भूख की दुश्वारियां : विकसित देश निभाएं अपनी जिम्मेदारियां

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  बाल मुकुन्द ओझा                                                                                               

देश और दुनिया में भुखमरी एक बहुत बड़ी समस्या बन गई है। आबादी विस्फोट के साथ भुखमरी का आंकड़ा भी बेहद चिंताजनक स्थिति में दिन-प्रतिदिन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसी समस्या से निपटने के लिए विश्व खाद्य दिवस 16 अक्टूबर को मनाया जाता है।  इस दिन को मनाने का मकसद यह है कि दुनिया में किसी भी व्यक्ति को भूखा न सोना पड़े और सभी को पोषक आहार मिल सके। देश और दुनिया में अभी भी करोड़ो लोग भुखमरी के शिकार है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में लगभग 73.3 करोड़ लोग प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में भोजन न मिलने के कारण भूख का सामना करते हैं, जबकि लगभग 2.8 बिलियन लोग पौष्टिक आहार का खर्च वहन नहीं कर पाते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि हमारे देश में 81 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा 123 देशों में कुपोषण और बाल मृत्यु दर संकेतकों के आधार पर भुखमरी के स्तर को मापने और ट्रैक करने के लिए उपयोग किया जाने वाले वैश्विक भुखमरी सूचकांक यानी ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में भारत को 102वें स्थान पर रखा गया है। रिपोर्ट में इंडेक्स एंट्री के अनुसार बताया गया है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में 25 .8 का स्कोर के साथ भारत में भूख का स्तर गंभीर है। भारत की स्थिति में वर्ष 2024 और 2023 के मुकाबले सुधार दिखाया गया है। 2024 में भारत 105 वें  और 2023 में 111 वें स्थान पर बताया गया था। यह स्थिति तो तब है जब सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दस वर्षों में देश में रहने वाले लगभग 25 करोड़ लोग ‘बहुआयामी गरीबी’ से बाहर आ गए है। तथा गरीबों के लिए 5 करोड़ घर बनाए गए। हालांकि भारत सरकार का कहना है, ग्लोबल हंगर रिपोर्ट  में इस्तेमाल किया गया भूख मापने का पैमाना बेहद “त्रुटिपूर्ण” है और यह भारत की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाता ह।  साथ ही सरकार ने जोर देकर कहा कि वह देश में कुपोषण के मुद्दे को हल करने के लिए गंभीर प्रयास कर रही है।

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश है, फिर भी भुखमरी और कुपोषण यहाँ एक बड़ी समस्या है। आजादी के 78 वर्ष  बाद भी देश को भूख और कुपोषण जैसी समस्याओं से छुटकारा नहीं मिल पाया है। बच्चे, महिलाएं और वंचित समाज के लोग इन समस्याओं का सबसे अधिक सामना कर रहे हैं। एक तरफ हम खाद्यान्न के मामले में न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अनाज का एक बड़ा हिस्सा निर्यात करते हैं साथ ही 81 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन दे रहे है, वहीं दूसरी ओर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में है। इन्हीं चुनौतियों का सामना करने के लिए हर साल  विश्व खाद्य दिवस 16 अक्टूबर को मनाया जाता है। 

विश्व खाद्य दिवस 2025 की थीम खाद्य सुरक्षा: क्रियाशील विज्ञान रखी गई है। यह विषय इस बात पर केंद्रित है कि विज्ञान, नवाचार और डेटा किस प्रकार से खाद्य जनित रोगों के खतरों को कम कर सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन ने आधिकारिक तौर पर 1979 में 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस के रूप में घोषित किया। इस वर्ष  विश्व खाद्य दिवस हम ऐसे समय में मनाने जारहे है जब भारत भूख और गरीबी के दल दल से बाहर निकलने के लिए प्रयासरत है।

दुनिया भर में हर साल जितना भोजन तैयार होता है उसका लगभग एक-तिहाई बर्बाद हो जाता है। बर्बाद किया जाने वाला खाना इतना होता है कि उससे दो अरब लोगों के भोजन की ज़रूरत पूरी हो सकती है। दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह संख्या आज भी तेजी से बढ़ती जा रही है। अब तो यह मानने वालों की तादाद कम नहीं है कि जब तक धरती और आसमान रहेगा तब तक आदमजात अमीरी और गरीबी नामक दो वर्गों में बंटा रहेगा। शोषक और शोषित की परिभाषा समय के साथ बदलती रहेगी मगर भूख और गरीबी का तांडव कायम रहेगा। अमीरी और गरीबी का अंतर कम जरूर हो सकता है मगर इसके लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी पड़ेगी। प्रत्येक संपन्न देश और व्यक्ति को संकल्पबद्धता के साथ गरीब की रोजी और रोटी का माकूल प्रबंध करना होगा। बिना इसके खाध दिवस मनाना बेमानी और गरीब के साथ एक क्रूर मजाक होगा। भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। भूख के कारण कमजोरी के शिकार बच्चों में बीमारियों से ग्रस्त होने का खतरा लगातार बना रहता है।

    −बाल मुकुन्द ओझा                                                   

  वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार 

   D 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

 “सेवा, सुरक्षा, सहयोग… या आत्मघात? हरियाणा पुलिस का संकट काल”

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शहीद कौन है — आईपीएस पूरन कुमार या एएसआई संदीप लाठर? 

हरियाणा पुलिस एक गहरे संकट से गुजर रही है। पहले आईपीएस पूरन कुमार और अब एएसआई संदीप लाठर की आत्महत्या ने विभाग की कार्यसंस्कृति, मनोबल और आंतरिक तनाव पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगातार आत्महत्याओं से यह स्पष्ट है कि वर्दी के पीछे इंसान टूट रहा है। राजनीतिक दबाव, जातिगत खींचतान और मानसिक अवसाद पुलिस व्यवस्था को खोखला बना रहे हैं। अब ज़रूरत है उच्च स्तरीय जांच के साथ-साथ जिला स्तर पर काउंसलिंग व्यवस्था की, ताकि खाकी का आत्मविश्वास लौट सके और “सेवा, सुरक्षा, सहयोग” का आदर्श दोबारा जीवित हो।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा इन दिनों एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ पुलिस महकमे की साख, मनोबल और संवेदनशीलता तीनों एक साथ संकट में दिखाई दे रहे हैं। पहले आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार की आत्महत्या ने पूरे राज्य को झकझोर दिया और अब एएसआई संदीप लाठर की खुदकुशी ने इस त्रासदी को और गहरा कर दिया है। दोनों घटनाएँ न केवल पुलिस विभाग के भीतर की बेचैनी को उजागर करती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि कानून के रखवाले ही जब अपने जीवन से हार मानने लगें, तो समाज की बुनियाद कितनी डगमगा जाती है।

एएसआई संदीप लाठर ने आत्महत्या से पहले जो वीडियो जारी किया, उसमें उसने अपने अफसरों और सिस्टम के रवैये पर सवाल उठाए। इससे पहले आईपीएस पूरन कुमार की मौत के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित रह गए थे। अब इन दो आत्महत्याओं ने मिलकर एक ऐसा सिलसिला शुरू कर दिया है, जिसने हरियाणा पुलिस की छवि पर गहरा धब्बा छोड़ दिया है। आम जनता यह सोचने पर मजबूर है कि जो विभाग सुरक्षा और न्याय का प्रतीक माना जाता है, उसके भीतर इतना असंतोष, अविश्वास और भय कैसे पनप गया।

हरियाणा पुलिस देश की सबसे अनुशासित और जुझारू पुलिस बलों में गिनी जाती रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हालात ऐसे बने हैं कि इस बल के भीतर मनोबल टूटने लगा है। कहीं राजनीतिक दबाव है, कहीं जातिगत खींचतान, तो कहीं अफसरों के बीच अंतर्विरोध। आईपीएस पूरन कुमार की आत्महत्या के मामले में कई लोगों ने सवाल उठाया था कि क्या उन्हें किसी साजिश का शिकार बनाया गया? और अब संदीप लाठर की मौत के बाद यह सवाल और भी गंभीर रूप ले चुका है।

यह पूरा घटनाक्रम किसी वेब सीरीज़ की तरह उलझा हुआ प्रतीत होता है, जिसमें हर पात्र का अपना दर्द है और हर मोड़ पर नया रहस्य खुलता है। परंतु यह कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि एक वास्तविक त्रासदी है — उन परिवारों की जिनके सदस्य कानून के रक्षक थे और अब उनकी आत्माएं न्याय की पुकार लगा रही हैं।

कानून और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी जिन लोगों के कंधों पर होती है, जब वही खुद अवसाद, निराशा और असहायता के शिकार हों, तो यह किसी भी राज्य के लिए चेतावनी की घंटी है। हरियाणा में हाल के वर्षों में कई बार पुलिस कर्मियों ने खुले मंच से यह स्वीकार किया है कि उनकी कार्यस्थितियाँ बेहद तनावपूर्ण हैं। लंबी ड्यूटी, छुट्टियों की कमी, ऊपरी आदेशों का दबाव और समाज की नकारात्मक धारणा – ये सभी कारण एक पुलिसकर्मी के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं।

चिंता की बात यह है कि आत्महत्या जैसे चरम कदम का सिलसिला अब पुलिस में आम होता जा रहा है। पहले चंडीगढ़, अब रोहतक — हर बार एक नई जगह से वही खबर आती है कि एक और वर्दीधारी ने अपनी जान दे दी। यह सवाल उठाना लाजमी है कि आखिर पुलिस विभाग में ऐसा माहौल क्यों बन रहा है जहाँ मनोबल इतना कमजोर पड़ रहा है कि जीवन ही बोझ लगने लगे।

कुछ लोगों का तर्क है कि इन घटनाओं के पीछे जातिवाद और राजनीति की भूमिका है। हरियाणा जैसे राज्य में, जहाँ जातीय समीकरण राजनीति से लेकर प्रशासन तक गहराई से जुड़े हुए हैं, यह संभावना पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकती। किसी अधिकारी के साथ भेदभाव या दबाव, चाहे वह जातिगत हो या राजनीतिक, मानसिक रूप से तोड़ सकता है। यह वही आग है जो धीरे-धीरे पूरे सिस्टम को निगल रही है। हरित प्रदेश हरियाणा का सामाजिक ताना-बाना तभी सुरक्षित रहेगा, जब प्रशासन जातिवाद से ऊपर उठकर ईमानदार और निष्पक्ष कार्रवाई करेगा।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि शहीद कौन है — आईपीएस पूरन कुमार या एएसआई संदीप लाठर? दोनों ही अपने-अपने स्तर पर सिस्टम से लड़ते हुए हार गए। अगर कोई पुलिसकर्मी अपने अफसरों से न्याय की उम्मीद खो दे, तो वह किससे उम्मीद करेगा? जब “सेवा, सुरक्षा और सहयोग” का आदर्श वाक्य ही खोखला लगने लगे, तो यह न केवल संस्थागत विफलता है बल्कि मानवीय करुणा का भी अंत है।

इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री नायब सैनी और डीजीपी ओपी सिंह की जिम्मेदारी बेहद अहम हो जाती है। उच्च स्तरीय जांच तो जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है एक ऐसा सिस्टम तैयार करना जो पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करे। जिला स्तर पर काउंसलिंग सत्र आयोजित किए जाने चाहिए ताकि कर्मचारी अपने तनाव, दबाव और व्यक्तिगत समस्याओं को साझा कर सकें। यदि किसी पुलिसकर्मी की मानसिक स्थिति अस्थिर पाई जाए तो उसे तुरंत मनोवैज्ञानिक सहायता दी जानी चाहिए और जब तक वह पूरी तरह सक्षम न हो, उसे सर्विस रिवॉल्वर न दिया जाए।

यह सुझाव किसी सजा की तरह नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच की तरह देखा जाना चाहिए। पुलिस की नौकरी आसान नहीं होती। हर दिन अपराधियों से सामना, समाज की उम्मीदें, और ऊपर से आदेशों की जटिलता – इन सबके बीच इंसानियत को बचाए रखना कठिन है। अगर मानसिक स्थिरता को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो ऐसी आत्महत्याओं की श्रृंखला आगे भी जारी रह सकती है।

हरियाणा सरकार को यह भी समझना होगा कि पुलिस सिर्फ कानून लागू करने वाली एजेंसी नहीं, बल्कि समाज का आईना है। जब उसमें दरारें पड़ती हैं, तो समाज की छवि भी टूटती है। पुलिस के भीतर आपसी सहयोग, सम्मान और संवाद की संस्कृति को मजबूत करना बेहद आवश्यक है। अफसरों और अधीनस्थों के बीच संवाद की कमी ही सबसे बड़ा कारण बनती है मनोबल गिरने का।

राज्य के गृह मंत्रालय को चाहिए कि वह एक स्वतंत्र “पुलिस मानसिक स्वास्थ्य प्रकोष्ठ” स्थापित करे, जो केवल पुलिसकर्मियों की भावनात्मक और मानसिक स्थिति पर निगरानी रखे। साथ ही, विभाग के भीतर जवाबदेही तय हो कि कोई भी अफसर अपने अधीनस्थों पर अनावश्यक दबाव या अपमानजनक व्यवहार न करे।

आज हरियाणा पुलिस एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसे अपने अस्तित्व और आदर्श दोनों को बचाना है। यह समय आत्ममंथन का है — कि आखिर कहाँ गलती हुई, किस बिंदु पर वह ‘सेवा और सुरक्षा’ से ‘संदेह और संदेहास्पद मौतों’ तक पहुँच गई।

राजनीतिक हस्तक्षेप, जातिवादी खींचतान, मीडिया ट्रायल और सोशल मीडिया के दबाव ने पहले ही खाकी की गरिमा को कमजोर किया है। अब जरूरत है उस आत्मविश्वास को लौटाने की जो कभी हरियाणा पुलिस की पहचान हुआ करता था।

सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि पुलिस केवल आदेश मानने वाली मशीन नहीं, बल्कि संवेदनशील मनुष्य हैं। जब तक उन्हें सम्मान, न्याय और सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक कानून का शासन भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

आख़िर में राहत साहब के शब्द इस पूरे घटनाक्रम का सटीक बयान करते हैं —

“चराग़ों को उछाला जा रहा है, हवा पर रौब डाला जा रहा है,

न हार अपनी, न अपनी जीत होगी, मगर सिक्का उछाला जा रहा है।”

हरियाणा पुलिस के लिए यह वक्त आत्ममंथन का है — एक तरफ़ व्यवस्था की सच्चाई है, दूसरी तरफ़ वर्दीधारियों की टूटती हिम्मत। अगर इस सच्चाई को स्वीकार कर सुधार के रास्ते नहीं खोले गए, तो यह ‘सेवा, सुरक्षा, सहयोग’ नहीं बल्कि ‘संघर्ष, संदेह और आत्मघात’ की परंपरा बन जाएगी।

हरियाणा को आत्मघाती पुलिस नहीं, आत्मसम्मान से भरी पुलिस की जरूरत है — ताकि लोग जब “खाकी” देखें, तो डर नहीं, भरोसा महसूस करें।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

“कुर्सी नहीं, भरोसे की राजनीति: रमेश वर्मा का सफ़र

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(समाज सेवा विशेष) 

(स्वयं विधायक पद का चुनाव नहीं लड़ा, पर कई विधायकों की डूबती नैया पार लगवाई।) 

भिवानी के गाँव बड़वा में जन्में रमेश वर्मा की राजनीतिक यात्रा एक ऐसे जननेता की कहानी है जिसने सत्ता नहीं, सेवा को साधन बनाया। चार दशक से अधिक समय में उन्होंने पंचायत से लेकर विधानसभा तक अपनी पहचान ईमानदारी, पारदर्शिता और जनसेवा से बनाई। गांवों में विकास, महिलाओं का सशक्तिकरण और युवाओं को दिशा देने के उनके प्रयास ग्राम राजनीति को नई परिभाषा देते हैं। भले ही उन्होंने स्वयं विधायक पद का चुनाव नहीं लड़ा, पर कई विधायकों की डूबती नैया पार लगवाई। वे यह याद दिलाते हैं कि राजनीति केवल चुनाव जीतने का खेल नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक सतत जिम्मेदारी है।  रमेश वर्मा का नेतृत्व केवल निर्णयों में नहीं, बल्कि संवाद में दिखता है। वे लोगों की समस्याएँ सुनते हैं, अधिकारियों से समाधान करवाते हैं और परिणाम सामने आने तक उसका फॉलोअप करते हैं। इस व्यवहारिक राजनीति ने उन्हें एक भरोसेमंद चेहरा बना दिया है।

✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ

गांव की राजनीति को अक्सर स्वार्थ, गुटबाज़ी और जातिगत समीकरणों के चश्मे से देखा जाता है। लेकिन कभी-कभी उसी मिट्टी से ऐसे लोग भी निकलते हैं, जो यह साबित कर देते हैं कि राजनीति केवल सत्ता पाने का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा का सच्चा रास्ता भी हो सकती है। हरियाणा के भिवानी ज़िले के छोटे से गांव बड़वा से निकलने वाले रमेश वर्मा इसी सोच का जीवंत उदाहरण हैं। उनके चार दशक से अधिक लंबे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में सत्ता की लालसा नहीं, बल्कि सेवा का संस्कार दिखाई देता है।

रमेश वर्मा की यात्रा उस पीढ़ी से शुरू होती है, जब पंचायत केवल निर्णय का मंच नहीं बल्कि संवाद का प्रतीक हुआ करती थी। वर्ष 1983 में उनके पिता किशना राम सिंहमार के ग्राम सरपंच चुने जाने के समय से ही उन्होंने प्रशासनिक कार्य, गांव के विकास की जरूरतों और जनहित के मुद्दों को करीब से देखा। यही अनुभव उनकी राजनीतिक सोच की नींव बना। उस दौर में युवा रमेश ने पंचायत के कार्यों में सहयोग कर यह सीखा कि जनता का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होती है। राजनीति में यह सीख उन्हें आगे भी दिशा देती रही।

वर्ष 1996 में उन्होंने पहली बार जिला परिषद सदस्य के चुनाव में भाग लिया। 10 उम्मीदवारों में द्वितीय स्थान प्राप्त करना उस समय न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि थी, बल्कि यह संकेत भी कि बड़वा का यह युवा अपने गांव से आगे सोचने लगा था। तीन साल बाद, 1999 में, जब उन्हें हरियाणा सरकार द्वारा मार्केट कमेटी सिवानी (हल्का बवानी खेड़ा) का चेयरमैन नियुक्त किया गया, तब उन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारी को जनकल्याण की दृष्टि से निभाया। उस कार्यकाल में स्थानीय किसानों के हित, मंडी व्यवस्था की पारदर्शिता और व्यापारियों की सुविधाओं पर उनका ध्यान विशेष रहा।

रमेश वर्मा की राजनीति का दूसरा चरण 2005 में शुरू होता है, जब वे दोबारा अपने गांव के सरपंच चुने गए। पांच वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने जिस समर्पण से ग्राम पंचायत को विकास के मार्ग पर अग्रसर किया, वह आज भी चर्चा का विषय है। सड़क, पानी, स्ट्रीट लाइट, नालियां, स्कूल भवन और मंदिर-पार्क जैसी परियोजनाओं में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। लोगों का कहना है कि उन्होंने राजनीति को दिखावे का साधन नहीं, बल्कि समाज निर्माण का माध्यम बनाया।

2016 में जब वे पंचायती चुनाव में मात्र 71 वोटों से दूसरे स्थान पर रहे, तब भी उन्होंने इसे पराजय नहीं, बल्कि जनता के नए मिज़ाज का सम्मान माना। यह विनम्रता और आत्मस्वीकार ही उन्हें आम नेताओं से अलग बनाती है। उस हार के बाद भी उन्होंने समाजसेवा का कार्य जारी रखा और अगले तीन वर्षों में लोहारू विधानसभा चुनाव (2019) में सक्रिय रूप से संगठन और प्रचार कार्य संभालकर यह साबित किया कि उनकी निष्ठा पद से नहीं, उद्देश्य से जुड़ी है। भले ही उन्होंने स्वयं विधायक पद का चुनाव नहीं लड़ा, पर कई विधायकों की ‘डूबती नैया’ पार लगवाई। यह उनकी रणनीतिक सूझबूझ और जनसंपर्क कौशल का प्रमाण था — वे हर मोर्चे पर पार्टी और समाज के हित में मजबूती से खड़े रहे।

सिर्फ राजनीति ही नहीं, रमेश वर्मा की पहचान एक समाजसेवी के रूप में भी गहरी है। “स्वच्छ भारत अभियान” के दौरान उन्होंने न केवल गांव में सफाई अभियान चलाया, बल्कि लोगों को व्यवहारिक रूप से स्वच्छता की आदत डालने की प्रेरणा दी। महिलाओं के लिए उन्होंने स्वयं सहायता समूह (SHG) की शुरुआत की, ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। कोविड-19 महामारी के कठिन दौर में उन्होंने राशन, मास्क और सैनिटाइज़र वितरण में सक्रिय भागीदारी निभाई, जबकि अधिकांश लोग भय से घरों में सीमित थे। उनके लिए सेवा किसी अवसर की प्रतीक्षा नहीं करती — वह जीवन का हिस्सा है।

युवाओं के लिए रमेश वर्मा ने कई खेलकूद प्रतियोगिताओं और करियर काउंसलिंग शिविरों का आयोजन करवाया। उनका मानना है कि गांव का युवा यदि सही दिशा और प्रेरणा पाए, तो उसे शहर की ओर पलायन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यही सोच उन्हें स्थानीय स्तर पर शिक्षा और रोजगार को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करती है।

उनकी राजनीतिक शैली में सबसे उल्लेखनीय बात है पारदर्शिता और जवाबदेही। उन्होंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि किसी भी योजना या विकास कार्य में जनता की भागीदारी हो। गांव की बैठकों में हर मुद्दे पर खुलकर चर्चा होती रही। उनका यह विश्वास कि “राजनीति लोगों पर हुकूमत नहीं, बल्कि लोगों के बीच रहकर सेवा करने का नाम है” — उनकी पहचान बन गया है।

रमेश वर्मा का नेतृत्व केवल निर्णयों में नहीं, बल्कि संवाद में दिखता है। वे लोगों की समस्याएँ सुनते हैं, अधिकारियों से समाधान करवाते हैं और परिणाम सामने आने तक उसका फॉलोअप करते हैं। इस व्यवहारिक राजनीति ने उन्हें एक भरोसेमंद चेहरा बना दिया है। यही कारण है कि वे 40 से अधिक गांवों में विकास योजनाओं के लिए बजट स्वीकृत करवाने में योगदान दे पाए।

वर्ष 1983 से 2025 तक का उनका सामाजिक जीवन सम्मान और सीख दोनों से भरा है। हिसार और भिवानी के कई गांवों में उन्हें विभिन्न सामाजिक संगठनों और सांस्कृतिक मंचों द्वारा सम्मानित किया गया। 2024 में स्थानीय अख़बारों में उन पर विशेष लेख प्रकाशित हुए, जिनमें उन्हें “जागरूक नेता और समाजसेवी” कहा गया।

रमेश वर्मा की राजनीति में जो सबसे अलग दिखाई देता है, वह है ईमानदारी की निरंतरता। अक्सर नेता चुनाव के समय जनता के बीच दिखते हैं, फिर पांच साल गायब रहते हैं, लेकिन रमेश वर्मा के मामले में यह पैटर्न उलटा है। वे हर परिस्थिति में अपने क्षेत्र के लोगों के बीच मौजूद रहते हैं — चाहे कोई समस्या हो या उत्सव। यह निरंतर जुड़ाव ही उन्हें “जनता का आदमी” बनाता है, न कि सिर्फ “पद का व्यक्ति।”

उनकी दृष्टि साफ है — राजनीति में पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ-साथ शिक्षा, रोजगार, किसानों की सुरक्षा और महिलाओं-युवाओं के सशक्तिकरण को प्राथमिकता देना। वे मानते हैं कि गांव और शहर के बीच विकास की खाई तभी पाटी जा सकती है, जब स्थानीय स्तर पर संसाधनों और अवसरों का समान वितरण हो।

आज जब राजनीति का बड़ा हिस्सा प्रदर्शन, बयानबाज़ी और प्रचार तक सिमट गया है, तब रमेश वर्मा जैसे नेता यह याद दिलाते हैं कि “नेतृत्व का मतलब लोकप्रियता नहीं, जिम्मेदारी होता है।” वे जनता को वोट बैंक नहीं, परिवार समझते हैं। यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें “नेता” नहीं बल्कि “सेवक” कहकर बुलाते हैं।

हरियाणा की राजनीति में जहां युवा पीढ़ी में तेज़ी से बढ़ते स्वार्थ और लाभवाद के बीच ईमानदार नेतृत्व की कमी महसूस की जा रही है, वहां रमेश वर्मा जैसे जनप्रतिनिधि उम्मीद की एक नई किरण हैं। उनकी यात्रा यह संदेश देती है कि गांव की गलियों से भी ऐसे नेता निकल सकते हैं जो प्रदेश और देश के स्तर पर नये मानक स्थापित करें।

आज जब लोकतंत्र को फिर से जनसंपर्क से जोड़ने की जरूरत महसूस हो रही है, तब रमेश वर्मा जैसे लोगों की कहानियाँ लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करती हैं। वे उस परंपरा के प्रतिनिधि हैं जिसमें नेता जनता से दूर नहीं, बल्कि जनता के साथ चलता है।

अगर भारत को सचमुच गांवों का देश कहा जाए, तो ऐसे नेताओं की भूमिका और भी बड़ी हो जाती है। क्योंकि गांव के नेता ही लोकतंत्र की पहली सीढ़ी होते हैं। और जब वह सीढ़ी मजबूत होती है, तभी ऊपर खड़ा ढांचा स्थायी रह सकता है। रमेश वर्मा जैसे जनप्रतिनिधि यही सुनिश्चित करते हैं कि लोकतंत्र की जड़ें केवल संविधान में नहीं, बल्कि गांव की मिट्टी में भी गहराई तक फैली रहें।

अंततः, रमेश वर्मा की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी है जो राजनीति को नैतिकता से जोड़ती है। वे यह साबित करते हैं कि “राजनीति में रहकर भी साफ़ रहा जा सकता है, यदि नीयत साफ़ हो।” उनका जीवन इस बात का साक्ष्य है कि जनसेवा यदि ईमानदारी से की जाए तो वह केवल गांव नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को भी उजाला देती है।

 -डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत ने पकड़ी ई-कॉमर्स की रफ़्तार :ऑनलाइन बाजार हुए गुलज़ार

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बाल मुकुन्द ओझा

देश और दुनिया में इस समय ई-कॉमर्स यानी कि इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स सुर्खियों में है। यह ऑनलाइन व्यापार करने का एक तरीका है। इसके अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के द्वारा इंटरनेट के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-बिक्री की जाती है। इस साल ऑनलाइन और ऑफलाइन प्लेटफॉर्म पर करीब छह लाख करोड़ रुपए का कारोबार होने का अनुमान है, जिसमें ऑनलाइन पर 1.20 लाख करोड़ रुपए के कारोबार का अनुमान लगाया जा रहा है, जो हमारे देश की जीडीपी का 3.2 प्रतिशत आंका गया है। नामी गिरामी ई-कॉमर्स कंपनियों ने त्योहारी सीज़न और जीएसटी में हालिया बदलाव का फायदा उठाना भी शुरू कर दिया है। उन्होंने पहले ही डिस्काउंट ऑफर देने शुरू कर दिए थे। कई कंपनियों के विज्ञापन में 50 से 80 प्रतिशत  डिस्काउंट का ऑफर दिया जा रहा है। अनुसंधान फर्म ‘डेटम इंटेलिजेंस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में जीएसटी दरों को आमजन के अनुकूल और सुविधाजनक बनाने से इस साल त्योहारी बिक्री 27 प्रतिशत से बढ़कर 1.20 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकती है, क्योंकि टैक्स स्लैब को कम करने से कई जरूरी उत्पादों की कीमत में कमी आई है, जिससे बिक्री में 15 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की आशा है। नई जीएसटी व्यवस्था में अब सिर्फ 5 और 18 प्रतिशत के 2 टैक्स स्लैब रखे गए हैं और कुछ दरों को पूरी तरह से हटा दिया गया है, जिससे ग्राहकों को 10 प्रतिशत तक की बचत होने का अनुमान है। नई जीएसटी व्यवस्था में टीवी, एसी, इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स पर विशेष तौर पर बचत होगी।

आज के समय में ऑनलाइन ख़रीदारी करना लोगों विशेषकर युवाओं द्वारा बहुत पसंद किया जा रहा है। इंटरनेट के माध्यम से खरीदारी को ही ई-कॉमर्स कहते है। घरेलू उत्पादों सहित मोबाइल, ग्रोसरी, फर्नीचर, कपडे एवं इलेक्ट्रानिक का सामान आदि खरीदने के लिए बाजार नहीं जाना पड़ता है अपितु घर बैठे ही इंटरनेट ऑनलाइन शॉपिंग के द्वारा एक क्लिक से आप घर पर ही सामान मंगवा सकते है। ऑनलाइन शॉपिंग का व्यवसाय आज के समय में बहुत लोकप्रिय बन चुका है। ऑनलाइन खरीदारी में आपको उत्पाद के विषय में सम्पूर्ण जानकारी दी जाती है तथा मोल-भाव भी नहीं होता जिससे आपसे अधिक पैसे सामान के लिए नहीं लिए जा सकते। जहां लोग पहले खुद दुकानों पर जाकर खरीददारी करते थे। वहीं लोग अब अपनी सुविधा को मद्देनज़र रखते हुए ऑनलाइन खरीद फरोख्त करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। इसी कारण अमेज़न, फ्लिपकार्ट, मिंत्रा, मीशो, ब्लिंकिट,स्नेपडील, शॉपक्लूज, बिगबास्केट, ग्रोफर्स, डील शेयर, स्विगी और जेप्टो जैसे ब्रांड तेजी से अपने पैर जमा रहे हैं। ऑनलाइन व्यापार चार महत्वपूर्ण बाजार वर्गों में काम करता है और इसे सेल फोन, टैबलेट और अन्य शानदार गैजेट्स के माध्यम से चलाया जा सकता है। आज के समय में ई-कॉमर्स के लिये इंटरनेट सबसे महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। यह बुनियादी ढाँचे के साथ-साथ उपभोक्ता और व्यापार के लिये कई अवसर भी प्रस्तुत करता है। इसके उपयोग से उपभोक्ताओं के लिये समय और दूरी जैसी बाधाएँ बहुत मायने नहीं रखती हैं। ई-कॉमर्स के ज़रिये सामान सीधे उपभोक्ता को प्राप्त होता है। इससे बिचौलियों की भूमिका तो समाप्त होती ही है, सामान भी सस्ता मिलता है। इससे बाज़ार में भी प्रतिस्पर्द्धा बनी रहती है और ग्राहक बाज़ार में उपलब्ध सामानों की तुलना भी कर पाता है जिसके कारण ग्राहकों को उच्च गुणवत्ता वाला सामान मिल पाता है।

भारत में अधिकतर लोग सामान खरीदने के लिए ई-कॉमर्स प्लेटफार्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। मोबाइल फ़ोन्स और इंटरनेट डाटा में हो रहे निरंतर विकास से भारत में ई-कॉमर्स इंडस्ट्री बढ़ती जा रही है, यही कारण है कि आज ई-कॉमर्स से जुड़े कई सारे नए नए ऐप्स मार्केट में आ गए हैं। भारत का ऑनलाइन कॉमर्स सेक्टर 2020 में 30 बिलियन डॉलर के आधार से शुरू होकर दशक के अंत तक 2030 में 300 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है, जो देश में 1 ट्रिलियन डॉलर के डिजिटल अवसर में महत्वपूर्ण योगदान होगा। आज भारत ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करने में दुनिया में छठे नंबर पर आता है। भारत में ई-कॉमर्स तेजी से लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहा है। आज शहरी ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल किया जा रहा है।

ई कामर्स व्यवसाय खुदरा विक्रेताओं और ग्राहकों को संभावित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्रदान करता है। आज के समय में, जब ज्यादातर लोग ऑनलाइन शॉपिंग का सहारा ले रहे हैं, ईकामर्स की वर्तमान स्थिति बेहद सकारात्मक दिखती है क्योंकि अधिक लोग जाते हैं अपने ईकामर्स स्टोर के साथ ऑनलाइन, और यह आने वाले वर्षों में अपने चरम पर होने की उम्मीद है। ऑनलाइन सेल में सामान सस्ता जरूर मिल रहा है मगर उपभोक्ता को सावधानी रखनी पड़ेगी क्योकि ठगी करने वाले गिरोह भी सक्रीय हो गए है। जो भोले भले लोगों को सस्ते माल के चक्कर में फंसा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे है। अधिकृत प्लेटफॉर्म का उपयोग करें। बैंक स्टेटमेंट और पासवर्ड सुरक्षा सुनिश्चित करें। कैश ऑन डिलीवरी अपनाएँ और फर्जी ऑफर्स से बचें। ऐसे में लोगों ने सतर्कता नहीं रखी तो सस्ते में माल खरीदना महंगा भी पड़ सकता है।

  

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32 मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

मो.- 9414441218

लालू यादव एंड कंपनी कोर्ट के निशाने पर

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लालू यादव , राबड़ी देवी और तेजस्वी की कल दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में बड़ी भारी बेइज्जती हुई । सीबीआई की जांच के बाद दायर हुई चार्जशीट में तीनों को घोर भ्रष्टाचारी , धोखेबाज और गरीब जनता के शोषक के रूप में इंगित किया गया था । कोर्ट ने रेलवे खानपान और पर्यटन निगम घोटाले में न केवल तत्कालीन रेल मंत्री लालू अपितु उनकी बीबी , बेटे सहित रेलवे के अनेक अधिकारियों को पूर्ण भ्रष्ट एवं दोषी ठहराया ।

दूसरे मामले में कोर्ट ने पाया कि लालू के रेल मंत्री रहते हुए गरीब बिहारियों की जमीन कुछ सौ रुपए में खरीदकर गरीबों को अनैतिक रूप से खलासी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरियां थमा दी गई । वह भी बगैर कोई परीक्षा दिए और बगैर कोई साक्षात्कार लिए । शेष अभ्यर्थियों का हक छीनकर लालू खानदान ने गरीबों की जमीनों के बदले शहरी क्षेत्रों में मंहगी सरकारी जमीनें मुफ्त हासिल की । फिर उन्हें बेचकर हजारों करोड़ रुपए कमाए । तेजस्वी की प्रार्थना पर इस मुद्दे पर अब 10 नवम्बर को आरोप तय होंगे ।

बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए पशुओं का करोड़ों का चारा डकारने वाले लालू के ये दोनों कारनामें भारत ही नहीं पूरे विश्व में अनूठे हैं । कोई और देश होता तो लालू , राबड़ी , तेजस्वी जैसे नेताओं को बिहार में एक वोट न मिलता ? वैसे अपने नोटिस किया क्या ? बिहार में कांग्रेस ने आज तक तेजस्वी को सीएम फेस क्यों नहीं माना ? शायद यही कारण रहा हो । वैसे कांग्रेस ही कौनसी दूध की धुली है । उसके अनेक बड़े शीर्ष नेता खुद भी भ्रष्टाचार के मामलों में जमानत पर चल रहे हैं ।

इसके बावजूद कांग्रेस को उम्मीद थी 13 अक्टूबर का फैसला आते ही लालू खानदान को जेल जाना पड़ सकता है । खैर तेजस्वी की दरख़्वास्त पर कोर्ट ने गंभीर आरोप तो तय कर दिए पर फैसला 10 नवम्बर तक टाल दिया । लेकिन तीनों की भारी किरकिरी हो गई । जैसे ही कांग्रेस तेजस्वी को नेता मानेगी , बिहार में इंडी गठबंधन का भी कबाड़ा हो सकता है । यकीन न हो तो आजमा लीजिए । यह काफी मुश्किल घड़ी है , देखते जाइए । भाजपा पर टाइमिंग के आरोप मढ़ने से भी कुछ नहीं होगा चूंकि कार्रवाई न्यायालय में चल रही है ।

आपको बता दें कि जमीन के बदले नौकरी का महाघोटाला 2004 से 2009 के बीच लगातार चलता रहा । तब केन्द्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी । वे नाम के पीएम थे , प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मजबूरन सोनिया गांधी की सैंडल या खड़ाऊँ रखकर सरकार चला रहे थे । देश में जब भारी बवाल हुआ तब कांग्रेस सरकार को लालू के घोटाले के खिलाफ 2005 में सीबीआई जांच बैठानी पड़ी । सीबीआई ने 2013 में चार्जशीट फाइल की जिस पर कल कोर्ट ने आरोप तय किए ।

बाद में कुछ मामलों में 2017 , 2018 और 2022 में भी चार्जशीट आईं । उन सभी पर कार्रवाई चल रही है । इंडी गठबन्धन अब बीजेपी पर आरोप लगाने की स्थिति में है तो नहीं । पर आदतन लगा रहा है और मात खा रहा है । कुछ भी हो , लालू परिवार चुनावी मझधार में बुरी तरह घिर गया है । गरीबों की जमीनों पर लालू खानदान द्वार खड़े किए गए मॉल , कमर्शियल कॉम्प्लेक्स और रियायशी टॉवर चुनावी माहौल में आरजेडी नेताओं के चेहरों पर कालिख पोत रहे हैं । साथ ही गठबन्धन की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं । तेजस्वी यदि सीएम बने तो ढाई करोड़ नौकरियां भी क्या इसी प्रकार जमीनों मकानों के बदले बांटी जाएंगी .

…कौशल सिखौला

विवेकहीन समाज की एक त्रासदी−जातीय भेदभाव

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सदियों से भारतीय समाज जातीय भेदभाव की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। यह नफरत केवल सामाजिक संरचना को नहीं, बल्कि इंसान के विवेक और संवेदना को भी कुंद कर चुकी है। हर निर्णय, हर दृष्टिकोण, हर न्याय आज जाति के तराज़ू पर तोला जाता है। जब तक समाज जातीय पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर न्याय-अन्याय के बीच अंतर करना नहीं सीखेगा, तब तक कुछ स्वार्थी और धूर्त लोग इस विभाजन की साज़िश में हमें अपनी सर्कस बनाते रहेंगे।

– डॉ प्रियंका सौरभ

भारतीय समाज की जड़ें हजारों वर्षों पुरानी हैं। पर इन जड़ों में कई ऐसी गांठें भी हैं, जिन्होंने इंसानियत को बाँट दिया है। जाति का विचार शुरुआत में शायद एक सामाजिक संगठन का ढांचा था, पर समय के साथ यह व्यवस्था अन्याय, भेदभाव और शोषण का औजार बन गई। ऊँच-नीच की मानसिकता ने समाज को वर्गों में बाँट दिया और इस बंटवारे ने इंसान की पहचान को उसके कर्म से हटाकर उसकी जाति से जोड़ दिया।

जब कोई समाज अपने नैतिक विवेक को खो देता है, तब वह अन्याय को सामान्य मानने लगता है। यही आज की सबसे बड़ी समस्या है। जातीय सोच इतनी गहराई से हमारी मानसिकता में समा गई है कि लोग अन्याय को भी “अपनों के पक्ष में” देखकर सही ठहराने लगते हैं। किसी अपराधी की जाति अगर अपनी है, तो लोग उसे निर्दोष मान लेते हैं; और अगर पीड़ित किसी अन्य जाति का है, तो उसके दर्द के प्रति संवेदना गायब हो जाती है। यह वह बिंदु है जहां इंसानियत मर जाती है और जातिवाद जीत जाता है।

राजनीति ने जातिवाद को जीवित रखा है, बल्कि उसे हवा दी है। हर चुनाव में उम्मीदवारों की योग्यता नहीं, उनकी जातीय पहचान का हिसाब लगाया जाता है। नेता जानते हैं कि जातीय गोलबंदी उनकी सत्ता की नींव है, इसलिए वे समाज को एकजुट करने के बजाय बांटे रखना चाहते हैं। वोट के लिए जाति को हथियार बनाना सबसे खतरनाक प्रवृत्ति है, क्योंकि यह विभाजन न केवल लोकतंत्र की भावना को कमजोर करता है, बल्कि पीढ़ियों के मन में अविश्वास और घृणा बो देता है।

जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने का सबसे सशक्त माध्यम शिक्षा है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि शिक्षा का प्रसार भी कई बार समान अवसरों के बिना अधूरा रह जाता है। जब तक हर वर्ग को समान अवसर, समान मंच और समान सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक जातीय सोच का अंत संभव नहीं है। सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य को स्वतंत्र सोचने और दूसरों के दुःख को समझने की क्षमता दे।

मीडिया समाज का दर्पण होता है। पर जब दर्पण ही धुंधला हो जाए, तो सच्चाई कैसे दिखाई देगी? जातीय हिंसा या भेदभाव की खबरें अक्सर राजनीतिक दृष्टिकोण से तो दिखाई जाती हैं, पर उनमें इंसानियत की करुणा का अभाव होता है। जरूरत है कि मीडिया समाज में संवाद का माध्यम बने, न कि विभाजन का। पत्रकारिता का मूल धर्म है सत्य को सामने लाना — चाहे वह किसी जाति, वर्ग या धर्म के विरुद्ध क्यों न हो।

हर युग में कुछ ऐसे चालाक और धूर्त लोग रहे हैं जो समाज की कमजोरियों को भुनाते हैं। कभी धर्म के नाम पर, कभी जाति के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर — वे हमें बाँटकर अपनी कुर्सी और शक्ति को सुरक्षित करते हैं। हम वही जनता हैं जो उनके शो में दर्शक बन बैठे हैं। वे खेल दिखाते हैं, हम ताली बजाते हैं — और हर बार यह सर्कस चलता रहता है। अगर हम सच में बदलाव चाहते हैं, तो हमें दर्शक नहीं, निर्णायक बनना होगा।

न्याय का अर्थ तभी पूरा होता है जब वह बिना किसी पूर्वाग्रह के किया जाए। न्याय का कोई रंग, धर्म या जाति नहीं होती। समाज को चाहिए कि वह “हम बनाम वे” की मानसिकता से बाहर निकलकर “सबके लिए न्याय” की भावना को अपनाए। यही लोकतंत्र का आधार है। अगर हर व्यक्ति अपने स्तर पर जाति से ऊपर उठकर सोचने लगे, तो यह बदलाव किसी क्रांति से कम नहीं होगा।

जातिवाद केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि एक मानसिक गुलामी है। यह हमें विवेकहीन, असंवेदनशील और विभाजित बनाता है। आज समय की सबसे बड़ी मांग यही है कि हम अपने भीतर झाँकें और समझें कि असली पहचान हमारी जाति नहीं, बल्कि हमारा कर्म और हमारा चरित्र है। सदियों से जो दीवारें हमें बाँटती आई हैं, उन्हें तोड़ने की शुरुआत हमें खुद से करनी होगी। जब समाज न्याय के पक्ष में खड़ा होना सीख लेगा — बिना यह देखे कि पीड़ित या अपराधी किस जाति का है — तभी हम कह सकेंगे कि हमने सच्चे अर्थों में सभ्यता की ओर कदम बढ़ाया है। अन्यथा यह जातीय सर्कस यूँ ही चलता रहेगा, और हम अनजाने में उसके दर्शक बने रहेंगे।

-प्रियंका सौरभस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

सूफ़ी संगीत का सम्राट−नुसरत फ़तेह अली ख़ान

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जब सूफ़ी संगीत की बात होती है तो दुनिया में सबसे पहले जिस नाम की गूंज सुनाई देती है, वह है नुसरत फ़तेह अली ख़ान। उन्होंने न केवल पाकिस्तान बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और विश्व स्तर पर कव्वाली को एक नई पहचान दी। उनकी आवाज़ में जो जादू था, वह सरहदों, भाषाओं और धर्मों की सीमाओं से परे था। नुसरत ने संगीत को भक्ति, प्रेम और ईश्वर के प्रति आत्मिक समर्पण का माध्यम बना दिया।


प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

नुसरत फ़तेह अली ख़ान का जन्म 13 अक्टूबर 1948 को फ़ैसलाबाद (तब का लायलपुर), पाकिस्तान में एक प्रसिद्ध कव्वाल परिवार में हुआ था। उनके पिता उस्ताद फतेह अली ख़ान स्वयं एक प्रख्यात कव्वाल और संगीतज्ञ थे। नुसरत के परिवार की कव्वाली परंपरा छह सौ वर्षों से चली आ रही थी — यानी वे “कव्वाल बच्चा” परिवार से थे, जिनका उद्देश्य सूफ़ी संगीत को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखना था।

शुरुआत में नुसरत के पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा संगीत में आए, क्योंकि उन्होंने देखा था कि इस कला को समाज में उचित सम्मान नहीं मिलता। परंतु नुसरत में बचपन से ही संगीत के प्रति अद्भुत लगाव था। वे स्कूल के दिनों में ही सुरों से खेलते थे और पिता की महफ़िलों में छिपकर सुनते थे। पिता की मृत्यु (1964) के बाद, उनके चाचा उस्ताद मुबारक अली ख़ान ने उन्हें प्रशिक्षित किया और इस प्रकार एक नयी यात्रा शुरू हुई।


संगीतिक यात्रा की शुरुआत

नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने पहली बार सार्वजनिक मंच पर 1971 में प्रदर्शन किया। उनके स्वर में ऐसी ताक़त और गहराई थी कि सुनने वाले तुरंत मुग्ध हो जाते। उनकी आवाज़ का विस्तार — निचले सुर से ऊँचे सुर तक — अद्भुत था। वे सुरों को इतने सहज रूप में बदलते कि ऐसा लगता जैसे ईश्वर खुद उनके गले में बसता हो।

उनकी प्रारंभिक कव्वालियाँ पारंपरिक सूफ़ी रचनाओं पर आधारित थीं — जैसे हज़रत अमीर ख़ुसरो, बुल्ले शाह, वारिस शाह, और निज़ामुद्दीन औलिया की वाणी। धीरे-धीरे उन्होंने अपने अंदाज़ में लय, ताल और स्वर का ऐसा संगम रचा कि कव्वाली एक वैश्विक कला बन गई।


कव्वाली का नुसरत अंदाज़

नुसरत फ़तेह अली ख़ान की कव्वाली पारंपरिक सीमाओं को तोड़ती है। उन्होंने पुराने ढांचे में आधुनिकता का रंग भरा। उनकी कव्वालियों में ताल की विविधता, ताली और हारमोनियम का उत्कृष्ट तालमेल, और गायन की ऊँचाई पर पहुँचने की क्षमता असाधारण थी।

उनकी प्रसिद्ध कव्वालियाँ जैसे —

“अल्लाह हू, अल्लाह हू”

“ताजदार-ए-हरम”

“ये जो हल्का हल्का सुरूर है”

“दमादम मस्त कलंदर”

“आफरीन आफरीन”

“किंना सोहणा तैनूं रब ने बनाया”

“मेरे रश्के क़मर”
आज भी सूफ़ी संगीत के भक्तों के लिए भक्ति और प्रेम का प्रतीक हैं।

नुसरत की कव्वालियाँ केवल धार्मिक भावना तक सीमित नहीं थीं, उनमें मानवीय प्रेम, ईश्वर से संवाद और आत्मा की तड़प भी झलकती थी।


अंतरराष्ट्रीय पहचान

1980 के दशक में नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने विश्व मंच पर कदम रखा। उन्होंने पीटर गैब्रियल जैसे पश्चिमी संगीतकारों के साथ काम किया और “रियल वर्ल्ड रिकॉर्ड्स” के तहत अपनी रिकॉर्डिंग्स जारी कीं। यह पहला अवसर था जब किसी दक्षिण एशियाई सूफ़ी गायक को पश्चिमी संगीत मंच पर इतनी लोकप्रियता मिली।

उनकी प्रसिद्ध एलबम “Shahen-Shah” (1989), “Devotional and Love Songs” (1992), और “Mustt Mustt” (1990) ने अंतरराष्ट्रीय संगीत जगत में तहलका मचा दिया।

ब्रिटिश संगीतकार माइकल ब्रुक के साथ उनके सहयोग ने “Fusion Qawwali” को जन्म दिया — एक ऐसा प्रयोग जिसमें पूर्व और पश्चिम दोनों की संगीत परंपराएँ मिल गईं।

उनकी आवाज़ हॉलीवुड फिल्मों तक पहुँची — Dead Man Walking, Natural Born Killers और The Last Temptation of Christ जैसी फिल्मों में उनके स्वर गूंजे।


भारत से आत्मिक रिश्ता

नुसरत फ़तेह अली ख़ान का भारत से गहरा जुड़ाव था। वे अक्सर दिल्ली, मुंबई और अजमेर शरीफ़ की दरगाह में अपनी कव्वाली प्रस्तुत करने आते थे। उन्होंने भारतीय संगीत निर्देशकों जैसे ए.आर. रहमान, आनंद-मिलिंद, और जतिन-ललित के साथ भी काम किया।

रहमान के साथ उनकी रचना “गुरु नालो इश्क़ मीठा” और “आफरीन आफरीन” आज भी भारतीय युवाओं के बीच लोकप्रिय है। रहमान खुद स्वीकार करते हैं कि नुसरत साहब उनके लिए “आवाज़ के दरवेश” थे।


आवाज़ की विशेषता

नुसरत की आवाज़ में एक ऐसी “रूहानियत” थी जो हर धर्म और संस्कृति के श्रोता को अपनी ओर खींच लेती थी। वे ऊँचे सुर में भी स्पष्टता बनाए रखते और एक ही पंक्ति को बार-बार दोहराकर श्रोता को ध्यान की अवस्था में पहुँचा देते।

उनकी आवाज़ में न कोई बनावट थी, न प्रदर्शन — वह सिर्फ़ “इश्क़-ए-हक़ीक़ी” (ईश्वर का प्रेम) का संप्रेषण था। यही कारण है कि उन्हें “शहंशाह-ए-कव्वाली” कहा गया।


पुरस्कार और सम्मान

नुसरत फ़तेह अली ख़ान को दुनिया भर में अनेक पुरस्कार मिले।

यूनेस्को म्यूज़िक अवॉर्ड (1995)

ग्रैमी अवॉर्ड के लिए नामांकन (1996)

पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “निशान-ए-इम्तियाज़”

ब्रिटिश म्यूज़िक अवार्ड्स में विशेष सम्मान

फ्रांस, कनाडा और अमेरिका के कई संगीत विश्वविद्यालयों ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी।

उनकी रचनाएँ आज भी विश्व के संगीत संस्थानों में अध्ययन का विषय हैं।


अंतिम दिन और निधन

नुसरत फ़तेह अली ख़ान का जीवन जितना उज्जवल था, उतनी ही जल्दी समाप्त भी हो गया। 1997 में वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। लंदन के एक अस्पताल में इलाज के दौरान 16 अगस्त 1997 को उन्होंने अंतिम साँस ली। उस समय वे केवल 48 वर्ष के थे।

उनके निधन पर दुनिया भर में शोक की लहर दौड़ गई। लंदन, दिल्ली, लाहौर, न्यूयॉर्क और पेरिस तक सूफ़ी प्रेमियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।


विरासत और प्रभाव

नुसरत फ़तेह अली ख़ान के बाद कव्वाली केवल एक धार्मिक संगीत नहीं रहा — वह विश्व संगीत (World Music) का हिस्सा बन गया। उनके शिष्यों और अनुयायियों में रहात फ़तेह अली ख़ान (उनके भतीजे) ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

आज उनकी आवाज़ इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में भी उतनी ही जीवंत है। चाहे भारतीय फिल्म “बजरंगी भाईजान” का “भर दो झोली मेरी” हो या रहमान के संगीत में “ख्वाजा मेरे ख्वाजा” — इन सब में नुसरत की सूफ़ियाना आत्मा महसूस होती है।

उनकी कव्वाली सिर्फ़ सुरों का संगम नहीं, बल्कि ईश्वर से आत्मा का संवाद थी।


निष्कर्ष

नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने यह सिद्ध कर दिया कि संगीत किसी एक धर्म, भाषा या सीमा का बंधक नहीं होता। उनकी आवाज़ आज भी दिलों को जोड़ती है, आस्था जगाती है और प्रेम की भाषा सिखाती है।

उनकी कव्वाली “अल्लाह हू, अल्लाह हू” जब गूंजती है तो लगता है कि इंसान खुद से परे किसी दिव्यता से जुड़ गया है। यही है नुसरत फ़तेह अली ख़ान की सबसे बड़ी पहचान — एक ऐसी आवाज़ जो रूह से बात करती है।

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सुप्रीम कोर्ट के करूर में की रैली के दौरान मची भगदड़ की सीबीआई जांच के आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के करूर में अभिनेता-राजनेता विजय के रैली के दौरान मची भगदड़ की सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं ! इस मामले में टीवीके ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि भगदड़ की जांच एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की निगरानी में हो । पार्टी का कहना था कि सिर्फ तमिलनाडु पुलिस की तरफ से बनाई गई विशेष जांच दल (एसआईटी) से जनता का भरोसा नहीं बनेगा। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि भगदड़ पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा हो सकता है।

टीवीके की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश अजय रस्तोगी को करूर भगदड़ मामले में सीबीआई जांच की निगरानी करने वाली समिति का प्रमुख नियुक्त किया है। टीवीके के सचिव आधव अर्जुना ने इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया था। इससे पहले मद्रास हाई कोर्ट ने एसआईटी का गठन किया था, जिसे टीवीके ने चुनौती दी थी।

तमिलनाडु के करूर में हुई भगदड़ के तुरंत बाद विवाद और आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए थे। करूर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर टीवीके के करूर (उत्तर) जिला सचिव माधियाझगन, जनरल सेक्रेटरी बसी आनंद, और ज्वाइंट जनरल सेक्रेटरी सीटीआर निर्मल कुमार के खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास, और अन्य की जान जोखिम में डालना जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। पुलिस का कहना है कि भगदड़ में कोई खुफिया चूक नहीं हुई। रैली में विजय देर से पहुंचे, और लोग कई घंटे से इंतजार कर रहे थे।

पुलिस अधिकारियों ने आयोजकों से कहा था कि विजय की विशेष रैली बस को निर्धारित स्थान से कम से कम 50 मीटर पहले रोक दें। लेकिन आयोजकों ने तय जगह पर ही बस खड़ी की। पुलिस के अनुसार, ’10 मिनट तक नेता बस से बाहर नहीं आए, जिससे भीड़ असंतुष्ट हो गई। लोग उन्हें देखने के लिए बेताब थे।’करूर में अभिनेता-राजनेता विजय की रैली के दौरान भगदड़ में 40 से अधिक लोगों की मौत हो गई। इस मामले में विजय की पार्टी तमिलागा वेट्री कजगम ने सुप्रीम कोर्ट से स्वतंत्र जांच की मांग की थी। टीवीके का कहना है कि सिर्फ तमिलनाडु पुलिस की एसआईटी जनता का भरोसा जीतने में सक्षम नहीं होगी।

बिहार चुनाव : लालू के घोटाले ने बेटे तेजस्वी की राह में बिखेरे कांटे

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बाल मुकुन्द ओझा

दिल्ली की एक अदालत द्वारा लालू यादव परिवार पर नौकरी के बदले जमीन सम्बन्धी एक बहुचर्चित मामले में धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार समेत अन्य धाराओं के तहत आरोप तय करने से  बिहार विधान सभा चुनाव से पहले ही महागठबंधन पर संकटों के बादल छा गए है। बिहार विधानसभा के चुनावों पर इसका कितना असर होगा, यह देखने वाली बात है। कभी देश के प्रधानमंत्री पद के लिए अहम् भूमिका निभाने वाले बिहार के कद्दावर नेता लालू यादव की अब एक ही इच्छा है कि उसके जीवनकाल में छोटा बेटा तेजस्वी बिहार की गद्दी पर आसीन हो। मगर उनकी लाख चेष्टा के बावजूद कहीं न कहीं उनके कार्यकाल के घोटाले और सियासी पैबंध उनकी राह में कांटे बिखेर ही देता है। चुनावी माहौल में लालू यादव के परिवार की मुश्किलें कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। बिहार में एकाएक ही सियासत गरमा गई है। बिहार विधान सभा का चुनाव लालू परिवार के लिए काफी मुश्किलों भरा हो गया है। आनन फानन में भाजपा सहित लालू विरोधी पार्टियों ने लालू पर तंज कसने शुरू कर दिए। बिहार के दो प्रमुख चुनावी मोर्चे महागठबंधन और एनडीए  ने सत्ता पर काबिज होने के लिए किलेबंदी शुरू कर दी है। लालू ने अपने बेटे तेजस्वी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की सार्वजनिक घोषणा कर रखी है। बिहार में येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने के लिए लालू यादव की छटपटाहट बस देखते ही बनती है। राजद अध्यक्ष लालू यादव अब बूढ़े हो चुके है और चाहते है उनकी विरासत के साथ बिहार की राजगद्दी बेटे तेजस्वी को मिले। नए घटनाक्रम ने आरजेडी की चुनावी संभावनाओं को पलीता लगा दिया है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आईआरसीटी घोटाले में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने आरजेडी सुप्रीमों लालू यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने तीनों नेताओं के खिलाफ अपने आदेश में कड़े शब्दों का प्रयोग किया और भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम में कथित अनियमितताओं से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में आरोप तय करने का आदेश सुनाया है। अदालत ने धारा 120B और 420 के तहत आरोप तय कर दिए हैं। न्यायालय ने साजिश, पद के दुरुपयोग और टेंडर प्रक्रिया में छेड़छाड़ की बात कही और यह भी जोड़ा कि सब कुछ लालू यादव की जानकारी में हुआ। सुनवाई के दौरान CBI ने सबूतों की एक पूरी श्रृंखला पेश की । अदालत ने कहा कि लालू यादव ने टेंडर प्रक्रिया में दखल दिया था । टेंडर प्रक्रिया में बड़ा बदलाव कराया था।

बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और उनके बेटे तेजस्वी यादव की चुनावी मुश्किलें बढ़ गई हैं। CBI केस के मुताबिक लालू प्रसाद यादव के रेल मंत्री रहने के दौरान (2004-2009 के बीच) बिहार के लोगो को मुंबई, जबलपुर,  कलकत्ता, जयपुर, हाजीपुर में ग्रुप डी पोस्ट के लिए नौकरी दी गई। इसके एवज में नौकरी पाने वाले लोगों ने लालू प्रसाद के परिजनों/परिजनों के स्वामित्व वाली कंपनी के नाम अपनी जमीन ट्रांसफर की।

लालू परिवार ने पूर्व की तरह फिर खुद के पाक साफ़ होने का दावा किया है। मगर उनके विरोधियों का कहना है इसे कहते है चोरी और सीनाजोरी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 1974 में भ्रष्टाचार के खिलाफ बिहार में सिंहनाद किया था। लालू ने जेपी के एक सेनानी के रूप में इस आंदोलन में अपनी सक्रीय भागीदारी दी थी और आज भ्रष्टाचार रूपी इसी अज़गर ने लालू और उनके परिवार को निगल लिया है। जेपी के आंदोलन से निकले लालू यादव को बहुचर्चित चारा घोटाले के पांच मामले में हुई सजा ने भ्रष्टाचार के इतिहास में एक नई इबारत लिख दी। राजद सुप्रीमो लालू यादव को चारा घोटाले से जुड़े पांच मामलों कुल साढ़े 32 साल की सजा सुनाई जा चुकी है। वे फिलहाल जमानत पर है। लालू की चार्जशीट पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा के समय हुई थी तो पहली सजा मनमोहन सिंह की सरकार के समय हुई। फिर भी फंसा दिए जाने का राग अलापा जा रहा है।

गौरतलब बिहार  का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार चारा घोटाला था जिसमें पशुओं को खिलाये जाने वाले चारे के नाम पर 950 करोड़ रुपये सरकारी खजाने से फर्जीवाड़ा करके निकाल लिये गये। केंद्र सरकार गरीब आदिवासियों को अपनी योजना के तहत गाय, भैंस, मुर्गी और बकरी पालन के लिए आर्थिक मदद मुहैया करा रही थी। इस दौरान मवेशी के चारे के लिए भी पैसे आते थे। लेकिन गरीबों के गुजर-बसर और पशुपालन में मदद के लिए केंद्र सरकार की तरफ से आए पैसे का गबन कर लिया गया था। 1996 में चारा घोटाले का मामला बाहर निकला । लालू के मुख्यमंत्री रहते ही चारा घोटाला सामने आया। आश्चर्य इस बात का है जन धन पर डाका डालने वालों को अपने किये पर कोई पछतावा नहीं है। अब एक बार फिर केंद्रीय जाँच दलों की राडार पर लालू परिवार का भ्रष्टाचार है जिसमें जेल जाने की तलवार लटकी हुई है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

भारत की आध्यात्मिक बेटी और राष्ट्रीय जागरण की अग्रदूत−भगिनी निवेदिता

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के इतिहास में एक ऐसा नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है जिसने विदेशी होकर भी भारत को अपनी आत्मा बना लिया — भगिनी निवेदिता।
वह न केवल स्वामी विवेकानंद की शिष्या थीं, बल्कि उन्होंने भारत के पुनर्निर्माण, महिला शिक्षा और राष्ट्रीय चेतना के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
उनका जीवन त्याग, सेवा और समर्पण की अद्भुत गाथा है — एक ऐसी विदेशी महिला की कहानी, जिसने “भारत माता” के चरणों में अपनी समस्त शक्ति अर्पित कर दी।


प्रारंभिक जीवन

भगिनी निवेदिता का जन्म 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैंड के डबलिन शहर में हुआ था।
उनका वास्तविक नाम मार्गरेट एलिज़ाबेथ नोबल (Margaret Elizabeth Noble) था।
उनके पिता सैमुअल नोबल एक ईसाई पादरी थे, और माँ का नाम मैरी इसाबेला नोबल था।
पिता की धर्मनिष्ठा और माँ की करुणा ने बचपन से ही मार्गरेट के भीतर सेवा और आदर्शवाद की भावना भर दी।

जब मार्गरेट मात्र पाँच वर्ष की थीं, तभी उनके पिता का देहांत हो गया। इस दुखद घटना ने उनके जीवन में गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने निर्णय लिया कि जीवन दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित करना ही सच्चा धर्म है।


शिक्षा और अध्यापन जीवन

मार्गरेट बचपन से ही प्रतिभाशाली थीं। उन्होंने लंदन में शिक्षक के रूप में कार्य शुरू किया और शिक्षा सुधार आंदोलन से जुड़ीं। उनका मानना था कि शिक्षा केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि मनुष्य के चरित्र का निर्माण करती है। उन्होंने इंग्लैंड में एक “Play School” खोला, जहाँ बच्चों को सृजनात्मक और नैतिक शिक्षा दी जाती थी। उसी समय वे दर्शन, धर्म और अध्यात्म में गहरी रुचि लेने लगीं। इन्हीं दिनों वे भारत के महान संत स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आईं — और यही उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला क्षण था।


स्वामी विवेकानंद से मुलाकात – जीवन का मोड़

1895 में स्वामी विवेकानंद इंग्लैंड गए और वहाँ उन्होंने भारतीय वेदांत दर्शन पर व्याख्यान दिए। उनके विचारों ने यूरोप के शिक्षित समाज को झकझोर दिया। मार्गरेट नोबल भी उनके एक व्याख्यान में उपस्थित थीं। स्वामी विवेकानंद के शब्दों —

“भारत की आत्मा सोई नहीं है, केवल उसे जगाने की आवश्यकता है।”
ने उन्हें भीतर तक आंदोलित कर दिया।

मार्गरेट ने स्वामीजी से कई बार संवाद किया और भारत की आध्यात्मिक संस्कृति के बारे में जाना।
स्वामी विवेकानंद ने उनसे कहा —

“भारत को शिक्षित, जागरूक और स्वावलंबी बनाने के लिए तुम्हारे जैसे लोगों की आवश्यकता है।”

बस, यही वह क्षण था जब मार्गरेट नोबल ने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया — भारत की सेवा।


भारत आगमन और नया जीवन

28 जनवरी 1898 को मार्गरेट नोबल भारत पहुँचीं।
स्वामी विवेकानंद ने उनका स्वागत किया और उन्हें ‘निवेदिता’ नाम दिया — जिसका अर्थ है “पूर्ण समर्पित”।
वह अब केवल मार्गरेट नहीं रहीं, वे भारत की “भगिनी निवेदिता” बन चुकी थीं।

उन्होंने अपना पश्चिमी परिधान त्याग दिया और भारतीय परंपरा के अनुसार सादा साड़ी धारण की।
उन्होंने बंगाल की भाषा सीखी, भारतीय रीति-रिवाज अपनाए और धीरे-धीरे पूरी तरह भारतीय संस्कृति में ढल गईं।
उन्होंने कहा था —

“अब मैं केवल भारत की नहीं, भारत की आत्मा की सेविका हूँ।”


महिला शिक्षा में योगदान

भगिनी निवेदिता ने भारत में महिलाओं की स्थिति देखकर गहरा दुःख प्रकट किया।
उन्होंने देखा कि शिक्षा के अभाव में महिलाएँ सामाजिक जीवन से वंचित हैं।
उन्होंने संकल्प लिया कि भारतीय महिलाओं को आत्मनिर्भर और शिक्षित बनाना ही उनकी सेवा का मार्ग होगा।

1898 में उन्होंने बेलगाछिया (कोलकाता) में महिला शिक्षा विद्यालय की स्थापना की।
यह स्कूल गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियों के लिए था।
वे स्वयं छात्रों को पढ़ातीं, घर-घर जाकर बालिकाओं को स्कूल आने के लिए प्रेरित करतीं।
उन्होंने कहा था —

“स्त्री को शिक्षित करना, राष्ट्र को शिक्षित करना है।”

उनका यह विद्यालय आगे चलकर “निवेदिता गर्ल्स’ स्कूल” के रूप में प्रसिद्ध हुआ और भारतीय महिला शिक्षा आंदोलन की आधारशिला बन गया।


भारतीय स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चेतना में भूमिका

भगिनी निवेदिता केवल शिक्षिका नहीं थीं, वे एक क्रांतिकारी विचारक भी थीं।
उन्होंने भारत के युवाओं में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए अनेक व्याख्यान दिए।
वे बाल गंगाधर तिलक, अरबिंदो घोष, सिस्टर निवेदिता के मित्र नागेंद्रनाथ बोस और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के संपर्क में रहीं।

उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों का विरोध किया और भारतीय स्वराज की मांग का समर्थन किया।
जब बंगाल विभाजन (1905) हुआ, तो वे स्वदेशी आंदोलन की अग्रणी बनीं।
उन्होंने कहा —

“भारत को जगाना है तो पहले उसकी आत्मा को जगाइए। स्वदेशी ही भारत की आत्मा का पुनर्जन्म है।”

उन्होंने कला, साहित्य और विज्ञान में भी भारतीयों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु की उन्होंने हर प्रकार से सहायता की।
उनके अनुसंधानों के लिए आर्थिक और बौद्धिक सहयोग दिया।
वास्तव में, निवेदिता भारत के वैज्ञानिक पुनर्जागरण की भी प्रेरक थीं।


भारतीय कला और संस्कृति के प्रति समर्पण

भगिनी निवेदिता का विश्वास था कि भारत की आत्मा उसकी कला और संस्कृति में बसती है।
उन्होंने अवनीन्द्रनाथ टैगोर और नंदलाल बोस जैसे कलाकारों को भारतीय परंपरा में कला के पुनरुद्धार के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने उन्हें पश्चिमी प्रभाव से मुक्त होकर भारत की जड़ों से जुड़ने का संदेश दिया।

उनका कथन था —

“भारतीय कला केवल सौंदर्य नहीं, यह आत्मा का प्रकाश है।”

उनके प्रयासों से भारतीय कला पुनर्जागरण आंदोलन (Indian Art Renaissance) को बल मिला।


साहित्यिक योगदान

भगिनी निवेदिता एक प्रतिभाशाली लेखिका भी थीं।
उन्होंने अंग्रेज़ी में अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनसे भारत की संस्कृति और दर्शन को विश्व के सामने प्रस्तुत किया।
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं —

The Web of Indian Life (1904)

The Master As I Saw Him (1910) — स्वामी विवेकानंद पर आधारित

Kali the Mother (1900)

Footfalls of the Indian History

इन पुस्तकों में उन्होंने भारत की आध्यात्मिकता, नारी शक्ति, संस्कृति और इतिहास की गहराई को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया।


सेवा और त्याग का जीवन

भगिनी निवेदिता ने केवल शिक्षा और राष्ट्र सेवा तक अपने कार्य को सीमित नहीं रखा।
जब 1899 में प्लेग महामारी ने कोलकाता को घेरा, तब वे निडर होकर सड़कों पर उतरीं।
वे बीमारों की सेवा करतीं, बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचातीं और हर गरीब की मदद करतीं।
उन्होंने कहा था —

“सेवा ही सबसे बड़ी उपासना है।”

वे दिन-रात समाज के बीच रहीं और अपनी सेहत की परवाह नहीं की।
लगातार परिश्रम और अस्वस्थता ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया, परंतु उन्होंने काम बंद नहीं किया।


निधन और अमरता

भगिनी निवेदिता का निधन 13 अक्टूबर 1911 को दार्जिलिंग में हुआ।
उस समय वे मात्र 43 वर्ष की थीं।
उनका अंतिम संस्कार दार्जिलिंग के “खर्चो मठ” के निकट हुआ।
उनकी समाधि पर लिखा गया —

“Here reposes Sister Nivedita, who gave her all to India.”
(यहाँ भगिनी निवेदिता विश्राम कर रही हैं, जिन्होंने अपना सब कुछ भारत को अर्पित कर दिया।)


विरासत और प्रेरणा

भगिनी निवेदिता की विरासत आज भी जीवंत है।
उन्होंने भारत को न केवल शिक्षा और सेवा का मार्ग दिखाया, बल्कि यह भी सिखाया कि सच्चा देशप्रेम सीमाओं से परे होता है।
वह विदेशी होते हुए भी भारत की सच्ची बेटी बनीं।

उनकी शिक्षाएँ आज भी महिला सशक्तिकरण, स्वदेशी भावना और मानवीय सेवा के आदर्श हैं।
स्वामी विवेकानंद के सपनों के भारत को साकार करने में उनका योगदान अतुलनीय है।


निष्कर्ष

भगिनी निवेदिता का जीवन इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक विचार है — और उस विचार से जिसने प्रेम किया, वही सच्चा भारतीय है।
उन्होंने कहा था —

“भारत ने मुझे जन्म नहीं दिया, पर उसने मुझे नया जीवन दिया।”

भगिनी निवेदिता ने अपने कर्मों से दिखा दिया कि सेवा, त्याग और प्रेम ही सच्चे धर्म हैं।
वह एक महिला थीं, पर उनके भीतर एक राष्ट्र का हृदय धड़कता था।
उनकी स्मृति आज भी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करती है जो भारत की सेवा का संकल्प लेता है।