पूर्व गृहमंत्री पी चिदम्बरम का कबूलनामा

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कौशल सिखौला

वरिष्ठ पत्रकार

पूर्व गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने 17 साल बाद कुबूल किया कि 26/11 के बाद भारत सरकार अमेरिकी दबाव के आगे झुक गई थी । अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय जगत ने मनमोहन सरकार पर जबरदस्त दबाव डाला कि पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए । तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री कॉलिंडिजा राइस इस सम्बन्ध में खुद भारत आईं ।

उन्होंने कहा कि तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने आतंकवादी घटना के बाद त्यागपत्र दिया था, लेकिन हमारी यूपीए सरकार देश में फैले आक्रोश के बावजूद पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठा पाई । एक मीडिया चैनल को दिए साक्षात्कार में चिदंबरम ने ऐसे खुलासे किए जिसने 2008 में हुई भीषण घटना के बाद कांग्रेस की कायरता को उजागर किया है ।

अब ऑपरेशन सिंदूर के बाद ” नरेंदर सरेंडर ” जैसे शर्मनाक और फूहड़ बयान देने वाले राहुल गांधी क्या जवाब देंगे ? संसद के पूरे मानसून सत्र में सदन के भीतर बाहर छातियां पीटने वाला विपक्ष क्या कांग्रेस से सवाल पूछेगा ? भारतीय सेना पहले ही कह चुकी है 26/11 के बाद देश में उमड़े जबरदस्त आक्रोश और पाक आतंकी कसाब के जिंदा पकड़े जाने के बाद सेना बहुत बड़ी कार्रवाई करना चाहती थी । लेकिन मनमोहन सरकार ने हरी झंडी देने से इनकार कर दिया था । सेना बेबसी और अपमान का घूंट पीकर बैठी रह गई । केन्द्र की चुप्पी से पाकिस्तान को क्लीन चिट मिल गई । तमाम जिन्दा सबूतों के बावजूद सरकार कायरों की तरह कुछ भी न कर पाई । यूपीए के अन्य घटकों ने भी होंठ सिल लिए ।

चिदंबरम की स्वीकारोक्ति के बाद हमे मोदी सरकार और सेना द्वारा किए गए ऑपरेशन सिंदूर पर भारी गर्व हो चला है । बड़बोले डोनाल्ड ट्रम्प की हेकड़ी और मध्यस्थता के कोरे झूठ को सरकार ने जिस तरह नकारा वह भारत को और भी ऊंचे आसान पर बैठाने के लिए काफी है । हम नए भारत , जुझारू भारत सरकार और जांबाज सेना को साधुवाद देते हैं , सेल्यूट देते हैं । सिंदूर ऑपरेशन की सफलता से भारत की छाती फूलकर 100 इंच चौड़ी हो गई है ।

हम नहीं समझते कि कांग्रेस के नेताओं को अभी भी कोई शर्म आएगी । लेकिन धन्यवाद चिदंबरम साहब , 17 साल बाद ही सही आपकी आत्मा जागी तो ? अमेरिका में हुए 9/11 के बाद मुंबई का 26/11 दूसरी सबसे बड़ी आतंकवादी घटना थी । कांग्रेस सरकार ने थर थर कांपते हुए यदि उस समय करारा जवाब दिया होता तो पुलवामा न होता पहलगाम न होता । चलिए चिदंबरम साहब ! कम से कम आपने तो अपनी यूपीए सरकार की गाल पर झन्नाटेदार तमाचा जड़ दिया और कायरपन भी उजागर कर ही दिया ।

−कौशल सिखौला

युद्धोन्मादी दौर में गांधी के विचार आज भी प्रासंगिक

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बाल मुकुंद ओझा

 गांधी जयंती, 2 अक्टूबर को देशभर में प्रार्थना सभाओं, विभिन्न कार्यक्रमों के साथ राजधानी दिल्ली में गांधी प्रतिमा के सामने श्रद्धांजलि अर्पित कर मनाई जाती है। महात्मा गांधी की समाधि पर राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री सहित बड़े बड़े नेता प्रार्थना सभा में शामिल होकर अपनी श्रद्धांजलि देते है। गांधी की याद में रघुपति राघव राजा राम गाकर औपचारिकता का निर्वहन करते हैं। आज भी देश और दुनिया में वंचित, शोषित और पीड़ित समुदाय अपने अधिकारों के संघर्ष के लिए महात्मा गांधी के बताये आंदोलन की राह पर चलकर अपना हक हासिल करते हैं। यह गाँधी के विचारों की सबसे बड़ी जीत है। दो अक्टूबर, अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस  के रूप में भी मनाया जाता है। आज देश और दुनिया में युद्ध, नक्सलवाद, आतंकवाद, हिंसा और प्रतिहिंसा के बादल मंडरा रहे हैं, ऐसे युद्धोन्मादी दौर में गांधी के आदर्श और सिद्धांत सबके लिए और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं।

आजादी के 78 वर्षों के बाद नई पीढ़ी के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि देश को शांति और अहिंसा के मार्ग पर ले जाने वाले गाँधी के विचारों की हत्या किसने की। झूठी सौगंध खाने वाले लोग कौन है और उनके मनसूबे क्या है। गोडसे के नाम की ताली हम कब तक पीटते रहेंगे। आखिर देश गाँधी के बताये मार्ग से क्यों भटका। आज सम्पूर्ण विश्व भारतवासियों से पूछ रहा है कि संसार को अहिंसा का पाठ पढा़ने वाले बापू के देश में बात बात पर मार काट क्यों मच रही है। हमें इस पर गहराई से चिंतन और मनन करने की जरूरत है। गांधी जयंती के मौके पर हम देश के लिए अपनी जान गंवाने वाले शहीदों को याद करते हैं। साथ ही हम उन महान पुरुषों को भी याद करते हैं जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपना बलिदान दिया।

सच तो यह है कि गांधी जयंती के अवसर पर अहिंसा दिवस पर हम कश्मे खाते है उनके पदचिन्हों पर चलने की मगर हमारा आचरण इसके सर्वथा विपरीत होता है। आज सम्पूर्ण देश में गांधी जयंती पर अहिंसा दिवस भी मनाया जाता है। अब यह भी कागजी हो गया है। देश में कुछ असामाजिक संगठन, विभिन्न नामों से देश की शांति भंग करने पर उतारू है। ये लोग आतंकवादियों की शह पर हमारी एकता छिन्न भिन्न कर सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ रहे है। कश्मीर की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। पाकिस्तान छद्म युद्ध पर उतारू है। कुछ सियासी तत्व नेपाल, बांग्ला देश का हवाला देकर लोकतान्त्रिक देश में आग भड़काने का प्रयास भी कर रहे है। ऐसे में अहिंसा की बाते बेमानी हो गयी है।

 महात्मा गांधी त्याग और बलिदान की मूर्ति थे। सादा जीवन और उच्च विचार उनका आदर्श था और वे भारतीय जनमानस में सदैव प्रेरणा के स्त्रोत रहेंगें। अहिंसा और सादगी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के प्रमुख अलंकार थे। उनके ये दोनों गुण आज भी आमजन को एक गौरवशाली जीवन की प्रेरणा देते हैं।

एक गांधी जी थे जिन्होंने सत्य ओर अहिंसा का पाठ पढ़ाया, आत्मविश्वास ओर आत्मनिर्भरता से जीना सिखाया। आज के दिन हमें उनके बतायें मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सादगी, सच्चाई और अहिंसा के मार्ग पर चलकर देश की आजादी के आंदोलन में अपनी ऐतिहासिक और निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने देश को स्वावलम्बन के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी और ग्राम स्वराज के साथ-साथ सुशासन और सुराज का भी मार्ग दिखाया।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

“बुराई पर विजय: क्या रावण सच में मर गए?

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क्या दशहरे का संदेश खो गया है?

दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, लेकिन आज रावण दहन केवल मनोरंजन बन गया है। पुतले जलते हैं, पर समाज में अपराध, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा और भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहे हैं। पुराना रावण विद्वान और शक्तिशाली था, पर अहंकार और वासना के कारण विनष्ट हुआ। आज के रावण और भी खतरनाक हैं, क्योंकि वे कानून और नैतिकता की परवाह किए बिना समाज में व्याप्त बुराइयों का प्रतिनिधित्व करते हैं। दशहरे का असली संदेश यह है कि हमें अपने भीतर और समाज में व्याप्त दोषों का संहार करना चाहिए, तभी वास्तविक विजय संभव है।

– डॉ सत्यवान सौरभ

दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, हमारे समाज में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन रावण का दहन करके यह संदेश दिया जाता है कि बुराइयाँ समाप्त हो जाएँ और धर्म और नैतिकता की स्थापना हो। परंतु आज के दौर में यह पर्व केवल उत्सव और मनोरंजन का साधन बनता जा रहा है। रावण दहन के पुतले जलते हैं, मगर समाज में व्याप्त रावण – यानी अपराध, दुराचार और नैतिक पतन – लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

हर साल दशहरे पर लोग बड़े उत्साह के साथ रावण के पुतले फोड़ते और जला देते हैं। इसका उद्देश्य हमेशा यह रहा कि बुराइयों का नाश हो और अच्छाई की विजय हो। लेकिन वर्तमान समाज में यह प्रतीकात्मक क्रिया केवल दृश्य मनोरंजन बनकर रह गई है। लोग इसे देखने आते हैं, सोशल मीडिया पर फोटो और वीडियो डालते हैं, पर भीतर अपने जीवन या समाज में व्याप्त बुराइयों को बदलने का प्रयास नहीं करते।

पुराने समय में रावण महाज्ञानी, शक्तिशाली और नीति पालन करने वाला शासक था। वह भगवान शिव का उपासक था, विद्वान था, और शूरवीर भी। उसकी एक गलती – वासना के कारण सीता का हरण – उसे नाश की ओर ले गई। रावण के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि कोई भी व्यक्ति अपनी विद्वत्ता, शक्ति या संसाधनों के बल पर नैतिक पतन के मार्ग पर टिक नहीं सकता। यदि अहंकार और वासना हृदय पर हावी हो जाए तो विनाश निश्चित है।

आज का समाज भी इसी तरह के रावणों से भरा है। पुराना रावण केवल एक व्यक्तित्व था, जबकि आज के रावण हर घर, गली, शहर और गाँव में विद्यमान हैं। अपराध, हत्या, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा, रिश्वत और भ्रष्टाचार की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह केवल पुलिस या कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि समाज के नैतिक पतन का संकेत भी है।

हमारे दशहरे के पर्व में जलते पुतले यह दिखाते हैं कि बुराई का अंत हो गया। परंतु वास्तविकता यह है कि बुराई समाज में कहीं भी कम नहीं हुई। आज के “रावण” धूर्त, अहंकारी और क्रूर हैं। वह अपने लाभ के लिए किसी की भी हानि करने से नहीं हिचकिचाते। दहेज़ के लिए पत्नी को जलाना, महिलाओं का अपहरण, बलात्कार और बच्चों पर अत्याचार – ये केवल कुछ उदाहरण हैं। यह सब समाज में बड़े पैमाने पर घट रहा है।

पुराने रावण ने अपने भीतर की इच्छाओं और अहंकार के कारण ही विनाश का मार्ग अपनाया। आज के रावण और भी खतरनाक हैं, क्योंकि वे केवल बाहरी शक्ति और कानून का इस्तेमाल करके अपने स्वार्थ साधते हैं। उनमें नैतिकता, ईमानदारी या धर्म के लिए कोई श्रद्धा नहीं है। परिणामस्वरूप, समाज में विश्वास और मानवता का संकट बढ़ता जा रहा है।

रावण दहन का असली उद्देश्य केवल पुतले जलाना नहीं है। यह हमें अपने भीतर के रावणों – दोष, नकारात्मक भावनाओं और बुराइयों – को पहचानने और दूर करने की शिक्षा देता है। जब तक हम अपने भीतर के अहंकार, द्वेष, झूठ, कपट और वासना को नहीं मारेंगे, तब तक समाज में स्थायी परिवर्तन संभव नहीं है।

आपकी कविता “जलते पुतले पूछते…” इस संदेश को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है। इसमें यह दिखाया गया है कि पुतले जलते हैं, पर असली रावण समाज में बढ़ते ही रहते हैं। हर वर्ष रावण का वध होता है, लेकिन मन में रावण कहीं और पनपता है। इसका अर्थ यही है कि बाहरी उत्सव केवल प्रतीकात्मक क्रिया है, जबकि असली युद्ध हमें अपने अंदर करना है।

आज का समाज शिक्षित और जागरूक है, पर फिर भी बुराइयाँ बढ़ रही हैं। अपराध, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा, भ्रष्टाचार, अनैतिक व्यापार – ये सभी आधुनिक रावणों के उदाहरण हैं। बच्चों और युवाओं पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। यदि हम केवल रावण दहन के उत्सव में आनंद लेते रहेंगे और बुराइयों के खिलाफ वास्तविक प्रयास नहीं करेंगे, तो यह उत्सव खाली प्रतीक बनकर रह जाएगा।

दशहरे का असली अर्थ तब पूरा होता है जब हम अपने भीतर के दोषों का संहार करें। झूठ, कपट, अहंकार, वासना और द्वेष – इन्हें पहचानकर दूर करना ही असली विजय है। यह केवल सामाजिक और नैतिक सुधार का मार्ग नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत उन्नति का भी मार्ग है।

रावण का जीवन अत्यंत शिक्षाप्रद है। वह महाज्ञानी था, पर अहंकार और वासना के कारण विनष्ट हुआ। यही शिक्षा आज के समाज के लिए महत्वपूर्ण है। हमें यह समझना होगा कि बाहरी प्रतीक केवल मार्गदर्शन कर सकते हैं; वास्तविक परिवर्तन अंदर से होना आवश्यक है।

समाज में बदलाव केवल व्यक्तियों के प्रयास से संभव है। माता-पिता, शिक्षक, समाज के वरिष्ठ लोग और नीति निर्माता सभी को मिलकर युवाओं और बच्चों में नैतिक शिक्षा, सदाचार और मानवता का बीज बोना होगा। तभी दशहरे का वास्तविक संदेश – बुराई पर अच्छाई की विजय – साकार हो सकता है।

यदि हम चाहते हैं कि रावण दहन का पर्व केवल जलते पुतलों तक सीमित न रहे, तो हमें अपने अंदर झूठ, कपट, अहंकार और द्वेष का अंत करना होगा। अपने समाज के भीतर व्याप्त अपराध और अनैतिकता पर विजय पाना होगा। तभी दशहरे का त्योहार न केवल उत्सव बनेगा, बल्कि वास्तविक रूप से समाज सुधार और नैतिकता का प्रतीक बनेगा।

आज के समय में रावण केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त उन सभी बुराइयों का प्रतीक है जो रिश्तों, परिवार और सामाजिक जीवन को नुकसान पहुंचाती हैं। जब तक हम अपने भीतर और समाज में इन रावणों का संहार नहीं करेंगे, तब तक दशहरे का असली अर्थ खोता रहेगा।

अंततः यह केवल प्रतीकात्मक पर्व नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और सुधार का अवसर होना चाहिए। जलते पुतले हमें केवल याद दिलाते हैं कि रावण का अंत आवश्यक है, पर असली विजय अपने भीतर और समाज में व्याप्त बुराइयों पर तभी संभव है। अगर हम यह संदेश नहीं समझेंगे, तो दशहरे के हर साल रावण का वध केवल दृश्य बनकर रह जाएगा, और समाज में वास्तविक रावण बढ़ते रहेंगे।

-प्रियंका सौरभ 

ये है राष्ट्रवाद

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−कौशल सिखौला

वरिष्ठ पत्रकार

जो लोग राष्ट्रवाद का नाम सुनते ही झुलस जाते हैं , एक बार फिर देख लिया न राष्ट्रवाद ? दिक्कत यह है कि कुछ ज्वलनशील लोग राष्ट्रवाद का शब्द सुनते ही उसे हिन्दुत्व से जोड़ने लगते हैं । पता नहीं उन्हें पाकिस्तान पर भारत की जीत से पता चला या नहीं कि राष्ट्रवाद क्या होता है ?

जब पाकिस्तान को एक बार हराया तो राष्ट्रवाद उभरा । दूसरी बार हराया तो फिर से राष्ट्रवाद का उल्हास एक जुनून बनकर गली गली फैल गया । और फिर फाइनल में पाकिस्तान को जो धोया तो ऐसा धोया कि सारा पाकिस्तान पूरी रात कूक मार कर रोया । और भारत ? भारत पर दो दिनों से जुनून छाया हुआ है । राष्ट्रवाद का सैलाब ऐसा उमड़ा हुआ है कि गलियों मोहल्लों तक फैल गया है । तब तक फैला रहेगा जब तक कि हमारी एशियन ट्रॉफी और व्यक्तिगत गोल्ड मेडल लेकर भागा पीसीबी अध्यक्ष मोहसिन बीसीसीआई को उन्हें वापस नहीं भिजवा देता ।

याद दिला दें कि पीसीबी अध्यक्ष मोहसिन नकवी पाकिस्तान का गृहमंत्री भी है । पाकिस्तान के तमाम आतंकी ठिकाने उसी कट्टरवादी की अगुवाई में चल रहे हैं । बताइए ! भारत के यशस्वी कप्तान सूर्य कुमार यादव पहलगाम के उस हत्यारे के हाथों ट्रॉफी कैसे ले लेते ? पहलगाम के खून से रंगे उसके हाथ से हाथ कैसे मिलाते ? इसीलिए तो एक बार भी आतंकिस्तान से आई पाक टीम से हाथ नहीं मिलाया ?

सूर्य कुमार यादव उर्फ सूर्या ने सच्चे राष्ट्रवादी होने का परिचय दिया है । उन लोगों का यहां हम नाम भी नहीं लेना चाहते जो भगवान कृष्ण के वंशज तो हैं पर राष्ट्रवाद का नाम लेते ही उबल पड़ते हैं , इतिहास या सनातन की बात करने पर जिन्हें मिर्ची लग जाती है । क्रिकेट हो , हाकी हो , कबड्डी हो या ओलंपिक खेल । भारत जब भी विजयी होता है , 145 करोड़ देश वासियों के 290 करोड़ हाथ हिन्दुस्तान का जयकारा लगाते हुए आसमान की ओर उठ जाते हैं ।

हां , कुछ हैं सिरफिरे जो पाकिस्तान की हार पर आंसू बहाते हैं । भारत की जीत पर इस बार भी कुछ बड़े लोग इसलिए चुप रहे कि कहीं उनका वोट बैंक नाराज न हो जाए ? बहुत से इसलिए चिढ़ गए चूंकि प्रधानमंत्री ने ट्वीटकर इस जीत को मैदान पर हुए सिंदूर से जोड़ दिया ? हालांकि देश ने दिखा दिया कि राष्ट्रीय अवसरों पर देश में न कोई जाति है और न कोई धर्म है । बस एक राष्ट्र है भारत , एकध्वज है तिरंगा । यही तो परम राष्ट्रवाद है । जिनमें नहीं हैं तो घर बैठो , राष्ट्रवादियों से चिढ़ते क्यों हो ? सूर्या ! तुम्हें फिर से साधुवाद , तुमने देश को एक जुट दिखाई देने का एक और अवसर दिया ।

….कौशल सिखौला

सदाचार-सत्य की विजय का महापर्व है दशहरा

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बाल मुकुन्द ओझा

सत्य पर असत्य की जीत का सबसे बड़ा त्योहार दशहरा देशभर में 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा।  हिंदू पंचांग के अनुसार, 1 अक्टूबर की शाम 7 बजकर 2 मिनट से दशमी तिथि शुरू हो जाएगी जो 2 अक्टूबर को शाम 7 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। यही वजह है कि रावण दहन 2 अक्टूबर को ही किया जाएगा। भगवान राम ने बुराइयों के प्रतीक रावण का वध कर देश और दुनियां को भय, आतंक और डर से मुक्ति दिलाई थी। अब तो घर घर रावण रूपी बुराई और आतंक ने अपना साम्राज्य फैला रखा है जिसे समाप्त करने के लिए एक नहीं असंख्य राम की जरुरत है। दशहरा या विजयदशमी पर्व हम हजारों सालों से मानते आरहे है। राम सत्य और रावण बुराई का प्रतीक माना गया है। यह भी कहा जा सकता है कि यह अन्याय पर न्याय और अधर्म पर धर्म की विजय है। यह सतयुग की घटना बताई जा रही है। वर्तमान को हम कलियुग के रूप में जानते है। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो बस ईश्वर ही जनता है। उस समय एक रावण मारा गया मगर आज तो हमारे सामने रावणों की फौज खड़ी है जो अलग अलग मुखोटे  लगाए घर घर बुराई फैला रही है यानि आज एक नहीं अनेक रावण है जो विभिन्न बुराइयों के प्रतीक है। असली दशहरा तो तभी मनाने में मजा आये जब इन सभी रावणों का धूमधाम से वध हो। आज घर घर रावण पग पग लंका देखी जा रही है। कहीं  गुफा वाले रावण है तो कहीं फल वाले रावण। कहीं नाचते गाते रावण देखे जा रहे है तो कहीं भक्त बने रावण। अब तो आस्था स्थलों पर भी जाते डर लगता है।  जाने किस मोड़ पर रावण मिल जाये। एक गायक ने इन शब्दों में व्याख्या की है –

कलयुग बैठा मार कुंडली जाऊ तो मै कहाँ जाऊ

अब हर घर में रावण बैठा इतने राम कहाँ से लाऊ।

तुलसीदास कृत रामायण के अनुसार रावण ने सीता माता का हरण जरूर किया मगर सतीत्व से खिलवाड़ नहीं किया। वह अपनी बहन सूर्पणखां का बदला लेना चाहता था।  रावण शादी के लिए डराता धमकाता रहा मगर कोई जोर जबरदस्ती नहीं की। मगर आज के रावण धर्मोपदेशक के रूप में हमारे साथ छल कपट करने पर उतारू है। आस्था के साथ सरेआम खिलवाड़ कर रहे है। बेटी और बहन के रिश्ते को तार तार कर रहे है और हम अंधे हो कर सब कुछ देखते हुए भी अनजान बने हुए है। जब तक हम ऐसे रावणों को नहीं पहचानेंगे तब तक आज की सीता की इज्जत यूँ ही लूटती रहेगी। आज के रावण स्वयं को रावण नहीं मानते वे अपने को राम मानकर चलते है। वे खुद को सच्चा और सामने वाले को झूठा ठहराने में तनिक भी विलम्ब नहीं करते। बहरहाल हम एक बार फिर विजयदशमी पर्व मना रहे है। सदा की तरह परिवार के साथ मैदान पर पहुंचकर रावण वध देखेंगे। मेले का आनद लेंगे। कुछ खाएंगे पियेंगे औए घर लौटकर पर्व की जुगाली करेंगे।

 आइये हम भी इस कथा सारणी के पन्ने पलटे। दशहरा या विजयदशमी देश का एक प्रमुख त्योंहार है। दशहरा का अर्थ है, वह पर्व जो पापों को हर ले। अन्याय के युग के अंत का यह पर्व है। दशहरा भक्ति और समर्पण का पर्व है । आश्विन शुक्ल दशमी को विजयदशमी का त्योहार देश भर में लाखों लोगों द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है। खुले स्थानों पर मेलों का आयोजन एवं राक्षसराज रावण कुम्भकरण और मेघनाथ के बड़े- बड़े पुतलों का प्रदर्शन किया जाता है। यह त्योहार हमें प्रेरणा देता है कि हमें अंहकार नहीं करना चाहिए क्योंकि अंहकार के मद में डूबे हुये व्यक्ति का एक दिन विनाश तय है। रावण बहुत बड़ा विद्वान और वीर व्यक्ति था परन्तु उसका अंहकार ही उसके विनाश कारण बना। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द ‘दश- हर’ से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ दस बुराइयों से छुटकारा पाना है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। विजयादशमी का यह त्योंहार बुराइयों पर अच्छाई का प्रतीक है। दशहरा अच्छाई की बुराई पर जीत का पर्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने रावण का अंत कर दिया था लेकिन अच्छाई और बुराई के बीच की यह जंग आज भी जारी है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

“जलते पुतले, बढ़ते रावण: दशहरे का बदलता अर्थ”

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“पुतलों का दहन नहीं, मन और समाज के भीतर छिपी बुराइयों का संहार ही दशहरे का असली संदेश है।”

दशहरे पर रावण के पुतले जलाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। लेकिन आज पुतले केवल मनोरंजन बनकर रह गए हैं, जबकि समाज में अहंकार, हिंसा, वासना और अन्य बुराइयाँ लगातार बढ़ रही हैं। असली रावण हमारे भीतर और समाज में मौजूद हैं। यही समय है कि हम अपने मन के रावणों की पहचान करें, उन्हें त्यागें और समाज से अपराध, छल-कपट और अन्य अधर्म को मिटाने का संकल्प लें। तभी दशहरा वास्तव में विजयादशमी बन सकता है।

– डॉ सत्यवान सौरभ

हर साल जब दशहरे की शाम को रावण के विशाल पुतले धू-धू कर जलते हैं, तो दर्शकों की आँखों में उत्सव का रोमांच दिखाई देता है। पटाखों की गड़गड़ाहट, आतिशबाज़ी की चमक और भीड़ का शोर इस पर्व को एक रंगीन उत्सव में बदल देता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस पूरे आयोजन का संदेश—बुराई पर अच्छाई की जीत—हमारे जीवन और समाज में कहीं उतर पाता है?

आज दशहरा एक मनोरंजन का ट्रेंड बनकर रह गया है। लोग पुतले जलाते हैं, फोटो और वीडियो बनाते हैं, सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। लेकिन यह सोचने का समय शायद ही निकालते हैं कि यह रावण दहन केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि हमें आत्ममंथन और सामाजिक सुधार का अवसर देने के लिए शुरू हुआ था।

रामायण की कथा में रावण केवल एक पात्र नहीं था, बल्कि वह उन बुराइयों का प्रतीक था जो इंसान को पतन की ओर ले जाती हैं—अहंकार, वासना, छल, क्रोध और अधर्म। रावण जैसा महाज्ञानी, शिवभक्त और शूरवीर भी अपनी एक गलती—वासना और अहंकार—के कारण विनाश को प्राप्त हुआ। दशहरा हमें यही याद दिलाने आता है कि यदि बुराई चाहे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः उसका नाश निश्चित है।

लेकिन आज दशहरे का स्वरूप बदल चुका है। अब रावण दहन व्यावसायिक और दिखावटी उत्सव में बदल गया है। हर साल पुतले और बड़े बनाए जाते हैं, पटाखों पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। रिपोर्टें बताती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में रावण पुतलों की संख्या कई गुना बढ़ी है, पर समाज में अपराध और बुराइयों का ग्राफ घटने की बजाय बढ़ा ही है।

आज के दौर में रावण केवल पुतलों तक सीमित नहीं है। वह हमारे बीच, हमारे आस-पास, हमारे भीतर मौजूद है। समाज में अपराध, बलात्कार, हत्या, दहेज हिंसा, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और नशे की लत जैसी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। रिश्तों का पतन भी चिंता का विषय है—मां-बाप, भाई-बहन, यहाँ तक कि बच्चों तक की हत्या की खबरें आए दिन सामने आती हैं। आज का इंसान ज्यादा पढ़ा-लिखा और आधुनिक है, लेकिन बुराइयाँ भी उतनी ही तेज़ी से पनप रही हैं।

विडंबना यह है कि जिस रावण को हम हर साल जलाते हैं, वह अकेला था। विद्वान था, नीतिज्ञ था, अपने परिवार और राज्य के प्रति कर्तव्यनिष्ठ था। उसकी एक गलती उसे विनाश की ओर ले गई। लेकिन आज का रावण—यानी आज का अपराधी और बुराई का प्रतीक—उससे कहीं अधिक क्रूर, धूर्त और निर्लज्ज है।

दशहरे का पर्व हमें यह याद दिलाने के लिए है कि बुराइयाँ कितनी भी ताकतवर क्यों न हों, उन्हें मिटाना ही होगा। लेकिन केवल पुतले जलाने से बुराइयाँ खत्म नहीं होंगी। हमें यह समझना होगा कि आज का रावण बाहर ही नहीं, भीतर भी है। हर इंसान के भीतर अहंकार, क्रोध, वासना, ईर्ष्या और लालच जैसे रावण मौजूद हैं। जब तक इनका दहन नहीं होगा, तब तक समाज में शांति और न्याय संभव नहीं।

पुतला जलाने के साथ हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन से कम-से-कम एक बुराई को अवश्य दूर करेंगे। दशहरे का संदेश तभी सार्थक होगा जब समाज सामूहिक रूप से भ्रष्टाचार, हिंसा, नशाखोरी, दहेज और महिला शोषण जैसी बुराइयों के खिलाफ खड़ा होगा।

आज के दौर का सबसे बड़ा संकट यह है कि समाज बुराइयों के प्रति संवेदनहीन होता जा रहा है। हर दिन अख़बारों में दुष्कर्म, हत्या और भ्रष्टाचार की खबरें छपती हैं, लेकिन हम उन्हें सामान्य मानकर टाल देते हैं। पुतला जलाने के बाद हम चैन से घर लौट आते हैं, मानो बुराई का अंत हो चुका हो। हकीकत यह है कि आज के रावण सर्वव्यापी हैं। वे महलों में भी रहते हैं और झोपड़ियों में भी। वे पढ़े-लिखे भी हैं और अशिक्षित भी। वे राजनीति, व्यापार, शिक्षा और समाज के हर क्षेत्र में फैले हुए हैं।

राम केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक पात्र नहीं, बल्कि आदर्श और मूल्यों का प्रतीक हैं। राम का अर्थ है धर्म का पालन। राम का अर्थ है सत्य और न्याय के लिए संघर्ष। राम का अर्थ है मर्यादा और कर्तव्यनिष्ठा। लेकिन आज का समाज राम के गुणों को अपनाने के बजाय केवल राम के नाम का राजनीतिक और धार्मिक उपयोग कर रहा है। परिणाम यह है कि रावण जलते तो हैं, पर मन के रावण और समाज के रावण और अधिक शक्तिशाली होकर खड़े हो जाते हैं।

दशहरा हमें अवसर देता है कि हम रुककर सोचें—क्या हम अपने भीतर के रावण को पहचान पा रहे हैं? क्या हम अपने जीवन से एक भी बुराई कम कर पाए हैं? क्या हम समाज को बेहतर बनाने के लिए कोई ठोस कदम उठा रहे हैं? यदि इन सवालों का जवाब “नहीं” है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि रावण दहन केवल एक परंपरा बनकर रह गया है।

सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि हम केवल पुतले जलाने की रस्म न निभाएँ, बल्कि अपने भीतर और समाज में मौजूद रावणों को पहचानें और उनका संहार करने का साहस दिखाएँ। तभी दशहरा एक सच्चे अर्थ में विजयादशमी बन पाएगा। जब-जब हम अपने भीतर के अहंकार, वासना और लोभ को परास्त करेंगे, तब-तब हमारे भीतर का राम जीवित होगा। और तभी हम कह सकेंगे कि रावण सचमुच मरा है।

– डॉ सत्यवान सौरभ

धरती की सज़ा: हमने किया क्या?

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सितम्बर का महीना है, लेकिन धूप ऐसी तपा रही है जैसे जून की झुलसाती गर्मी हो। लोग पसीने से बेहाल, बिजली कट रही है तो हालात और खराब। पंखे और कूलर जैसे कोई राहत नहीं दे पा रहे। हमारे बुजुर्ग कह रहे हैं कि हमारे जमाने में सितम्बर तक हल्की ठंडक आने लगती थी। खेत-खलिहानों में काम करना आसान होता था पर अब मौसम का मिजाज ही बदल गया है। इस बदलाव की असली वजह कहीं और नहीं, बल्कि हमारे ही किए गए काम हैं। प्लास्टिक का कचरा जगह-जगह पड़ा मिलता है। गली, मौहल्ला, नाले, नदी सब जगह। एक ओर लोग सुविधा के लिए प्लास्टिक की थैली का इस्तेमाल करते हैं, दूसरी ओर वही थैली धरती और पानी का गला घोंट रही है। नालियां जाम होती हैं। पानी का बहाव रुकता है और फिर बरसात के दिनों में बाढ़ जैसी स्थिति खड़ी हो जाती है। इसी तरह फैक्ट्री से निकलता धुआं और गाड़ियों का प्रदूषण भी कम नहीं। सुबह-शाम सड़क पर निकल जाओ तो धूल, धुआं और शोर कान फोड़ देता है। बच्चों के फेफड़े कमजोर हो रहे हैं, अस्थमा और एलर्जी जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। गांवों में भी अब शुद्ध हवा और पानी मिलना मुश्किल हो गया है।सबसे बड़ा नुकसान पेड़ों के कटने से हो रहा है। जहां कभी बड़े-बड़े पीपल, नीम और बरगद की छांव में लोग बैठकर सुस्ताते थे, वहीं अब सीमेंट-कंक्रीट की इमारतें खड़ी हैं। खेतों के किनारे लगी हरियाली की मेड़ें काट दी गईं। शहरों में पार्क तो बने हैं पर उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। लोग पौधारोपण करते हैं। फोटो सेंशन तक यह पौधारोपण सीमित रहता है और उसके बाद यह पौधे सूख जाते हैं। यही वजह है कि गर्मी इतनी बढ़ गई है कि सितम्बर भी जून जैसा लग रहा है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है।

हमारे देश में आज भी कई जगह लोग पर्यावरण को बचाने के लिए आगे आ रहे हैं। कोई प्लास्टिक मुक्त अभियान चला रहा है तो कहीं स्कूल के बच्चे या कुछ एन.जी.ओ. सप्ताह या महीने में एक दिन पौधारोपण कर रहे हैं। उत्तराखंड, हिमाचल जैसे राज्यों में लोग जंगलों को बचाने के लिए आंदोलन खड़े करते हैं। किसान जैविक खेती अपनाकर मिट्टी और पानी दोनों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ शहरों में महिलाएं कपड़े की थैली बनाने का छोटा-सा व्यवसाय चला रही हैं। ताकि लोग कपड़े की थैली इस्तेमाल करें और प्लास्टिक से बचें। सकारात्मक बात यह भी है कि नई पीढ़ी इस मसले को समझ रही है। सोशल मीडिया पर युवा क्लीन इंडिया, ग्रीन इंडिया के नारे को फैला रहे हैं। शादी-ब्याह में भी अब कुछ लोग प्लास्टिक की प्लेट, गिलास छोड़कर पत्तल-दोने का इस्तेमाल करने लगे हैं। यह छोटी-छोटी कोशिशें ही बड़े बदलाव की नींव बनेंगी। फिर भी चुनौतियां कम नहीं। सरकार नियम बनाती है, लेकिन पालन में ढिलाई रहती है। उद्योगपति मुनाफे के लिए प्रदूषण फैलाने से नहीं चूकते। आम लोग भी सुविधा देखकर गलत रास्ता चुन लेते हैं कि जैसे ठंडी कोल्ड ड्रिंक पीने के बाद बोतल सड़क पर फेंक देना। सवाल यह है कि जब तक हम सभी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक कानून और अभियान कुछ खास नहीं कर पाएंगे। सोचिए जब सितम्बर में ही जून जैसी गर्मी महसूस हो रही है तो आने वाले सालों में हालात क्या होने वाले है। अगर पेड़ नहीं लगाए गए, प्लास्टिक पर रोक नहीं लगी और प्रदूषण पर काबू नहीं पाया गया तो आने वाली पीढ़ियों को सांस लेने के लिए भी साफ हवा नसीब नहीं होगी, लेकिन उम्मीद अभी बाकी है। अगर हर इंसान अपनी आदत बदल लें कि बाजार जाते वक्त कपड़े का झोला ले जाए। मोहल्ले में गीला व सूखा कूड़ा अलग-अलग करें। घर या गली में एक पौधा लगाए और जरूरत से ज्यादा बिजली-पानी बर्बाद न करें तो हालात सुधर सकते हैं। सरकार, समाज और हम सब मिलकर काम करें तो सितम्बर में फिर से ठंडी हवाएं बह सकती हैं और भारत की धरती पर हरियाली लौट सकती है। यानी बात साफ है कि पर्यावरण संकट को लेकर तस्वीर दो पहलुओं वाली है। नकारात्मक यह कि लापरवाही और स्वार्थ ने हमें मुसीबत में डाल दिया है। सकारात्मक यह कि अगर अभी से सुधर गए तो आने वाले कल को बचा सकते हैं। भारत की ताकत यही है कि जब लोग मिलकर ठान लें तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है।

भूपेन्द्र शर्मा सोनू
(स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक)

त्यौहारों की मिठास और मिलावट का सच: खुशियां या खतरा?

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भारत देश में त्यौहारों का मौसम हमेशा रौनक और रंगीनियों से भरा होता है। दशहरा से लेकर दीपावली तक, हर घर में खुशियों की मिठास बिखरती है। बाजारों में दुकानों की सजावट, झिलमिलाती रोशनियाँ और घर-घर में मिठाइयों की खुशबू, यही तो हैं हमारे त्यौहार की असली पहचान। बच्चे उत्साह से खिलखिलाते हैं, बड़े अपने रिश्तेदारों को याद करते हैं और पूरा समाज मिलकर इन पर्वों की तैयारी में जुट जाता है। यही हमारी संस्कृति की खूबसूरती है, जो हमें मिल जुलकर खुशियाँ बाँटना सिखाती है, लेकिन यही दृश्य जब थोड़ा करीब से देखें तो पीछे छुपा हुआ सच भी सामने आता है।

दशहरे और दीपावली जैसे बड़े पर्वों पर बाजारों में मिठाई और मावा तैयार करने वालों की लापरवाही और मिलावटखोरी का खेल भी जोर पकड़ लेता है। नकली मिठाई, मिलावटी मावा, रंग-रोगन से भरे गुड़ और तेल में डूबी हलवाई की दुकानें, ये सब सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं और इससे सीधे ग्राहक की सेहत खतरे में पड़ जाती है। ग्राहक की बेफिक्री और दुकानदार की लालच में ही यह बुरी आदत जन्म लेती है। वह मिठाई जो बच्चों की मुस्कान और रिश्तों की मिठास लाने के लिए बनती है, वही अब घातक मिलावट का माध्यम बन जाती है। नकली मावा, रसायनों से भरी लड्डू और ढीली चॉकलेट। ये केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं, बल्कि हमारे त्यौहारों की असली पहचान को भी नुकसान पहुँचाते हैं। नकारात्मक पक्ष केवल दुकानदार और मिठाई तक ही सीमित नहीं है। खाद्य विभाग की लापरवाही और कानून की ढील भी इस समस्या को और बढ़ावा देती है। औपचारिक कार्यवाही अक्सर टालमटोल और दिखावे तक सीमित रहती है। ठेकेदारों और दुकानदारों को संरक्षण मिलना, जांच में ढिलाई और नियमों में लचीलापन, ये सब मिलकर भ्रष्टाचार को जन्म देते हैं। ग्राहक की शिकायतें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। परिणामस्वरूप त्यौहार की खुशी के साथ-साथ स्वास्थ्य का खतरा भी घर-घर पहुँचता है, लेकिन हर कहानी का एक सकारात्मक पहलू भी होता है। आजकल कई जागरूक ग्राहक और समाजसेवी संगठनों ने इस बुराई के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया है। सोशल मीडिया पर नकली मिठाई, मिलावटखोरी और असुरक्षित खाद्य सामग्री की खबरें फैल रही हैं। लोग अब केवल मिठाई के स्वाद से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि उसकी शुद्धता और गुणवत्ता के प्रति भी सजग हो रहे हैं। इसके अलावा कुछ छोटे और जिम्मेदार हलवाई ऐसे हैं जो पारंपरिक तरीकों और शुद्ध सामग्री का इस्तेमाल करते हैं। इनकी मिठाई में सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि भरोसे और संस्कृति की मिठास भी मिलती है। ये व्यवसाय धीरे-धीरे ग्राहकों के विश्वास के कारण तरक्की कर रहे हैं। इस पहलू से देखा जाए तो समस्या के बावजूद उम्मीद की किरण भी दिखाई देती है।त्यौहारों का असली मकसद खुशियाँ बांटना, रिश्तों को मजबूत करना और संस्कृति को जीवित रखना है। यदि हम समाज के रूप में सचेत हो, दुकानदार जिम्मेदार हों और प्रशासन नियमों का पालन करें तो यह खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है। मिलावटखोरी और भ्रष्टाचार पर कड़ी नजर रखी जाए। औपचारिक कार्रवाई समय पर हो और ग्राहक को जागरूक किया जाए। तभी दशहरा और दीपावली का असली रंग लौट सकता है। सच तो यह भी है कि हमारे त्यौहार और बाजार दोनों ही हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। एक तरफ मिठाई, रोशनी और उत्साह हैं, वहीं दूसरी तरफ मिलावट, भ्रष्टाचार और लापरवाही भी हैं। इस सामूहिक परिदृश्य को देखकर हमें यह समझना होगा कि त्यौहार केवल बाहर दिखावे के लिए नहीं होते, बल्कि असली मिठास और खुशियाँ तभी कायम रहेंगी जब हम जिम्मेदारी और सच्चाई को भी त्यौहार में शामिल करें।समाज की सजगता, प्रशासन की पारदर्शिता और ग्राहक की सतर्कता.. यही तीन स्तंभ हैं, जो हमारी मिठाई को केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि सुरक्षित और सच्ची भी बनाए रख सकते हैं। तभी दशहरा और दीपावली का असली मज़ा, बिना किसी मिलावट और धोखे के हर घर में महसूस होगा।

भूपेन्द्र शर्मा सोनू
(स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक)

ढाक के तीन पात : भाषा, संस्कृति और प्रतीक का रहस्य

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डॉ मेनका त्रिपाठी

भाषा विज्ञान की दुनिया अनेक रहस्यो की परत खोलती है,ढाक के तीन पात का मुहावरा हम सबने सुना है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ढाक होता क्या है?

ढाक को पलाश और टेसू के नाम से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Butea monosperma है। संस्कृत और प्राचीन ग्रंथों में इसे किंशुक, रक्तपुष्पक, ब्रह्मवृक्ष, ब्राह्मणपोष, पर्णी, त्रिपत्रक, कठपुष्प, केसुदो और पलाशा जैसे विविध नामों से संबोधित किया गया है। यह नाम केवल भाषाई भिन्नता नहीं दर्शाते बल्कि इस वृक्ष के प्रति समाज और संस्कृति की गहरी आस्था को भी प्रकट करते हैं।

ढाक की सबसे विशिष्ट पहचान इसके तीन पत्ते हैं। प्रत्येक शाखा पर तीन पत्ते जुड़े रहते हैं। बेल पत्र भी तीन होते है लेकिन ढाक के तीन पत्तों के कारण से यह मुहावरे का आधार बना और पूरी कहावत मे कहा गया कि ढाक के तीन पात, चौथा लगे न पाँचवी की आस।

यह अभिव्यक्ति असंभवता और सीमाओं का प्रतीक बनकर लोकजीवन में रच-बस गई।

ढाक का स्थान केवल भाषा तक सीमित नहीं है। गाँवों और लोकसंस्कृति में ढाक के पत्तों का उपयोग पत्तल और दोना बनाने में होता रहा है। पकवानों और व्यंजनों जैसे चाट पकौड़ी इन्हीं पत्तों पर परोसे जाते थे। धार्मिक परंपराओं में भी इनका विशेष महत्व है। ये शुद्ध होते है सच मानिये स्वाद भी आता है अब तो लोग फैशन मे भी इन्हे प्रयोग मे ला रहे है

रामायण महाभारत में वर्णित चित्रणों और सीता-राम की जन्मकथाओं में ढाक के पत्तों का प्रयोग पूजा-अर्चना और फल अर्पण के लिए किया जाता था।

भाषाविज्ञान की दृष्टि से ढाक शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के पलाश और किंशुक शब्दों से जुड़ती है। ध्वनि और प्रयोग के स्तर पर यह ढलकर लोकभाषा में ढाक बन गया। यह परिवर्तन दिखाता है कि किस प्रकार एक वृक्ष केवल प्राकृतिक इकाई न रहकर भाषा, साहित्य और संस्कृति का अंग बन जाता है।

संस्कृत साहित्य में किंशुक की शोभा का वर्णन अनेक स्थानों पर मिलता है। एक श्लोक में कहा गया है –

किंशुकः शोणपुष्पश्रीः पावकोऽग्निसमप्रभः।

यत्र यत्र स्थितो लोके तत्र तत्र शुभं भवेत्॥

अर्थ यह है कि किंशुक अपने लाल पुष्पों से अग्नि के समान दीप्तिमान दिखाई देता है और जहाँ भी होता है वहाँ शुभता का संचार करता है।

ढाक के तीन पात का मुहावरा इस प्रकार केवल एक कहावत भर नहीं, बल्कि भाषा, समाज और संस्कृति के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। यह इस तथ्य को उजागर करता है कि भारतीय लोकजीवन में वृक्ष और उनके पत्ते भी वाणी और अभिव्यक्ति का हिस्सा बन जाते हैं।

मेनका त्रिपाठी

संघ, गांधी और लद्दाख के सोनम वांगचुक

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अरुण कुमार त्रिपाठी
ऐसा कम होता है लेकिन इस साल हो रहा है। इस साल ‘पूर्णमासी के दिन सूर्यग्रहण’ लग रहा है। महात्मा गांधी की जयंती यानी दो अक्तूबर को ही दशहरा पड़ रहा है और उसी दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सौ साल पूरे हो रहे हैं। यह भी गजब संयोग देखिए कि उससे हफ्ते भर पहले गांधीवादी तरीके से लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और उस क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची में डालने की मांग कर रहे न्यू लद्दाख मूवमेंट के नेता सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। अब भाजपा की आईटी सेल समेत तमाम हिंदुत्ववादी उन्हें देशद्रोही सिद्ध करने में लग गए हैं। बांग्लादेश के मुख्य प्रशासनिक सलाहकार मोहम्मद युनूस के साथ उनकी फोटो और पाकिस्तान के अखबार डॉन के कार्यक्रम में उनकी भागीदारी की पोस्ट के माध्यम से यह सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है कि उनकी देशभक्ति संदिग्ध है। कहा जा रहा है कि उन्होंने ‘जेन जी’ यानी युवा पीढ़ी को हिंसा के लिए भड़काया है।
दो अक्तूबर को दशहरा और संघ का शताब्दी वर्ष पड़ने के कारण गांधी जयंती पर होने वाले तमाम कार्यक्रम रद्द हो गए हैं। कुछ गांधीजन इसे इसे सांप्रदायिकता विरोधी दिवस के रूप में मनाना चाहते हैं लेकिन देखना है वे कैसे मनाते हैं। यह भी जानना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उस दिन महात्मा गांधी को किस तरह से याद करता है। हिंदुत्ववादियों की ट्रॉल ब्रिगेड उन्हें अपनी हिंसा का कितना निशाना बनाती है। लेकिन इन संयोगों के आसपास होने वाले विचार विमर्श यह साबित करते हैं कि गांधी विचार से प्रेरित नागरिकों और संगठनों के सामने सावरकर के विचारों से प्रेरित संगठनों से टकराव अवश्यंभावी है। उनके मध्य समन्वय का कोई बीच का रास्ता बनता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। सावरकर का विचार बहुसंख्यकवादी एकचालानुवर्ती संगठन और उसके माध्यम से कायम होने वाली राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तानाशाही की ओर जाता है। जबकि गांधी का विचार लोकतंत्र, विकेंद्रीकरण, मानवाधिकार और पर्यावरण रक्षा की ओर जाता है।
सावरकर और उनसे प्रेरित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का विचार वास्तव में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के उस उस युरोपीय राष्ट्रनिर्माण और औद्योगिक विकास की नकल है जो संसार को विनाशकारी महायुद्ध की ओर ले जाता है। आज वह विचार अमेरिका और उसके उद्दंड बालक इजराइल के तौर पर नए सिरे से जोर मार रहा है। पूरे भारत को मुट्ठी में कैद कर लेने वाले संगठन संघ का विचार भी उसी का सहोदर है। यह राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक ध्रुवीकरण, सरकारी दमन और आज्ञाकारी समाज निर्माण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियार जमा करके पड़ोसियों से युद्ध की ओर जाता है। राष्ट्रीय गौरव की पुनर्स्थापना, धर्म की रक्षा वगैरह इसकी रणनीतियां हैं। यह विचार भावनाओं पर इस कदर आधारित है कि इसे विचार कहना भी बेइमानी लगता है। अगर इसके रेशे रेशे पर चर्चा करें तो इसमें झूठ और धोखाधड़ी का इतना बड़ा तत्व निकलेगा कि यहां उसका वर्णन कर पाना संभव नहीं है। वास्तव में यह कोई विचार नहीं बल्कि विचारहीनता का कोहरा है।
दूसरी ओर महात्मा गांधी के चिंतन और कर्म से निकला उनका विचार है जो दुनिया के भविष्य के लिए अनिवार्य है। उसमें भावना और उत्तेजना के बजाय मानवीय संवेदना है। उसकी तर्कपद्धति ऊपरी तौर पर भले ही बासी लगे लेकिन उसे हर समय और परिस्थिति में रखकर देखिए तो उसमें ताजगी का सुवासित गहरा झोंका उठता हुआ दिखाई देगा। उसमें घृणा और आशंका नहीं अभय और प्रेम है। यह महज संयोग नहीं है कि बीसवीं सदी के पहले दशक में लंदन में गांधी और सावरकर की मुलाकात दशहरे के मौके पर हुई थी और दोनों ने उस पर्व की अपने अपने ढंग से व्याख्या की थी। सावरकर के लिए वह पर्व हिंसा के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की प्रेरणा देने वाला था, जबकि गांधी के लिए अहिंसा के माध्यम से असत्य और बुराई के विरुद्ध बाहरी और भीतरी अहिंसक संघर्ष की प्रेरणा।
गांधी और सावरकर के विचारों का यह संघर्ष तब से आज तक जारी है। वह सारे संसार को झकझोर देने वाली गांधी हत्या और सावरकर की गुमनाम मृत्यु से समाप्त नहीं हुआ। बल्कि अगर हम मशहूर साहित्यकार यूआर अनंतमूर्ति को पढ़ें तो लगता है कि वह आगे भी जारी रहने वाला है। उन्होंने 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्तारूढ़ होने से पहले अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका ‘हिंदुत्व या हिंद स्वराज’(मूलतः कन्नड़) के माध्यम से इस बात को रेखांकित किया था। उनका कहना था कि सावरकर के हिंदुत्व का विचार औद्योगिक और सैन्य शक्ति पर आधारित केंद्रीकरण का फासीवादी विचार है। इस विचार में पर्यावरण और कमजोर समाजों का विनाश अंतर्निहित है। जबकि गांधी का विचार सत्य, मानव स्वतंत्रता और पर्यावरण की रक्षा पर आधारित विकेंद्रीकरण का एक हिंसा विरोधी विचार है।
लद्दाख के सोनम बांगचुक और केंद्र सरकार के बीच हुआ टकराव दरअसल इन विचारों का टकराव है। यह विकास के दो मॉडल का टकराव है। एक मॉडल चाहता है कि लद्दाख का समाज दिल्ली से नियंत्रित हो और वहां के लोगों के नागरिक अधिकार और संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार भी सीमित हों। वहां बड़ी आर्थिक शक्तियों को खनिजों और अक्षय ऊर्जा के दोहन का असीमित अधिकार हो। लद्दाख के नागरिकों को निरंतर संदेह की नजर से देखा जाए और आर्थिक और सैन्य शक्तियों पर सदैव भरोसा किया जाए। दूसरी और नव लद्दाख आंदोलन का विचार यह है कि वहां के लोगों को अपने विकास का रास्ता तय करने और उसे अपने ढंग से संचालित करने का अधिकार हो। वहां की धरती और पर्यावरण को लद्दाख के स्थानीय विवेक के लिहाज से संचालित और व्यवस्थित किया जाए। इसीलिए वे लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने और उसे पूर्वोत्तर के राज्यों की तरह से छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग भी कर रहे हैं। लद्दाख के लोगों का मानना है कि अपने क्षेत्र के विकास और उसकी रणनीतिक स्थिति के बारे में उनका ज्ञान किसी और इलाके या दिल्ली के लोगों के ज्ञान से बेहतर है। जबकि दिल्ली मानती है कि असली देशभक्ति और राष्ट्रीय हित को वे ही समझते हैं जिनके हाथों में सैन्य शक्ति है और उत्पादन के बड़े साधन हैं।
सोनम बांगचुक लद्दाख के गांधी कहे जाते हैं। हालांकि वे इस तरह के विशेषण को स्वीकार करने से इंकार करते हैं। पर उनके चरित्र की एक झलक राजकुमार हीरानी की फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में रैंचो यानी फुंसुक बांगड़ू के रूप में देखी जा सकती है। वह बालक जिसने किसी तरह अपने संकटपूर्ण बचपन से निकलकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और फिर समाज के साथ मिलकर इतने नवोन्मेष किए कि उसके नाम पर तमाम पेटेंट बने। उसने विज्ञान को मुनाफे का धंधा बनाने के बजाय उसे समाज और अपने पर्यावरण के लिए उपयोगी बनाया है। उसने सौर ऊर्जा से सैनिकों के रहने के लिए गर्म टेंट बनाए, पानी की कमी दूर करने के लिए बर्फ के स्तूप का निर्माण किया और गांधी की बुनियादी तालीम के दर्शन को जमीन पर उतारने के लिए पहले स्टूडेंट्स इजूकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट आफ लद्दाख और फिर हिमालयन इंस्टीट्यूट फार आल्टरनेटिव लद्दाख जैसे संस्थान बनाए। वांगचुक एक नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा है। जिसे बर्दाश्त करना विकास के केंद्रीकृत और क्रूर मॉडल के लिए संभव नहीं है। इसीलिए कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशंसक रहे और सरकार से प्रशंसा प्राप्त कर चुके वांगचुक आज देशद्रोही बनाए जा रहे हैं। यह स्वदेशी के मोदी विचार का शीर्षासन नहीं तो और क्या है?
वास्तव में वांगचुक का विचार डॉ राम मनोहर लोहिया के हिमालय बचाओ विचार का ही विस्तार और जमीनी प्रयोग है। उसमें भारतीय भूभाग की रक्षा के साथ ही हिमालय जैसी विलक्षण पारिस्थितिकी की रक्षा का प्रयास भी है। पर मुश्किल है कि सत्ता के अहंकार और खोखले राष्ट्रवाद में मदमस्त लोगों को न तो हिमालय समझ में आता है और न ही उसकी पारिस्थितिकी का महत्त्व। उनके लिए मध्य भारत का दंडाकारण्य बड़ी कंपनियों के खनन का मैदान है तो हिमालय एक बड़ी सैन्य छावनी। अब तो हिमालय एक विशाल खनन क्षेत्र के तौर पर भी उभर रहा है। लद्दाख इसीलिए त्रस्त है। सरकार यह भूल रही है कि हिमाचल और उत्तराखंड जैसे पर्वतीय प्रदेश और पंजाब जैसे मैदानी इलाकों में इस साल जो भयंकर बाढ़ आई है उसकी वजहें विनाशकारी विकास की योजनाएं और राष्ट्रवादी हस्तक्षेप हैं।
वांगचुक को न समझने वाले मानव सभ्यता के इतिहास से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। सिंधु घाटी से लेकर तमाम सभ्यताएं पर्यावरणीय विनाश का शिकार रही हैं। वहां युद्धों के उतने प्रमाण नहीं हैं जितने पर्यावरण को न समझने के। गांधी पर आज भले ग्रहण लग रहा हो और वांगचुक आज भले जेल में डाले जा रहे हों लेकिन सभ्यता के भावी पथ प्रदर्शक तो वे ही हैं।

अरुण कुमार त्रिपाठी