जनरेशन अल्फ़ा की बेचैन बुद्धिमत्ता

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“मुझे नियम पता हैं, कृपया उन्हें समझाना शुरू मत कीजिए”

आज के बच्चों की आँखों में ज्ञान की नहीं, प्रतिक्रिया की चमक है। वे सुनना नहीं चाहते, क्योंकि हमने उन्हें सुना ही नहीं। “मुझे नियम पता हैं, कृपया उन्हें समझाना शुरू मत कीजिए” – यह वाक्य केवल एक बाल संवाद नहीं, बल्कि आधुनिक पालन-पोषण की थकान, असुरक्षा और भावनात्मक दूरी का आईना है। जब बच्चा यह कहता है, वह नियम नहीं, रिश्ते के स्वरूप पर सवाल उठा रहा होता है। यह समय बच्चों को अनुशासन नहीं, संवाद सिखाने का है — वरना आने वाला समाज समझदार तो होगा, पर संवेदनशील नहीं।

✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ

जब मैंने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में दस वर्षीय बालक इशित का वह दृश्य देखा जिसमें उसने अमिताभ बच्चन से कहा – “मुझे नियम पता हैं, कृपया उन्हें समझाना शुरू मत कीजिए”, तो मैं तनिक भी अचंभित नहीं हुई। मैंने ऐसे अनेक बालक देखे हैं जिनके शब्दों में आयु से अधिक प्रौढ़ता होती है, पर भावनाओं में बचपन कहीं पीछे छूट जाता है।

समाज माध्यमों पर किसी ने उसे घमंडी कहा, किसी ने कहा कि माता–पिता ने संस्कार नहीं दिए। पर सच्चाई इन त्वरित प्रतिक्रियाओं से कहीं अधिक गहरी है। वह बालक दरअसल एक पूरी पीढ़ी का दर्पण था – वह पीढ़ी जिसे हम अल्फा पीढ़ी कहते हैं, सबसे तेज़, सबसे अधीर और सबसे अस्थिर पीढ़ी।

ये बच्चे उस युग में पल रहे हैं जहाँ हर प्रश्न का उत्तर एक स्पर्श भर की दूरी पर है। इनके बचपन में खेलों की जगह मोबाइल है, साथियों की जगह परदे की चमक है। इन्हें सब कुछ “तुरंत” चाहिए – उत्तर भी, ध्यान भी, प्रशंसा भी। पर इस तात्कालिकता की कीमत चुकानी पड़ रही है। उनके मस्तिष्क का वह भाग जो धैर्य, निर्णय और भावनाओं का नियंत्रण संभालता है, परिपक्व होने से पहले ही सूचना की बाढ़ में बह जाता है। परिणाम यह कि विचार की गति बहुत तेज़ हो गई है, पर नियंत्रण की क्षमता कमज़ोर होती जा रही है। ये बच्चे जानते बहुत हैं, पर ठहरकर सुनना नहीं जानते।

इशित का व्यवहार उसी बेचैनी का प्रतीक था। उसके शब्दों में आत्मविश्वास था, पर उस आत्मविश्वास के पीछे एक छिपा हुआ भय भी था। जिस आयु में बच्चों को प्रश्न पूछने चाहिए, वह उत्तर देने को उतावला था। यह केवल एक बच्चे की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक स्थिति का संकेत है। यह व्यवहार किसी मानसिक रोग का नहीं, बल्कि असंतुलित विकास का परिणाम है। जब कोई बच्चा हर समय आगे बोलने, अपने को सही सिद्ध करने और ध्यान आकर्षित करने में लगा रहे, तो वह भीतर से किसी अदृश्य दबाव में जी रहा होता है।

अक्सर ऐसे बच्चे किसी अदृश्य प्रतियोगिता में बंधे रहते हैं। वे यह मान लेते हैं कि उन्हें हर हाल में बुद्धिमान और सफल दिखना ही है। उनका यह दिखावटी आत्मविश्वास एक परदे की तरह होता है जिसके पीछे असुरक्षा, डर और प्रदर्शन की चिंता छिपी रहती है। इशित ने जब कहा – “यदि मैं बारह लाख रुपये नहीं जीत पाया तो मुझे आपके साथ चित्र खिंचवाने की अनुमति नहीं होगी”, तब यह स्पष्ट था कि उसके आत्म–मूल्य को उपलब्धि से जोड़ दिया गया है। यह दबाव परिवार, विद्यालय और समाज तीनों की अपेक्षाओं से उपजता है।

आज के माता–पिता अपने बच्चों की बुद्धि और जीत की प्रशंसा करते हैं, पर उनकी भावनाओं पर कम ध्यान देते हैं। बच्चों को चतुर बनाना प्राथमिकता है, संयमी बनाना नहीं। यह भूल जाना कि बच्चों की सीखने की सबसे बड़ी शक्ति उनका अनुकरण है। वे हमारे शब्दों से नहीं, हमारे व्यवहार से सीखते हैं। यदि घर में झुँझलाहट, अधैर्य और कटुता है, तो वही रूप वे समाज में दोहराएँगे। परिवार में जो स्वभाव बीज की तरह बोया जाता है, वही समाज में वृक्ष बनकर उगता है।

विद्यालयों में भी यही दृश्य है। सातवीं कक्षा का विद्यार्थी कहता है – “मुझे सब कुछ पहले से ज्ञात है।” आठवीं की छात्रा समाज माध्यमों पर मिले प्रेम और लोकप्रियता के जाल में उलझकर टूट जाती है। यह केवल अभिभावकों की भूल नहीं, बल्कि उस शिक्षा प्रणाली की भी है जो हर बालक से एक समान गति और परिणाम की अपेक्षा रखती है। जो बच्चा उस साँचे में फिट नहीं बैठता, वह विद्रोही कहलाता है। कभी–कभी उसका विद्रोह केवल अपनी असंगति का स्वर होता है, अपराध नहीं।

हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हमने ज्ञान को तेज़ी का पर्याय बना दिया है। तकनीकी निपुणता को परिपक्वता समझ लिया है। पर असली संकट यह है कि हमारी नई पीढ़ी भावनात्मक रूप से अस्थिर होती जा रही है। वह बाहर की दुनिया से तो संवाद करती है, पर अपने भीतर से नहीं। विद्यालय, उपकरण और समाज की स्पर्धा ने बच्चों से बचपन का ठहराव छीन लिया है। अब जो बच्चा शांत है, उसे “धीमा” कहा जाता है, और जो शोर करता है वही “सफल” कहलाता है। यही हमारी सभ्यता का उलटापन है।

समस्या बच्चे में नहीं, हमारी दृष्टि में है। हमने बच्चों को बोलना सिखाया, पर सुनना नहीं; ज्ञान दिया, पर संवेदना नहीं। हमने उन्हें उपलब्धि का पाठ पढ़ाया, पर संतुलन का नहीं। इसीलिए आज जो बच्चा अपनी भावना व्यक्त करता है, उसे तुरंत दोषी ठहरा दिया जाता है – “संस्कारहीन”, “घमंडी”, “बाग़ी”। पर वह बच्चा केवल हमारी अपनी अधीरता का प्रतिबिंब है। हमारे घर, हमारे विद्यालय और हमारा समाज मिलकर उस मासूम मन को एक मशीन में बदल रहे हैं जो बोलता तो बहुत है पर समझता कम है। अब शिक्षा में प्रतियोगिता है, पालन–पोषण में प्रदर्शन है और समाज में तुलना है। इन तीनों ने मिलकर बच्चे के मन से उसकी सहजता छीन ली है।

अब आवश्यकता है सोच और प्रणाली दोनों को बदलने की। बच्चों को केवल ज्ञान नहीं, संवेदना की शिक्षा चाहिए। उन्हें जीतना नहीं, ठहरना सिखाना होगा। यदि हमने यह दिशा नहीं बदली तो विनम्रता और धैर्य जैसी गुणों को ही असामान्यता कहा जाएगा। समाज उस ओर बढ़ रहा है जहाँ शांत व्यक्ति को कमजोर माना जाएगा और चिल्लाने वाले को सफल। यह वह खतरनाक दौर है जहाँ सभ्यता की जड़ें सूखने लगती हैं।

विडंबना यह भी है कि जिन वयस्कों ने उस बालक की आलोचना की, वे स्वयं समाज माध्यमों पर गुस्सा, असम्मान और अपशब्दों की भाषा बोलते हैं। जो पीढ़ी स्वयं संयम खो चुकी है, वह बच्चों को मर्यादा कैसे सिखा सकती है? यही सबसे गहरी चिंता है।

वह बालक दोष नहीं, संकेत है। वह हमें यह दिखाता है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। हम तकनीकी रूप से निपुण, पर मानसिक रूप से थके हुए नागरिक गढ़ रहे हैं। वह बालक हमारे भीतर की हड़बड़ी, हमारी अपेक्षाओं और हमारे असंतुलन का आईना है। उसे डाँटने की नहीं, समझने की आवश्यकता है। हर अति–चतुर बच्चे के भीतर एक उज्ज्वल परंतु डरा हुआ मन छिपा है, जिसे दबाने की नहीं, दिशा देने की ज़रूरत है।

जब तक हम बच्चों को उपलब्धि से अधिक संवेदना, और बुद्धि से अधिक विनम्रता का पाठ नहीं पढ़ाएँगे, तब तक वे हमारी अधूरी आकांक्षाओं के बोझ तले पलते रहेंगे। वह बालक दरअसल हमारा ही प्रतिबिंब था — और शायद अब डर हमें उस प्रतिबिंब से होना चाहिए, जिससे हम मुँह फेरते जा रहे हैं।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

(स्वतंत्र लेखिका, शिक्षाविद् और सामाजिक विश्लेषक)

इंस्टाग्राम पर आपत्तिजनक कंटेंट न देख पाये किशोर

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इंस्टाग्राम ने 18 वर्ष से कम उम्र के किशोरों को आपत्तिजनक कंटेंट से दूर रखने के लिए PG-13 आधारित फ़िल्टर प्रणाली लागू की है। इससे नाबालिग यूज़र्स हिंसक, यौन या मानसिक रूप से हानिकारक सामग्री नहीं देख पाएंगे। माता-पिता अब “सीमित कंटेंट सेटिंग्स” से बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रख सकेंगे। यह कदम सोशल मीडिया पर किशोरों की सुरक्षा और मानसिक संतुलन की दिशा में एक बड़ी पहल है। यदि इसे गंभीरता से लागू किया गया, तो यह स्वस्थ और जिम्मेदार डिजिटल समाज के निर्माण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

डिजिटल युग में सोशल मीडिया आज जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। बच्चा हो या बड़ा, सबकी दिनचर्या का एक अहम समय इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर बीतता है। लेकिन जैसे-जैसे इस आभासी दुनिया की चमक बढ़ी है, वैसे-वैसे इससे जुड़े खतरे भी गहराते गए हैं। सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं किशोर, जिनकी सोच, मनोवृत्ति और व्यवहार अभी विकसित हो ही रहे हैं। सोशल मीडिया की चकाचौंध में खोए किशोरों के लिए यह प्लेटफॉर्म कभी-कभी सीख का माध्यम तो बनता है, परंतु कई बार यह मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक असंतुलन का कारण भी बन जाता है। इन्हीं चिंताओं को देखते हुए इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा ने एक बड़ा कदम उठाया है। कंपनी ने घोषणा की है कि अब 18 वर्ष से कम आयु के किशोर अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर आपत्तिजनक या अनुचित कंटेंट नहीं देख पाएंगे।

यह फैसला केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। किशोरावस्था वह समय है जब व्यक्ति का मन सबसे संवेदनशील होता है। इस उम्र में जो कुछ देखा, सुना और महसूस किया जाता है, वही आने वाले जीवन की दिशा तय करता है। सोशल मीडिया पर हिंसक, यौन संकेतक या अवसादपूर्ण सामग्री तक आसान पहुँच बच्चों को अनजाने में ऐसे रास्ते पर ले जाती है जहाँ से लौटना कठिन हो जाता है। आत्महत्या की प्रवृत्ति, अवसाद, असुरक्षा और आत्मसम्मान की कमी जैसी मानसिक समस्याएँ सोशल मीडिया की असंयमित दुनिया से गहराई तक जुड़ी हुई हैं। ऐसे में मेटा का यह निर्णय निश्चय ही एक जिम्मेदार पहल है।

मेटा ने यह नीति ऐसे समय में बनाई है जब दुनिया भर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर बहस चल रही है। कई देशों की संसदों और अदालतों में सोशल मीडिया कंपनियों से यह पूछा गया कि वे नाबालिगों की मानसिक सुरक्षा के लिए क्या कदम उठा रही हैं। इंस्टाग्राम पर किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर कंपनी पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। अमेरिकी कांग्रेस से लेकर ब्रिटिश संसदीय समितियों तक में यह मुद्दा गूंज चुका है। मेटा के पूर्व कर्मचारियों ने भी यह खुलासा किया था कि इंस्टाग्राम का एल्गोरिद्म किशोरों को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म से जोड़ने के लिए जानबूझकर ऐसे कंटेंट सुझाता है जो मानसिक रूप से अस्थिर कर सकता है। आलोचनाओं के बाद कंपनी ने ‘पैरेंटल सुपरविजन टूल्स’ शुरू किए थे, लेकिन वे सीमित थे। अब कंपनी ने इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए “PG-13 आधारित कंटेंट फ़िल्टरिंग सिस्टम” लागू करने का निर्णय लिया है।

इस नई व्यवस्था के तहत माता-पिता को यह अधिकार होगा कि वे अपने बच्चों की गतिविधियों पर निगरानी रख सकें। 18 वर्ष से कम आयु के यूजर्स को इंस्टाग्राम पर वह सामग्री स्वतः ही नहीं दिखाई देगी जो हिंसक, यौन या आत्मघाती प्रवृत्ति वाली हो। यह प्रणाली फ़िल्टर के माध्यम से काम करेगी जो हॉलीवुड फिल्मों की PG-13 रेटिंग प्रणाली की तरह होगी। जैसे किसी फिल्म को यह रेटिंग तब दी जाती है जब वह 13 वर्ष से ऊपर के बच्चों के लिए उपयुक्त मानी जाती है, वैसे ही अब इंस्टाग्राम पर भी कंटेंट की उपयुक्तता उसी मानक से तय की जाएगी। कंपनी का दावा है कि यह फीचर पहले अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में लागू होगा और वर्ष के अंत तक भारत सहित दुनिया भर में लागू कर दिया जाएगा।

यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत सोशल मीडिया यूजर्स के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में है। लाखों किशोर रोजाना इंस्टाग्राम पर सक्रिय हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे सेल्फी पोस्ट करने, रील्स बनाने और लाइक्स पाने की दौड़ में इतने उलझ गए हैं कि वास्तविक जीवन की संवेदनाएं और प्राथमिकताएं पीछे छूटती जा रही हैं। किशोरों का आत्ममूल्य अब इस बात से तय होने लगा है कि उन्हें कितने फॉलोअर्स मिले, कितने लोगों ने उनकी पोस्ट को पसंद किया। यह सामाजिक स्वीकृति का नया और खतरनाक रूप है। जब किसी पोस्ट पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो किशोर आत्मग्लानि और अवसाद में डूबने लगते हैं। कई बार इसी निराशा में वे आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं। ऐसे में अगर इंस्टाग्राम किशोरों को आपत्तिजनक सामग्री से दूर रख सके तो यह उनके मानसिक संतुलन और भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत लाभकारी होगा।

माता-पिता भी इस कदम से राहत महसूस करेंगे। अब उन्हें यह डर नहीं रहेगा कि उनका बच्चा गलती से किसी गलत दिशा में जा रहा है या अश्लील सामग्री के प्रभाव में आ रहा है। “सीमित कंटेंट सेटिंग्स” के ज़रिए वे यह तय कर पाएंगे कि उनके बच्चे को क्या दिखना चाहिए और क्या नहीं। इससे पारिवारिक संवाद भी बेहतर होगा क्योंकि अभिभावक अब निगरानी के साथ-साथ मार्गदर्शन की भूमिका निभा सकेंगे। बच्चों को भी यह एहसास होगा कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल करने का प्लेटफॉर्म है।

फिर भी यह नीति तभी सफल होगी जब तकनीकी सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी बढ़े। केवल फिल्टर लगाने से समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। बच्चे हमेशा तकनीक से एक कदम आगे रहते हैं। वे प्रतिबंधों को पार करने के तरीके खोज लेते हैं। इसलिए आवश्यक है कि स्कूलों, परिवारों और समाज में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा दिया जाए। बच्चों को यह समझाया जाए कि क्या सही है, क्या गलत है और क्यों कुछ चीज़ें सीमित की जा रही हैं। जब तक उन्हें कारणों की समझ नहीं होगी, वे प्रतिबंधों को नियंत्रण नहीं बल्कि विरोध के रूप में देखेंगे।

यह भी विचारणीय है कि “आपत्तिजनक सामग्री” की परिभाषा हर समाज और संस्कृति में अलग-अलग हो सकती है। जो एक देश में अनुचित माना जाता है, वह दूसरे में सामान्य हो सकता है। इसलिए वैश्विक स्तर पर लागू होने वाले ऐसे नियमों के लिए सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय भावनाओं का ध्यान रखना आवश्यक है। मेटा को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके एल्गोरिद्म स्थानीय भाषाओं और समाज की संवेदनशीलता को समझ सकें। भारत जैसे बहुभाषी देश में यह एक बड़ी चुनौती होगी।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सोशल मीडिया कंपनियों की प्राथमिकता प्रायः मुनाफा होती है, न कि नैतिकता। अधिक यूजर्स का मतलब अधिक विज्ञापन और अधिक राजस्व। ऐसे में किशोरों को प्लेटफॉर्म से दूर रखना या उनके कंटेंट को सीमित करना कंपनी के आर्थिक हितों के विपरीत जा सकता है। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि मेटा इस नई नीति को कितनी गंभीरता से लागू करता है। यदि यह केवल दिखावटी कदम साबित हुआ तो इसका उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।

सोशल मीडिया के नियमन की यह वैश्विक पहल सरकारों के लिए भी एक संकेत है। डिजिटल दुनिया इतनी प्रभावशाली हो चुकी है कि अब केवल नैतिक अपीलों से काम नहीं चलेगा। जैसे फिल्मों, विज्ञापनों और टीवी कार्यक्रमों पर सेंसरशिप की एक व्यवस्था होती है, वैसे ही सोशल मीडिया के लिए भी संतुलित और स्वतंत्र निगरानी संस्थान आवश्यक हैं। सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कंपनियां केवल नीतियां घोषित न करें बल्कि उनके पालन के लिए पारदर्शी तंत्र भी बनाएं। अभिभावकों को भी सशक्त किया जाए कि वे अपने बच्चों की डिजिटल आदतों पर नज़र रख सकें।

किशोरों को यह समझाने की ज़रूरत है कि इंस्टाग्राम पर लाइक्स या फॉलोअर्स से उनकी असली पहचान तय नहीं होती। आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और सामाजिक सहयोग ही जीवन के सच्चे मूल्य हैं। डिजिटल दुनिया असली दुनिया का विकल्प नहीं हो सकती। अगर बच्चे यह समझ जाएँ कि सोशल मीडिया एक साधन है, साध्य नहीं, तो उसकी सकारात्मक क्षमता अपार है।

मेटा का यह निर्णय केवल तकनीकी सुधार नहीं बल्कि एक मानव-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है। आज जब दुनिया के कई हिस्सों में किशोर आत्महत्या, साइबर बुलिंग और ऑनलाइन शोषण के शिकार हो रहे हैं, तब ऐसी पहलें उम्मीद की किरण बनती हैं। लेकिन इसके साथ यह भी ज़रूरी है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ पारदर्शिता बरतें। माता-पिता को नियमित रिपोर्ट्स मिलें, बच्चे स्वयं अपने डिजिटल व्यवहार का मूल्यांकन करें और शिक्षण संस्थान इस विषय को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाएं।

कई अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि सोशल मीडिया की अधिकता से किशोरों में चिंता, नींद की कमी और आत्मसंतुष्टि में गिरावट आती है। लगातार दूसरों से तुलना करने की प्रवृत्ति उन्हें हीनभावना की ओर धकेल देती है। “परफेक्ट बॉडी”, “ग्लैमरस लाइफस्टाइल” और “फिल्टर की दुनिया” में वे असलियत से कटते चले जाते हैं। मेटा यदि अपने नए सिस्टम के ज़रिए इन खतरों को कम कर सके तो यह समाज के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।

हालाँकि, इसे केवल किशोरों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। वयस्कों के लिए भी सोशल मीडिया पर नियंत्रण आवश्यक है। फेक न्यूज़, घृणास्पद भाषण और गलत सूचनाएँ अब लोकतंत्र के लिए चुनौती बन चुकी हैं। इसलिए इस दिशा में मेटा की पहल अन्य प्लेटफॉर्म्स के लिए भी मिसाल बन सकती है।

अंततः कहा जा सकता है कि यह निर्णय किशोरों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और नैतिक विकास के लिए अत्यंत सराहनीय कदम है। तकनीक तभी सार्थक होती है जब वह मानवता की भलाई के लिए काम करे। मेटा का यह कदम इसी भावना का विस्तार है। आने वाले समय में यदि यह नीति पूरी गंभीरता और पारदर्शिता से लागू होती है, तो यह न केवल किशोरों बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए एक स्वस्थ डिजिटल संस्कृति की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन साबित होगी।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

भाई-बहन के प्यार का अनमोल उपहार है भाई दूज

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बाल मुकुन्द ओझा

दिवाली और गोवर्धन पूजा के बाद देश में भाई दूज का त्योहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है। राखी की तरह ही भाई दूज भी भाई-बहन के प्यार और रिश्ते का प्रतीक है। इस दिन को भाई दूज या भैय्या दूज भी कहते हैं। इस साल भाई दूज का त्योहार 23 अक्टूबर, को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, 23 अक्टूबर 2025 को तिलक लगाने का सबसे शुभ समय दोपहर 1 बजकर 13 मिनट से 3 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। यह शुभ काल 2 घंटे 15 मिनट तक रहेगा, जिसमें बहनें अपने भाइयों को तिलक कर सकती हैं और उनके कल्याण की कामना करते हुए पूजा कर सकती हैं। माना जाता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने से भाई-बहन के ऊपर से अकाल मृत्यु का संकट टल जाता है।

भाई दूज का त्योहार भाई-बहन के रिश्ते को समर्पित होता है। भाईदूज एक ऐसा पर्व है जो भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। भाई दूज पर बहने अपने भाईयों को तिलक लगाती हैं। फिर भाई की आरती उतार कर उनकी लंबी उम्र की कामना करती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर यमुना जी ने यमराज को अपने घर पर टीका किया था और भोजन कराया था। इसी पूजा के बाद से ही यमराज को सुख – समृद्धि की प्राप्ति हुई और तभी से भाई दूज का पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है।

यह त्योहार देश भर में धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व को मनाने की विधि हर जगह एक जैसी नहीं है। उत्तर भारत में जहां यह चलन है कि इस दिन बहनें भाई को अक्षत और तिलक लगाकर नारियल देती हैं वहीं पूर्वी भारत में बहनें शंखनाद के बाद भाई को तिलक लगाती हैं और भेंट स्वरूप कुछ उपहार देती हैं। इस दिन भाई बहनों से मिलने उनके घर जाते हैं और बहने भी भाइयों के माथे पर तिलक कर उनकी लंबी आयु की कामना करती है।  उनकी आरती उतारती हैं।  वहीं, भाई भी बहनों के प्रति प्यार दिखाते हुए उन्हें उपहार देते हैं। 

धार्मिक कथा के अनुसार सूर्य देवता की पत्नी का नाम संज्ञा था तथा इनकी दो संताने थी। इनके पुत्र का नाम यमराज तथा पुत्री का नाम यमुना। यमदेव बहन यमुना से अलग रहते थे, लेकिन मिलने के लिए आते रहते थेद्य जब यम देव ने यमपुरी नगरी का निर्माण किया तो उनकी बहन यमुना भी उनके साथ रहने लगी। भाई यम के द्वारा यमपुरी में पापियों को दंड देते देख यमुना काफी दुखी होती थी। इसलिए वह यमपुरी का छोड़कर गो लोक में रहने चली गयी। कुछ समय बाद जब यमराज स्वयं गोलोक गए, तब उनकी भेट यमुना जी से हुई।

पौराणिक कथा के अनुसार देवी यमुना अपने भाई यमराज से बहुत प्रेम करती थी लेकिन वे दोनों लंबे समय तक मिल नहीं पाते थे। एक बार यम अचनाक दिवाली के बाद बहन यमुना से मिलने पहुंच गए।  खुशी में यामी ने तमाम तरह के पकवान बनाए और भाई यम के माथे पर तिलक किया। इससे खुश होकर उन्होंने यमुना से वरदान मांगने को कहा। इस पर यमुना ने अपने भाई से कहा कि वे चाहती हैं कि यम हर साल उनसे मिलने आएं और आज के बाद जो भी बहन अपने भाई के माथे पर तिलक करे उसे यमराज का डर न रहे। यमराज ने यमुना को ये वरदान दिया और उस दिन से भाई दूज का त्योहार मनाया जाने लगा। मान्यता है कि जो बहनें अपने भाई के तिलक करती हैं उनकी उम्र लंबी होती है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

इंडिया इज लाफिंग

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भारत ने जब अटल सरकार के जमाने में पोहकरण में परमाणु विस्फोट किया था तो सफलता मिलने पर सूचना के लिए एक कोड निर्धारित था । वह कोड था “buddha is smiling” अर्थात बुद्ध मुस्कुरा रहे हैं । जैसे ही महान वैज्ञानिक डॉ एपीजी अब्दुल कलाम का यह सफलता संदेश रेडियो से प्रसारित हुआ , देश में खुशी की लहर दौड़ गई । जो लोग दुनिया के खुशी इंडेक्स में भारत को नीचे दिखाते हैं , उन्हें पर्वकाल में भारत का दीदार करना चाहिए ।

वैसी ही लहर जीएसटी कम होने के बाद इस समय देश में फैली है । देख लीजिए देश में नेक्स्ट जनरेशन रिफॉर्म्स की शुरुआत हो चुकी है । नतीजा सामने है । दशहरे पर 4.5 लाख करोड़ और दिवाली पर 6 लाख करोड़ का खरीद कारोबार देश में हुआ । यह पाकिस्तान सहित 48 देशों की जीडीपी से ज्यादा है । नवरात्र में दुर्गा पूजा , गरबा ,दशहरा , करवा चौथ और अब दीपावली में भारतीय अर्थव्यवस्था ने जबरदस्त उड़ान भरी है ।

अभी छठ पूजा का विशाल पर्व सामने है । देखते जाइए , देवोत्थान एकादशी से प्रारंभ होने वाला विवाह सीजन एक बार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था को सातवें आसमान पर उठाएगा । अनुमान है कि शादी ब्याह का यह दौर एक बार फिर से इंडियन इकोनॉमी को हाई स्पीड प्रदान करेगा । वैश्विक चुनौतियों के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 208 प्रतिशत बढ़ना मजबूत भारतीय अर्थव्यवस्था का संकेत है । मुहूर्त कारोबार ने निवेशकों की पूंजी मात्र 1 घंटे में 1.50 लाख करोड़ बढ़ा दी है ।

त्यौहारों और विवाहों का सीजन भारतीय अर्थव्यवस्था को सदा से ऊंची उड़ान देता आया है । इस बार तो मालामाल कर दिया है । कुछ ही दिनों में स्वदेशी का मुद्दा भी खासी लोकप्रियता हासिल कर रहा है । दो दिन पहले मैं अपनी 7 वर्षीय पौत्री के साथ पटाखों की एक बड़ी शॉप पर आतिशबाजी लेने गया । हम खरीदारी कर रहे थे कि दुकानदार ने पूछा चाईनीज दे दूं । मैं कुछ बोलता उससे पहले ही बालिका बोल उठी कि नहीं अंकल इंडियन ।

कल्पना नहीं की थी कि परिवार में होने वाली बातों का छोटी बच्ची पर भी इतना असर पड़ेगा ? मतलब भारत स्वदेशी की ओर बढ़ेगा तो कायाकल्प हो जाएगा । तब ट्रंप की धमकियां भी बेअसर हो जाएंगी । देखिए एक दशक पहले तक जो आबादी हमारे लिए अभिशाप थी , वही अब वरदान बन गई है । 145 करोड़ का बाजार है हमारे पास । अपनी इसी शक्ति के दम पर हम जीत जाएंगे , जरूर जीत जाएंगे एक दिन ?

यही कहेंगे –

बुद्धा इज़ लाफिंग

इंडिया इज लाफिंग

….. कौशल सिखौला

आयुर्वेद में शक्तिशाली औषधि है सिरस

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सिरस (शिरीष) पेड़ को आयुर्वेद में एक शक्तिशाली औषधि माना गया है। इसका उपयोग त्वचा, सांस, पाचन और विषकर्म जैसी कई समस्याओं के उपचार में किया जाता है। इसके पत्ते, फूल, छाल, बीज और कांटे सभी औषधीय रूप से उपयोगी माने जाते हैं।

शिरीष के फूलों और छाल का लेप घाव, फोड़े-फुंसी, खुजली, दाद, सोरायसिस और कुष्ठ जैसे त्वचा रोगों में लाभकारी है। शिरीष एलर्जी और सूजन को कम करने में प्रभावी हैं; त्वचा पर इसके लेप से राहत मिलती है।शिरीष की छाल या फलियों से बनी हर्बल चाय अस्थमा, खांसी, जुकाम और ब्रोंकाइटिस में लाभ पहुँचाती है। शिरीष की छाल का काढ़ा सिरदर्द, दांत दर्द व माइग्रेन में राहत देता है। शिरीष की फलियां और छाल पेट के कीड़े, अपच, कब्ज और पेचिश में लाभ पहुंचाती हैं। यह पौधा विषनाशक योग में आता है। जहरीले डंक या सांप के काटने में यह असरदार माना गया है। शिरीष रक्तचाप संतुलित करने और रक्त को शुद्ध करने में सहायक है। छाल, पत्ते या फूलों को पीसकर घाव, दाद-खुजली या सूजन वाली जगहों पर लगाएं। छाल, बीज, या फलियों को पानी में उबालकर श्वसन, पाचन और सिर/दांत दर्द में सेवन करें। शिरीष के तेल का प्रयोग त्वचा रोगों में किया जाता है।द्य छाल की काढ़ा से दांत दर्द, मसूड़ों की सूजन या गले के दर्द में गरारे करें। शरीर में किसी भी प्रकार की गांठ को सही करने की ताकत रखता है।प्रतिदिन दो घंटे शीर्ष के पेड़ के नीचे बैठने मात्र से गांठे खत्म हो जाती हैं।

इसके बारे में एक प्राचीन कथा है। कथा विशेषतः ग्रामीण भारत में लोकप्रिय है और इसका उल्लेख भक्तों की कहानियों व लोक परंपराओं में भी मिलता है। शिरीष के फूल और भगवान विष्णु की कथाकथा के अनुसार, एक गाँव में एक निर्धन महिला थी जो भगवान विष्णु की परम भक्त थी। उसके पास न सोना था, न चाँदी, न ही अन्य कीमती वस्तुएँ कि वह भगवान को अर्पण कर सके। किंतु उसके घर के पास एक सिरस का वृक्ष था, जिस पर सुगंधित शिरीष के फूल खिलते थे। प्रतिदिन वह महिला स्नान कर शिरीष के फूल तोड़ती, उन्हें स्वच्छ पात्र में सजाती और प्रभु को भावपूर्वक अर्पित करती। गाँव के कई लोग उसका मज़ाक उड़ाते थे, कहते कि ‘सिर्फ साधारण फूलों से भगवान कैसे प्रसन्न होंगे?’ परंतु महिला की आस्था अडिग रही।एक दिन जब गाँव में विपत्ति आई, तो वही महिला, जिसने केवल श्रद्धा और सिरस के फूलों से भगवान की सेवा की थी, सुरक्षित रही।

शास्त्रों के अनुसार, उसकी निष्काम भक्ति से भगवान विष्णु अति प्रसन्न हुए और आशीर्वाद देते हुए बोले – “सच्ची श्रद्धा से चढ़ाया गया शिरीष का एक फूल भी मुझे सभी स्वर्ण-रत्न और भोग्य वस्तुओं से प्रिय है।”इसलिए, आज भी मंदिरों में, विशेष अवसरों पर, भगवान विष्णु और लक्ष्मी को शिरीष के फूल अर्पित किए जाते हैं। इन्हें शांति, सौंदर्य और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

अलविदा “अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर” — असरानी को भावभीनी श्रद्धांजलि

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गोवर्धन असरानी, जिन्हें हम सब प्यार से असरानी कहते थे, भारतीय सिनेमा के सबसे प्रिय हास्य अभिनेता थे। उनके अभिनय में विनम्रता, सादगी और अद्भुत हास्य का संगम था। शोले के “अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर” से लेकर गोलमाल, बावर्ची और चुपके चुपके तक, उन्होंने हर किरदार में जीवन की सच्चाई दिखायी। युवा हों या वृद्ध, सभी उनकी हँसी और संवादों के दीवाने थे। सरल जीवन, निष्ठा और कला के प्रति समर्पण उनके व्यक्तित्व का मूल था। भारतीय सिनेमा उनका योगदान हमेशा याद रखेगा।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

भारतीय चलचित्र जगत ने एक और प्रकाशपुंज खो दिया। हास्य अभिनय के महारथी, सरल स्वभाव के धनी और हर पीढ़ी को हँसाने वाले कलाकार गोवर्धन असरानी, जिन्हें संसार प्यार से केवल असरानी कहता था, अब इस नश्वर संसार से विदा ले चुके हैं। उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया है। परन्तु उनकी मुस्कान, उनकी आवाज़ और उनका सहज अभिनय सदैव जीवित रहेगा।

असरानी का जीवन केवल अभिनय की कहानी नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी यात्रा थी जिसमें परिश्रम, लगन, अनुशासन और कला के प्रति गहरा समर्पण समाहित था। वे उन विरल कलाकारों में से एक थे जिन्होंने दर्शकों को यह सिखाया कि हँसी केवल ठहाका नहीं होती, बल्कि जीवन की जटिलताओं को हल्का करने का साधन भी होती है। उनके अभिनय में हास्य की गंभीरता और संवेदना दोनों एक साथ दिखाई देती थीं।

असरानी का जन्म सन् १९४१ में जयपुर नगर में एक सिंधी परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे अभिनय की ओर आकर्षित थे। उनके परिवार को यह स्वप्न नहीं था कि एक दिन उनका बेटा भारतीय चलचित्रों में एक प्रसिद्ध नाम बनेगा, परंतु असरानी के भीतर कला का दीप बचपन से ही प्रज्वलित था। विद्यालय के नाटकों में उन्होंने भाग लिया और वहीं से अभिनय का बीज अंकुरित हुआ। युवावस्था में उन्होंने पुणे स्थित भारतीय चलचित्र तथा दूरदर्शन संस्थान में प्रशिक्षण प्राप्त किया। उस संस्थान ने उन्हें न केवल अभिनय का अभ्यास सिखाया बल्कि कला के गहरे दर्शन से भी परिचित कराया। वहाँ से निकलने के बाद उन्होंने मुंबई नगर का रुख किया — वही नगर जिसने असंख्य स्वप्नदर्शियों को गले लगाया और असंख्य को असफलताओं की धूल में मिला दिया। परंतु असरानी उन लोगों में थे जो असफलताओं से टूटते नहीं बल्कि और मज़बूत होते हैं।

असरानी जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे हास्य को हल्केपन से नहीं, बल्कि गंभीरता से निभाते थे। उनका कहना था कि “लोगों को हँसाना सबसे कठिन कार्य है, क्योंकि उसमें सच्चाई छिपी होती है।” उन्होंने दर्शकों को यह महसूस कराया कि हँसी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण है। उनका हास्य कभी अशिष्ट नहीं हुआ। उनके संवादों में एक मर्यादा थी, एक विनम्रता थी। वे दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान लाते थे, परंतु किसी की गरिमा को ठेस नहीं पहुँचाते थे। यही कारण है कि वे पीढ़ियों तक प्रिय बने रहे।

सन् १९७५ में जब शोले प्रदर्शित हुई, तो उसमें अनेक पात्रों ने इतिहास रचा — जय, वीरू, गब्बर सिंह, ठाकुर और इसी श्रेणी में था वह जेलर, जो हर बार अपनी अंग्रेज़ी मिश्रित हिंदी में दर्शकों को हँसा देता था। “हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं…” यह संवाद आज भी भारतीय जनमानस में जीवित है। असरानी ने इस किरदार को केवल निभाया नहीं, बल्कि उसमें प्राण फूँक दिए। उनकी आँखों की चपलता, चेहरे के भाव, शरीर की भाषा — सब कुछ ऐसा था कि दर्शक हर बार उस दृश्य के आने पर मुस्कुरा उठते थे। इस एक भूमिका ने उन्हें अमर बना दिया, परंतु उन्होंने स्वयं को कभी इस एक छवि तक सीमित नहीं होने दिया।

असरानी का अभिनय केवल हास्य तक सीमित नहीं था। उन्होंने गंभीर भूमिकाएँ भी निभाईं। बावर्ची, अभिमान, चुपके चुपके, गोलमाल, नमक हराम, कुली नंबर एक, दिल है कि मानता नहीं, हेरा फेरी जैसी अनेक चलचित्रों में उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। वे ऐसे कलाकार थे जो किसी भी परिस्थिति में ढल जाते थे। निर्देशक उनके चेहरे को देखकर समझ जाते थे कि इस व्यक्ति में असीम संभावनाएँ छिपी हैं। उनकी आवाज़ में एक ऐसी मिठास थी जो दर्शकों के कानों में सीधे उतर जाती थी। उन्होंने मंच, दूरदर्शन और चलचित्र — तीनों माध्यमों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

असरानी के लिए अभिनय केवल जीविका नहीं, बल्कि एक साधना था। वे कहा करते थे, “कलाकार वह दर्पण है जिसमें समाज अपना चेहरा देखता है। अगर हँसी के ज़रिए मैं समाज की थकान दूर कर सकता हूँ, तो वही मेरा पुरस्कार है।” उनका यह दृष्टिकोण उन्हें सामान्य हास्य कलाकारों से ऊपर उठा देता था। वे हँसी के साथ विचार भी देते थे। उनकी प्रस्तुति कभी फूहड़ नहीं होती थी; उसमें मानवता का तत्व होता था।

असरानी जी का स्वभाव अत्यंत विनम्र था। उन्होंने अपने सह-अभिनेताओं के साथ हमेशा मित्रता का व्यवहार किया। चाहे राजेश खन्ना हों, अमिताभ बच्चन हों या धर्मेन्द्र — सभी ने उनके साथ कार्य करना आनंददायक बताया। वे सेट पर हल्के-फुल्के वातावरण का निर्माण करते थे। कठिन दृश्यों में भी वे वातावरण को सहज बना देते थे। उनके साथी कलाकार कहते हैं कि असरानी जी का हँसी-मज़ाक केवल मनोरंजन के लिए नहीं होता था, बल्कि वह तनाव को दूर करने का साधन होता था।

बहुत से लोग नहीं जानते कि असरानी ने केवल अभिनय ही नहीं किया, बल्कि निर्देशन और शिक्षण के क्षेत्र में भी योगदान दिया। उन्होंने नवोदित कलाकारों को अभिनय की बारीकियाँ सिखाईं। वे अक्सर कहा करते थे, “हास्य अभिनय केवल चेहरा बिगाड़ने या अजीब चाल चलने का नाम नहीं है; यह दिल की सच्चाई से उपजता है।” उन्होंने युवा कलाकारों को सिखाया कि कैमरे के सामने झूठ नहीं बोला जा सकता। दर्शक हर झूठ को पकड़ लेते हैं। इसलिए अभिनय का आधार ईमानदारी होना चाहिए।

असरानी जी का सबसे बड़ा पुरस्कार यही था कि वे हर उम्र के दर्शकों के प्रिय थे। बुज़ुर्ग उन्हें पुराने दौर की यादों से जोड़ते थे, युवा उन्हें हल्के-फुल्के हास्य के प्रतीक मानते थे, और बच्चे उन्हें अपने मजेदार अंकल के रूप में देखते थे। उनकी आवाज़ सुनते ही चेहरा मुस्कुरा उठता था। वे हर वर्ग के लिए आत्मीय थे।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भी असरानी सक्रिय रहे। उन्होंने कई धारावाहिकों और नाटकों में भाग लिया। वे कहते थे कि “जब तक साँस है, अभिनय चलता रहेगा।” वे कभी भी प्रसिद्धि के पीछे नहीं भागे। उन्होंने सरल जीवन जिया, और यही सरलता उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। उनका निधन ८४ वर्ष की आयु में हुआ, परंतु वे अंतिम दिनों तक सक्रिय रहे। वे न केवल अपने परिवार के लिए, बल्कि भारतीय चलचित्र जगत के लिए भी प्रेरणा बन गए।

असरानी का योगदान केवल अभिनय तक सीमित नहीं है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि हँसी भी एक गंभीर कला है। उन्होंने दर्शकों को यह सिखाया कि हर परिस्थिति में मुस्कराना संभव है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। हर वह कलाकार जो हास्य के क्षेत्र में कार्य करेगा, कहीं न कहीं असरानी से प्रेरणा लेगा। उनके संवाद, उनकी शैली, उनकी आत्मीयता — सब कुछ भारतीय सिनेमा की स्मृतियों में अमिट रहेंगे।

असरानी जी का जीवन यह सिखाता है कि किसी भी कार्य को अगर मन से किया जाए, तो वह कला बन जाता है। उन्होंने संघर्ष किया, असफलताएँ देखीं, परंतु कभी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए। वे यह भी मानते थे कि कला का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में आशा और सहानुभूति जगाना है। उनके जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि विनम्रता, ईमानदारी और परिश्रम — यही किसी कलाकार की सच्ची पहचान हैं।

आज जब असरानी जी हमारे बीच नहीं हैं, तो ऐसा लगता है मानो भारतीय सिनेमा का एक प्रिय स्वर मौन हो गया हो। परंतु उनकी हँसी, उनका चेहरा और उनका अभिनय हमारे भीतर सदा जीवित रहेगा। वे जहाँ भी होंगे, शायद वहाँ भी अपनी विशिष्ट शैली में कह रहे होंगे — “आर्डर! आर्डर! अदालत की कार्यवाही स्थगित की जाती है!” उनकी आत्मा को शांति मिले। भारतवर्ष सदैव उनका आभारी रहेगा।

असरानी — एक नाम, एक मुस्कान, एक युग। सिनेमा की हँसी अब कुछ कम हो गई है, पर असरानी की यादें सदैव गूंजती रहेंगी।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

घर से दलिदर या दरिद्र को भगाने की परंपरा

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बिहार और उत्तर प्रदेश के भोजपुरी भाषी क्षेत्र में दीपावली के अगले दिन घर से दलिदर या दरिद्र को को भगाने की मजेदार परंपरा है।इस दरिद्रता को भगाने के लिए दिवाली की भोर सूप से ध्वनि की जाती है। ये परंपरा आदि काल से चली आ रही है। दिवाली की भोर यानी ब्रह्मकाल में सूप पीटने की प्रथा का उद्देश्य घर से दरिद्रता को बाहर निकालकर समृद्धि और वैभव को आमंत्रित करना है। इस दिन महिलाएं सूप बजाकर ‘दुख-दरिद्रता बाहर जाए-अन्न-धन लक्ष्मी घर में आएं’ गांव की स्त्रियां टोली बनाकर ब्रह्म बेला में हाथ में सूप और कलछुल लेकर घरों से निकलती हैं और सूप बजाती हुई दलिदर को बगल वाले गांव के सिवान तक खदेड़ आती है।

दिवाली की सुबह लगभग चार बजे उठकर घर की माताएं या कोई भी एक सदस्य टूटी हुई सूप लेकर पूरे घर में घूम घूम कर उसे बजाता है। हर कोने में ले जाकर सूप खटखटाता है। और कहता है की दरिद्रता भागे और लक्ष्मी जी आए। आम भाषा में लोग कहते हैं दलिंदर भाग मां लक्ष्मी अंदर आए। इस तरह की बातें इसलिए कही जाती हैं कि जो नकारात्मकता घर है वह बाहर भागे और सकारात्मक यानी मां लक्ष्मीजी घर के अंदर आएं। दलिदर भगाने की इस लोक परंपरा को देवी लक्ष्मी की बड़ी बहन अलक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है। पुराणों के अनुसार अलक्ष्मी समुद्र मंथन में लक्ष्मी के पहले मिली थी। लक्ष्मी युवा, सौंदर्यवान थी लेकिन अलक्ष्मी वृद्धा, कुरूप। लक्ष्मी धन, वैभव और सौभाग्य का प्रतीक और अलक्ष्मी दरिद्रता, दुख, दुर्भाग्य का कारण। लक्ष्मी का संबंध मिष्ठान्न से है, अलक्ष्मी का खट्टी और कड़वी चीजों से। यही वजह है कि मिठाई घर के भीतर रखी जाती है और नीबू तथा तीखी मिर्ची घर के बाहर लटका दी जाती है। लक्ष्मी मिठाई खाने घर के अंदर तक आती हैं। अलक्ष्मी नींबू, मिर्ची खाकर दरवाज़े से ही संतुष्ट लौट जाती हैं।

भोजपुरी लोक संस्कृति में संभवतः दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी को दलिदर कहकर भगाया जाता है। आज के दिन गांव की औरतें सूप और कलछुल की कर्कश ध्वनि के बीच दलिदर को बगल वाले गांव की सीमा तक खदेड़ देती है। बगल वाले गांव की औरतें उसे अपने बगल के गांव के सिवान तक। सिलसिला चलता रहता है। प्रतिस्पर्द्धा ऐसी कि दलिदर उस पूरे इलाके में 360 डिग्री घूमकर ही रह जाता होगा। इलाके से निकलने का शायद ही कोई रास्ता बचता होगा उस बेचारे के पास। शायद यही कारण है कि सदियों तक खदेड़े जाने के बावजूद देश में दलिदर आज भी जस का तस बना हुआ है।

ध्रुव गुुप्ता

गोवर्धन पूजा से श्रद्धा बढ़े, दिखावा नहीं 

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 “कृष्ण का पर्व हमें सिखाता है कि असली भक्ति धरती, गाय और करुणा में है, कैमरे की चमक में नहीं।”

गोवर्धन पूजा केवल भगवान कृष्ण का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, गाय और धरती के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, संवेदना में है। आज जब पूजा इंस्टाग्राम की तस्वीर बन चुकी है और गोबर की जगह प्लास्टिक ने ले ली है, तब ज़रूरत है श्रद्धा के वास्तविक अर्थ को समझने की। गोवर्धन पर्व हमें याद दिलाता है कि मिट्टी, जल और जीव-जंतु की सेवा ही असली आराधना है। पूजा तब पूर्ण होती है जब धरती मुस्कुराती है, न कि सिर्फ़ कैमरा।

— डॉ. सत्यवान सौरभ

दीपों की कतारें अभी बुझी भी नहीं होतीं कि अगली सुबह गोवर्धन पर्व आ जाता है। यह त्योहार केवल भगवान कृष्ण की पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति, गोवंश और सामूहिक श्रम के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है। यह पर्व उस सादगी, मिट्टी की सुगंध और मन की पवित्रता का प्रतीक है, जो भारतीय संस्कृति की जड़ों में रची-बसी है। लेकिन जब श्रद्धा का अर्थ केवल दिखावे, फोटो और स्टेटस तक सीमित रह गया हो, तब “गोवर्धन पूजा से श्रद्धा बढ़े” कहना एक कामना भी है और एक चेतावनी भी।

कृष्ण की कथा में गोवर्धन पूजा का मूल भाव बहुत गहरा है। जब इंद्र के अहंकार से तंग आकर गोकुलवासी भीषण वर्षा में डूबने लगे, तब बालक कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठा लिया। इस घटना को केवल एक चमत्कार के रूप में देखना उसके अर्थ को छोटा करना है। असल में यह एक सामाजिक प्रतीक है। यह हमें बताती है कि जब सत्ता अहंकार में अंधी हो जाती है, तब जनसाधारण को अपने सामूहिक साहस से संकट से निकलना पड़ता है। कृष्ण ने गोवर्धन पूजा की परंपरा इसलिए शुरू की ताकि लोग प्रकृति, गोमाता और अपनी श्रमशक्ति को देवत्व के रूप में स्वीकारें—क्योंकि वही असली सहायक हैं, न कि केवल आकाश के देवता।

गोवर्धन पूजा दरअसल प्रकृति पूजा है। गाय, गोबर, गोचर भूमि—ये सब उस पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं जिसने भारतीय जीवन को आत्मनिर्भर बनाया। जब हम गोबर, मिट्टी और फूलों से गोवर्धन बनाते हैं, तो वह धरती और पर्यावरण के प्रति हमारी श्रद्धा का प्रतीक होता है। वह एक स्मरण है कि यह मिट्टी ही हमारी असली माता है, जो हर बीज को अंकुरित कर हमें अन्न देती है। लेकिन आज के दौर में यह सब प्रतीक धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। गोबर की जगह प्लास्टिक की सजावट ने ले ली है, मिट्टी की गंध पर परफ्यूम का कब्जा हो गया है। गोवर्धन पूजा अब इंस्टाग्राम पोस्ट बन गई है—जिसमें “हैप्पी गोवर्धन पूजा” के स्टिकर तो हैं, पर गाय के लिए चारा नहीं। श्रद्धा अब धरती पर नहीं, स्क्रीन पर चमकती है।

कृष्ण ने कहा था—“कर्मण्येवाधिकारस्ते।” लेकिन हमने कर्म छोड़कर कर्मकांड को पकड़ लिया। पूजा अब उस भावना से दूर जा रही है जिसमें सामूहिकता, सहयोग और संवेदना थी। पहले गाँवों में सब मिलकर गोवर्धन बनाते थे, बच्चे गोबर लाते, महिलाएँ फूल सजातीं, पुरुष दीप रखते। वह सामूहिक श्रम और सादगी का पर्व था, जिसमें न कोई प्रतियोगिता थी, न तुलना। आज हर घर में अलग-अलग पूजा होती है—मानो यह अहंकार का गोवर्धन हो गया हो। श्रद्धा भी अब प्रदर्शन बन गई है, जिसमें पूजा का असल अर्थ खो गया है।

भारत का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि हम गाय को “माता” कहकर आँसू बहाते हैं, लेकिन सड़कों पर वही गाय भूख और दर्द से मरती है। गोवर्धन पूजा का केंद्र ही गाय है, और हम उसी केंद्र को भुला चुके हैं। यह कैसी श्रद्धा है जो दीप जलाती है पर एक मुठ्ठी चारा देने में कंजूसी करती है? पूजा का अर्थ केवल आरती नहीं, जिम्मेदारी भी है। जब तक हम गोवंश, जल, मिट्टी और वृक्षों के प्रति करुणा नहीं दिखाएँगे, तब तक हमारी पूजा अधूरी रहेगी।

त्योहार अब भक्ति नहीं, भोग का उत्सव बनते जा रहे हैं। गोवर्धन पूजा भी अब “सेल्फी सीज़न” का हिस्सा बन गई है। प्रसाद, थाल और पूजा की तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड करने की होड़ लग जाती है। लेकिन असली भोग—जो सेवा, संतोष और सादगी में था—वह कहीं खो गया है। हमारी दादी-नानी के समय यह पर्व मिट्टी और मेहनत की खुशबू से भरा होता था। अब यह कृत्रिम रोशनी और दिखावे का तमाशा बन गया है। श्रद्धा अब कैमरे की फ्लैश पर निर्भर है, आत्मा की रोशनी पर नहीं।

अगर कृष्ण आज होते, तो शायद पूछते—क्या तुम सच में गोवर्धन बना रहे हो, या गोवर्धन के मूल अर्थ को मिटा रहे हो? क्या तुम्हारी पूजा में धरती की गंध है या केवल मॉल की सुगंध? क्या तुम्हारी आरती में गाय की घंटी की आवाज़ है या मोबाइल के नोटिफिकेशन की? ये सवाल हमारे भीतर की श्रद्धा की जाँच करते हैं। क्योंकि भक्ति तभी सार्थक होती है जब वह दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनती है।

ग्रामीण भारत में आज भी यह पर्व आत्मीयता से मनाया जाता है। गाँव की गलियों में बच्चे नंगे पैर गोबर इकट्ठा करते हैं, महिलाएँ पारंपरिक गीत गाती हैं—“गोवर्धन धर्यो गिरधारी।” वहाँ पूजा में सादगी है, पर दिल है। वहीं शहरी भारत में गोवर्धन पूजा “रील” बन चुकी है—पाँच मिनट की पूजा, फिर पिज़्ज़ा पार्टी। यह फर्क बताता है कि विकास ने हमें सुविधा तो दी, पर संवेदना छीन ली। हमारी आधुनिकता ने हमें अपने ही मूल से काट दिया है।

जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट मानवता के सामने सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं, तब गोवर्धन पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि ईश्वर से प्रार्थना करने से पहले हमें धरती के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। यह वह समय है जब हमें गोवर्धन पूजा की व्याख्या को नये अर्थों में देखना चाहिए—केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवनशैली के रूप में। अगर हम इस दिन पेड़ लगाएँ, गोशाला में सेवा करें, तालाब साफ़ करें, पशुओं को भोजन दें—तो वही सच्ची श्रद्धा होगी।

श्रद्धा का अर्थ केवल झुकना नहीं, जुड़ना है—धरती से, जल से, पशु से, मनुष्य से। जब श्रद्धा जिम्मेदारी के साथ जुड़ती है, तभी वह भक्ति बनती है। वरना वह सिर्फ रस्म रह जाती है। कृष्ण का गोवर्धन पर्व हमें यही सिखाता है—कि असली धर्म दूसरों के लिए खड़ा होना है।

कृष्ण ने इंद्र का अहंकार तोड़ा था, लेकिन आज हमारे भीतर भी ऐसे सैकड़ों इंद्र पल रहे हैं—लालच, ईर्ष्या, उपभोग, दिखावा और अधिकार की अंधी चाह। हमें इन इंद्रों को शांत करने के लिए अपने भीतर एक गोवर्धन उठाना होगा। वह गोवर्धन कोई पत्थर का पहाड़ नहीं, बल्कि विवेक, संयम और करुणा का पहाड़ है, जिसे हम सबको मिलकर थामना है।

गोवर्धन पूजा का एक और गहरा पक्ष है—यह पर्व सामूहिकता का उत्सव है। जब गोवर्धन के नीचे सारा गोकुल एकत्र हुआ था, तब किसी ने किसी की जात, पद या संपत्ति नहीं पूछी थी। सब एक ही छत के नीचे थे—बराबर, सुरक्षित, जुड़ाव में। यह दृश्य बताता है कि संकट के समय समाज को एकता में रहना चाहिए। पर आज हम अपने-अपने घरों के भीतर बंद हैं, पूजा भी निजी हो गई है, और समाज से संबंध केवल औपचारिक रह गए हैं। हमें फिर वही सामूहिकता लौटानी होगी, जिसमें साथ रहना भी पूजा है।

यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि शक्ति का अर्थ केवल भौतिक बल नहीं होता। जब बालक कृष्ण ने पर्वत उठाया था, तब वह शारीरिक नहीं, नैतिक शक्ति थी। आज के युग में वह नैतिक शक्ति सबसे बड़ी कमी बन गई है। हमें हर घर में, हर हृदय में एक छोटा-सा गोवर्धन बनाना होगा—जहाँ श्रद्धा, सादगी और करुणा एक साथ बसें।

अगर गोवर्धन पूजा का सच्चा पालन करना है, तो तीन संकल्प लेने होंगे। पहला, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता—हर पूजा के बाद एक पेड़ लगाना या किसी पशु को भोजन देना। दूसरा, सादगी का पुनर्जागरण—दिखावे की जगह सच्चे भाव अपनाना। और तीसरा, सामूहिकता का पुनर्स्थापन—पूजा को फिर से मिल-जुलकर मनाने की परंपरा लौटाना, ताकि समाज में संवाद और संवेदना जिंदा रहे।

आज का समय ऐसा है जब श्रद्धा की परिभाषा बदल रही है। श्रद्धा अब विज्ञापनों और प्रचार में दिखने लगी है, पर जीवन से गायब हो रही है। हम मंदिरों में झुकते हैं, पर किसी घायल गाय या भूखे इंसान के आगे नहीं रुकते। हम दीये जलाते हैं, पर अपने मन के अंधकार से डरते हैं। यही वह विच्छेदन है जो हमें भीतर से खोखला बना रहा है। गोवर्धन पूजा उस खोखलेपन को भरने का अवसर है—अगर हम चाहें तो।

यह पर्व केवल धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि नैतिक अनुबंध है—मनुष्य और प्रकृति के बीच। यह याद दिलाता है कि देवता की पूजा से पहले धरती की सेवा जरूरी है। गोवर्धन पर्वत अब कोई भौतिक शिला नहीं, बल्कि हमारे भीतर का आत्मबल है, जो संकट के समय खड़ा रहता है। इंद्र अब कोई स्वर्गीय देव नहीं, बल्कि हमारी इच्छाओं का प्रतीक है, जो हर सुख पर वर्षा की तरह गिरना चाहता है। और कृष्ण वह विवेक है जो उसे संयम सिखाता है।

जब हम कहते हैं “गोवर्धन पूजा से श्रद्धा बढ़े”, तो इसका अर्थ केवल पूजा-पाठ की बढ़ोतरी नहीं, बल्कि आस्था की गहराई से है। श्रद्धा वह शक्ति है जो हमें कर्तव्य के प्रति सचेत करती है। अगर श्रद्धा बढ़ी, तो समाज में संवेदना बढ़ेगी; अगर श्रद्धा गहरी हुई, तो राजनीति में नैतिकता लौटेगी; अगर श्रद्धा सच्ची हुई, तो पर्यावरण बचेगा।

हमारे समाज को आज एक ऐसे गोवर्धन की ज़रूरत है जो दिखावे के नहीं, दायित्व के पत्थरों से बना हो। एक ऐसे पर्व की, जो हमें सजावट नहीं, सच्चाई सिखाए। एक ऐसी श्रद्धा की, जो सोशल मीडिया पर नहीं, समाज के भीतर बसे। गोवर्धन पूजा का सार यही है—जहाँ प्रकृति, पशु और मनुष्य एक सूत्र में बंधे हों।

कृष्ण का संदेश बहुत सीधा है—“जब संकट आये, तो पर्वत उठाओ, पर मिलकर।” यही वह पंक्ति है जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी। अगर हम गोवर्धन पूजा के दिन अपने भीतर यह संकल्प लें कि हम दिखावे से अधिक जिम्मेदारी निभाएँगे, तो यही पूजा सबसे पवित्र होगी।

गोवर्धन पूजा हमें याद दिलाती है कि मिट्टी में ही जीवन की सबसे सच्ची सुगंध है, और उसी मिट्टी से हमारी श्रद्धा भी अंकुरित होती है। वह मिट्टी जो गाय के खुरों से पवित्र होती है, किसान के श्रम से सींची जाती है, और आकाश की धूप से सुनहरी बनती है। जब तक हम इस मिट्टी का आदर नहीं करेंगे, तब तक कोई भी पूजा पूर्ण नहीं होगी।

इसलिए इस बार जब दीप जलाएँ, तो साथ एक वचन भी लें—कि गोवर्धन पूजा से केवल घर नहीं, मन भी उजले होंगे। श्रद्धा केवल आरती की लौ में नहीं, व्यवहार की रोशनी में भी दिखेगी। तभी हम सच्चे अर्थों में कह सकेंगे—

“गोवर्धन पूजा से श्रद्धा बढ़े, दिखावा नहीं।”

क्योंकि श्रद्धा बढ़ी तो ईश्वर अपने आप हमारे भीतर उतर आएगा, और शायद तब हमें किसी गोवर्धन की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी—क्योंकि हर मन स्वयं पर्वत बन जाएगा।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

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बदलते समय में भाई दूज: प्रेम और अपनापन कैसे बना रहे

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> “त्योहार अब सिर्फ़ रस्म नहीं, रिश्तों की परीक्षा बनते जा रहे हैं — सवाल यह है कि क्या हमारे दिलों में अब भी वही स्नेह बचा है?”

भाई दूज सिर्फ़ तिलक और मिठाई का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों की वह डोर है जो समय की रफ़्तार में भी स्नेह का रंग बनाए रखती है। पर बदलते दौर में जहाँ मुलाकातें वीडियो कॉल पर सिमट गई हैं और तिलक डिजिटल इमोजी बन गया है, वहाँ यह सवाल उठता है — क्या रिश्तों की गर्माहट अब भी वैसी ही है? भाई दूज हमें याद दिलाता है कि प्रेम केवल परंपरा नहीं, आत्मीयता का अभ्यास है। यह त्योहार हमें अपने व्यस्त जीवन में अपनापन लौटाने का अवसर देता है।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

दीवाली के बाद का शांत उजाला जब धीरे-धीरे घरों में उतरता है, तब आती है भाई दूज की सुबह — मिठास और ममता से भरी। बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं, आरती करती हैं और मन ही मन यह कामना करती हैं कि उनका भाई सदा सुखी रहे। बदले में भाई बहन को उपहार देता है और यह वादा कि जीवनभर उसका साथ निभाएगा। यह दृश्य जितना सरल लगता है, उतना ही गहरा भी है। क्योंकि यह सिर्फ एक तिलक नहीं, रिश्तों में भरोसे, सुरक्षा और प्रेम की लकीर खींचने का संस्कार है।

लेकिन आज जब समय बदल रहा है, रिश्तों की परिभाषाएँ बदल रही हैं, तब यह सवाल उठता है कि क्या भाई दूज का वही अपनापन और स्नेह अब भी पहले जैसा है? क्या भाई-बहन का रिश्ता अब भी उतना ही सहज, निर्भीक और भावनाओं से भरा है, जैसा कभी गाँव की मिट्टी और आँगन की धूप में होता था?

कभी भाई दूज सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव हुआ करता था। बहनें सवेरे से तैयार होकर भाई की प्रतीक्षा करती थीं, घरों में पकवानों की खुशबू फैल जाती थी। भाई दूर-दूर से बहन के घर पहुँचते थे, क्योंकि यह दिन मिलन का होता था। न कोई दिखावा, न औपचारिकता—बस भावनाओं का सच्चा प्रवाह। उस समय रिश्तों में दूरी नहीं, दिलों की गर्माहट थी।

आज भी भाई दूज मनाया जाता है, पर उसकी आत्मा कहीं धुंधली पड़ने लगी है। अब भाई दूज का तिलक कई बार व्हाट्सएप पर भेजे गए इमोजी से लग जाता है, राखी और तिलक दोनों ऑनलाइन ग्रीटिंग्स में सिमट गए हैं। “भाई दूज मुबारक” का संदेश सोशल मीडिया पर चमकता है, पर उसके पीछे की नज़रों में अब वो अपनापन नहीं दिखता जो किसी बहन की आँखों में तब झलकता था जब वह अपने भाई का चेहरा देखती थी।

यह बदलाव केवल तकनीक का नहीं, संवेदना का भी है। समय ने हमें जोड़ा जरूर है, पर जोड़े हुए रिश्ते अब दिलों से ज़्यादा डिवाइसों में रहने लगे हैं। भाई दूज जैसे पर्व जो निकटता, स्नेह और संवाद के प्रतीक थे, अब “स्टेटस अपडेट” बनते जा रहे हैं। इस बदलाव की जड़ें आधुनिक जीवन की भागदौड़, व्यावसायिकता और आत्मकेंद्रित सोच में हैं, जिसने हमें अपनों से दूर कर दिया है।

भाई दूज का पर्व केवल बहन की पूजा नहीं, बल्कि उस भावनात्मक संतुलन का प्रतीक भी है, जिसमें भाई सुरक्षा देता है और बहन संवेदना। दोनों एक-दूसरे की जरूरत बनकर रिश्तों के समाज का ढांचा खड़ा करते हैं। लेकिन आज की पीढ़ी में यह रिश्ता धीरे-धीरे औपचारिक होता जा रहा है। शहरों में बढ़ती व्यस्तता, प्रवास, और आत्मनिर्भर जीवनशैली ने भाई-बहन के रिश्तों को एक ‘मौके की मुलाकात’ बना दिया है।

जहाँ पहले भाई अपनी बहन के घर जाकर दिन भर का समय उसके परिवार के साथ बिताता था, अब वह मुलाकात कुछ मिनटों या वीडियो कॉल तक सीमित रह जाती है। बहनें भी अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, भावनात्मक रूप से मज़बूत हैं, और जीवन के हर फैसले खुद लेती हैं। यह बदलाव सकारात्मक भी है, क्योंकि अब बहनें “सुरक्षा की मोहताज” नहीं, बल्कि बराबरी के आत्मसम्मान की प्रतीक हैं। मगर इस बराबरी के दौर में भी रिश्तों की गर्माहट बनी रहना जरूरी है।

त्योहारों का उद्देश्य ही यही होता है—रिश्तों को दोबारा गढ़ना, दूरी मिटाना। भाई दूज हमें हर साल यह याद दिलाती है कि रिश्तों का पोषण केवल खून से नहीं, व्यवहार से होता है। लेकिन आधुनिकता की रफ्तार ने हमें इतना व्यस्त कर दिया है कि हम भावनाओं को भी समय-सारिणी में बाँधने लगे हैं। कभी-कभी लगता है कि रिश्ते अब कैलेंडर पर टिके कुछ त्योहारी दिनों के मेहमान बन गए हैं।

आज की बहनें केवल उपहार नहीं, भावनात्मक साझेदारी चाहती हैं। उन्हें यह नहीं चाहिए कि भाई बस त्यौहार पर पैसे या गिफ्ट दे दे; वे चाहती हैं कि भाई उन्हें समझे, उनका सम्मान करे, उनके निर्णयों में साथ खड़ा रहे। और भाई भी चाहते हैं कि बहन सिर्फ स्नेह की मूर्ति नहीं, बल्कि सहयोग और संवेदना की साझेदार बने। यही रिश्ते का नया रूप है—बराबरी और आत्मीयता का संतुलन।

भाई दूज अब केवल बहन की सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और संवाद का भी प्रतीक बनना चाहिए। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ बचपन का नहीं होता, वह उम्रभर का साथ है। भले जीवन के रास्ते अलग हों, पर दिलों के रास्ते जुड़े रहने चाहिए।

आज का समाज रिश्तों को “प्रोडक्टिविटी” और “प्रोफेशनलिज़्म” की कसौटी पर तौलने लगा है। हम दोस्ती में भी फायदे ढूँढ़ते हैं, तो पारिवारिक रिश्ते भी कभी-कभी बोझ लगने लगते हैं। भाई दूज ऐसे ही समय में हमें झकझोरती है—कि प्रेम का कोई विकल्प नहीं होता। तकनीक रिश्ते बना सकती है, पर आत्मीयता केवल स्पर्श, मुस्कान और अपनापन से आती है।

यह सही है कि समय बदल रहा है और रिश्तों की शैली भी बदलनी चाहिए। लेकिन हर बदलाव में भावनाओं का बीज बचा रहना जरूरी है। भाई दूज के पर्व को नया अर्थ देना होगा—जहाँ भाई और बहन दोनों एक-दूसरे की भावनाओं, संघर्षों और स्वतंत्रता का सम्मान करें। त्योहार तभी जीवित रहते हैं जब वे समय के साथ अपनी आत्मा को बचाए रखते हैं।

आज की बहनें अपने भाइयों से केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि समानता चाहती हैं; और भाई भी यह समझने लगे हैं कि बहन की स्वतंत्रता उसकी शक्ति है, विद्रोह नहीं। यह समझदारी इस रिश्ते को और गहरा बना सकती है। भाई दूज अब उस सामाजिक ढांचे का प्रतीक बन सकता है जहाँ पुरुष और स्त्री के बीच सहयोग और संवेदना का रिश्ता हो, न कि संरक्षण और निर्भरता का।

कभी-कभी लगता है कि त्योहारों की भी अपनी भाषा होती है, जो हमें वह सब याद दिलाती है जिसे हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भूल जाते हैं। भाई दूज की भाषा है—स्मृति और स्नेह की। यह पर्व हमें उस समय में ले जाता है जब हम बिना कारण किसी की परवाह करते थे, जब रिश्ते लेन-देन नहीं, जीवन का आधार थे। इस पर्व के बहाने हमें अपने भीतर झाँकना चाहिए—क्या हम अब भी उतने ही आत्मीय हैं जितने बचपन में थे?

अगर इस सवाल का उत्तर ‘हाँ’ है तो यह त्योहार जीवित है। और अगर उत्तर ‘न’ है, तो हमें इसे फिर से जीवित करना होगा—किसी सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं, बल्कि सच्चे व्यवहार से। किसी बहन के घर जाकर उसका हाल पूछने से, किसी भाई को गले लगाने से, किसी बचपन की याद को फिर से जीने से।

भाई दूज का असली अर्थ यही है कि रिश्तों की दीवारों पर समय की धूल जम जाने के बावजूद उनका रंग न फीका पड़े। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रेम का रिश्ता कभी पुराना नहीं होता, बस हमें उसे झाड़-पोंछकर चमकाना आना चाहिए।

आज जब दुनिया ‘डिजिटल रिश्तों’ की ओर बढ़ रही है, तो ऐसे पर्व हमें धरती से जोड़ते हैं। हमें बताते हैं कि मानवीय भावनाएँ अब भी सबसे बड़ी पूँजी हैं। इसलिए भाई दूज का तिलक केवल माथे पर नहीं, मन पर लगाना चाहिए—जहाँ अपनापन, स्मृति और कृतज्ञता की लकीरें स्थायी रहें।

भाई दूज का संदेश बहुत सीधा है—रिश्तों को निभाने के लिए कोई बड़ी रस्म नहीं चाहिए, बस छोटी-छोटी संवेदनाएँ चाहिएं। कभी एक फोन कॉल, कभी एक पत्र, कभी बिना कारण किया गया धन्यवाद—यही वो छोटे तिलक हैं जो भाई-बहन के रिश्ते को जीवित रखते हैं।

समय बदलेगा, त्यौहार भी रूप बदलेंगे, पर प्रेम और अपनापन अगर मन में बसा रहा, तो रिश्ते कभी टूटेंगे नहीं। भाई दूज हमें यह याद दिलाने आया है कि जीवन चाहे जितना तेज़ हो जाए, एक दिन रुककर किसी प्रिय को तिलक लगाना, उसकी आँखों में अपनेपन की रोशनी देखना—यही सच्चा त्योहार है।

इसलिए इस बार जब तिलक लगाएँ, तो साथ यह वचन भी लें—कि रिश्तों की डोर कभी ढीली नहीं पड़ने देंगे। भाई दूज की यह रौशनी सिर्फ दीयों में नहीं, दिलों में भी जले। प्रेम और अपनापन केवल तस्वीरों में नहीं, व्यवहार में बहे। तभी इस पर्व का सार बचा रहेगा, और हम कह सकेंगे—

बदलते समय में भी, भाई दूज से प्रेम और अपनापन बना हुआ है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

21 अक्टूबर को गुरू रामदास ने की अमृतसर नगर की स्थापना

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कहते हैं कि 21 अक्टूबर 1577 गुरू रामदास ने अमृतसर नगर की स्थापना की।और इसे मूल रूप से ‘रामदासपुर’ के नाम से जाना जाता था। शहर का नाम ‘अमृतसर’ श्री गुरु रामदास जी द्वारा बनाए गए ‘अमृत सरोवर’ से पड़ा। गुरु अर्जुन देव जी ने 1577 में इसी सरोवर के बीच श्री हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की नींव रखी, जो 1604 में पूरा हुआ। शहर का इतिहास 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन के अधीन आने के साथ-साथ जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसी दुखद घटनाओं से भी जुड़ा है। 

अमृतसर का इतिहास गौरवशाली है। यह अपनी संस्कृति और लड़ाइयों के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है। अमृतसर अनेक त्रासदियों और दर्दनाक घटनाओं का गवाह रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नरसंहार अमृतसर के जलियांवाला बाग में ही हुआ था। इसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच जो बंटवारा हुआ उस समय भी अमृतसर में बड़ा हत्याकांड हुआ।

यहीं नहीं अफगान और मुगल शासकों ने इसके ऊपर अनेक आक्रमण किए और इसको बर्बाद कर दिया। इसके बावजूद सिक्खों ने अपने दृढ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से दोबारा इसको बसाया। हालांकि अमृतसर में समय के साथ काफी बदलाव आए हैं लेकिन आज भी अमृतसर की गरिमा बरकरार है।

अमृतसर लगभग साढ़े चार सौ वर्ष से अस्तित्व में है। सबसे पहले गुरु रामदास ने 1577 में 500 बीघा में गुरूद्वारे की नींव रखी थी। यह गुरूद्वारा एक सरोवर के बीच में बना हुआ है। यहां का बना तंदूर बड़ा लजीज होता है। यहां पर सुन्दर कृपाण, आम पापड, आम का आचार और सिक्खों की दस गुरूओं की खूबसूरत तस्वीरें मिलती हैं।

अमृतसर में पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा। अमृतसर के पास उसके गौरवमयी इतिहास के अलावा कुछ भी नहीं है। अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के अलावा देखने लायक कुछ है तो वह है अमृतसर का पुराना शहर। इसके चारों तरफ दीवार बनी हुई है। इसमें बारह प्रवेश द्वार है। यह बारह द्वार अमृतसर की कहानी बयान करते हैं।

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