अमीश त्रिपाठी, आज जिनका जन्मदिन है

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अमीश त्रिपाठी का जन्म 18 अक्टूबर, 1974 को मुंबई (महाराष्ट्र, भारत) में हुआ था। वे एक भारतीय लेखक हैं जो अपने उपन्यासों, विशेषकर अंग्रेजी भाषा में पौराणिक कथा शैली के उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं। अमीश त्रिपाठी वैश्विक साहित्यिक मंच पर एक विपुल और प्रभावशाली लेखक के रूप में उभरे हैं।

उन्होंने पौराणिक कथा शैली को फिर से परिभाषित करने का प्रयास किया है, ऐसी कहानियाँ बुनी हैं जो दुनियाभर के पाठकों को प्रभावित करती हैं। अपनी मनमोहक कहानियों के माध्यम से, अमीश ने भारतीय पौराणिक कथाओं को समकालीन दुनिया में सफलतापूर्वक पहुँचाया है, प्राचीन किंवदंतियों में नई जान फूंकी है। इस लेख में, हम इस साहित्यिक वास्तुकार के जीवन, कार्यों और प्रभाव के बारे में जानेंगे, जिन्होंने भारत के साहित्यिक पटल पर एक अमिट छाप छोड़ी है।

उन्होंने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से विज्ञान में स्नातक होने के बाद, त्रिपाठी ने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई की। उन्होंने भारतीय प्रबंधन संस्थान, कलकत्ता (IIM-C) से एमबीए की डिग्री प्राप्त की।

साहित्यिक प्रसिद्धि हासिल करने से पहले, अमीश ने बैंकिंग और बीमा क्षेत्रों में काम करते हुए वित्तीय सेवा उद्योग में एक सफल करियर बनाया। उन्होंने स्टैंडर्ड चार्टर्ड, डीबीएस बैंक और आईडीबीआई फेडरल लाइफ इंश्योरेंस सहित कई कंपनियों में विपणन और उत्पाद प्रबंधक के रूप में वित्त के क्षेत्र में काम किया।

हालाँकि, कहानी कहने के प्रति उनकी रुचि और भारतीय पौराणिक कथाओं के प्रति गहरे आकर्षण ने उन्हें एक लेखक के रूप में एक नया रास्ता अख़्तियार करने के लिए प्रेरित किया।

अमीश को सफलता उनके पहले उपन्यास, “द इम्मोर्टल्स ऑफ मेलुहा” से मिली, जो शिव त्रयी की पहली पुस्तक थी। दरअसल, शिव त्रयी तीन पुस्तकों की एक श्रृंखला है जो भगवान शिव के जीवन को पुनर्कल्पित करते हुए उनकों मानवीकृत करने का प्रयास करती है। त्रयी में शामिल हैं –

“द इम्मोर्टल्स ऑफ़ मेलुहा” (2010)

“द सीक्रेट ऑफ़ द नागाज़” (2011)

“द ओथ ऑफ़ द वायुपुत्राज़” (2013)

शिव त्रयी की शानदार सफलता के बाद, अमीश ने अपने साहित्यिक प्रयासों में भारतीय पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर अपना लेखन जारी रखा। उन्होंने राम चंद्र श्रृंखला की शुरुआत की, जो “इक्ष्वाकु के वंशज” (2015) से शुरू हुई।

इसके बाद, उन्होंने अपनी इम्मोर्टल इंडिया सीरीज़ के साथ नॉन-फिक्शन में भी कदम रखा है, जो देश के इतिहास और संस्कृति पर केंद्रित है।

अमीश त्रिपाठी का साहित्यिक कार्य भौगोलिक सीमाओं से परे है। भारतीय पौराणिक कथाओं को समसामयिक परिदृश्य में समाहित करने की उनकी असाधारण क्षमता ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक हलकों में पहचान दिलाई है। उनके उपन्यासों का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है, जिससे वे दुनिया भर के पाठकों के लिए सुलभ हो गए हैं।

अमीश त्रिपाठी का प्रभाव उनकी किताबों के पृष्ठों से कहीं आगे तक फैला हुआ है। इक्ष्वाकु के वंशज ने क्रॉसवर्ड बुक का “सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय पुरस्कार” जीता। 2019 में, त्रिपाठी को भारत सरकार द्वारा एक राजनयिक भूमिका में नेहरू सेंटर, लंदन के निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था।

अमीश ने परंपरा और आधुनिकता का सफलतापूर्वक विलय कर एक ऐसी साहित्यिक विरासत का निर्माण किया है जो समय की कसौटी पर खरी उतरती प्रतीत होती है। साहित्य की दुनिया में उनका योगदान आज भी निरंतर जारी है।

वर्ष 2022 में 13 अक्टूबर के दिन ‘लेखक से भेंट’ कार्यक्रम में साहित्य अकादेमी के सभागार में अमीश त्रिपाठी से मेरी भेंट हुई थी। कम समय में युवा पाठकों के बीच अपनी जगह बनाने वाले अमीश ने ज्यादातर समय श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए थे।

अपनी पुस्तकों की बिक्री का साठ लाख का जादुई आंकड़ा वे छू चुके थे। उनके प्रशंसकों में जाने माने फिल्मी सितारों से लेकर राजनेता और बुद्धिजीवी सहित युवा वर्ग हैं। शिव व राम पर लिखी गई उनकी श्रृंखलाएं बहुत लोकप्रिय हुई हैं।कांत शुक्ला

−रजनीकांत शुक्ला

चुनाव का मैदान सजा है , मुंछवा ” बढ़ाए ” डालो

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बिहार में तीन व्यंजन बड़े लोकप्रिय हैं । पहला है चौड़ा पोहा या चिवड़ा और दही , दूसरा लिट्टी चोखा और तीसरा सर्वाधिक लोकप्रिय सत्तू । हमारे नगर में अनेक बिहारी रहते हैं , भेल बनने पर आए उनमें से कईं मित्र भी हैं । 150 साल पहले जब कर्नल प्रॉबी काटले ने हरिद्वार से कानपुर तक नहर बनाने का काम कानपुर से हरिद्वार की ओर उल्टा शुरू किया था ।

नतीजा यह निकला कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से हजारों मजदूर हरिद्वार रुड़की आ बसे । नहर बन जाने के बाद ठेले चलाने लगे और अनाज मंडी , घास मंडी आदि में पल्लेदारी करने लगे । सावन भादों में दोपहर बाद ढोलक की थाप पर गीत गाते थे । एक लोकगीत बड़ा प्रचलित और पसंदीदा था । वह था —
आई सतुवन की बहार मुंछवा मुंडाए डालो … बरसात के मौसम में कटोरे भर भर सत्तू पियेंगे , मूंछें कटोरे में न डूब जाएं सो मुंडा डालो ।

आजकल बिहार में बड़ी रौनक है । लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व चुनाव जो आ गया त्यौहारों के मौसम में , तो रौनक तो होगी ही । आइए अब बिहार की उस खिचड़ी की बात करें जो इन दिनों चूल्हों पर चढ़ी है , राजनीति के गलियारों में खुदबुदा रही है । बेशक अभी तक पकी नहीं है । आपको पता है न , इंटरनेशनल लेबल पर भारत के सबसे लोकप्रिय दो डिशेज क्या हैं ? तो बता दें कि वे हैं कढ़ी और खिचड़ी । जी हां , ठीक सुना आपने खिचड़ी ! समझ जाइए कथित बिरयानी नहीं सीधी सादी खिचड़ी ।

भारत के फाइव स्टार होटलों में भी मिलती है । लेकिन हम बात उस राजनैतिक खिचड़ी की कर रहे हैं जिसे चंद्रगुप्त , अशोक और चाणक्य के बिहार में सत्तर पार्टियां मिलकर पकाना चाहती हैं । परन्तु अभी तक सलीके से पका नहीं पा रही । पक तो जाएगी एक दिन , अब किसकी पकेगी , बताना मुश्किल । लगाते रहिए गणित और फैलाते रहिए आंकड़े ? खिचड़ी पकेगी , किसी की तो पकेगी , जो पकेगी , वह सरकार बनने के बाद भी पकती रहेगी । कईं दालों ही नहीं , पतले , मोटे , लम्बे , छोटे ; कईं किस्म के दाल चावलों से बनीं मशहूर बिहारी खिचड़ी । कईं तरह के छौंके और तड़के वाली खिचड़ी ।

तो साहब ! लिट्टी चोखा खाइए , सत्तू पीजिए या पोहा दही खाइए , आपकी मर्जी । चुनाव का मैदान सजा है , मुंछवा ” बढ़ाए ” डालो ?
…..कौशल सिखौला

खुशियों की दीपावली : मन की अंधियारी दूर करने का समय

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(रोशनी बाहर नहीं, मन के भीतर जलाएं दीये, रिश्तों और सुकून से रौशन होती है असली दीपावली।) 

दीपावली केवल दीप जलाने का पर्व नहीं, बल्कि मन के अंधकार को मिटाने और आत्मा में उजाला भरने का अवसर है। आज यह जरूरी है कि हम इसे दिखावे या प्रदूषण का उत्सव न बनाएं, बल्कि सादगी, करुणा और प्रेम का पर्व बनाएं। जब हम दूसरों के जीवन में रोशनी बाँटते हैं, तभी सच्चा सुख और सुकून प्राप्त होता है। दीपावली का असली अर्थ है — हर मन में शांति, हर घर में प्रेम और हर समाज में समरसता का प्रकाश।

– डॉ प्रियंका सौरभ

दीपावली वर्ष का वह पर्व है जो केवल अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के तमस को मिटाकर आत्मिक प्रकाश जगाने का संदेश देता है। यह वह दिन है जब लोग घरों को सजाते हैं, दीपक जलाते हैं, नए वस्त्र पहनते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं। परंतु क्या हमने कभी ठहरकर सोचा है कि असली दीपावली क्या केवल घर की सफाई और रोशनी से पूरी हो जाती है? क्या वास्तव में वह अंधकार, जिसके नाश के लिए यह पर्व मनाया जाता है, केवल दीवारों और आँगन में होता है या हमारे मन और व्यवहार में भी कहीं छिपा है?

आज का समाज बाहरी चमक में इतना उलझ गया है कि भीतर की रोशनी मद्धम पड़ती जा रही है। दीपावली अब अक्सर दिखावे, खर्च और प्रतिस्पर्धा का उत्सव बनती जा रही है। लोग इस दिन अपने घर को हजारों लाइटों से सजा देते हैं, लेकिन अपने मन के कोनों में बसे अंधकार — ईर्ष्या, अहंकार, असंतोष और असहनशीलता — को नजरअंदाज कर देते हैं। त्योहार का असली उद्देश्य यही था कि हम अपने भीतर झाँकें, संबंधों को सहेजें और अपने चारों ओर स्नेह की रोशनी फैलाएं। मगर आज यह भावना बाज़ार और भौतिकता के शोर में खोती जा रही है।

दीपावली केवल लक्ष्मी के आगमन का नहीं बल्कि आत्ममंथन का भी समय है। जब हम घर के हर कोने की धूल झाड़ते हैं, तो दरअसल हमें अपने मन की धूल भी झाड़नी चाहिए — पुरानी शिकायतें, मतभेद, कटुता और तनाव। हर दीपक यह याद दिलाता है कि अंधकार मिटाने के लिए केवल एक दीप ही काफी होता है, बशर्ते वह सच्चे मन से जलाया गया हो। परिवार में एक छोटी सी मुस्कान, एक क्षमा का भाव, एक प्रेमपूर्ण संवाद — यही वे दीप हैं जो रिश्तों के कोनों को रोशन करते हैं।

आज के दौर में यह पर्व मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में भी बहुत मायने रखता है। तेज़ भागदौड़, सामाजिक दबाव, कामकाजी तनाव और डिजिटल दुनिया की भागमभाग में इंसान भीतर से खाली होता जा रहा है। त्यौहारों को भी हमने एक “इवेंट” बना दिया है — फोटोशूट, सोशल मीडिया पोस्ट और महंगे तोहफों की परंपरा ने उसकी आत्मा को कमजोर कर दिया है। हमें यह याद रखना होगा कि दीपावली का आनंद केवल बाहरी सजावट में नहीं, बल्कि उस मानसिक सुकून में है जो हमें अपनेपन, संवाद और आत्मीयता से मिलता है।

आजकल के बच्चे और युवा पटाखों की चमक में खुशियाँ ढूंढते हैं। लेकिन क्या हमें यह अधिकार है कि अपनी खुशी के लिए पर्यावरण को प्रदूषित करें? धुएं और शोर से भरी हवा में सांस लेता हर जीव, हर बच्चा और हर बुज़ुर्ग इस खुशी की कीमत चुका रहा है। असली आनंद तो तब है जब हमारे दीपक किसी को कष्ट न दें। जब हम धरती माँ के प्रति भी उतने ही संवेदनशील हों जितने अपने घर के प्रति। पर्यावरण के अनुकूल दीपावली मनाना अब केवल विकल्प नहीं, जिम्मेदारी बन चुकी है। मिट्टी के दीप, प्राकृतिक रंगों की सजावट और स्थानीय उत्पादों का उपयोग करके भी हम इस पर्व को सुंदर बना सकते हैं — और यह सौंदर्य कृत्रिम रोशनी से कहीं अधिक स्थायी है।

दीपावली के अवसर पर एक और अंधकार मिटाने की आवश्यकता है — वह है अकेलेपन और मानसिक बेचैनी का अंधकार। त्योहार का मौसम बहुतों के लिए उत्सव का होता है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह यादों और उदासी का समय भी होता है। जिनके अपने दूर हैं, जो किसी प्रिय को खो चुके हैं, या जो आर्थिक और सामाजिक संघर्षों से जूझ रहे हैं — उनके लिए यह रोशनी कई बार चुभन का कारण बनती है। ऐसे में समाज का कर्तव्य है कि वह अपने आसपास के ऐसे लोगों को भी इस रोशनी में शामिल करे। दीपावली का असली अर्थ तभी पूर्ण होगा जब किसी के घर का अंधकार भी हमारे दीप से दूर हो।

हमारे शास्त्र कहते हैं — तमसो मा ज्योतिर्गमय — यानी हमें अंधकार से प्रकाश की ओर जाना चाहिए। यह प्रकाश केवल दीपक का नहीं बल्कि ज्ञान, विवेक और करुणा का है। जब मन में करुणा का प्रकाश जलता है, तो वह हजारों दीपकों से अधिक उजाला फैलाता है। दीपावली हमें यही सिखाती है कि जीवन में प्रकाश फैलाना केवल दिए जलाने का नहीं, बल्कि दया, सत्य और प्रेम की राह पर चलने का प्रतीक है।

त्योहारों का मकसद केवल परंपरा निभाना नहीं होता। वे हमें रुककर सोचने का अवसर देते हैं कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। दीपावली हमें याद दिलाती है कि जो प्रकाश बाहर है, वह तभी स्थायी होगा जब भीतर भी उजाला हो। जब हम अपने भीतर के राम को जगाते हैं और रावण रूपी अहंकार, द्वेष और लालच को जलाते हैं, तभी सच्ची दीपावली मनती है।

आज के समय में यह भी जरूरी है कि हम दीपावली को “समावेशिता का पर्व” बनाएं। समाज में विभाजन की दीवारें, जाति-धर्म के मतभेद, आर्थिक असमानता — ये सब हमारे युग के अंधकार हैं। अगर हर व्यक्ति अपने स्तर पर थोड़ा सा प्रकाश फैला सके — किसी गरीब को भोजन दे दे, किसी बच्चे की शिक्षा में सहयोग करे, किसी बीमार को सहारा दे — तो वही दीपावली सबसे उज्ज्वल होगी। असली लक्ष्मी वही है जो करुणा, दया और सेवा के रूप में घर में प्रवेश करे।

दीपावली व्यापार का भी पर्व मानी जाती है। यह समय होता है जब बाजारों में रौनक रहती है, कारोबारियों की आशाएं बढ़ती हैं। लेकिन व्यापारी समुदाय को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सच्चा लाभ केवल आर्थिक नहीं, नैतिक भी होता है। ईमानदारी, पारदर्शिता और ग्राहक के प्रति सम्मान ही वह पूंजी है जो लंबे समय तक टिकती है। जब बाजार में विश्वास का दीप जलेगा, तभी समाज समृद्ध होगा।

हमारी संस्कृति में यह भी कहा गया है कि “दीपावली केवल संपन्नता का नहीं, संयम का भी प्रतीक है।” इसलिए अत्यधिक उपभोग, दिखावा और प्रतिस्पर्धा से बचना ही सच्ची श्रद्धा है। यह पर्व हमें सिखाता है कि “थोड़े में भी बहुत” कैसे पाया जा सकता है। जिस घर में प्रेम, संतोष और एकता है, वहाँ हर दिन दीपावली है।

आज जरूरत है कि हम दीपावली को एक आध्यात्मिक और सामाजिक आंदोलन के रूप में देखें। हर व्यक्ति अपने जीवन में एक संकल्प ले — कि वह किसी न किसी रूप में प्रकाश फैलाएगा। कोई ज्ञान के दीप जलाएगा, कोई सहायता का, कोई प्रेम का। जब हर व्यक्ति एक दीप बनेगा, तो समाज में ऐसा उजाला फैलेगा जिसे कोई अंधकार मिटा नहीं सकेगा।

कभी-कभी यह भी आवश्यक है कि हम इस पर्व को कुछ पल की शांति के साथ मनाएँ। आत्मचिंतन के कुछ क्षण, अपने प्रियजनों के साथ समय बिताना, और अपनी उपलब्धियों व कमियों पर विचार करना भी दीपावली का हिस्सा होना चाहिए। जब हम अपने भीतर के दीप से मार्ग रोशन करते हैं, तो जीवन में दिशा स्पष्ट होती है।

दीपावली का अर्थ केवल “दीप” नहीं, “आवली” अर्थात् श्रृंखला भी है। यह श्रृंखला बताती है कि प्रकाश एक से दूसरे तक पहुँचता है। यही मानवता का मूल संदेश है — एक दीप दूसरे को जलाए, एक दिल दूसरे को रोशन करे। तभी यह संसार अंधकार से मुक्त हो सकेगा।

अंततः, इस दीपावली पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम केवल अपने घर को नहीं, बल्कि अपने विचारों, व्यवहारों और समाज को भी प्रकाशित करेंगे। शोर और प्रदूषण से दूर, सरलता और स्नेह से भरी दीपावली ही सच्चे अर्थों में “खुशियों और सुकून की दीपावली” होगी। यही दीपक भारत की संस्कृति का प्रतीक बनेगा — जहाँ रोशनी केवल बिजली से नहीं, बल्कि इंसानियत से फैलती है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

चंदन तस्कर वीरप्पन : जंगलों का सम्राट और अपराध जगत का कुख्यात नाम

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18 अक्तूबर 2004 को मुठभेड़ में वीरप्पन की मौत

भारत के अपराध इतिहास में यदि किसी व्यक्ति का नाम रहस्य, रोमांच और खौफ के साथ लिया जाता है, तो वह है — कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन। उसका असली नाम कूसे मुनीसामी वीरप्पन था। दक्षिण भारत के जंगलों में लगभग तीन दशक तक उसका राज चला। वह पुलिस, वन विभाग और यहां तक कि सेना तक के लिए सिरदर्द बना रहा। 18 अक्टूबर 2004 को उसका अंत हुआ, जब तमिलनाडु स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने उसे एक मुठभेड़ (एनकाउंटर) में मार गिराया।


प्रारंभिक जीवन

वीरप्पन का जन्म 18 जनवरी 1952 को तमिलनाडु के गोपीनाथम गाँव में हुआ था, जो कर्नाटक की सीमा से लगा हुआ है। बचपन से ही वह जंगलों के संपर्क में रहा। उसके पिता वन विभाग में मामूली कर्मचारी थे, और यहीं से उसे जंगलों के रहस्य, रास्ते और वन्य जीवों की जानकारी मिली। किशोर अवस्था में ही उसने हथियारों और बंदूकों में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था।

कहा जाता है कि जब वह 17 वर्ष का था, तब उसने पहली बार एक हाथी को मारा। यहीं से उसके अपराध जीवन की शुरुआत हुई। हाथीदांत और चंदन की तस्करी ने उसे जंगलों का बादशाह बना दिया।


अपराध की दुनिया में प्रवेश

वीरप्पन का अपराध जगत से रिश्ता 1970 के दशक में शुरू हुआ। उसने पहले एक छोटे शिकारिए के रूप में काम किया, लेकिन धीरे-धीरे वह तस्करी और लूटपाट की दिशा में बढ़ा।
कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर बसे सत्य अमंगलम के घने जंगल उसके साम्राज्य की तरह थे। वहां से वह चंदन की लकड़ी, हाथीदांत और वन्य जीवों की अवैध तस्करी करता था।

बताया जाता है कि उसने करीब 10,000 टन चंदन की लकड़ी और करीब 200 हाथियों के दांत की अवैध तस्करी की थी। इस अवैध व्यापार से उसने करोड़ों की संपत्ति अर्जित की, परंतु उसका जीवन हमेशा भाग-दौड़ और छिपने में बीता।


वीरप्पन और उसकी गैंग

वीरप्पन अकेला नहीं था। उसकी एक विशाल गैंग थी, जिसमें उसके कई रिश्तेदार और वफादार साथी शामिल थे। यह गैंग जंगलों में ही रहती थी और किसी को भी पास आने नहीं देती थी।
वीरप्पन की एक खास बात यह थी कि वह जंगल का गहरा जानकार था — कौन-सा रास्ता कहां जाता है, किस दिशा से पुलिस आ सकती है, कैसे छिपना है — यह सब उसे बखूबी पता था। यही वजह थी कि पुलिस और सेना उसे कई बार घेरने के बावजूद पकड़ नहीं पाई।


खूनी इतिहास और हत्याएं

वीरप्पन पर दर्जनों हत्याओं के आरोप थे। उसने कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के कई वन अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और आम लोगों की हत्या की।
सबसे चर्चित घटना थी — आईपीएस अधिकारी टी. हर्षा और आईएफएस अधिकारी संजय कुमार की हत्या।
उसने 1990 के दशक में करीब 120 से अधिक लोगों की जान ली।

1993 में उसने प्रसिद्ध कन्नड़ अभिनेता और राजनेता राजकुमार का अपहरण किया। इस घटना ने पूरे दक्षिण भारत में हलचल मचा दी। सरकार को उसके साथ बातचीत करनी पड़ी और कई रियायतें देनी पड़ीं। हालांकि बाद में राजकुमार को सुरक्षित रिहा कर दिया गया।


वीरप्पन का आतंक और जनता का दृष्टिकोण

वीरप्पन के प्रति लोगों की राय दो ध्रुवों में बंटी थी।
एक ओर वह पुलिस और प्रशासन के लिए खूंखार अपराधी था,
दूसरी ओर कुछ ग्रामीण उसे ‘आधुनिक रॉबिन हुड’ मानते थे।
क्योंकि वह कभी-कभी गरीबों की मदद भी करता था, उन्हें पैसे देता और पुलिस से बचाव में उनकी मदद लेता।

ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि कोई भी उसके खिलाफ पुलिस को सूचना देने की हिम्मत नहीं करता था।


अंतिम मुठभेड़ : 18 अक्टूबर 2004

करीब तीन दशक तक पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के बाद आखिरकार वीरप्पन का अंत हुआ।
तमिलनाडु की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने एक ‘ऑपरेशन कोकून’ (Operation Cocoon) नामक योजना के तहत उसे मार गिराया।
18 अक्टूबर 2004 की रात, जब वह एक एंबुलेंस में वेश बदलकर जा रहा था, तभी पुलिस ने उसे धर्मपुरी जिले के पापरपट्टी गांव के पास घेर लिया।

मुठभेड़ में वीरप्पन और उसके तीन साथी मारे गए। इस प्रकार 33 वर्षों का आतंक समाप्त हुआ।


वीरप्पन की विरासत और चर्चा

वीरप्पन की मौत के बाद भी उसकी कहानी लोगों के बीच जिंदा है।
उस पर कई डॉक्यूमेंट्री, फिल्में और किताबें बन चुकी हैं —
जैसे “Veerappan: Chasing the Brigand”, “Killing Veerappan” (राम गोपाल वर्मा की फिल्म), और कई टीवी सीरीज़।

उसकी कहानी सिर्फ अपराध की नहीं, बल्कि प्रशासनिक असफलता और जंगल के समाज की वास्तविकता को भी उजागर करती है।


निष्कर्ष

वीरप्पन एक ऐसा नाम है जो भारतीय अपराध इतिहास में रहस्य, भय और रोमांच का प्रतीक बन गया।
वह न केवल एक तस्कर था बल्कि एक ऐसा व्यक्ति था जिसने वर्षों तक भारत की पुलिस और सरकार को चुनौती दी।
उसकी मौत के साथ एक युग का अंत हुआ, लेकिन उसकी कहानी आज भी यह सवाल छोड़ जाती है —
क्या व्यवस्था की कमज़ोरियों ने वीरप्पन जैसे अपराधियों को जन्म नहीं दिया?

बेनजीर भुट्टो और मेरी पीढ़ी

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2007 में आज के ही दिन आठ साल के स्वनिर्वासन के बाद बेनजीर भुट्टों पाकिस्तान लौंटी। कुछ ही घंटो में उनके काफिले पर करांची में बमों से हमला किया गया। इस हमले से वह बच गईं किंतु इसी दिसंबर में उनकी हत्याकर दी गई। उनकी हत्या के समय लिखा गया मेरा लेख।

और मेरी पीढ़ी पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर अली भुट्टों के निधन से हुई क्षति के बारे लोगों की अलग-अलग राय होगी। कोई इसे जमहूरियत पर कुर्बानी करार दे रहा है तो कोई इसे पाकिस्तान में अमेरिकी पॉलिसी की हार बता रहा है । किसी का कहना है कि यह पाकिस्तान की बहुत बड़ी क्षति है तो कोई बेनजीर के पति और उनके बच्चों के लिए असहनीय हादसा मान रहा है। कुछ भी हो बेनजीर का निधन भारत में जन्मी मेरी पीढ़ी का बहुत बड़ा नुकसान है । और है उनके एक खूबसूरत सपने का अंतः। बेनजीर की मौत ने मेरी पीढ़ी के समय की धुंध में छिपे घाव को फिर कुरेद दिया। फिर से उन्हे एक नई हवा दे दी। 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध हुआ। इस जंग में पाकिस्तान को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। दुनिया के नक्शे पर बांग्ला देश नाम से नया मुल्क उभरा। भारत से सात पीढ़ी तक युद्ध करने का दंभ भरने वाले पाकिस्तान के प्रधान मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को समझौते के लिए मजबूर होना पड़ा। समझौता वार्ता भारत में होनी थी। वार्ता के लिए इंद्र की नगरी जैसे खूबसूरत पर्वतीय शाहर शिमला को चुना गया। जुल्फिकार अली भुट्टो वार्ता के लिए भारत आए। उनके साथ आई सतयुग काल की अप्सरा रंभा,उर्वषी और मेनका की खूबसूरती को याद दिलाती उनकी बेटी बेनजीर । बेनजीर वास्तव में बेनजीर थी। जब यह भारत आई तो उसकी उम्र 19 साल के आसपास रही होगी। उपन्यासकार वृंदावन लाल वर्मा की मृगनयनी जैसी बेनजीर मेरी पीढ़ी के युवाओं को रांझा बना देने के लिए काफी थी।आज मेरी पीढ़ी बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी है। बेनजीर के शिमला आने के समय वह नौजवान थी। उसकी उम्र 18 से 21 साल के बीच रही होगी। प्रत्येक नौजवान की तरह इसके भी अपने – अपने सपने थे। सबकी अपनी अपनी हीर थी ,सबकी अपनी -अपनी राधा थी। मेरी जवानी के दौर की प्रसिद्ध हिरोइन थीं- मधुबाला,मीना कुमारी,आशा पारिख,वहीदा रहमान आदि- आदि।हरेक नौजवान की तमन्ना थी कि उसकी सपनों की रानी इनसे कुछ कम न हो। बेनजीर भारत आई तो समझौते की खबरों के साथ-साथ उसकी खूबसूरती,स्टाइल की खबरें मेरी पीढ़ी को मिली। इन खबरों ने उसकी सपनों की रानी की छवि ही बदल दी। उस समय के हर नौजवान की तमन्ना हुई कि उसके आंगन की तुलसी कोई और नही सिर्फ- और सिर्फ बेनजीर हो।उस समय समाचार सुनने के लिए रेडियो ही था। मेरी पीढ़ी ने शिमला समझौते के समाचार आकाशवाणी और बीबीसी से सुने। भारत युद्ध में जीत चुका था। देश भक्ति का जोश सबमें भरा था। हरेक जानना चाहता था कि शिमला में क्या हो रहा है, किंतु मेरी पीढ़ी की इच्छा यह जानने में रहती कि बेनजीर कैसी हैं। क्या पहने हैं,क्या कर रही है। परिवार से बचकर छुपकर या परिवार वालों के समाचार सुनने के दौरान बुलैटिन में बेनजीर के बारे में प्रसारित होने वाले समाचारो को सुनने की उत्सुक होती। अखबारों में छपे

बेनजीर के फोटो ,उसकी चर्चा में युवाओं की ज्यादा रूचि रहती। आपस में चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा उस समय बेनजीर ही रही।शिमला के बेनजीर के प्रवास के पांच दिन मेरी पीढ़ी के युवाओं में एक ऐसा अहसास और ऐसा नशा भर गए कि उनके सपनों की रानी ही बदल गई। बेनजीर के भारत से वापस जाने का बहुत अहसास रहा। उनकी तमन्ना यह थी कि यह परी भारत के आंगन को ही महकाए।पर ऐसा हुआ नहीं।शिमला वापसी के बहुत दिन बाद तक मेरी पीढ़ी के युवाओं ने जमकर आहें भरी। कुछ की यह दीवानगी तो काफी समय तक जारी रही।वख्त के साथ साथ जिंदगी की 35-36 साल की जददोजहद में बहुत कुछ पीछे छूट गया। बेनजीर की यादें भी धुंधला गईं । जीवन के इस सफर में क्या छूटा पता नहीं,किंतु जो मिल गया उसको मुकद्दर समझकर जीवन की जंग जारी रखी। जवानी के तेज से चमकने वाली आंखों पर कब चश्मा आ गया ,केशा?वदास के सफैद बालों को देख सोने के बदन वाली मृगलोचनी कब बाबा कहने लगी,पता नही चला। किंतु बेनजीर के निधन के समाचार ने मुझे आज 35-36 साल पीछे धकेल मेरी पीढ़ी की जवानी की, उसकी हीर , उसकी उर्वश की याद ताजा करा दी। जिंदगी की जंग में मेरी पीढ़ी ने हार नहीं मानी। बहुत कुछ खोने के बाद भी दुनिया के विकास में कोई कसर नही छोड़ी ,किंतु जवानी का बेनजीर जैसा खूबसूरत सपना टूट जाए ,तो बहुत ज्यादा मलाल होता है। पाकिस्तान , पाकिस्तान के आवाम को नुकसान हुआ हो या नही किंतु बेनजीर के निधन से हिंदुस्तान की मेरी पीढ़ी को तो बहुत नुकसान हुआ है।

अशोक मधुप

मैथिली ठाकुर से क्या दिक्कत है?

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मैथिली ठाकुर से क्या दिक्कत है?। आप कहेंगे कि मैथिली को राजनैतिक अनुभव नहीं है। सदन में होने के लिये आवश्यक बौद्धिकता नहीं होगी उसमें। यही न? बिहार में नीतीश जी को छोड़ दिया जाय तो दोनों पक्षों के शीर्ष पर दिख रहे नई पीढ़ी के अधिकांश नेताओं से अधिक बौद्धिक है वह लड़की। नाम ले कर बताएं क्या? तुलना कर के देख लीजियेगा।

आप कहेंगे कि उसकी आयु कम है। तेजस्वी जी, तेजप्रताप जी, सम्राट जी, चिराग जी आदि लोग जब राजनीति में आये तब क्या उम्र थी उनकी? जिस आयु में वह चुनाव लड़ने आई है, लगभग उसी आयु में हमने तेजस्वी जी को बिहार का उपमुख्यमंत्री बना दिया था। फिर उस लड़की के लिए अलग मापदंड क्यों है?

आप कह रहे हैं कि गीत संगीत के लोगों को टिकट देना गलत है। मैं इस बात का समर्थन करना चाहता हूं, लेकिन फिर पवन सिंह के पीछे चलती लाखों की भीड़ याद आती है। आज ही खेसारी लाल यादव का नॉमिनेशन है, उनके पीछे खड़ी भीड़ देख लीजिये। नाचने गाने वाले लोग एकतरफा जीत जाएंगे, राजनैतिक दलों को यह भरोसा तो हमीं ने दिया है न?

यूपी बिहार में कमसे कम आधा दर्जन नेता ऐसे हैं जो भोजपुरी फिल्मी दुनिया से आये हैं। आप उन सभी से मैथिली ठाकुर की तुलना कर के देखिये। इस लड़की ने कभी फूहड़ नहीं गाया, हिट होने के लिए अश्लीलता नहीं परोसी। यदि आपको वे लोग नापसंद नहीं हैं, फिर यह क्यों नापसंद है?

इसी चुनाव में लोजपा ने मढ़ौरा से सीमा सिंह को टिकट दिया है। वे “आईटम डांसर” हैं। 300 भोजपुरी फिल्मों में अश्लील गानों पर अर्धनग्न नाची हैं। हम आप उनका विरोध कर पा रहे हैं क्या? मैथिली क्या उनसे भी बुरी कैंडिडेट है?

कहा जा रहा है कि ‘वह स्टार है, जीतने के बाद भी लोगों से मिलेगी नहीं।’ सम्भव है कि सचमुच ऐसा ही हो। पर यह भी तो सम्भव है कि जीतने के बाद वह नेताओं से अधिक क्षेत्र में रहने लगे। हम पहले ही दावा कैसे कर लेते हैं?

मैथिली ठाकुर का राजनीति में कूद पड़ना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है। वे जिस पैटर्न से राजनीति में आईं हैं, वह नया नहीं है। इसी पैटर्न से लोग आते रहे हैं और इस बार भी बहुत लोग आए हैं।

अब राजनीति का जो स्वरूप है उसमें किसी सामान्य कार्यकर्ता का चुनाव लड़ कर जीत जाना बहुत बड़ी बात है। पार्टियां राज्य भर में एक आध कार्यकर्ताओं को टिकट दे देती हैं ताकि कार्यकर्ताओं की उम्मीद बनी रहे। लोग दरी बिछाते रहें, नारा लगाते रहें। टिकट पर दावेदारी अब या तो पूंजीपतियों की है, या दूसरे फील्ड से आये चर्चित लोगों की… पैसा न हो तो आदमी पंचायत का चुनाव नहीं जीत पायेगा, विधायक बनना तो बहुत बड़ी बात है।

मैथिली को शुभकामनाएं। उम्मीद है कि इसके बाद भी वह अपने अंदर की गायिका को ही आगे रखेगी।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

त्योहारी सीजन में ई-कॉमर्स कंपनियों की बल्ले-बल्ले

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बाल मुकुन्द ओझा

त्योहारी सीजन में बाजार ने तूफानी तेजी पकड़ रहा है, लेकिन सबसे ज्यादा तेजी ऑनलाइन बाजार में ही दिखाई पड़ रही है। आज जिसे देखो वह ऑनलाइन बाजार से खरीददारी के लिए व्यस्त है। इसमें ग्राहक और कंपनियों दोनों का फायदा भी हो रहा है। ग्राहक को घर बैठे मनपसंद सामान मिल रहा है तो वहीं कंपनियों के सामने के लिए एक बहुत बड़ा मार्केट भी बन रहा है। एक लोकल सर्वे ने ऑनलाइन शॉपिंग को लेकर सर्वे किया था जिसमें अधिकांश लोगों ने बताया था कि उन्होंने ऑनलाइन शॉपिंग को चुना है। इससे बाजार की भीडभाड से भी राहत मिल रही और लोगों के सामने विकल्प चुनने के भी की ब्रॉड मौजूद थे। इसीलिए विदेशों की तर्ज पर भारत में भी ऑनलाइन शॉपिग तेजी से बढ़ रही है। देश में इ-कॉमर्स का बाजार इन दिनों अपनी बूम पर है।  यह सच है, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर कई प्रकार की मनभावक छूट, ऑफर और घर बैठे डिलीवरी की सुविधा मिलती है, यह भी सही है, ऑनलाइन खरीदारी में समय और ऊर्जा की बचत होती है, परंतु नकली प्रोडक्ट्स और डिलेवरी की दिक्कतें भी आम हैं। अब ग्राहकों को सावधानी तो रखनी ही होगी अन्यथा सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।

त्योहार के सीजन में लगभग 70 करोड़ ग्राहक बाज़ारों में ख़रीदारी करते हैं और जहां 500 रुपये या उससे कम ख़रीदारी करने वाले लोग हैं वहीं हज़ारों और लाखों रुपये खर्च करने वालों की भी कमी नहीं है और इसीलिए देश में त्योहारी सीजन की महत्त्ता व्यापार की दृष्टि से बेहद ही महत्वपूर्ण है। त्योहारों पर जिस तरह से विभिन्न प्रकार की चीजों की बिक्री से बाजार गुलज़ार हो रहा है उससे साफ अंदाजा लगा सकते हैं कि आने वाले सभी त्योहारों पर खरीदारी के लिए ग्राहक मन बना चुके हैं। लोग खरीदारी के लिए बाजारों में पहुंच रहे हैं। दुकानें ग्राहकों से गुलजार होने लगी है। बाजारों में चहल पहल व भीड़-भाड़ देखने को मिल रही है। ऑनलाइन शॉपिंग की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा हुआ है। दुकानदारों का कहना है कि बाजार में खरीदारी करने वालों की भीड़ बढ़ रही है और आने वाले दिनों में कारोबार बढ़ने की उम्मीद है। त्योहारी सीजन से इलेक्ट्रॉनिक, कपड़ा, ऑटो मोबाइल, सराफा बाजार में ग्राहकों का रुझान बढ़ा है। पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की बढ़ती संख्या से न केवल इन स्थलों की रौनक बड़ रही है बल्कि अच्छा कारोबार होने से कारोबारियों के चेहरों पर चमक देखने को मिल रही है। यह त्योहारी सीजन हालाँकि महंगाई की मार से उपभोक्ताओं को राहतभरा नहीं है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस साल ऑनलाइन और ऑफलाइन प्लेटफॉर्म पर करीब छह लाख करोड़ रुपए का कारोबार होने का अनुमान है, जिसमें ऑनलाइन पर 1.20 लाख करोड़ रुपए के कारोबार का अनुमान लगाया जा रहा है, जो हमारे देश की जीडीपी का 3.2 प्रतिशत आंका गया है। नामी गिरामी ई-कॉमर्स कंपनियों ने त्योहारी सीज़न और जीएसटी में हालिया बदलाव का फायदा उठाना भी शुरू कर दिया है। उन्होंने पहले ही डिस्काउंट ऑफर देने शुरू कर दिए थे।  कई कंपनियों के विज्ञापन में 50 से 80 प्रतिशत  डिस्काउंट का  वादा किया है। अनुसंधान फर्म ‘डेटम इंटेलिजेंस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में जीएसटी दरों को आमजन के अनुकूल बनाने से इस साल त्योहारी बिक्री 27 प्रतिशत से बढ़कर 1.20 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकती है, क्योंकि टैक्स स्लैब को कम करने से कई जरूरी उत्पादों की कीमत में भारी कमी आई है, जिससे बिक्री में 15 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की आशा है।

नई जीएसटी व्यवस्था में अब सिर्फ 5 और 18 प्रतिशत के 2 टैक्स स्लैब रखे गए हैं और कुछ दरों को पूरी तरह से हटा दिया गया है, जिससे ग्राहकों को 10 प्रतिशत तक की बचत होने का अनुमान है। नई जीएसटी व्यवस्था में टीवी, एसी, इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स पर विशेष तौर पर बचत होगी। रिपोर्ट के मुताबिक विगत तीन वर्षों में पहली बार शहरी उपभोक्ताओं के खर्च में वृद्धि देखी गई है। सिर्फ जुलाई महीने में 37.6 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने अपने गैर-जरूरी खर्च में वृद्धि की है।

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने बीते महीने एक सर्वे करवाया था, जिसके अनुसार इस साल सिर्फ रक्षा बंधन, गणेश पूजा, नवरात्रि और दिवाली के दौरान लगभग 4.80 लाख करोड़ रुपए के ऑफलाइन कारोबार होने का अनुमान है। दुकानदार और ऑनलाइन कम्पनियाँ जहां इन त्योहारों में आकर्षक ऑफर तथा डिस्काउंट की पेशकश कर ग्राहकों को रिझाने का प्रयास करते हैं, वहीं ग्राहक भी इन आकर्षक ऑफरों का लाभ उठाकर जमकर खरीदारी करते हैं। ऑनलाइन सेल में सामान सस्ता जरूर मिल रहा है मगर उपभोक्ता को सावधानी रखनी पड़ेगी क्योकि ठगी करने वाले गिरोह भी सक्रीय हो गए है। जो भोले भले लोगों को सस्ते माल के चक्कर में फंसा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे है। अधिकृत प्लेटफॉर्म का उपयोग करें। बैंक स्टेटमेंट और पासवर्ड सुरक्षा सुनिश्चित करें। कैश ऑन डिलीवरी अपनाएँ और फर्जी ऑफर्स से बचें। ऐसे में लोगों ने सतर्कता नहीं रखी तो सस्ते में माल खरीदना महंगा भी पड़ सकता है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32 मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

                                                                  

फिल्म अभिनेत्री स्मिता पाटिल और उनका फिल्म जगत में योगदान

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भारतीय सिनेमा में स्मिता पाटिल का नाम उन अभिनेत्रियों में लिया जाता है जिन्होंने अभिनय को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनाओं और स्त्री अस्मिता की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। स्मिता पाटिल भारतीय समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema) की सबसे प्रभावशाली हस्तियों में से एक थीं। उन्होंने बहुत कम समय में जो ऊँचाई हासिल की, वह आज भी अभिनेत्रियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्टूबर 1955 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। उनके पिता शिवाजी गणपतराव पाटिल एक प्रतिष्ठित राजनेता थे और माता विद्या पाटिल समाजसेवी। इस परिवेश ने स्मिता में बचपन से ही सामाजिक चेतना और संवेदनशीलता का भाव भरा। उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा ली और प्रारंभ में टेलीविजन समाचार वाचक के रूप में करियर की शुरुआत की।

फिल्मी करियर की शुरुआत

स्मिता पाटिल की फिल्मी यात्रा की शुरुआत श्याम बेनेगल की फिल्म चरम (1974) से हुई। बेनेगल जैसे निर्देशक के साथ काम करने से उन्हें “न्यू सिनेमा” या “आर्ट सिनेमा” आंदोलन का हिस्सा बनने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने भूमिका (1977), मंथन (1976), निशांत (1975) और आक्रोश (1980) जैसी फिल्मों में अपने अभिनय से सबको प्रभावित किया।

समानांतर सिनेमा की सशक्त अभिनेत्री

स्मिता पाटिल उन गिनी-चुनी अभिनेत्रियों में थीं जिन्होंने व्यावसायिक और समानांतर दोनों प्रकार के सिनेमा में सफलता पाई। समानांतर सिनेमा में उन्होंने महिलाओं की व्यथा, संघर्ष, और आत्मसम्मान को इतनी गहराई से दिखाया कि वे भारतीय स्त्री चेतना की प्रतीक बन गईं।

फिल्म भूमिका में उन्होंने एक ऐसी अभिनेत्री का किरदार निभाया जो अपने करियर और निजी जीवन के बीच जूझती रहती है। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मंथन में उन्होंने ग्रामीण भारत की एक सशक्त महिला की भूमिका निभाई, जो दूध आंदोलन में शामिल होती है। आक्रोश और अर्धसत्य में उन्होंने शहरी समाज की जटिलताओं और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली स्त्री के रूप में यादगार अभिनय किया।

व्यावसायिक फिल्मों में योगदान

स्मिता पाटिल ने केवल गंभीर फिल्मों तक अपने आप को सीमित नहीं रखा। उन्होंने व्यावसायिक सिनेमा में भी उल्लेखनीय भूमिकाएँ निभाईं। नमक हलाल, शक्ति, चक्र, आज की आवाज़ और दर्द का रिश्ता जैसी फिल्मों में उन्होंने यह सिद्ध किया कि वह किसी भी प्रकार के किरदार को सहजता से निभा सकती हैं। चक्र (1981) में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें दूसरी बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

अभिनय की विशेषताएँ

स्मिता पाटिल के अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता थी — सहजता और गहराई। उनकी आँखों की अभिव्यक्ति में भावनाओं का पूरा संसार झलकता था। वह संवाद से अधिक अपनी मौन अभिव्यक्ति से दर्शकों पर प्रभाव डालती थीं। उनके अभिनय में नाटकीयता नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई दिखाई देती थी।

वे चरित्र में पूरी तरह समा जाती थीं — चाहे वह गाँव की साधारण स्त्री हो या शहर की आधुनिक महिला। उनके किरदारों में एक आत्मविश्वास और स्वाभिमान झलकता था। यही कारण है कि वे महिलाओं के अधिकारों और आत्मनिर्भरता की प्रतीक बन गईं।

निजी जीवन और असमय मृत्यु

स्मिता पाटिल का निजी जीवन भी चर्चा में रहा। अभिनेता राज बब्बर के साथ उनके संबंधों ने मीडिया का ध्यान आकर्षित किया। विवाह के बाद उन्होंने 1986 में बेटे प्रतीक बब्बर को जन्म दिया, लेकिन प्रसव के कुछ ही दिनों बाद 13 दिसंबर 1986 को मात्र 31 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। यह भारतीय सिनेमा के लिए एक गहरा आघात था।

विरासत और सम्मान

स्मिता पाटिल के निधन के बाद भी उनका योगदान अमर है। भारतीय सिनेमा में उनके नाम से स्मृति पुरस्कार दिए जाते हैं। कई फिल्म संस्थान आज भी उनके अभिनय को अध्ययन का विषय मानते हैं। उनके नाम पर महाराष्ट्र सरकार द्वारा “स्मिता पाटिल पुरस्कार” स्थापित किया गया, जो श्रेष्ठ महिला कलाकारों को दिया जाता है।

निष्कर्ष

स्मिता पाटिल का जीवन भले ही छोटा रहा, लेकिन उन्होंने अपने अभिनय से भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी। उन्होंने दिखाया कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, समाज के परिवर्तन का माध्यम भी हो सकता है। उनकी फिल्में आज भी सामाजिक यथार्थ का आईना हैं और नई पीढ़ी की अभिनेत्रियों को प्रेरित करती हैं।

सैयद अहमद ख़ान: आधुनिक भारत के निर्माता

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परिचय

भारत के पुनर्जागरण काल में जिन व्यक्तित्वों ने समाज में ज्ञान, शिक्षा और आधुनिकता की अलख जगाई, उनमें सर सैयद अहमद ख़ान का नाम अत्यंत आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने भारतीय मुसलमानों को अंधविश्वास, धार्मिक जड़ता और शैक्षणिक पिछड़ेपन से निकालकर आधुनिक शिक्षा की ओर अग्रसर किया। वे न केवल एक विद्वान थे बल्कि समाज सुधारक, शिक्षाविद्, इतिहासकार और विचारक भी थे। उनका सबसे बड़ा योगदान था — अलीगढ़ आंदोलन और मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना, जिसने आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) का रूप लिया।


प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

सर सैयद अहमद ख़ान का जन्म 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली में एक सम्मानित मुगल परिवार में हुआ। उनके पिता मिर्ज़ा मुहम्मद मुतक्की मुगल दरबार से जुड़े हुए थे और माँ अज़ीज़ुन्निसा बेगम धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। घर का वातावरण विद्वत्ता और संस्कृति से ओतप्रोत था। बचपन में ही सैयद अहमद ख़ान को अरबी, फारसी और इस्लामी शिक्षा दी गई। साथ ही उन्होंने गणित, तर्कशास्त्र और प्राकृतिक विज्ञान की भी शिक्षा प्राप्त की।

मुगल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजी शासन की बढ़ती पकड़ के बीच उनका युवाकाल गुज़रा, जिसने उनके दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।


नौकरी और प्रारंभिक योगदान

सर सैयद ने 1838 में ईस्ट इंडिया कंपनी की न्यायिक सेवा में नौकरी शुरू की और कई स्थानों पर सरेस्तेदार और सदर आमीन के रूप में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने ब्रिटिश शासन की कार्यप्रणाली, प्रशासन और समाज का गहराई से अध्ययन किया। वे समझ गए कि अंग्रेज़ों की प्रगति का मूल कारण शिक्षा और विज्ञान है, जबकि भारतीय, विशेषकर मुसलमान, शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं।

उन्होंने अपनी सरकारी सेवाओं के दौरान कई किताबें लिखीं, जिनमें इतिहास, धर्म और समाज सुधार से संबंधित विषय शामिल थे। उनकी आरंभिक कृतियों में आसार-उस-सनादीद (दिल्ली के ऐतिहासिक स्मारकों पर) विशेष रूप से प्रसिद्ध है।


1857 का विद्रोह और दृष्टिकोण में परिवर्तन

1857 के स्वतंत्रता संग्राम ने सर सैयद के जीवन की दिशा बदल दी। उस समय वे बिजनौर में कार्यरत थे। उन्होंने देखा कि यह विद्रोह अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच एक गहरी खाई का कारण बन गया। अंग्रेज़ों ने मुसलमानों को विद्रोह का मुख्य दोषी ठहराया, जिससे उनकी स्थिति और बिगड़ गई।

सर सैयद ने इस स्थिति को सुधारने के लिए 1858 में “आसार-उस-सनादीद” के बाद “असबाब-ए-बगावत-ए-हिंद” नामक पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने बड़े साहस के साथ कहा कि विद्रोह का कारण केवल भारतीयों की बगावत नहीं थी, बल्कि अंग्रेज़ प्रशासन की गलत नीतियाँ और जनता से दूरी भी इसके लिए जिम्मेदार थीं। इस पुस्तक ने अंग्रेज़ी शासन को भी सोचने पर मजबूर कर दिया और मुसलमानों में शिक्षा के प्रति नई सोच जागी।


शैक्षिक जागरण और अलीगढ़ आंदोलन

1857 के बाद सर सैयद ने यह निश्चय कर लिया कि मुसलमानों की उन्नति का एकमात्र रास्ता आधुनिक शिक्षा है। उन्होंने साइंटिफिक सोसाइटी ऑफ ग़ाज़ीपुर (1864) की स्थापना की, जहाँ अंग्रेज़ी वैज्ञानिक और सामाजिक पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद किया जाता था ताकि आम मुसलमान उन्हें पढ़ सकें।

बाद में उन्होंने अलीगढ़ आंदोलन की शुरुआत की — एक ऐसा सामाजिक और शैक्षिक आंदोलन जिसने भारतीय मुसलमानों को पश्चिमी शिक्षा, आधुनिक सोच और विज्ञान की ओर अग्रसर किया।
1875 में उन्होंने मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (MAO College) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था अंग्रेज़ी और आधुनिक शिक्षा को इस्लामी संस्कारों के साथ जोड़ना। यही कॉलेज आगे चलकर 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) बन गया।


शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण

सर सैयद का मानना था कि किसी भी समाज की उन्नति का आधार शिक्षा है। वे धार्मिक और आधुनिक दोनों प्रकार की शिक्षा को आवश्यक मानते थे। उनका प्रसिद्ध कथन था —

“Without education, a nation remains in darkness.”
(“शिक्षा के बिना कोई भी कौम अंधकार में रहती है।”)

उन्होंने मुसलमानों को चेताया कि वे अंग्रेज़ों से घृणा न करें, बल्कि उनकी भाषा और विज्ञान सीखें ताकि वे प्रतिस्पर्धा में पीछे न रहें। उन्होंने कहा कि कुरान विज्ञान और तर्क के विरोध में नहीं है, बल्कि ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है।


धर्म और विज्ञान का संतुलन

सर सैयद इस्लाम के एक ऐसे व्याख्याकार थे जिन्होंने धर्म और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने कुरान की व्याख्या करते समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया और कहा कि “धर्म का उद्देश्य मानवता, नैतिकता और तर्क का पालन है।”

उनकी व्याख्या को कई कट्टरपंथी मौलवियों ने विरोध भी किया और उन्हें “काफ़िर” तक कहा गया, परंतु सर सैयद अपने विचारों पर अडिग रहे। उनका मानना था कि इस्लाम और विज्ञान में कोई विरोध नहीं है; दोनों का लक्ष्य सत्य की खोज है।


अलीगढ़ आंदोलन का प्रभाव

अलीगढ़ आंदोलन केवल एक शैक्षणिक सुधार आंदोलन नहीं था, बल्कि यह भारतीय मुसलमानों की सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक था। इस आंदोलन से प्रेरित होकर मुसलमानों ने पत्रकारिता, साहित्य, राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की।
इस आंदोलन से निकले कई छात्र आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाज सुधार के अग्रणी बने।

अलीगढ़ आंदोलन ने मुस्लिम राष्ट्रीयता की भावना को भी जन्म दिया, जिसने बाद में भारत-पाक विभाजन के राजनीतिक आधारों को प्रभावित किया। हालांकि सर सैयद का उद्देश्य विभाजन नहीं, बल्कि मुसलमानों का शैक्षिक और सामाजिक उत्थान था।


राजनीतिक विचारधारा

सर सैयद की राजनीति “वफादारी के बदले अधिकार” की नीति पर आधारित थी। वे ब्रिटिश शासन से टकराव के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि जब तक मुसलमान शिक्षित नहीं होंगे, वे शासन में भागीदारी के योग्य नहीं बन सकते। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता का भी समर्थन किया, लेकिन समय के साथ वे यह समझने लगे कि दोनों समुदायों के सामाजिक और राजनीतिक हित अलग-अलग हैं।

उनका यह कथन प्रसिद्ध है —

“हिंदू और मुसलमान एक ही मिट्टी के दो फूल हैं, जो एक ही बाग़ में खिले हैं, लेकिन उनकी खुशबू अलग-अलग है।”


सम्मान और उपाधियाँ

ब्रिटिश सरकार ने सर सैयद अहमद खान की सेवाओं को देखते हुए उन्हें 1869 में “सर” की उपाधि और Knight Commander of the Star of India (KCSI) से सम्मानित किया। वे रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के सदस्य भी रहे। उन्होंने अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट नामक पत्रिका शुरू की, जिसमें समाज सुधार और शिक्षा से जुड़ी बातें प्रकाशित होती थीं।


अंतिम जीवन और निधन

अपने अंतिम वर्षों में सर सैयद ने अलीगढ़ में ही रहकर कॉलेज के विकास और विद्यार्थियों के मार्गदर्शन में जीवन व्यतीत किया। वे कमजोर मुसलमान समाज को आत्मनिर्भर, शिक्षित और आधुनिक बनाना चाहते थे।
27 मार्च 1898 को अलीगढ़ में 80 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय परिसर में ही दफ़नाया गया। आज भी उनका मकबरा अलीगढ़ की भूमि पर प्रेरणा का प्रतीक है।


निष्कर्ष

सर सैयद अहमद खान आधुनिक भारत के उन विरल व्यक्तित्वों में से हैं जिन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु का निर्माण किया। उन्होंने भारतीय मुसलमानों को आत्ममंथन, शिक्षा और तर्क की दिशा में अग्रसर किया।

उनकी सोच आज भी प्रासंगिक है — जब समाज धर्म, भाषा और जाति के नाम पर बँटता जा रहा है, तब सर सैयद का संदेश याद दिलाता है कि सच्ची प्रगति केवल शिक्षा, सहिष्णुता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही संभव है।
वास्तव में, वे न केवल मुसलमानों के बल्कि पूरे भारतवर्ष के आधुनिकता के अग्रदूत थे।

आज के दिन हुई भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना

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17 अक्टूबर 1920 को ताशकंद में एक बैठक हुई, जिसमें कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के सिद्धांतों के आधार पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया। इसमें सात व्यक्ति उपस्थित थे; रॉय, अबानी मुखर्जी, आचार्य, मोहम्मद शफीक सिद्दीकी, मोहम्मद अली (अहमद हसन), एवलिन ट्रेंट-रॉय और रोजा फिटिंगोव।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भारत के सबसे पुराने राजनीतिक दलों में से एक है । हालाँकि, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर इस बात पर विवाद है कि पार्टी की स्थापना की तिथि क्या मानी जाए। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का प्रारंभिक इतिहास उथल-पुथल भरा और जटिल था। 1920 में ताशकंद में एमएन रॉय के नेतृत्व में एक भारतीय कम्युनिस्ट समूह का उदय हुआ। 1921 के बाद से भारत के अंदर छोटे-छोटे स्थानीय कम्युनिस्ट समूह उभरने लगे। 1925 में कानपुर में एक राष्ट्रीय कम्युनिस्ट सम्मेलन आयोजित किया गया । भारत के अंदर एक कम्युनिस्ट पार्टी संगठन बनाने के प्रयासों में पार्टी के प्रमुख सदस्यों की गिरफ़्तारियों और अदालती मुकदमों के कारण बाधाएँ आईं।

1964 में पार्टी विभाजन के बाद , भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की दो प्रमुख इकाइयाँ, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (सीपीआई(एम)) और समकालीन सीपीआई, पार्टी के प्रारंभिक इतिहास की अलग-अलग व्याख्या करने लगीं। सीपीआई(एम) का कहना है कि पार्टी की स्थापना अक्टूबर 1920 में ताशकंद में हुई थी, जबकि सीपीआई का तर्क है कि पार्टी की स्थापना दिसंबर 1925 में कानपुर में हुई थी।

1917 की अक्टूबर क्रांति से पहले भारतीय राष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन पर मार्क्सवाद का कुछ प्रभाव था । प्रवासी क्रांतिकारी लाला हरदयाल ने मार्च 1912 में कार्ल मार्क्स पर एक जीवनी लिखी । स्वदेशी मणि रामकृष्ण पिल्लई ने मलयालम भाषा में मार्क्स पर एक जीवनी लिखी । हालाँकि, ऐसा प्रतीत नहीं होता कि 1921 से पहले भारत में कोई संगठित कम्युनिस्ट गतिविधि मौजूद थी।

प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत में उग्र राष्ट्रवादियों का एक वर्ग यह उम्मीद लगाए बैठा था कि युद्ध में ब्रिटिश की हार भारतीय स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करेगी। हालांकि, जब यूनाइटेड किंगडम विश्व युद्ध में विजयी शक्तियों में से एक के रूप में उभरा, तो इस वर्ग ने अपनी स्थिति को संशोधित किया कि स्वतंत्रता बाहरी सहायता से हासिल की जाएगी। उग्र राष्ट्रवादियों के बीच छिटपुट आतंकवाद की अस्वीकृति भी बढ़ गई थी। 7 मई 1919 को लेनिन और कई भारतीय क्रांतिकारियों के बीच एक बैठक हुई। उपस्थित लोगों में राजा महेंद्र प्रताप ( 1915 में काबुल में जर्मन समर्थन से स्थापित भारत की अनंतिम सरकार के अध्यक्ष ), मोहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली (उक्त अनंतिम सरकार के प्रधान मंत्री), अब्दुल रब और एमपीटी आचार्य शामिल थे। आचार्य बाद में अक्टूबर 1920 में ताशकंद में प्रवासी कम्युनिस्ट संगठन के गठन में भाग लेंगे।

जनवरी और अप्रैल 1920 के बीच कुछ उग्र भारतीय राष्ट्रवादी सोवियत तुर्किस्तान के ताशकंद में स्थानांतरित हो गए । 17 अप्रैल 1920 को ताशकंद में सोविन्टरप्रॉप का एक भारतीय कम्युनिस्ट सेक्शन बनाया गया, जिसके सात सदस्यों में अब्दुल मजीद, अब्दुल फाज़िल, मोहम्मद शफीक और मोहम्मद अली थे (बाद के दो को भारत की अनंतिम सरकार द्वारा ताशकंद भेजा गया था)। भारतीय सोविन्टरप्रॉप सेक्शन ने ज़मींदार नामक एक एकल-अंकीय उर्दू प्रकाशन और बोल्शेविज़्म एंड द इस्लामिक नेशंस (एम. बरकतुल्लाह द्वारा लिखित) और व्हाट सोवियत पावर इज़ लाइक नामक पुस्तिकाएँ प्रकाशित कीं। इसने “भारतीय भाइयों के नाम ” शीर्षक से एक अपील जारी की।

एमएन रॉय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की दूसरी विश्व कांग्रेस की शुरुआत से पहले मास्को पहुंचे , जो जुलाई-अगस्त 1920 में आयोजित की गई थी। उन्होंने कांग्रेस में मेक्सिको की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हुए मतदान के अधिकार वाले प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया । अबानी मुखर्जी (कांग्रेस आयोजकों द्वारा ‘वामपंथी समाजवादी’ के रूप में वर्गीकृत, गैर-मतदान प्रतिनिधि), एवलिन ट्रेंट-रॉय (गैर-मतदान प्रतिनिधि, एमएन रॉय की पत्नी), एमपीटी आचार्य (ताशकंद में भारतीय क्रांतिकारी संघ का प्रतिनिधित्व, गैर-मतदान प्रतिनिधि) और मोहम्मद शफीक (पर्यवेक्षक) ने भी कांग्रेस में भाग लिया। कांग्रेस के दौरान रॉय और अन्य लोगों द्वारा भारतीय क्रांति के लिए सामान्य योजना और कार्य कार्यक्रम नामक एक दस्तावेज का मसौदा तैयार किया गया था।

कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की दूसरी कांग्रेस ने भारत की एक प्रवासी कम्युनिस्ट पार्टी के गठन की रूपरेखा तैयार की। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कार्यकारी समिति ( ईसीसीआई) ने एक छोटा ब्यूरो स्थापित किया जिसने सितंबर 1920 में बाकू में पूर्व के लोगों की पहली कांग्रेस का आयोजन किया और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गठन की तैयारियों की देखरेख की।

17 अक्टूबर 1920 को ताशकंद में एक बैठक हुई, जिसमें कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के सिद्धांतों के आधार पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया। इसमें सात व्यक्ति उपस्थित थे; रॉय, अबानी मुखर्जी, आचार्य, मोहम्मद शफीक सिद्दीकी, मोहम्मद अली (अहमद हसन), एवलिन ट्रेंट-रॉय और रोजा फिटिंगोव। बैठक में यह संकल्प लिया गया कि पार्टी भारतीय संदर्भ में क्रांतिकारी संघर्ष के लिए एक कार्यक्रम तैयार करेगी। बैठक इंटरनेशनेल पर हस्ताक्षर के साथ समाप्त हुई । पार्टी ब्यूरो कुछ समय के लिए ताशकंद में रहा। पार्टी ने प्रचार और वैचारिक गतिविधियों का संचालन किया और भारत के अंदर कम्युनिस्ट समूहों के प्रयासों का समन्वय करने की कोशिश की। इंडिया हाउस में एक राजनीतिक स्कूल चल रहा था, 1920 के अंत तक मुखर्जी ने पार्टी कार्यक्रम का एक मसौदा साझा किया, लेकिन इस दस्तावेज़ को रॉय ने अस्वीकार कर दिया और इस प्रकार इसे अपनाया नहीं गया।

इंडिया हाउस में ‘मुहाजिरों’ का एक समूह रहता था। ‘मुहाजिर’ भारतीय मुसलमानों का एक समूह था जो खिलाफत की रक्षा के लिए लड़ने के लिए तुर्की पहुँचने का प्रयास कर रहा था, लेकिन रास्ते में उन्हें मध्य एशियाई विद्रोहियों ने बंदी बना लिया और काफिर करार दे दिया। जब लाल सेना ने मुहाजिरों को बचाया , तो उनमें से 36 बोल्शेविक सैन्य टुकड़ियों में शामिल हो गए। मुहाजिरों के लिए युवा बुखारन (जो ताशकंद में एक कम्युनिस्ट पार्टी बना रहे थे) एक उदाहरण के रूप में कार्य करते थे। सोवियत भूमि सुधारों ने मुहाजिरों के राजनीतिक विचारों को भी प्रभावित किया। रॉय ताशकंद के भारतीय सैन्य स्कूल में लगभग 50 मुहाजिरों का दाखिला कराने में सफल रहे, जिससे उन्हें भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में भाग लेने के लिए तैयार किया गया। इंडिया हाउस में अखिल-इस्लामी मुहाजिर और रॉय का कम्युनिस्ट समूह एक साथ रहते थे। कम्युनिस्ट अक्सर राजनीतिक व्याख्यान देते थे, जिनमें वे ब्रिटिश शासन का सामना करने के लिए एक क्रांतिकारी जन आंदोलन बनाने पर ज़ोर देते थे (खासकर कम्युनिस्ट व्याख्यानों में धर्म पर सीधे हमले से परहेज़ किया जाता था)। इंडिया हाउस के मुहाजिर शौकत उस्मानी अंततः कम्युनिस्ट समूह में शामिल हो गए।

प्रवासी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 15 दिसंबर 1920 को ताशकंद में एक पार्टी बैठक आयोजित की। एक तीन-सदस्यीय कार्यकारी समिति चुनी गई, जिसमें आचार्य (अध्यक्ष), शफीक (सचिव) और रॉय शामिल थे। बैठक में तीन लोगों को पार्टी के उम्मीदवार सदस्य के रूप में शामिल किया गया – अब्दुल कादिर सेहराई, मसूद अली शाह काजी और अकबर शाह (सलीम)। पाँच दिन बाद पार्टी ने तुर्किस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के तुर्किस्तान ब्यूरो को एक संक्षिप्त संदेश भेजा, जिसमें पुष्टि की गई कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के सिद्धांतों के अनुसार की गई है और पार्टी तुर्किस्तान ब्यूरो के राजनीतिक मार्गदर्शन में काम कर रही है।

1921 की शुरुआत में रॉय मास्को चले गए और अपने साथ तीन छात्रों (उस्मानी, अब्दुल मजीद, अब्दुल कादिर सेहराई) को आगे की राजनीतिक ट्रेनिंग के लिए ले गए। मुखर्जी को ताशकंद में पार्टी ब्यूरो का प्रभारी बना दिया गया। [ 9 ] मार्च 1921 में एंग्लो-सोवियत व्यापार समझौते के बाद , जिसने रूसी गृहयुद्ध को काफी हद तक समाप्त कर दिया, कुछ 36-40 मुहाजिरों ने आगे की ट्रेनिंग प्राप्त करने की इच्छा जताई और 1921 के मध्य तक उन्हें मास्को में कम्युनिस्ट यूनिवर्सिटी ऑफ द टॉयलर्स ऑफ द ईस्ट में स्थानांतरित कर दिया गया। कुछ मुहाजिरों ने सोवियत रूस से लौटना शुरू कर दिया, जैसे उस्मानी। उनमें से कई को पेशावर षडयंत्र मामले में ब्रिटिश अधिकारियों ने आरोपी बनाया और दोषी ठहराया।

कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने ईसीसीआई और तुर्केस्तान ब्यूरो के माध्यम से भारतीय क्रांतिकारियों के संगठनात्मक और राजनीतिक मुद्दों को हल करने की मांग की। 1921 की पहली छमाही में दो समूहों ने मास्को में प्रतिनिधिमंडल भेजे। प्रतिनिधिमंडलों में से एक ताशकंद स्थित भारतीय क्रांतिकारी संघ द्वारा भेजा गया था जिसका नेतृत्व अब्दुर रब बर्क कर रहे थे। सोवियत की राजधानी का दौरा करने वाला दूसरा समूह बर्लिन से आया था, और इसमें वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय , जीएके लोहानी , भूपेंद्रनाथ दत्ता , पांडुरंग सदाशिव खानखोजे , नलिनी गुप्ता और एग्नेस स्मेडली शामिल थे। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के पूर्वी आयोग और भारत आयोग ने रॉय, अब्दुल रब समूह और चट्टोपाध्याय समूह के नेतृत्व वाले ताशकंद प्रवासी सीपीआई का विलय करने की मांग की, लेकिन इन प्रयासों से कोई संगठनात्मक एकता हासिल नहीं हुई। जबकि चट्टोपाध्याय प्रतिनिधिमंडल के 14 सदस्यों में से अधिकांश ने अविश्वास में मास्को छोड़ दिया, दो व्यक्ति बने रहे (एक ने कम्युनिस्ट इंटरनेशनल मुख्यालय में काम किया जबकि दूसरी, नलिनी गुप्ता, रॉय की प्रमुख सहायक बन गईं)।

कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की तीसरी विश्व कांग्रेस से पहले ईसीसीआई के लघु ब्यूरो ने परामर्शदात्री वोट के साथ प्रतिनिधिमंडल भेजने के लिए आमंत्रित संगठनों की सूची में भारत के ‘कम्युनिस्ट समूहों’ को सूचीबद्ध किया। भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले चार प्रतिनिधियों ने कार्यवाही में भाग लिया, लेकिन कांग्रेस के दस्तावेजों में केवल रॉय का नाम था।

रॉय ने 36वीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए अहमदाबाद, 1921 में घोषणापत्र लिखा । यह पाठ गुप्त रूप से भारत पहुँचा और दिसंबर 1921 में अहमदाबाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में वितरित किया गया।

− रजनीकांत शुक्ला