत करते हैं, कभी-कभी सत्ताधारी दल के लोग अधिकारियों को गलत करने पर मजबूर भी करते हैं। बचपन में हमने ‘पंच परमेश्वर’ की जो कहानी सुनी थी, उस पर हमारा एतबार आज भी कायम है।

एसआईआर में फार्म 7 की अनगिनत धांधलियों और गड़बड़ियों को लेकर हमारी जो आपत्तियाँ और ठोस साक्ष्य हैं, उनका संज्ञान लेकर चुनाव आयोग न्यायसंगत निर्णय लेगा और इस अपराध के लिए कानूनी कार्रवाई करते हुए दोषियों के खिलाफ एफआईआर भी करेगा, ये हमारा अटूट विश्वास है। चुनाव आयोग जब अपने गौरवशाली अतीत के प्रति सजग रहेगा तभी लोकतंत्र बचेगा और चुनाव आयोग के हर अधिकारी का मान-सम्मान भी।

टैरिफ वार से भारत का कुछ नहीं बिगड़ेगा : डॉ मोहन भागवत

लखनऊ, 18 फ़रवरी (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने बुधवार को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में कहा कि टैरिफ वार से भारत का कुछ नहीं बिगड़ेगा। हम किसी देश से नहीं दबेंगे, खड़े रहेंगे। कुछ दिन बाद सबकुछ सामान्य हो जाएगा।

उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था पूंजीपतियों और बैंको में हाथों में नहीं, हमारे घरों में है। भारत के पास इतना सामर्थ्य है कि वह दबाव सहन करके भी आगे बढ़ सकता हैं।

उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म ही सच्चा मानव धर्म है। दुनिया मे पंथ निरपेक्षता वाला कोई समाज है तो वह हिन्दू समाज है। संघ का काम देश के लिए है। अनेक जाति, पंथ संप्रदाय बताने से अच्छा है कि हम सब अपनी पहचान हिन्दू मानें।

उन्होंने कहा सामाजिक समरसता समाज मे एकता का आधार है। जाति, भाषा की पहचान महत्वपूर्ण नहीं हैं। हम सब हिन्दू हैं यह भाव रखना होगा। जाति नाम की व्यवस्था धीरे-धीरे जा रही है। तरुण पीढ़ी के आचरण में यह दिख रहा है। संघ में किसी की जाति नहीं पूछी जाती है। सब हिन्दू सहोदर हैं, इस भाव से काम करते हैं। समाज से जाति को मिटाने के लिए जाति को भुलाना होगा। समाज में जिस दिन जाति-पाति को महत्व नहीं मिलेगा, उस दिन जाति पर राजनीति करने वाले नेता भी बदल जाएंगे।

बच्चों को पहले घर में धर्म की शिक्षा दें

उन्होंने कहा कि दूर-दूर रहने वाले परिवार भावनात्मक रूप से जुड़े रह सकते हैं। हमें अपने बच्चों को नाते रिश्तेदारों, संबंधियों से मिलाते रहना चाहिए। परिवारों को वर्ष में एक बार कुल परंपरा परिवार के संस्कार के निर्वहन के लिए एकत्रित होना चाहिए। इससे परिवारों में पीढ़ियों का जुड़ाव बना रहता है। एक अच्छे परिवार से अच्छे समाज का निर्माण होता है। उन्होने संयुक्त परिवारों में हो रहे विघटन के संदर्भ में कहा कि आधुनिकता हमारी रगों में है लेकिन हम पश्चिमीकरण के विरोधी हैं।उन्होंने कहा कि हम अपने बच्चों को पहले घर में ही धर्म की शिक्षा दें। धन का प्रदर्शन करने की परंपरा हमारी नहीं रही है। संयुक्त परिवार में संस्कारों का वास होता है।

भक्तों के हाथ में होना चाहिए मंदिरों का नियंत्रण

मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के सवाल पर सरसंघचालक ने कहा कि हम भी यह चाहते हैं कि मंदिरों का नियंत्रण भक्तों के हाथों में हो। धर्माचार्य और सज्जन लोग मिलकर मंदिरों का संचालन करें। लेकिन इसके लिए हमें तैयारी करनी होगी। विश्व हिन्दू परिषद इस दिशा में काम कर रहा है। मंदिरों का पैसा राष्ट्रहित व हिन्दू कल्याण में लगना चाहिए।

व्यक्ति निर्माण करता है संघ

संघ व्यक्ति का निर्माण करता है। संघ की कार्यपद्धति में देने की बात है,लेने की नहीं। इसलिए हमारे समर्पित कार्यकर्ताओं में निराशा नहीं आती। अपने प्रयासों से अनेक गांवों को विकसित करने का काम संघ ने हाथ में लिया है। देश में पाँच हजार गांवों को संघ ने विकास के लिए चयनित किया है। जिसमें से 333 गाँव अच्छे बन गए हैं। ऐसे गांवों में जहां कुछ नहीं था, वहाँ ग्रामवासियों ने 12वीं तक विद्यालय बना दिये। गाँव में कोई मुकदमा नहीं हैं। भूमिहीन किसानों को भूमि मिली है। गाँव में ही रोजगार सृजित किया है। इससे गाँव के किसानों की उन्नति हुई है।

उन्होंने सज्जन शक्ति से आह्वान किया कि उन्हें किसी न किसी समाज परिवर्तन के प्रकल्प से जुड़कर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जानने के लिए संघ की शाखा में आएं और संघ को जाने। संघ की शाखा में आना संभव न हो तो संघ से जुड़े कार्यक्रमों में आएं। अगर यह भी संभव नहीं हो सकता है, तो वे किसी न किसी सामाजिक गतिविधि से जुड़े।