राहुल गांधी कैसे नेता हैं ? जब तक चुनाव आयोग ने चुनाव की घोषणा नहीं की , राहुल गांधी बिहार में दर दर भटक रहे थे , तेजस्वी के साथ वोट चोरी वोट चोरी करते शहर शहर घूम रहे थे । जब कार्यक्रम की घोषणा होने वाली थी तब तेजस्वी के साथ बैठकर रणनीति बनाने के लिए की बजाय 15 दिनों के लिए चार देशों की विदेश यात्रा पर निकल लिए । वापस लौटने के बाद भी बिहार नहीं गए । तेजस्वी दिल्ली आए तो तेजस्वी को मिलने का समय नहीं दिया । बिहार जाने की बजाय चंडीगढ़ चले गए । चंडीगढ़ से शिमला निकल गए । शिमला से दिल्ली लौटे और आज यूपी के फतहपुर जाएंगे और वहीं से जुबिन गर्ग के घरवालों से मिलने असम चले जाएंगे ।
बिहार में आज पहले चरण के लिए नामांकन का आखिरी दिन है । कांग्रेस और राजद के बीच सीटों का बंटवारा अब तक नहीं हुआ । सीधा मतलब भाड़ में जाए चुनाव और गड्ढे में गिरे बिहार ? अपनी मस्ती में कोई खलल नहीं होनी चाहिए । एटम बम का तो कोई असर हुआ नहीं , हाइड्रोजन बम मिला नहीं , नाइट्रोजन बम और बम्बर्स पित्रोदा ने दिए नहीं । चुनाव आयोग की पीसी होते ही वोट चोरी नारा मटियामेट हो गया । देखा इंडी महागठबंधन का क्या हाल है ? किसी को पता ही नहीं कि सीट तालमेल कौन करेगा ? कब करेगा ? पहले चरण की वोटिंग के लिए केवल 20 दिन ही बाकी बचे हैं ।
दूसरी तरफ एनडीए को देखिए ? सीट बंटवारा हो चुका है , नामांकन पूरे हो गए । परसों दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता बिहार में तीन रेलियां कर आईं । कल बटोगे तो कटोगे का नारा लेकर योगी आदित्यनाथ ने बिहार में दो जनसभाएं की । अभी 18 जनसभाएं करेंगे । कल ही नीतीश कुमार ने भी दो रेलियां कर डाली । अमित शाह दो दिनों के लिए बिहार में हैं । उधर राहुल गाँधी ने अभी तक भी तेजस्वी को गठबंधन का चेहरा नहीं माना , जबकि एनडीए छह महीने पहले ही नीतीश कुमार को भावी मुख्यमंत्री घोषित कर चुके हैं । तो इंडी में यह क्या चल रहा है ?
लगता है कांग्रेस की नजर 13 अक्टूबर के न्यायालय निर्णय पर लगी थी । राउज एवेन्यू कोर्ट ने लालू , राबड़ी और तेजस्वी को भ्रष्टाचार के मामलों में धारा 120 बी और धारा 420 सहित 10 धाराओं में दोषी करार दिया है । तो क्या एक आरोपी को सीएम पद पर नहीं देखना चाहते राहुल जो बिहार तो टाटा बाय बाय कह दिया ? क्या कांग्रेस बैकफुट पर चली गई है । वैसे देश जानता है लालू खानदान ही क्या , सोनिया और राहुल भी तो जमानत पर ही चल रहे हैं ? जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद का ख्वाब पाले हुए हैं तो तेजस्वी ने मुख्यमंत्री का ख्वाब देख लिया तो गिला कैसा ? एक ही डाल के दो फूल हैं दोनों लड़के ?
(आभूषणों से ज़्यादा मन का सौंदर्य जरूरी, मन की गरीबी है सबसे बड़ी दरिद्रता।)
धनतेरस का अर्थ केवल ‘धन’ नहीं बल्कि ‘ध्यान’ भी है — ध्यान उस पर जो हमारे जीवन को सार्थक बनाता है। यह त्योहार हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि समृद्धि का असली अर्थ क्या है। अगर घर में प्रेम है, परिवार में एकता है, मन में शांति है, और समाज में करुणा है—तो यही सबसे बड़ा धन है। इसलिए इस धनतेरस पर केवल चाँदी की चमक नहीं, अपने मन की उजास बढ़ाइए। अपने भीतर के अंधकार को पहचानिए और प्रेम, संयम और सेवा का दीप जलाइए। यही होगी असली पूजा—जहाँ लक्ष्मी केवल तिजोरी में नहीं, व्यवहार में भी बसती है।
– डॉ. सत्यवान सौरभ
धनतेरस का नाम लेते ही आंखों के सामने दीपों की उजास, सोने-चांदी की झिलमिलाहट, बाज़ारों का रौनकभरा शोर और पूजा की तैयारियों में जुटे घर-घर के दृश्य उभर आते हैं। यह दिन न केवल खरीदारी का त्योहार है, बल्कि भारतीय संस्कृति के गहरे दर्शन का प्रतीक भी है। यह वह दिन है जब लोग मानते हैं कि लक्ष्मी माता घर आएंगी, समृद्धि का आशीर्वाद देंगी, और दुर्भाग्य के अंधकार को मिटा देंगी। परंतु अगर हम इस पर्व के पीछे के दर्शन को गहराई से देखें, तो पाएंगे कि धनतेरस का अर्थ केवल सोना-चांदी खरीदना नहीं, बल्कि ‘धन’ की सही परिभाषा को समझना है।
‘धन’ शब्द संस्कृत के ‘धना’ से बना है, जिसका अर्थ केवल संपत्ति या पैसा नहीं बल्कि समृद्धि, सुख और संतोष का संगम है। प्राचीन ग्रंथों में धनतेरस को ‘धनत्रयोदशी’ कहा गया है — अर्थात धन और स्वास्थ्य दोनों की कामना का दिन। इसी दिन समुद्र मंथन से धनवंतरि देवता अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, जिन्होंने मानवता को स्वास्थ्य का वरदान दिया। यही कारण है कि इस दिन को आयुर्वेद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। जब दुनिया धन को केवल भौतिक संपत्ति के रूप में देखती है, तब भारतीय दर्शन इसे शरीर, मन और आत्मा की समृद्धि के रूप में देखता है।
आज के समय में धनतेरस का रूप काफी बदल गया है। पहले जहां यह दिन दीप जलाने, घर साफ़ करने और देवी-देवताओं की पूजा का होता था, अब यह दिन शॉपिंग मॉल और ऑनलाइन सेल का प्रतीक बन गया है। धनतेरस आते ही लोग सोना, चांदी, कार, बाइक, फ्रिज, टीवी, मोबाइल—सब कुछ खरीदने की होड़ में लग जाते हैं। लेकिन क्या यही असली ‘धन’ है? क्या केवल महंगी वस्तुएं खरीदकर हम सच में समृद्ध हो जाते हैं? शायद नहीं। असली समृद्धि तो उस मन में है जो संतोष जानता है, उस घर में है जहाँ प्रेम की दीवारें मजबूत हैं, और उस समाज में है जहाँ सभी के पास रोटी, कपड़ा और सम्मान हो।
धनतेरस हमें यह भी सिखाता है कि धन का उपयोग कैसा हो। जब धन भगवान धनवंतरि से जुड़ा हुआ है, तो इसका अर्थ यह भी है कि धन स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा के लिए होना चाहिए, न कि दिखावे और व्यर्थ विलासिता के लिए। लेकिन आज की हकीकत यह है कि लोग धनतेरस पर नई चीज़ें खरीदने के लिए कर्ज़ तक ले लेते हैं। त्योहार खुशियों का होना चाहिए, पर वह तनाव और तुलना का माध्यम बन जाता है। सोशल मीडिया पर कौन कितना खरीद रहा है, किसने कौन-सी गाड़ी ली—यह तुलना हमें भीतर से खोखला कर देती है। असली पूजा तो तब है जब हम अपने जीवन में संतुलन और संयम को जगह दें।
एक समय था जब धनतेरस के अवसर पर लोग मिट्टी के दीप, तांबे या पीतल के बर्तन खरीदते थे। यह परंपरा केवल प्रतीकात्मक नहीं थी, बल्कि वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी। मिट्टी के दीप अंधकार मिटाने का प्रतीक हैं, और धातु के बर्तन स्वास्थ्य व सकारात्मक ऊर्जा का। लेकिन अब इन बर्तनों की जगह चमकदार चाइनीज़ लाइट्स और प्लास्टिक के सजावटी सामान ने ले ली है। पहले जहां घरों में ‘शुभ-लाभ’ लिखकर दीवारें सजी होती थीं, अब ‘डिस्काउंट’ और ‘कैशबैक’ के बोर्ड झिलमिला रहे हैं। यह बदलाव केवल बाहरी नहीं, बल्कि हमारे भीतर के मूल्यबोध में भी आया है।
धनतेरस का एक और गहरा संदेश है—‘धन’ और ‘धर्म’ के संतुलन का। यदि धन अधर्म के मार्ग से अर्जित किया गया है, तो वह कभी सुख नहीं दे सकता। महाभारत में कहा गया है—“धनं धर्मेण सञ्चयेत्” यानी धन को धर्म के मार्ग से अर्जित करो। आज जब समाज में भ्रष्टाचार, लालच और अनैतिक कमाई बढ़ रही है, तब धनतेरस हमें याद दिलाता है कि असली पूजा वह नहीं जो सोने के दीपक से हो, बल्कि वह है जो ईमानदारी और परिश्रम से कमाए धन से की जाए। इस दिन जब हम दीप जलाते हैं, तो वह केवल बाहर का अंधकार नहीं मिटाता, बल्कि भीतर के लालच, ईर्ष्या और मोह के अंधकार को भी दूर करने का संदेश देता है।
इस पर्व का एक आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक पक्ष भी है। कार्तिक मास की त्रयोदशी के दिन मौसम बदलता है, सर्दी की शुरुआत होती है, और शरीर में रोगों की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे समय में भगवान धनवंतरि की पूजा करना इस बात का प्रतीक है कि हमें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। धनतेरस का अर्थ केवल धन प्राप्ति नहीं, बल्कि दीर्घायु, स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन की प्राप्ति भी है। जब शरीर स्वस्थ होगा, तभी जीवन में वास्तविक सुख और समृद्धि होगी।
अगर हम अपने पुरखों की जीवनशैली देखें, तो वे त्योहारों को केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं मानते थे, बल्कि सामाजिक समरसता और पर्यावरण संतुलन का अवसर भी समझते थे। धनतेरस के दिन घरों की सफाई का चलन केवल देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए नहीं, बल्कि स्वच्छता के प्रतीक के रूप में भी था। दीप जलाना केवल अंधकार हटाने के लिए नहीं, बल्कि प्रदूषण कम करने और वातावरण को पवित्र करने का एक उपाय भी था। लेकिन आज सफाई की जगह सजावट ने ले ली है, और पवित्रता की जगह दिखावे ने।
धनतेरस समाज में समानता का भी प्रतीक रहा है। पुराने समय में अमीर-गरीब सभी इस दिन अपने घरों में दीप जलाते थे। किसी के पास सोना-चांदी न हो तो वह मिट्टी का दीपक जलाकर भी अपनी श्रद्धा प्रकट करता था। आज यह भाव कम होता जा रहा है। त्योहार जो कभी सबको जोड़ता था, अब वर्गों में बाँट रहा है। मॉलों की चकाचौंध में झुग्गियों की अंधेरी रातें दब जाती हैं। यह सोचने की बात है कि अगर लक्ष्मी सच्चे मन से हर घर में आती हैं, तो इतने लोग भूखे क्यों हैं? इतने किसान कर्ज़ में क्यों मर रहे हैं? क्या हमने लक्ष्मी को केवल अमीरों की देवी बना दिया है?
धनतेरस का वास्तविक संदेश यही है कि हमें धन का सही उपयोग करना सीखना चाहिए। यह दिन हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हमारा धन कितने लोगों के जीवन में रोशनी लाता है। अगर हम अपने धन से किसी गरीब की मदद करें, किसी बीमार के इलाज में सहयोग दें, किसी जरूरतमंद बच्चे की पढ़ाई में योगदान दें—तो वही असली धनतेरस होगी। लक्ष्मी तभी स्थायी होती हैं जब उनका उपयोग दूसरों की भलाई में होता है। वरना वह केवल कुछ समय की झिलमिलाहट बनकर रह जाती हैं।
आज के युग में जब हम डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शॉपिंग और कृत्रिम रोशनी के बीच धनतेरस मना रहे हैं, तब यह और भी ज़रूरी है कि हम इस पर्व की आत्मा को पहचानें। यह पर्व हमें अपने घर के साथ-साथ अपने मन का भी ‘क्लीनिंग डे’ बनाने का अवसर देता है। अपने भीतर के लोभ, ईर्ष्या, स्वार्थ और दिखावे की धूल झाड़कर अगर हम मन में करुणा, ईमानदारी और प्रेम के दीप जला सकें, तो वही सच्चा धनतेरस होगा।
धनतेरस केवल एक दिन नहीं, एक दृष्टिकोण है—जीवन को संतुलित, स्वास्थ्यपूर्ण और अर्थपूर्ण बनाने का दृष्टिकोण। यह हमें सिखाता है कि धन का मूल्य उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि उसके प्रयोग में है। अगर हम धन को साधन बनाएँ, साध्य नहीं, तो वह जीवन में सौंदर्य और संतोष दोनों लाता है। लेकिन अगर वही धन हमें दूसरों से श्रेष्ठ दिखने की दौड़ में ले जाए, तो वह वरदान नहीं, अभिशाप बन जाता है।
आज के समय में शायद सबसे बड़ा ‘धन’ यह है कि हम अपनी मानसिक शांति को बचा पाएँ। परिवार के साथ बैठकर मुस्कुरा सकें, कुछ समय अपनों को दे सकें, बुजुर्गों के चरण छूकर आशीर्वाद ले सकें—यह भी धनतेरस का ही भाव है। क्योंकि जो घर प्रेम और सम्मान से भरा हो, वहाँ लक्ष्मी अपने आप आ जाती हैं।
त्योहारों की असली चमक सोने या चांदी की नहीं होती, वह मन की निर्मलता में होती है। दीपों की रोशनी बाहर तभी फैलेगी जब भीतर के दीप प्रज्वलित हों। इसलिए इस धनतेरस पर अगर आप कुछ खरीदना ही चाहें, तो अपने लिए संयम, करुणा और संतोष खरीदिए। यह वे अमूल्य वस्तुएं हैं जो कभी पुरानी नहीं पड़तीं, कभी चोरी नहीं होतीं, और जीवनभर समृद्धि देती हैं।
धनतेरस का यह पर्व हमें हर वर्ष यह याद दिलाता है कि समृद्धि केवल धनवान बनने में नहीं, बल्कि मनवान बनने में है। जब हम अपने कर्मों से दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाते हैं, जब हम अपनी कमाई से किसी का अंधकार मिटाते हैं—तभी सच्चे अर्थों में ‘धनतेरस’ होती है। इसलिए दीप जलाइए, पर साथ ही किसी और के जीवन में भी उम्मीद का दीप जलाइए। यही इस पर्व का सबसे सुंदर संदेश है।
– डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
दीवाली के मौके पर हर साल पटाखे छोड़कर खुशी का इजहार किया जाता है, लेकिन दीवाली पर दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की सांसों पर संकट के बादल मंडराने लगते हैं। वायु प्रदूषण बढ़ने से सांस लेना दूभर हो जाता है। सामान्य पटाखे कितनी खतरनाक और हानिकारक हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मुल्क की सबसे बड़ी अदालत को पटाखे फोड़ने का समय और तारीखें निर्धारित करने का आदेश देने पर मजबूर होना पड़ा। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली और एनसीआर में 18 से 20 अक्तूबर के बीच ग्रीन पटाखों की बिक्री केवल उन निर्धारित स्थानों से करने की अनुमति दी है, जिनकी पहचान जिलाधिकारी के माध्यम से की गई है। पटाखों को दीवाली से एक दिन पहले और दीवाली वाले दिन सुबह छह से सात बजे और रात में आठ से 10 बजे तक फोड़ने की इजाज़त है। अदालत के फैसले का व्यापक प्रचार-प्रसार करने के अलावा पुलिस प्रशासन, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों के साथ बिक्री वाले स्थलों पर निगरानी के लिए गश्ती दल का गठन करेगा। दल की जिम्मेदारी केवल क्यूआर कोड वाले उत्पाद की बिक्री सुनिश्चित कराने की है। पीठ के निर्णय के मुताबिक प्रतिबंधित उत्पादों के निर्माण या बिक्री में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उल्लंघन करने वाले उत्पादकों के लाइसेंस रद्द किए जाएंगे। ई-कॉमर्स वेबसाइटों से पटाखों की बिक्री नहीं की जाएगी। पटाखे बेचने की इजाज़त सिर्फ राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (नीरी) से पंजीकृत लाइसेंस प्राप्त विक्रेता को ही है। गैर पंजीकृत निर्माताओं के बने पटाखों को जब्त किया जाएगा। बाहर से लाए पटाखे दिल्ली व एनसीआर में नहीं बेचे जाएंगे। गश्ती दल पटाखा निर्माताओं की नियमित जांच करेंगे तथा उनके क्यूआर कोड वेबसाइटों पर अपलोड किए जाएंगे। बेरियम वाले और नीरी द्वारा अस्वीकृत पटाखें के उपयोग की अनुमति नहीं होगी। लड़ियों और सीरीज पटाखों का निर्माण और बिक्री नहीं की जाएगी। सवाल यह है कि जब पटाखों का इस्तेमाल खुशी की अभिव्यक्ति के लिए किया जाता है, तो फिर हर साल दिल्ली और एनसीआर में इनके उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की नौबत क्यों आती है? क्या सामान्य पटाखें के स्थान पर हरित पटाखों के इस्तेमाल से गंभीर वतावरण की समस्या का समाधान मुमकिन है? दरअसल, पटाखों में पोटेशियम नाइट्रेट, सल्फर, एल्युमीनियम, मैग्नीशियम और चारकोल जैसे बारूद बनाने वाले रासायनिक तत्व शामिल किए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। रंगों के लिए अन्य रासायनिक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। हरे रंग के लिए बेरियम क्लोराइड, लाल रंग के लिए स्ट्रोंटियम कार्बोनेट, नीले रंग के लिए कॉपर क्लोराइड, पीले रंग के लिए सोडियम नाइट्रेट, नारंगी रंग के लिए स्ट्रोंटियम व सोडियम का मिश्रण और चांदी जैसे सफेद रंग के लिए टाइटेनियम, जिरकोनियम और मैग्नीशियम का मिश्रण प्रयोग में लाया जाता है। पटाखे फूटने व जलने के बाद इनमें से सल्फर डाई ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, कार्बन मोनॉक्साइड जैसी हानिकारक गैसों के अलावा हेवी मेटल्स सल्फर, लेड, क्रोमियम, कोबाल्ट, मरकरी मैग्नीशियम भी निकलते हैं। ये सभी हवा में घुलकर आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ और बीमारी का कारण बनते हैं। पोटेशियम नाइट्रेट, एल्युमीनियम पावडर और सल्फर मिक्सचर के कारण पटाखों में तेज आवाज पैदा होती है। 2023 में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बेरियम वाले पटाखों को रोकने संबंधी आदेश सिर्फ दिल्ली और एनसीआर तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि हर राज्य में लागू करने के लिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में पारंपरिक पटाखों पर प्रतिबंध लगाते हुए केवल हरित पटाखों के उपयोग की अनुमति प्रदान की थी। सवाल यह भी है कि क्या ग्रीन क्रेकर्स से प्रदूषण नहीं होगा? हरित पटाखों में जिओलाइट और आयरन ऑक्साइड का इस्तेमाल किया जाता है। ये पदार्थ कम रसायन का उपयोग करने के कारण पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होते हैं। ये पटाखे पूरी तरह प्रदूषणमुक्त और हानिरहित नहीं होते, बल्कि सामान्य पटाखों की की अपेक्षा 30 प्रतिशत कम वायु प्रदूषण या पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) फैलाते हैं। पीएम हवा में पाए जाने वाले छोट-छोटे कण होते हैं, जिन्हें उनके आकार के हिसाब से पीएम-10, पीएम-2.5, पीएम-1 और अल्ट्रा-फाइन पार्टिकुलेट मैटर में विभाजित किया जाता है। ये छोटे कण शरीर में गहराई तक पहुंचकर स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। ग्रीन पटाखे सेफ वाटर एंड एयर रिलीजर, सेफ मिनीमल एल्युमीनियम और सेफ थर्माइट क्रेकर तीन प्रकार के होते हैं। पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाने को ध्यान में रखते हुए इनमें रसायन मिलाया जाता है। ये पटाखे धूल को सोखने वाली पानी की बूंदें छोड़ते हैं और कम धुआं पैदा करते हैं। दीवाली, दशहरा, शब-ए-बरात और शादी-विवाह के मौकों पर पटाखे फोड़ने का रिवाज सदियों से चला आ रहा है। ग्रीन पटाखों तक सीमित रहना आसान नहीं है। वातावरण को प्रदूषणमुक्त बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार को सौंपकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। स्वस्थ समाज का निर्माण करने के लिए हर व्यक्ति को जागरूक होने की जरूरत है, ताकि त्योहार का उल्लास बना रहे और वायु एवं घ्वनि प्रदूषण के खतरों से भी बचा जा सके।
हर साल की भांति आज भी यानि 17 अक्टूबर को हम अन्तर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस मनाने जा रहे है। इस बीच कई बार गरीब की परिभाषा बदली मगर गरीबी उन्मूलन को पूरी तरह अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। इसके विपरीत भारत ने 80 करोड़ से अधिक की अपनी आबादी को मुफ्त अनाज सहायता और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराकर अपनी सरकार का मंतव्य जाहिर कर दिया। साथ ही 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का दावा कर दिया। साल दर साल दी जा रही यह खाद्य सहायता कब तक जारी रहेगी, कोई बताने वाला नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने भी गरीबी घटने के भारत के इस दावे को स्वीकार कर लिया। विख्यात कृषि अर्थशास्त्री डॉ. गुलाटी की माने तो, जब देश में अत्यधिक गरीबी सिर्फ 5 प्रतिशत है तो 80 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन क्यों दिया जा रहा है? क्या वे अपना भोजन खरीदने में सक्षम नहीं हैं। दावों प्रतिदावों के बीच गरीबी के खिलाफ संघर्ष आज भी जारी है। विचारणीय बात तो यह है मुफ्त अनाज का यह मायाजाल कब तक जारी रहेगा और आखिर यह गरीबी कब ख़त्म होगी। पैसा फेंक तमाशा देख के इस चक्रव्यूह से आज़ादी कब मिलेगी।
संयुक्त राष्ट्र की गरीबी के खिलाफ संघर्ष की विभिन्न रिपोर्टों का गहन अधय्यन करें तो पाएंगे आज भी दुनियाभर में लोग रोटी कपड़ा और मकान के लिए जूझ रहे है। इस दिन का उद्देश्य दुनिया भर में विशेष रूप से विकासशील देशों में गरीबी और गरीबी उन्मूलन की आवश्यकता के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। संयुक्त राष्ट्र ने अन्तर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस को मनाने की पहल 22 दिसम्बर 1992 को की थी। यह लोगों के दैनिक जीवन में आने वाली समस्याओं को उजागर करने और उन्हें आवश्यक सहायता प्रदान करने का एक वैश्विक मंच है। यह दिन गरीबी के खिलाफ लड़ाई में सहयोग, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के महत्व को उजागर करता है।
दुनिया भर में गरीबी की स्थिति आज भी बेहद चिंताजनक है। विश्व बैंक के मुताबिक लगभग 700 मिलियन लोग आज भी अत्यधिक गरीबी में जीवनयापन कर रहे हैं। रिपोर्ट से साफ़ होता है, दुनिया की एक बड़ी आबादी आज भी बुनियादी आवश्यकताओं, जैसे भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा तक पहुंच नहीं पाई है। हमारे देश की बात करें तो आजादी के 78 सालों के बाद भारत में गरीब और गरीबी पर लगातार अध्ययन और खुलासा हो रहा है। भारत की गरीबी आज भी आंकड़ों के भ्रम जाल में उलझी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक पिछले 10 सालों में 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में सरकार सफल रही है। वहीं 16 करोड़ घरों में नल का पानी पहुंचाया है और गरीब परिवारों के लिए 5 करोड़ घर बनाए हैं। इसके अलावा 12 करोड़ से अधिक शौचालय उपलब्ध कराए हैं, जिन्हें इन सुविधाओं की कमी के कारण सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती थी।
विश्व बैंक ने इस वर्ष जारी रिपोर्ट में अपनी गरीबी रेखा की सीमा को संशोधित करते हुए इसे 2.15 डॉलर प्रतिदिन से बढ़ाकर 3 डॉलर प्रतिदिन कर दिया है। इस नए मानक के अनुसार, भारत में अत्यधिक गरीबी की दर में उल्लेखनीय कमी देखी गई है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 2011-12 में 27.1 प्रतिशत की अत्यधिक गरीबी दर 2022-23 में घटकर मात्र 5.3 प्रतिशत रह गई है। इसका अर्थ है कि अत्यधिक गरीबी में रहने वाली जनसंख्या 344.47 मिलियन से घटकर 75.24 मिलियन हो गई है।
भारत सरकार ने हर प्रकार की गरीबी को कम करने के लक्ष्य के साथ लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में उल्लेखनीय प्रगति की है। पोषण अभियान और एनीमिया मुक्त भारत जैसी उल्लेखनीय पहलों ने स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिससे वंचित रहने में काफी कमी आई है। दुनिया के सबसे बड़े खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों में से एक का संचालन करते हुए, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली 81.35 करोड़ लाभार्थियों को कवर करती है, जो ग्रामीण और शहरी आबादी को खाद्यान्न प्रदान करती है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ्त खाद्यान्न वितरण को अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ाना, सरकार की प्रतिबद्धता का उदाहरण है। मातृ स्वास्थ्य का समाधान करने वाले विभिन्न कार्यक्रम, उज्ज्वला योजना के माध्यम से स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन वितरण, सौभाग्य के माध्यम से बिजली कवरेज में सुधार, और स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसे परिवर्तनकारी अभियानों ने सामूहिक रूप से लोगों की रहने की स्थिति और समग्र कल्याण की स्थिति में सुधार किया है। इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री जन धन योजना और पीएम आवास योजना जैसे प्रमुख कार्यक्रमों ने वित्तीय समावेशन और वंचितों के लिए सुरक्षित आवास प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे बुनियादी सेवाओं तक पहुंच में आने वाली मूलभूत समस्याओं का तेजी से समाधान हो रहा है ताकि देश एक विकसित राष्ट्र यानी विकसित भारत @2047 बनने की ओर अग्रसर हो सके। सरकारी स्तर पर यदि ईमानदारी से प्रयास किये जाये और जन धन का दुरूपयोग नहीं हो तो भारत शीघ्र गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो सकता है।
एक उभरती या फिर यह कहें कि उभर चुकी गायिका का मात्र 25 वर्ष की उम्र में अचानक राजनीति में आना और आते ही चुनाव लड़ना अटपटा लग रहा है।मैथिली बेहद प्रतिभाशाली लोकगायिका हैं। वे बचपन से गा रहीं हैं अभी बहुत लम्बा कैरियर सामने है।सच कहें तो भजन और लोक गायकी में जो मुकाम शारदा सिन्हा और मालिनी अवस्थी ने हासिल किया है , मैथिली भी उसी ओर बढ़ रही हैं। अविवाहित और बच्ची सी दिखती मैथिली की आवाज का बिहार ही नहीं पूरा देश दीवाना है।पूरी दुनिया से जुड़ने की सामर्थ्यवान मैथिली एक पार्टी में सिमटकर क्या हासिल करेंगी , वे जानें।चुनाव तो जीत जाएंगी लेकिन कितना आगे बढ़ पाएंगी कहना मुश्किल है
इसे में याद आती हैं मशहूर और विश्वविख्यात पंडवानी गायिका तीजन बाई। लोकगायन में भूपेन हजारिका और नरेन्द्र सिंह नेगी ने बड़ा नाम कमाया।वैसे गायन , लोक गायन , शास्त्रीय गायन , सुगम गायन और फिल्म संगीत के क्षेत्र में असंख्य नाम हैं जिन्होंने देश विदेश में बेहद ऊंचे मकाम हासिल किए।वाद्य यंत्रों के क्षेत्र में भी कईं बड़े बड़े नाम हैं।उन सभी स्वनामधन्य महापुरुषों की बाबत सभी जानते हैं।राजनीति बड़ी छलिया है। इसने खिलाड़ियों , फिल्मों , न्याय पालिकाओं , ब्यूरोक्रेसी , नौकरी पेशाओं , संतई आदि क्षेत्रों की बहुत से प्रतिभाओं को विचलित किया है।क्या करें राजनीति में ग्लैमर ही इस कदर है।।कौन कौन रहे नाम बताने की जरूरत नहीं सब जानते हैं।कल भी थे ,आज भी हैं और कल भी रहेंगे।हमने कहा न कि राजनीति बड़ी छलिया है , अपने इशारों पर नचाती भी है , रुलाती भी है , खिलाती भी है।
राजनीति को इस्तेमाल करना आता है , खूब आता है।कोई आम आदमी हो या कलाकार , राजनीति के रंग हजार।तो क्या हुआ जो मैथिली चली गईं।जो जनता उन्हें सुनती है , फर्श से अर्श पर पहुंचाती है , उसी की सेवा का अवसर मिले तो अच्छा है।
राजनीति भी एक कशिश है साहब , जब चुनावी ढोल बजते हैं , दिल मचल ही जाता है और फिर वर्तमान राजनीति में भी जब हेमामालिनी , कंगना , जया , रेखा आदि ने दखल दी तो सभी का दिल मचल ही जाता है।ये तो फिर भी बिहार से एक छोटी उम्र की गायिका हैं।अब मैथिली ठाकुर चुनावी फेज में राजनीति में आई तो राजनीति तो उन्हें भुनाएगी ही
तो गाए जाओ , सुनाए जाओ मैथिली। बस इतना याद रखना कि बड़ी कठिन है डगर पनघट की …
मावे को देखो। कंचन काया। बुलडोजर आया। ले गया पकड़ कर। दबा दिया जमीन में। बात कुछ जमी नहीं। मावे का दाह संस्कार क्यों नहीं किया? अवसर तो देखते। मावा क्यों बना? किसके लिए बना? अवसर क्या है?
अपनी देह पर रसगुल्ला भी बहुत इतराता है। वो भी पकड़ा गया। दोनों को नकली साबित किया गया। दोनों क्या सफाई देते। रसगुल्ला स्पंज था। टूट गया। बिखर गया। उसका रस आंसुओं में ढल गया।
आजकल एक टीम वार्षिकोत्सव मना रही है। यह हर साल इसी अवसर पर आती है। यह सीजन मच्छरों और डेंगू का होता है। चुनाव भी इसी समय होते हैं। गुलाबी ठंड शुरू हो जाती है। सब अपने दीप में उलझे रहते हैं। जलाएं तो कैसे जलाएं? घी से जलाएं? या तेल से जलाएं?
मावे ने तय किया, वह अब नहीं बनेगा। रसगुल्ला भी हताश था। दोनों ने हड़ताल कर दी। हमारे भी बुनियादी हक हैं। हम खाने के लिए बने हैं। जमीन में दबने के लिए नहीं। अपने देश में अजूबे की कमी नहीं। टीम फट से सूंघ लेती है, कहां मावा नकली है? कहां रसगुल्ले घटिया? कायदे में, दिवाली आते ही मावा और रसगुल्ले सही जगह पहुंचा देना चाहिए। साहब खा कर देख लें। कोई कमी हो तो बता दें। व्यापारी है। दुकान चलानी है। वह सब इंतजाम करा देगा।
कुछ विभाग पारलौकिक हैं। बिजली कनेक्शन दिवाली पर कटते हैं। अवैध निर्माण दिवाली पर ध्वस्त होते हैं। दवाइयों के नमूने लेने का यह उचित अवसर है। खायेंगे। बीमार पड़ेंगे। दवाई की जरूरत पड़ेगी। जब रोशनी चाहोगे। बिजली कटेगी। तभी दीपक जलेंगे। दिवाली होगी। इसी बात के पैसे हैं।
अमावस्या इनकी डायरी में नोट होती है। हर अमावस्या पर ये नहीं निकलते। त्यौहार आए नहीं..इनका मिशन शुरू। ये पटा कर खाते हैं। यानी पटाखे पकड़ते हैं। ये मियां, हरफन मौला हैं। इनकी उंगलियां मावे में धंसी हुई हैं। अपने हलके के ये होनहार हैं। मावे या रसगुल्ले की क्या औकात..जो इनसे भिड़ जाए। दुनिया कमजोर को दबाती है। आपकी सेहत न बिगड़े, इसका हिसाब रखती है।
हर वर्ष अक्टूबर–नवंबर के महीनों में पंजाब और हरियाणा के खेतों से उठने वाला धुआँ दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत की साँसें रोक देता है। पराली जलाना किसानों की विवशता और नीतिनिर्माताओं की विफलता दोनों का परिणाम है। जब तक किसान के हित, कृषि की आवश्यकताएँ और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़कर देखा नहीं जाएगा, तब तक न तो प्रदूषण घटेगा और न ही ग्रामीण भारत को स्थायी आजीविका का मार्ग मिलेगा।
— डॉ प्रियंका सौरभ
हर वर्ष जब धान की कटाई का मौसम आता है, तब पंजाब और हरियाणा के खेतों से उठने वाला धुआँ आसमान को धुंध से भर देता है। यह केवल खेतों की आग नहीं होती, बल्कि भारत की कृषि नीति, आर्थिक असमानता और पर्यावरणीय असंतुलन की जलती हुई तस्वीर होती है। दिल्ली तथा उसके आस-पास के क्षेत्र इस धुएँ से ढक जाते हैं और वायु गुणवत्ता अत्यंत गंभीर स्तर तक पहुँच जाती है।
कानूनी रूप से पराली जलाना प्रतिबंधित है, फिर भी किसान इसे हर साल दोहराते हैं क्योंकि इसके पीछे अनेक सामाजिक और आर्थिक कारण जुड़े हैं।
पराली जलाने का मूल कारण खेतों में बचा हुआ धान का ठूँठ होता है। जब धान की फसल कट जाती है, तब खेत में रह गए अवशेष को हटाने के लिए किसानों के पास न समय होता है न साधन। पंजाब और हरियाणा की कृषि व्यवस्था मुख्य रूप से धान और गेहूँ पर आधारित है। सन् 1960 के दशक की हरित क्रांति ने इन राज्यों को देश का अन्न भंडार तो बना दिया, परंतु कृषि को एकरूपी और जल–प्रधान भी बना दिया। भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए सन् 2009 में पंजाब में “उप–जल संरक्षण अधिनियम” लागू किया गया, जिसके अंतर्गत धान की रोपाई जून के अंत तक करने का निर्देश दिया गया ताकि मानसूनी वर्षा का लाभ लिया जा सके।
परिणामस्वरूप धान कटाई और गेहूँ की बुवाई के बीच केवल दस से बीस दिन का अंतर रह गया। इतने कम समय में किसान पराली को एकत्रित या सड़ाकर खेत तैयार नहीं कर सकते, इसलिए वे सबसे तेज़ और सस्ता उपाय—जलाना—चुन लेते हैं।
दूसरा बड़ा कारण आर्थिक है। पराली हटाने या निपटाने के लिए जो मशीनें चाहिए—जैसे सुपर स्ट्रॉ प्रबंधन प्रणाली, हैप्पी सीडर, बेलर या रोटावेटर—वे अत्यंत महँगी हैं। छोटे और सीमांत किसान जिनकी जोत तीन हेक्टेयर से भी कम है, वे इन मशीनों को खरीदने या किराए पर लेने में असमर्थ हैं। उदाहरण के लिए, हैप्पी सीडर का किराया लगभग दो से तीन हज़ार रुपये प्रति एकड़ पड़ता है, जबकि पराली जलाने में केवल माचिस और थोड़े डीज़ल का खर्च आता है। यही व्यावहारिकता इस समस्या को गहराई तक जकड़े हुए है।
तीसरा कारण पराली का कम उपयोग मूल्य है। पंजाब और हरियाणा में बोई जाने वाली अधिकतर धान की किस्में साधारण होती हैं, जिनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। ऐसी पराली पशु चारे के रूप में प्रयोग योग्य नहीं होती और न ही इससे जैव ईंधन या खाद आसानी से बनाई जा सकती है। पूर्वी भारत के राज्यों में धान की पराली पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग में आती है, परंतु पंजाब–हरियाणा में यह उपयोग सीमित है। इसीलिए यहाँ पराली किसानों के लिए किसी आर्थिक लाभ का साधन नहीं बन पाती।
चौथा कारण है श्रम की कमी और जोत का विखंडन। प्रवासी मजदूरों की संख्या घट रही है, और छोटे खेतों में मशीनरी लगाने की क्षमता नहीं है। समय की कमी और श्रमिकों के अभाव में किसान अगली फसल बोने की जल्दी में पराली को जला देते हैं।
सामाजिक दृष्टि से भी पराली जलाना वर्षों से एक स्वीकृत प्रक्रिया बन चुकी है। किसानों को यह लगता है कि खेत की सफाई का यही सबसे आसान और पारंपरिक तरीका है। कानूनों और जुर्मानों के बावजूद यह प्रथा इसलिए जारी है क्योंकि प्रवर्तन ढीला है और राजनीतिक दबावों के कारण प्रशासन कठोर कार्रवाई नहीं कर पाता। वर्ष 2023 में पंजाब में लगभग साठ हज़ार पराली जलाने की घटनाएँ दर्ज की गईं, जबकि जुर्माना और निगरानी दोनों व्यवस्था में थे।
अब प्रश्न यह है कि इस समस्या का स्थायी समाधान क्या हो सकता है?
स्पष्ट है कि केवल प्रतिबंध या दंड इस समस्या को समाप्त नहीं कर सकते। आवश्यक है कि ऐसी रणनीति अपनाई जाए जो किसान की आजीविका और पर्यावरण संरक्षण दोनों को साथ लेकर चले।
पहला समाधान है फसल विविधीकरण। पंजाब और हरियाणा की भूमि लगातार धान–गेहूँ चक्र से थक चुकी है। जल स्तर भी नीचे जा रहा है। अतः मक्का, दलहन, तिलहन और बागवानी फसलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इन फसलों के लिए यदि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य, बीमा सुरक्षा और निश्चित खरीद सुनिश्चित करे तो किसान धीरे-धीरे धान पर निर्भरता कम कर सकते हैं। हरियाणा की “भावांतर भरपाई योजना” इस दिशा में एक अच्छा उदाहरण है, जिसमें किसानों को मूल्य अंतर की भरपाई दी जाती है।
दूसरा समाधान है यंत्रीकरण और साझा संसाधन। किसानों को मशीनें साझा उपयोग के लिए उपलब्ध कराई जाएँ। पंचायत या सहकारी समितियों के स्तर पर “कस्टम हायरिंग केंद्र” स्थापित हों, जहाँ से किसान कम किराए पर हैप्पी सीडर या सुपर स्ट्रॉ प्रबंधन प्रणाली जैसी मशीनें ले सकें। केंद्र सरकार की “फसल अवशेष प्रबंधन योजना” के अंतर्गत पंजाब और हरियाणा में एक लाख से अधिक मशीनें बाँटी गई हैं, पर इनकी पहुँच सभी किसानों तक नहीं हो पाई है। यदि हर गाँव में सामुदायिक यांत्रिक केंद्र बने, तो किसान पराली जलाने से बचेंगे।
तीसरा उपाय है पराली का औद्योगिक उपयोग। पराली को कचरा न मानकर एक संसाधन के रूप में देखा जाए। इससे जैव ऊर्जा, एथेनॉल, कागज़, पैकेजिंग और निर्माण सामग्री तैयार की जा सकती है। उदाहरण के लिए, भारतीय तेल निगम की पानीपत जैव रिफाइनरी प्रतिवर्ष लगभग दो लाख टन पराली से एथेनॉल बनाती है। यदि इस प्रकार की परियोजनाएँ हर जिले में स्थापित हों तो पराली किसानों के लिए आय का स्रोत बनेगी और जलाने की आवश्यकता कम होगी। सरकार को परिवहन सहायता, खरीद अनुबंध और स्थायी बाज़ार उपलब्ध कराने की नीति बनानी चाहिए।
चौथा कदम होना चाहिए कृषि–पर्यावरणीय समय निर्धारण। धान की छोटी अवधि वाली किस्में जैसे पी.आर.–126 या डी.आर.आर. धान–44 अपनाने से किसानों को फसल कटाई और बुवाई के बीच कुछ अतिरिक्त दिन मिल सकते हैं। इस समय का उपयोग पराली प्रबंधन में किया जा सकता है।
इसके साथ–साथ परिशुद्ध कृषि यानी सटीक तकनीकी साधनों का प्रयोग, जल–सिंचाई प्रणाली में सुधार और जैविक खाद उपयोग से भी पर्यावरणीय लाभ मिलेगा।
पाँचवाँ, सामुदायिक प्रोत्साहन और जनजागरूकता। पराली न जलाने वाले किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए, गाँव स्तर पर प्रतियोगिता आयोजित हो और “शून्य दहन ग्राम” घोषित किए जाएँ। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में “पुसा डीकंपोजर” नामक जैविक घोल के प्रयोग से पराली को खेत में ही खाद में बदला जा रहा है। यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए तो पराली जलाने की आवश्यकता नहीं बचेगी।
छठा, प्रशासनिक तालमेल और नीति–समन्वय। केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच सामंजस्य होना चाहिए ताकि कृषि, पर्यावरण और ऊर्जा विभाग एक साझा योजना के अंतर्गत काम करें। पराली प्रबंधन को ग्रामीण रोजगार योजना, जैव ऊर्जा मिशन और जलवायु परिवर्तन कार्यक्रमों से जोड़ा जा सकता है। उदाहरण के लिए, मनरेगा के अंतर्गत पराली एकत्रीकरण या जैव खाद इकाइयों में कार्य को रोजगार से जोड़ा जा सकता है।
सातवाँ, शहरी–ग्रामीण सहभागिता भी इस दिशा में उपयोगी होगी। दिल्ली जैसे महानगर जहाँ प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव होता है, उन्हें अपने सामाजिक उत्तरदायित्व निधि के माध्यम से पंजाब–हरियाणा के किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए। इससे प्रदूषण के स्रोत और पीड़ित क्षेत्र के बीच साझा जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी।
इसके साथ-साथ तकनीकी निगरानी प्रणाली को भी सशक्त बनाना चाहिए। उपग्रह आधारित आँकड़ों से पराली जलाने की घटनाओं की त्वरित जानकारी मिल सकती है, जिससे स्थानीय प्रशासन समय रहते हस्तक्षेप कर सके। परंतु यह हस्तक्षेप केवल दंडात्मक न होकर सहयोगात्मक होना चाहिए।
इन सभी उपायों का उद्देश्य यह है कि किसान को दोषी नहीं बल्कि भागीदार बनाया जाए। किसान पराली इसलिए जलाते हैं क्योंकि उनके पास व्यावहारिक विकल्प नहीं हैं। जब उन्हें ऐसे विकल्प मिलेंगे जो सस्ते, लाभकारी और पर्यावरण के अनुकूल हों, तो वे स्वयं इस समस्या के समाधान का हिस्सा बनेंगे।
अंततः यह समझना होगा कि पराली जलाना केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि सामाजिक–आर्थिक असंतुलन का परिणाम है। इसे रोकने के लिए किसानों के कल्याण, नीति सुधार और तकनीकी समर्थन का समन्वय आवश्यक है। यदि पराली को ऊर्जा, उद्योग और जैविक खाद के रूप में उपयोग में लाया जाए, तो यह प्रदूषण का कारण नहीं बल्कि विकास का साधन बन सकती है।
पराली जलाने की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंधों और दंड से नहीं, बल्कि संवेदनशील नीति, किसानों की सहभागिता और तकनीकी नवाचार से निकलेगा। जब फसल विविधीकरण, यंत्रीकरण, पराली का औद्योगिक उपयोग और सामुदायिक प्रोत्साहन एक साथ काम करेंगे, तब ही स्वच्छ वायु और सुरक्षित कृषि दोनों संभव होंगी। यह संतुलन ही उत्तर भारत को पराली की आग से मुक्त करने और टिकाऊ कृषि विकास की दिशा में अग्रसर करने का एकमात्र मार्ग है।
जन्म 9 जनवरी, 1922 ( रायपुर, पंजाब, ब्रिटिश भारत ) – मृत्यु 9 दिसंबर, 2011 (कॉनकॉर्ड, मैसाचुसेट्स, संयुक्त राज्य अमेरिका)
खुराना उन पहले वैज्ञानिकों में से एक थे जिन्होंने प्रोटीन संश्लेषण में न्यूक्लियोटाइड्स की भूमिका को प्रदर्शित किया और आनुवंशिक कोड को समझने में मदद की। उन्होंने कृत्रिम जीन के विशिष्ट रूप से डिज़ाइन किए गए टुकड़ों और विधियों को विकसित करने में भी मदद की, जिनसे पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (पीसीआर) प्रक्रिया का आविष्कार हुआ, जो एक जैव रासायनिक तकनीक है जिसका उपयोग डीएनए के एक टुकड़े की एक या कुछ प्रतियों को प्रवर्धित करने के लिए किया जाता है।
1960 के दशक के अंत में, विस्कॉन्सिन-मैडिसन स्थित अपनी प्रयोगशाला में काम करते हुए हर गोबिंद खुराना। (फोटो साभार: विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय)
परिवार
हर गोबिंद खुराना पाँच बच्चों, एक लड़की और चार लड़कों, में सबसे छोटे थे। उनके माता-पिता हिंदू थे और रायपुर में रहते थे, जो 100 लोगों की आबादी वाला एक छोटा सा गाँव है, जो पंजाब में स्थित है, ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान को आवंटित एक क्षेत्र। यहीं खुराना का जन्म हुआ था। खुराना के पिता, गणपत राय, एक पटवाई (गाँव के कृषि कराधान क्लर्क) थे, जो ब्रिटिश भारत सरकार के लिए काम करते थे।
बहुत गरीब होते हुए भी खुराना के पिता ने अपने बच्चों को उच्चतम स्तर की शिक्षा देने का प्रयास किया। उन्होंने न केवल उन्हें पढ़ना सिखाया, बल्कि गाँव में एक कमरे का स्कूल भी स्थापित किया। परिणामस्वरूप खुराना और उनके भाई-बहन गाँव के मुट्ठी भर साक्षर लोगों में से थे। बचपन में खुराना हर सुबह जल्दी उठकर घर में खाना पकाने के लिए अंगारे की तलाश करते थे।
1952 में खुराना ने स्विस महिला एस्तेर एलिजाबेथ सिबलर से विवाह किया, जिनसे उनकी मुलाकात 1947 में प्राग की यात्रा के दौरान हुई थी। खुराना एस्तेर द्वारा अपने जीवन में लाई गई स्थिरता को बहुत महत्व देते थे, क्योंकि उन्होंने पिछले 6 साल अपने परिवार और गृह देश से दूर रहकर बिताए थे। एस्तेर ने उन्हें पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से परिचित कराया, जिसके प्रति उनमें जुनून पैदा हो गया और उनका घर चित्रों और विज्ञान, कला और दर्शन पर कई पुस्तकों से भरा था। खुराना की प्रकृति में भी गहरी रुचि थी और वे नियमित रूप से लंबी पैदल यात्रा और तैराकी के लिए जाते थे। अक्सर वे वैज्ञानिक समस्याओं पर विचार करने के लिए लंबी सैर के एकांत का उपयोग करते थे। उनके और एस्तेर के तीन बच्चे थे: जूलिया एलिजाबेथ (जन्म 1953), एमिली ऐनी (जन्म 1954; मृत्यु 1979) और डेव रॉय (जन्म 1958)।
शिक्षा
खुराना ने अपने पहले चार साल की शिक्षा एक गांव के शिक्षक से एक पेड़ के नीचे बैठकर प्राप्त की। इसके बाद खुराना ने मुल्तान (अब पश्चिमी पंजाब) के पास के शहर डीएवी हाई स्कूल में दाखिला लिया और फिर लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य और रसायन विज्ञान का अध्ययन करने के लिए आवेदन किया, जो पंजाब विश्वविद्यालय से संबद्ध था। अंततः उन्होंने रसायन विज्ञान का अध्ययन करने का निर्णय लिया और 1943 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। दो साल बाद उन्होंने उसी संस्थान से मास्टर डिग्री पूरी की।
1945 में खुराना को इंग्लैंड में डॉक्टरेट करने के लिए भारत सरकार की फेलोशिप मिली, जिसका उपयोग उन्होंने कीटनाशकों और कवकनाशकों का अध्ययन करने के लिए करने का इरादा किया। हालांकि, वे लिवरपूल विश्वविद्यालय में रोजर जेएस बीयर की देखरेख में मेलेनिन के रसायन विज्ञान का अध्ययन करने लगे।
आजीविका
खुराना शुरू से ही विषयों की कठोर सीमाओं में नहीं बंधे रहे और उनका काम उन्हें रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और भौतिकी के क्षेत्रों में ले जाना था। यह उनकी पीढ़ी के वैज्ञानिकों के लिए असामान्य था। जब भी वे कोई नया प्रोजेक्ट शुरू करते, खुराना दूसरी प्रयोगशालाओं में समय निकालते ताकि वे उस विचार को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक तकनीकों में निपुणता हासिल कर सकें।
अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई पूरी करते ही, जर्मन वैज्ञानिक साहित्य के महत्व को देखते हुए, खुराना ने फैसला किया कि उन्हें जर्मन भाषी देश में पोस्ट-डॉक्टरल शोध करने से लाभ होगा। इसके लिए उन्होंने 1948 और 1949 के बीच ज्यूरिख में स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (ETH) की ऑर्गेनिक केमिस्ट्री प्रयोगशाला में 11 महीने बिताए, जहाँ उन्होंने व्लादिमीर प्रेलॉग के साथ एल्कलॉइड रसायन विज्ञान पर शोध किया। खुराना प्रेलॉग द्वारा इस दौरान दिए गए दर्शन और कार्य नैतिकता को बहुत महत्व देते थे।
दुर्भाग्य से खुराना को अपनी स्विट्जरलैंड यात्रा बीच में ही छोड़नी पड़ी क्योंकि उनके पास कोई वजीफा नहीं था और उनकी बचत खत्म हो रही थी। इसके बाद, खुराना अपनी भारत सरकार की छात्रवृत्ति की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पंजाब लौट आए। हालाँकि, ब्रिटिश भारत के हालिया विभाजन के कारण उत्पन्न उथल-पुथल के कारण उन्हें नौकरी ढूँढ़ने में कठिनाई हुई।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में फ़ेलोशिप का प्रस्ताव उनके काम आया। यह प्रस्ताव उन्हें कैम्ब्रिज स्थित वैज्ञानिक जी.डब्ल्यू. केनर की मदद से मिला, जिनसे उनकी मुलाक़ात ज्यूरिख में हुई थी। 1950 में, खुराना अपने जहाज़ के किराए के लिए अपने परिवार द्वारा जमा किए गए पैसों से इंग्लैंड लौट आए। अगले दो वर्षों तक खुराना ने अलेक्जेंडर टॉड के साथ मिलकर न्यूक्लिक अम्लों की रासायनिक संरचना को परिभाषित करने का प्रयास किया। कैम्ब्रिज में यह एक रोमांचक समय था क्योंकि उस समय फ्रेड सेंगर इंसुलिन, जो कि पहला अनुक्रमित प्रोटीन था, के अनुक्रमण की प्रक्रिया में थे, और मैक्स पेरुट्ज़ और जॉन केंड्रू मायोग्लोब्युलिन और हीमोग्लोबिन का पहला एक्स-रे कर रहे थे। इस काम ने खुराना को प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों का अध्ययन शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
1952 में, खुराना को वैंकूवर में एक नई गैर-शैक्षणिक अनुसंधान प्रयोगशाला शुरू करने के लिए एक पद की पेशकश की गई, जो टॉड द्वारा ब्रिटिश कोलंबिया अनुसंधान परिषद के प्रमुख गॉर्डन एम. श्रुम को की गई सिफारिश पर आधारित थी। वैंकूवर स्थित प्रयोगशाला में सुविधाओं का अभाव होने के बावजूद, खुराना को इस नौकरी से मिली आज़ादी का पूरा फ़ायदा था जिससे उन्हें अपना शोध जारी रखने में मदद मिली। उन्होंने जल्द ही फ़ॉस्फ़ेज एस्टर और न्यूक्लिक अम्लों पर शोध से संबंधित कई परियोजनाएँ शुरू कीं। इस काम के लिए उन्हें लघु ऑलिगोन्यूक्लियोटाइडों के संश्लेषण की विधियाँ विकसित करनी पड़ीं। इन तकनीकों के उनके प्रकाशन ने जल्द ही आर्थर कोर्नबर्ग और पॉल बर्ग जैसे प्रसिद्ध जैव रसायनज्ञों का ध्यान आकर्षित किया, जो उनसे सीखने और उनके अभिकर्मकों को प्राप्त करने के लिए उनसे मिलने के लिए उत्सुक थे।
1960 में खुराना विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय के एंजाइम संस्थान चले गए, जहाँ उन्होंने आनुवंशिक कोड और ट्रांसफर आरएनए जीन के रासायनिक संश्लेषण पर काम करना शुरू किया। इस दौरान उन्होंने और उनके सहयोगियों ने यह निर्धारित किया कि न्यूक्लिक अम्लों में न्यूक्लियोटाइड द्वारा प्रोटीन संश्लेषण कैसे नियंत्रित होता है। 1970 में खुराना मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी चले गए, जहाँ उन्होंने दृष्टि के कोशिका संकेतन मार्गों को नियंत्रित करने वाले आणविक तंत्र की जाँच शुरू की। 2007 में अपनी सेवानिवृत्ति तक उन्होंने इसी विषय पर काम किया।
उपलब्धियों
1968 में खुराना को कॉर्नेल विश्वविद्यालय के मार्शल डब्ल्यू. निरेनबर्ग और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के रॉबर्ट डब्ल्यू होली के साथ फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार दिया गया। उन्हें यह पुरस्कार आनुवंशिक कोड और प्रोटीन संश्लेषण में इसके कार्य की व्याख्या के लिए दिया गया था। खुराना के कार्य ने निरेनबर्ग की इस खोज की पुष्टि की कि एक नई कोशिका की रासायनिक संरचना और कार्य इस बात से निर्धारित होते हैं कि डीएनए अणु की सर्पिल ‘सीढ़ी’ पर चार न्यूक्लियोटाइड कैसे व्यवस्थित होते हैं। उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि न्यूक्लियोटाइड कोड हमेशा तीन के समूहों में प्रसारित होता है, जिन्हें कोडॉन कहते हैं, और ये कोडॉन कोशिका को प्रोटीन का उत्पादन शुरू करने और रोकने का निर्देश देते हैं। खुराना जीन हेरफेर की संभावना को रेखांकित करने वाले पहले लोगों में से एक थे। उन्होंने यह कार्य किसी भी जीव के किसी भी व्यक्तिगत जीन का लक्षण-निर्धारण किए जाने से पहले किया था।
खुराना को सिंथेटिक डीएनए ऑलिगोन्युक्लियोराइड्स के निर्माण की तकनीक विकसित करने का श्रेय भी दिया जाता है, जिसने कृत्रिम जीन और डीएनए पोलीमरेज़ के लिए प्राइमर और टेम्प्लेट के निर्माण के लिए आधारशिला प्रदान की। इस कार्य ने पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (पीसीआर) के विकास की नींव रखी, एक ऐसी तकनीक जो डीएनए के छोटे टुकड़ों को कुछ ही घंटों में अरबों प्रतियों में प्रवर्धित करने में सक्षम बनाती है।
1976 में खुराना और एमआईटी में उनके सहयोगियों ने एक जीवित कोशिका में कृत्रिम जीन का पहला संश्लेषण किया। जीन को रासायनिक रूप से संश्लेषित करने की उनकी विधि ने इस बात के नियंत्रित, व्यवस्थित अध्ययन को सुगम बनाने में मदद की कि आनुवंशिक संरचना कार्य को कैसे प्रभावित करती है।
अपने नोबेल पुरस्कार के साथ, खुराना को 1968 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से लुईसा ग्रॉस हॉरविट्ज़ पुरस्कार और बेसिक मेडिकल रिसर्च के लिए लास्कर फाउंडेशन पुरस्कार; 1974 में अमेरिकन केमिकल सोसाइटी के शिकागो अनुभाग का विलार्ड गिब्स पदक; और 1987 में रेटिना अनुसंधान में पॉल कैसर इंटरनेशनल अवार्ड ऑफ मेरिट। 2007 में विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय, भारत सरकार और इंडो-यूएस विज्ञान और प्रौद्योगिकी फोरम ने विश्वविद्यालय और भारतीय शोध संस्थानों के बीच छात्रों के आदान-प्रदान की सुविधा के लिए खुराना के सम्मान में खुराना कार्यक्रम की स्थापना की।
हेमा मालिनी: ‘ड्रीम गर्ल’ जिसने भारतीय सिनेमा को एक नया आयाम दिया भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ही व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा, अद्वितीय सुंदरता और दशकों तक चली शानदार यात्रा से दर्शकों के दिलों पर राज किया है। इन्हीं में से एक हैं हेमा मालिनी, जिन्हें प्यार से ‘ड्रीम गर्ल’ के नाम से जाना जाता है। एक सफल अभिनेत्री, प्रशिक्षित शास्त्रीय नृत्यांगना, फिल्म निर्देशक, निर्माता और सक्रिय राजनेता के रूप में, हेमा मालिनी ने भारतीय कला और सार्वजनिक जीवन के कई क्षेत्रों में अमिट छाप छोड़ी है। प्रारंभिक जीवन और अभिनय की शुरुआत हेमा मालिनी का जन्म 16 अक्टूबर, 1948 को अम्मानकुडी, मद्रास (अब चेन्नई), तमिलनाडु में हुआ था। एक तमिल भाषी परिवार में पली-बढ़ी, उन्हें बचपन से ही कला और संस्कृति का माहौल मिला। उनकी माँ, जया चक्रवर्ती, एक फिल्म निर्माता थीं, जिन्होंने उनकी कलात्मक यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अभिनय में आने से पहले, हेमा मालिनी ने भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी जैसे शास्त्रीय नृत्यों में गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। नृत्य में उनकी महारत बाद में उनके फिल्मी करियर की एक पहचान बन गई। हेमा मालिनी ने 1960 के दशक के अंत में तमिल फिल्म ‘इधु साथियम’ (1962) में एक नर्तकी के रूप में अपनी शुरुआत की, लेकिन हिंदी सिनेमा में उनकी पहली बड़ी सफलता 1968 में आई। हिंदी फिल्म ‘सपनों का सौदागर’ में उन्होंने राज कपूर के साथ मुख्य भूमिका निभाई। यह फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर बहुत सफल न हुई हो, लेकिन राज कपूर ने ही उन्हें ‘ड्रीम गर्ल’ का उपनाम दिया, जो हमेशा के लिए उनके साथ जुड़ गया। भारतीय सिनेमा की ‘ड्रीम गर्ल’ का उदय 1970 और 1980 का दशक हेमा मालिनी के करियर का स्वर्ण युग था। उन्होंने उस समय के लगभग सभी बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया, जिनमें धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, देव आनंद और अमिताभ बच्चन शामिल थे। उनकी कुछ सबसे यादगार फिल्में हैं:
सीता और गीता (1972): इस फिल्म में दोहरी भूमिका में उनके प्रदर्शन ने उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिलाया।
शोले (1975): बसंती के रूप में उनका चुलबुला और साहसी चरित्र आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित किरदारों में से एक है। फिल्म के संवाद “चल धन्नो!” भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन गए हैं।
किनारा (1977), खुशबू (1975) और महबूबा (1976): इन फिल्मों में उन्होंने गंभीर और भावनात्मक भूमिकाओं में अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया।
ड्रीम गर्ल (1977): इस फिल्म ने उनके उपनाम को और भी लोकप्रिय बना दिया।
उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री विशेष रूप से अभिनेता धर्मेंद्र के साथ काफी लोकप्रिय हुई, जिसके बाद 1980 में दोनों ने विवाह कर लिया। नृत्य और कला के प्रति समर्पण अभिनय के शिखर पर रहते हुए भी, हेमा मालिनी ने अपनी शास्त्रीय नृत्य कला को कभी नहीं छोड़ा। वह एक उत्कृष्ट नृत्यांगना बनी रहीं और देश-विदेश में नियमित रूप से प्रदर्शन करती रहीं। उन्होंने पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति पर आधारित कई नृत्य नाटिकाओं का निर्माण और निर्देशन भी किया है, जिनमें ‘दुर्गा’, ‘राधा रास बिहारी’, और ‘मीरा’ प्रमुख हैं। उनका कला के प्रति यह समर्पण उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है। राजनीतिक सफर 2000 के दशक में, हेमा मालिनी ने फिल्मों से धीरे-धीरे हटकर राजनीति में कदम रखा। उन्होंने 2004 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल होकर सक्रिय रूप से राजनीति शुरू की। 2014 और 2019 में, वह उत्तर प्रदेश के मथुरा निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सांसद चुनी गईं। एक राजनेता के रूप में, वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम कर रही हैं। पुरस्कार और सम्मान उनके कलात्मक योगदान के लिए, हेमा मालिनी को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया है।
पद्म श्री (2000): भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (2000)।
उन्हें विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा मानद डॉक्टरेट की उपाधियाँ भी प्रदान की गई हैं।
विरासत हेमा मालिनी की विरासत केवल बॉक्स ऑफिस सफलता या राजनीतिक प्रभाव तक सीमित नहीं है। उन्होंने भारतीय सिनेमा में महिला नायिकाओं के लिए एक उच्च मानक स्थापित किया। उनकी सुंदरता, प्रतिभा और कला के प्रति समर्पण ने उन्हें भारतीय कला और संस्कृति की एक जीवित किंवदंती बना दिया है। ‘ड्रीम गर्ल’ के रूप में, उन्होंने पीढ़ियों को प्रेरित किया है, और एक अभिनेत्री, नृत्यांगना और राजनेता के रूप में उनका प्रभाव भारतीय समाज पर हमेशा बना रहेगा।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में, कुछ ही नाम ऐसे हैं जो अपनी कला और विरासत से श्रोताओं के दिलों में हमेशा के लिए अमिट छाप छोड़ गए हैं। इन्हीं में से एक हैं महान तबला वादक, पंडित लच्छू महाराज। उनका जन्म 16 अक्टूबर, 1944 को बनारस (अब वाराणसी) के पवित्र शहर में हुआ, एक ऐसा शहर जो कला, संस्कृति और आध्यात्मिकता का एक समृद्ध केंद्र है। बनारस घराने की तबला परंपरा के एक उत्कृष्ट प्रतिपादक के रूप में, लच्छू महाराज ने अपने जीवन को तबला वादन को समर्पित किया और अपनी असाधारण प्रतिभा और अद्वितीय शैली के लिए व्यापक रूप से जाने गए। लच्छू महाराज का बचपन संगीत से भरे माहौल में बीता। उनका परिवार बनारस घराने के प्रमुख संगीतकारों और गुरुओं से जुड़ा था, जिसने उनकी कलात्मक यात्रा की नींव रखी। उन्होंने अपने पिता, वासुदेव महाराज से तबले की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित तबला वादक थे। अपने पिता के मार्गदर्शन में, लच्छू महाराज ने तबले की जटिलताओं और बारीकियों को सीखा, और उनकी गहरी समझ ने उन्हें इस वाद्य यंत्र पर महारत हासिल करने में मदद की। उन्होंने कम उम्र में ही अपनी असाधारण क्षमता का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था, और यह स्पष्ट था कि वे एक असाधारण कलाकार बनने के लिए पैदा हुए थे। बनारस घराना, जिसकी जड़ें भगवान शिव के प्राचीन शहर में हैं, तबला वादन की अपनी अनूठी शैली और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। यह घराना अपनी खुली हाथ की थाप, गमकदार बोल और जटिल लयबद्ध पैटर्न के लिए जाना जाता है। लच्छू महाराज ने इस परंपरा को पूरी तरह से आत्मसात किया और इसे अपनी रचनात्मकता और नवाचार के साथ समृद्ध किया। उनकी वादन शैली में शक्ति और सूक्ष्मता का एक अनूठा मिश्रण था, जो उनके प्रदर्शनों को एक विशेष चमक प्रदान करता था। वे अपनी उंगलियों की गति, ताल पर अपनी पकड़ और तालबद्ध विचारों की सहजता के लिए विख्यात थे, जो उन्हें अन्य तबला वादकों से अलग करता था। लच्छू महाराज ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के लगभग सभी प्रमुख कलाकारों के साथ प्रदर्शन किया। उनकी संगत न केवल तालबद्ध समर्थन थी, बल्कि यह मुख्य कलाकार के प्रदर्शन में एक महत्वपूर्ण आयाम जोड़ती थी। उन्होंने बड़े गुलाम अली खान, भीमसेन जोशी, किशोरी अमोनकर, बिरजू महाराज और रवि शंकर जैसे दिग्गजों के साथ मंच साझा किया। इन सहयोगों ने उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया। उनकी संगत की क्षमता ऐसी थी कि वे न केवल ताल को बनाए रखते थे, बल्कि वे मुख्य कलाकार के साथ संवाद करते थे, उनके विचारों को समझते थे और अपने तबले के माध्यम से उन्हें एक नई दिशा देते थे। हालांकि लच्छू महाराज मुख्य रूप से शास्त्रीय संगीत से जुड़े थे, उन्होंने बॉलीवुड फिल्मों में भी काम किया और कई यादगार गीतों में अपने तबले का जादू बिखेरा। उन्होंने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ और ‘पाकीज़ा’ जैसी प्रतिष्ठित फिल्मों के संगीत में योगदान दिया, जिसने उन्हें व्यापक दर्शकों के बीच पहचान दिलाई। उनका फिल्मी योगदान उनकी बहुमुखी प्रतिभा और विभिन्न शैलियों के अनुकूल होने की उनकी क्षमता का प्रमाण था। अपने पूरे करियर में, लच्छू महाराज को कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें 1978 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो भारत में प्रदर्शन कलाओं के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। उन्हें भारत सरकार द्वारा 2016 में पद्म श्री पुरस्कार (मरणोपरांत) से भी सम्मानित किया गया। इन पुरस्कारों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके अपार योगदान और कला के प्रति उनके आजीवन समर्पण को मान्यता दी। लच्छू महाराज का केवल एक कलाकार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक गुरु और संरक्षक के रूप में भी गहरा प्रभाव था। उन्होंने कई छात्रों को प्रशिक्षित किया, जिन्होंने बाद में स्वयं तबला वादन के क्षेत्र में नाम कमाया। उनकी शिक्षा का दृष्टिकोण केवल तकनीकी कौशल तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने छात्रों को तबले की आत्मा को समझने और उसे अपनी भावनाओं के साथ व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया। 24 जुलाई, 2016 को, लच्छू महाराज का 71 वर्ष की आयु में निधन हो गया, जिससे भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में एक गहरा शून्य पैदा हो गया। हालांकि वे अब हमारे बीच नहीं हैं, उनकी संगीत विरासत हमेशा जीवित रहेगी। उनके द्वारा बजाई गई रचनाएं, उनकी रिकॉर्डिंग और उनके छात्रों द्वारा सिखाई गई शिक्षाएं भविष्य की पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी। लच्छू महाराज केवल एक तबला वादक नहीं थे; वे एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से भावनाओं, आध्यात्मिकता और संस्कृति को व्यक्त किया। उनकी वादन शैली ने बनारस घराने की परंपरा को बनाए रखा और उसे एक नया आयाम दिया। वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक सच्चे रत्न थे, और उनका योगदान हमेशा भारतीय संगीत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।