डेल कार्नेगी , आज जिनका जन्मदिन है

0

डेल कार्नेगी का जन्म 24 नवंबर, 1888 को मिसौरी के मैरीविले के एक फार्म में हुआ था। वे एक अमेरिकी लेखक और आत्म-सुधार, सेल्समैनशिप, कॉर्पोरेट प्रशिक्षण, सार्वजनिक भाषण और पारस्परिक कौशल के पाठ्यक्रमों के शिक्षक थे।

वे किसान अमांडा एलिजाबेथ हार्बिसन (1858-1939) और जेम्स विलियम कार्नेगी (1852-1941) के दूसरे पुत्र थे। कार्नेगी मैरीविले के दक्षिण-पूर्व में बेडिसन, मिसौरी के आसपास पले-बढ़े और उन्होंने ग्रामीण रोज़ हिल और हार्मनी के एक कमरे वाले स्कूलों में पढ़ाई की। कार्नेगी की मैरीविले के एक अन्य लेखक, होमर क्रॉय के साथ एक लंबी दोस्ती थी।

1904 में, 16 साल की उम्र में, उनका परिवार मिसौरी के वॉरेंसबर्ग स्थित एक फार्म में रहने चला गया । युवावस्था में, उन्हें सार्वजनिक रूप से बोलने में बहुत आनंद आता था और वे अपने स्कूल की वाद-विवाद टीम में शामिल हो गए। कार्नेगी ने बताया कि स्कूल जाने से पहले उन्हें सुबह 3 बजे उठकर सूअरों को चारा डालना और अपने माता-पिता की गायों का दूध निकालना पड़ता था। हाई स्कूल के दौरान, उन्हें विभिन्न चौटाउक्वा सभाओं में दिए जाने वाले भाषणों में रुचि होने लगी। उन्होंने 1906 में अपनी हाई स्कूल की शिक्षा पूरी की।

उन्होंने वॉरेंसबर्ग में स्टेट टीचर्स कॉलेज में दाखिला लिया और 1908 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

कॉलेज के बाद उनकी पहली नौकरी पशुपालकों को पत्राचार पाठ्यक्रम बेचने की थी। इसके बाद उन्होंने आर्मर एंड कंपनी के लिए बेकन , साबुन और चर्बी बेचना शुरू किया। वे इस हद तक सफल रहे कि उन्होंने नेब्रास्का के दक्षिण ओमाहा क्षेत्र को अपनी कंपनी का राष्ट्रीय स्तर का अग्रणी बना दिया।

200 डॉलर बचाने के बाद, डेल कार्नेगी ने 1911 में बिक्री छोड़ दी ताकि वह चॉटोक्वा लेक्चरर बनने के अपने आजीवन सपने को पूरा कर सकें। इसके बजाय उन्होंने न्यूयॉर्क में अमेरिकन एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में दाखिला लिया, लेकिन एक अभिनेता के रूप में उन्हें बहुत कम सफलता मिली, हालांकि ऐसा लिखा है कि उन्होंने पोली ऑफ द सर्कस के रोड शो में डॉ॰ हार्टले की भूमिका निभाई थी। जब उत्पादन समाप्त हो गया, तो वह न्यूयॉर्क लौट आए, 125वीं स्ट्रीट पर वाईएमसीए में रहने लगे । वहाँ उन्हें सार्वजनिक बोलना सिखाने का विचार आया, और उन्होंने वाईएमसीए प्रबंधक को 80% शुद्ध आय के बदले में एक कक्षा को निर्देश देने की अनुमति देने के लिए राजी किया। अपने पहले सत्र में, उनके पास सामग्री समाप्त हो गई थी। सुधार करते हुए, उन्होंने सुझाव दिया कि छात्र “किसी ऐसी चीज़ के बारे में बोलें जिससे उन्हें गुस्सा आए ” , कार्नेगी ने औसत अमेरिकी की अधिक आत्मविश्वास की इच्छा का लाभ उठाया था, और 1914 तक, वह हर हफ्ते 500 डॉलर (2024 में लगभग 15,700 डॉलर) कमा रहे थे।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अमेरिकी सेना में सेवा की और कैंप अप्टन में समय बिताया। उनके ड्राफ्ट कार्ड में उल्लेख था कि उन्होंने कर्तव्यनिष्ठ आपत्तिकर्ता का दर्जा प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था और उनकी एक तर्जनी उंगली कट गई थी।

1916 तक, डेल ने कार्नेगी हॉल में एक व्याख्यान दिया जिसके सभी टिकट बिक गए । कुछ समय बाद उन्होंने अपने अंतिम नाम की वर्तनी बदल दी क्योंकि – जैसा कि उन्होंने 1930 के दशक में अपने साथी मिसौरीवासियों को समझाया था – “उनके किसी भी मित्र या संवाददाता ने इसकी वर्तनी सही नहीं लिखी थी और वह उन्हें बार-बार सही नहीं करना चाहते थे।” कार्नेगी के लेखन का पहला संग्रह पब्लिक स्पीकिंग: अ प्रैक्टिकल कोर्स फॉर बिज़नेस मेन (1926) था , जिसे बाद में पब्लिक स्पीकिंग एंड इन्फ्लुएंसिंग मेन इन बिज़नेस (1932) शीर्षक दिया गया। 1936 में, साइमन एंड शूस्टर ने हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल प्रकाशित किया । यह पुस्तक अपनी शुरुआत से ही बेस्टसेलर थी। कार्नेगी की मृत्यु के समय तक, पुस्तक की 31 भाषाओं में पांच मिलियन प्रतियां बिक चुकी थीं पुस्तक में कहा गया है कि उन्होंने उस समय के वयस्क शिक्षा आंदोलन में अपनी भागीदारी में 150,000 से अधिक भाषणों की आलोचना की थी।

वे हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल (1936) के लेखक थे , जो आज भी लोकप्रिय एक बेस्टसेलर है। उन्होंने हाउ टू स्टॉप वरीइंग एंड स्टार्ट लिविंग (1948), लिंकन द अननोन (1932) और कई अन्य पुस्तकें भी लिखीं ।

उनकी पुस्तकों में एक मुख्य विचार यह है कि दूसरों के प्रति अपने व्यवहार में परिवर्तन करके उनके व्यवहार को बदलना संभव है।

कार्नेगी की मृत्यु 1 नवंबर, 1955 को न्यूयॉर्क के फॉरेस्ट हिल्स स्थित उनके घर पर हॉजकिन लिंफोमा से हुई। उन्हें मिसौरी के कैस काउंटी के बेल्टन कब्रिस्तान में दफनाया गया।

अपने बचपन में मैंने (शायद आपने भी) इनकी हिंदी में अनुवादित पुस्तकें पढ़ी हैं।

रजनीकांत शुक्ला

Like

Comment

Share

शिया धर्मगुरु कल्बे सादिक : शिक्षा, सुधार और एकता के प्रवर्तक

0

कल्बे सादिक आधुनिक भारत के उन विशिष्ट धर्मगुरुओं में से रहे, जिन्होंने धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर समाज में एकता, शिक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द का अद्भुत संदेश दिया। वे शिया मुस्लिम समुदाय के प्रतिष्ठित विद्वान, चिंतक और सुधारक थे, लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी—समाज के हर वर्ग के लिए समान प्रेम और सेवा की भावना। वे धार्मिक उपदेशों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उन्हें जीवन में उतारकर दिखाते थे। इसी कारण वे देशभर में सम्मान और विश्वास के प्रतीक बने।

कल्बे सादिक का जन्म 22 जून 1939 को लखनऊ शहर के एक प्रतिष्ठित धार्मिक परिवार में हुआ। उनके पिता मौलाना कल्बे हुसैन एक प्रसिद्ध आलिम थे। घर का वातावरण धार्मिक, विद्वत्तापूर्ण और समाजसेवा के संस्कारों से भरा हुआ था। बचपन से ही कल्बे सादिक की रूचि अध्ययन, चिंतन और तर्कपूर्ण चर्चा में रहती थी। उन्होंने अरबी, फारसी, उर्दू, इतिहास, इस्लामी दर्शन और अन्य धार्मिक विषयों में गहन अध्ययन किया। बाद में इंग्लैंड से आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर वे एक प्रखर वक्ता और गहन विचारक के रूप में विकसित हुए।

धर्मगुरु होने के बावजूद उनका दृष्टिकोण आधुनिक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील था। वे हमेशा कहते थे कि “यदि शिक्षा नहीं है तो धर्म का असली उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।” इसी विचारधारा के चलते उन्होंने शिक्षा को अपने जीवन का मुख्य साधन बना लिया। उन्होंने लखनऊ में तल्लीम-ओ-तरबिय्यत आंदोलन को नई गति दी और गरीब तथा वंचित बच्चों की पढ़ाई के लिए कई संस्थान स्थापित किए। टूटी पैर वाली कुर्सियों और बिना बिजली के कमरों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए उन्होंने आधुनिक स्कूल, कॉलेज और टेक्निकल संस्थान खड़े किए। उनकी यह सोच थी कि सिर्फ मदरसों की शिक्षा पर्याप्त नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान, गणित और तकनीक में भी मुस्लिम समाज को आगे आना होगा।

कल्बे सादिक केवल शिक्षा सुधारक ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक सुधार के भी बड़े पैमाने पर प्रवर्तक थे। उन्होंने दहेज के खिलाफ बहुत मजबूत आवाज उठाई। वे मंचों से खुलकर कहते थे कि दहेज लेना या देना इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने अपने समुदाय में सादगीपूर्ण निकाह का अभियान चलाया और स्वयं भी अपने घराने में इसका पालन किया। वे सामाजिक बुराइयों को धार्मिक आदेशों के माध्यम से नहीं, बल्कि तर्क, करुणा और मानवीयता के आधार पर समझाते थे।

भारत में धार्मिक तनाव और साम्प्रदायिक संघर्ष लंबे समय से चुनौती रहे हैं। ऐसे समय में कल्बे सादिक हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे सशक्त चेहरों में से रहे। उनकी तकरीरों में हमेशा भाईचारे, राष्ट्रीय एकता और मानवीय मूल्यों का संदेश होता था। वे कहते थे कि “धर्म बांटता नहीं, जोड़ता है। जो जोड़ता नहीं, वह धर्म नहीं।” उनकी सभाओं में सभी धर्मों के लोग शामिल होते थे और उनकी बातों से प्रेरणा लेते थे। वे राम और रहीम की एकता पर जोर देते थे और भारत की सांझी विरासत को एक अमूल्य धरोहर बताते थे।

कल्बे सादिक का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, सौम्य और विनम्र था। वे बड़े से बड़े मंच पर भी सादगी भरा पहनावा रखते थे और सामान्य भाषा में जटिल धार्मिक विषयों को समझा देते थे। उनकी शैली में संयम, करुणा और गंभीरता का अनोखा मेल होता था। वे आलोचना से घबराते नहीं थे और न ही किसी विवाद में कठोरता दिखाते थे। उनकी वाणी में ऐसी मिठास थी कि कटु से कटु दिल भी पिघल जाता था।

स्वास्थ्य कमजोर रहने के बावजूद वे आखिरी समय तक समाजसेवा और शिक्षा के कार्यों में लगे रहे। उन्होंने गरीबों की सहायता, छात्रवृत्ति कार्यक्रमों और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा दिया। उनका यह भी मानना था कि यदि समाज को आगे बढ़ाना है तो महिलाओं की शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लड़कियों की पढ़ाई के लिए विशेष प्रयास किए और उनके लिए कई संस्थान स्थापित कराए।

कल्बे सादिक ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य को श्रेष्ठ बनाना है, न कि उसे दूसरों से अलग करना। वे धार्मिक श्रेष्ठता की जगह मानवीय श्रेष्ठता को महत्व देते थे। वे इस्लाम को ज्ञान, तर्क और प्रेम का धर्म मानते थे और उसकी व्याख्या आधुनिक संदर्भों में करते थे। उनकी यह विशेषता उन्हें सिर्फ एक धर्मगुरु नहीं, बल्कि एक समाज-सुधारक और मानवतावादी चिंतक के रूप में स्थापित करती है।

24 नवंबर 2020 को उनके निधन से देश ने एक अद्भुत व्यक्तित्व खो दिया। परंतु उनके विचार, उनके कार्य और उनकी शिक्षाएं आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं। उनसे जुड़ी संस्थाएं आज भी हजारों बच्चों और गरीब परिवारों का जीवन बदल रही हैं। उनकी याद में आयोजित कार्यक्रमों में अक्सर एक ही बात दोहराई जाती है—“कल्बे सादिक ने इंसानियत का पैगाम दिया, और यह पैगाम कभी नहीं मिटेगा।”

अंततः, कल्बे सादिक का जीवन भारतीय मुस्लिम समाज ही नहीं बल्कि पूरे देश की सामाजिक-सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने शब्दों से ज्यादा कार्यों से यह साबित किया कि शिक्षा, भाईचारा और मानवता ही समाज को सही दिशा दे सकते हैं। उनका जीवन आज भी नई पीढ़ी के लिए एक प्रकाशस्तंभ की तरह है।

सर छोटू राम : किसान आंदोलनों के आधार स्तंभ

0

सर छोटू राम भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन किसानों, मजदूरों और ग्रामीण समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें आधुनिक भारत का किसान मसीहा कहा जाता है। उनका व्यक्तित्व केवल एक नेता का नहीं बल्कि सामाजिक सुधारक, दूरदर्शी चिंतक और न्यायप्रिय प्रशासक का रहा। उनके विचारों और नीतियों ने उत्तर भारत के ग्रामीण समाज को नई दिशा दी और बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में ग्रामीण चेतना को मजबूत किया।

सर छोटू राम का जन्म 24 नवंबर 1881 को तत्कालीन पंजाब प्रांत के रोहतक जिले के गढ़ी सांपला गांव में हुआ। उनका मूल नाम राऊ रिचपाल था, जिसे बाद में छोटू राम के रूप में जाना गया। सामान्य कृषक परिवार में जन्म लेने के कारण उन्होंने बचपन से ही किसानों की कठिनाइयों को नजदीक से देखा। यही अनुभव उनके पूरे जीवन के आधार बने और यही कारण था कि उन्होंने पढ़ाई-लिखाई के बाद भी शहरों की चमक-दमक से दूर रहकर ग्रामीण भारत की समस्याओं को केंद्र में रखा।

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव और जिला मुख्यालय में पूरी की। आगे की उच्च शिक्षा के लिए वे दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज गए और फिर कानून की पढ़ाई के लिए आगरा और अलाहाबाद में अध्ययन किया। वे अत्यंत तेजस्वी, स्पष्टवादी और मेहनती विद्यार्थी थे। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की, परंतु उनका मन हमेशा किसानों और मजदूरों की दुर्दशा पर चिंतित रहता था। इसी चिंता ने उन्हें राजनीति और सामाजिक सेवा की ओर मोड़ा।

राजनीति में प्रवेश के बाद उनका लक्ष्य बहुत स्पष्ट था—किसानों को साहूकारों और जमींदारों की शोषणकारी व्यवस्था से मुक्त कराना। उन्होंने यूनियनिस्ट पार्टी के माध्यम से पंजाब के ग्रामीण समाज को संगठित किया। उस समय किसानों पर अत्यधिक कर्जा होता था और सूदखोरी की वजह से उनकी जमीनें लगातार छीनी जा रही थीं। सर छोटू राम ने इस समस्या को जड़ से समझा और किसानों के लिए ऐतिहासिक कानून बनवाए। उनमें सबसे महत्वपूर्ण था—पंजाब राहत-ए-कर्ज अधिनियम। इस कानून ने किसानों को साहूकारों की पकड़ से काफी हद तक मुक्त कराया और उनकी जमीनों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके अलावा उन्होंने पंजाब कृषि उत्पादक विपणन अधिनियम बनवाया, जिससे किसानों को अपने उत्पादों की बेहतर कीमत मिल सके। मंडियों की व्यवस्था को नियंत्रित कर उन्होंने बिचौलियों के शोषण पर रोक लगवाई। सर छोटू राम के प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार हुआ। उन्होंने किसान सभा, सहकारी समितियों और ग्रामीण विकास योजनाओं को बढ़ावा दिया। वे हमेशा जोर देते थे कि भारत की असली शक्ति गांवों में है और यदि गांव मजबूत होंगे, तो राष्ट्र भी मजबूत होगा।

सर छोटू राम ने केवल किसानों के आर्थिक हितों की ही नहीं, बल्कि उनके सामाजिक उत्थान की भी चिंता की। उन्होंने समाज में फैली छुआछूत, जातिगत भेदभाव और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। वे शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम मानते थे। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि शिक्षित किसान ही अपने अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर तरीके से समझ सकता है।

सर छोटू राम अत्यंत सादगीपूर्ण और उच्च नैतिक मूल्यों वाले व्यक्ति थे। सत्ता में रहते हुए उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत लाभ नहीं उठाया। उनका जीवन अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी का उदाहरण रहा। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उनके विरोधी भी उनकी सत्यनिष्ठा और दूरदर्शिता का सम्मान करते थे। ब्रिटिश सरकार ने सामाजिक योगदान और प्रशासनिक दक्षता को देखते हुए उन्हें “सर” की उपाधि दी, परंतु उन्होंने हमेशा खुद को किसानों का सेवक ही माना।

उनका प्रभाव इतना व्यापक था कि उन्हें आज भी हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के ग्रामीण समाज में गहरी श्रद्धा से याद किया जाता है। उनकी नीतियों से लाभान्वित किसान उन्हें अपने पथप्रदर्शक के रूप में देखते हैं। कहा जाता है कि यदि सर छोटू राम का निधन 1945 में न हुआ होता, तो स्वतंत्र भारत की कृषि नीति और भी अधिक किसान-केंद्रित होती।

सर छोटू राम का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाए, जो अपने पद का उपयोग सेवा और सुधार के लिए करे, न कि स्वार्थ के लिए। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे—विशेषकर आज के दौर में, जब किसान मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं।

अंततः, सर छोटू राम केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि एक आंदोलन थे—ग्रामीण चेतना का, न्याय के संघर्ष का और भारत के किसानों को सम्मान दिलाने का। उनका जीवन देश के भविष्य के लिए प्रेरणा-स्रोत है और रहेगा।

सरकार बनाकर गिराना कांग्रेस की नीति

0

देश के वर्तमान विपक्ष को यह बात कभी समझ नहीं आएगी । हां जनता खूब समझ रही है । गौर करेंगे तो पाएंगे कि कांग्रेस जिस भी सरकार को समर्थन देकर पीएम बनाया , कुछ ही दिनों में उसे गिरा भी दिया । हम राज्यों की बात नहीं करते चूंकि सूची लम्बी हो जाएगी ।

केंद्र सरकार के उदाहरणों से समझ लीजिए । कांग्रेस ने इस शर्त पर चौधरी चरण सिंह , चंद्रशेखर , देवगौड़ा , इंद्रकुमार गुजराल आदि की सरकारें बनवाई कि भाजपा को अलग रखना पड़ेगा । समय समय पर बनी चारों सरकारें गिर गई चूंकि कांग्रेस ने कुछ ही महीनों में एक एक एककर चारों सरकारों को कुछ ही महीनों में गिरा दिया । कांग्रेस की हमेशा डिमांड रही है कि विपक्ष उनका पीएम या सीएम बनवाए तो वह यूपीए , महागठबंधन अथवा इंडी गठबंधन बनाए ।

यही वजह है कि हाल के बिहार चुनाव में कांग्रेस ने तेजस्वी को कभी भी सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं किया । यहां तक कि बड़े नेताओं ने बिहार जाना ही छोड़ दिया । मतदान के करीब जाकर समर्थन दिया । इसके विपरीत बीजेपी ने आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार बनवाई , कांग्रेस के पुराने नेता मोरारजी भाई को पीएम बनाया । बाद में कांग्रेस के बागी विश्वनाथ प्रताप सिंह को पीएम बनाया । वीपी सिंह यदि मंडल न लाते तो बीजेपी कमंडल न लाती । लेकिन वीपी सरकार अपने कुकर्मों से गिर गई ।

देश में आज जितनी भी पार्टियां हैं लगभग उन सभी का जन्म कांग्रेस से लड़ते हुए हुआ है । यहां तक कि डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना भी कांग्रेसवाद के खिलाफ लड़ते हुए की थी । मतलब यह कि जिन पार्टियों का जन्म कांग्रेस से लड़ते हुए हुआ वे सभी आज कांग्रेस से मिलकर बीजेपी के साथ लड़ रही हैं । अजीब चक्र है न ? मतलब तब कांग्रेस से नफ़रत थी तो जन्म लिया अब बीजेपी नफरत है तो मिट जाने को तैयार ?

हमारे कुछ मित्र कहते हैं कि हम कांग्रेस के निंदक हैं । ऐसा नहीं , कांग्रेस नहीं उसके नेताओं की छद्मवादिता निराश करती है। अरे भाई देश की जनता जिन्हें बार बार चुन रही है , उस जनता को तो चोर मत ठहराओ ? लोकतंत्र की असली मालिक सरकार नहीं , जनता है । चूंकि जनता विपक्ष को हराकर बीजेपी को वोट देती है तो जनता द्वारा चुनी गई सरकार को आप चोर चोर चिल्लाओगे ? अपने कर्म देखिए कि आपने किस तरह चंद्रशेखर , चरण सिंह , देवगौड़ा और गुजराल की सरकारों को बीच रास्ते गिराया था ? इतनी पिटाई के बाद कम से कम अब तो बाज आइए , कुछ सोचिए , कुछ समझिए । वरना यूँ ही सत्ता को ढूंढते रह जाएंगे….?

,,,,, कौशल सिखौला

वरिष्ठ पत्रकार

24 नवंबर का इतिहास

0
  • 1759 – इटली में विसूवियस पर्वत शिखर पर ज्वालामुखी विस्फोट।
  • 1859 – चार्ल्स डार्विन की ‘आन द ओरिजिन आफ स्पेशीज’का प्रकाशन।
  • 1963 – अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी के हत्यारे ली हार्वे ऑस्वाल्ड की हत्या की गई।
  • 1871 – नेशनल राइफल एसोसिएशन (एनवाईसी) का गठन।
  • 1926 – प्रख्यात दार्शनिक श्री अरविंदो को पूर्ण सिद्धि की प्राप्ति।
  • 1966 – कांगो की राजधानी किंसासा में पहला टीवी स्टेशन खुला।
    • स्लोवाकिया के ब्रातिस्लवा के निकट बुल्गारिया का विमान दुर्घटनाग्रस्त, 82 यात्रियों की मौत।
  • 1986 – तमिलनाडु विधानसभा में पहली बार एक साथ विधायकों को सदन से निष्कासित किया गया।
  • 1988 – दल बदल कानून के तहत पहली बार लोकसभा सांसद लालदूहोमा को अयोग्य करार दिया गया।
  • 1989 – चेकेस्लोवाकिया में तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी के पूरे नेतृत्व ने सामूहिक रूप से इस्तीफ़ा दे कर एक नए युग की शुरूआत की।
  • 1992 – चीन का घरेलू विमान दुर्घटनाग्रस्त, 141 लोगों की मौत।
  • 1998 – एमाइल लाहौद ने लेबनान के राष्ट्रपति पद की शपथ ली।
  • 1999 – एथेंस में सम्पन्न विश्व भारोत्तोलन चैंपियनशिप में भारत की कुंजुरानी देवी ने रजत पदक जीता।
  • 2001 – नेपाल में माओवादियों ने सेना व पुलिस के 38 जवान मार डाले।
  • 2006 – पाकिस्तान और चीन ने एक मुक्त व्यापार क्षेत्र संधि पर हस्ताक्षर किये तथा अवाक्स बनाने पर भी सहमति हुई।
  • 2007 – पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ आठ वर्षों के निर्वासन के बाद स्वदेश पहुँचे।
  • 2008- मालेगाँव बम ब्लास्ट के मामले में आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने एटीएस द्वारा अश्लील सीडी दिखाने का आरोप लगाया।

24 नवंबर को जन्मे व्यक्ति

24 नवंबर को हुए निधन

बड़वा गाँव : हरियाणा की ‘छोटी काशी’

0

परंपरा, अध्यात्म और संस्कृति से धरा एक जीवंत ग्राम

बड़वा, हरियाणा के भिवानी ज़िले का एक ऐसा प्राचीन और गौरवशाली गाँव है, जिसके कण–कण में इतिहास, अध्यात्म और संस्कृति रच-बस गए हैं। गाँव के उत्तर-पूर्व में हिसार, दक्षिण में सीवानी कस्बा, उत्तर में चौधरीवास, पूर्व में रावतखेड़ा तथा पश्चिम में नलोई और गावर गाँव स्थित हैं। इसका पिन कोड १२७०४५ है। अपनी विशिष्ट संस्कृति, मंदिरों की बहुलता और आस्थापूर्ण जीवन के कारण बड़वा को हरियाणा की ‘छोटी काशी’ कहा जाता है। यहाँ का वातावरण इतना सौम्य, सादा और मानवीय है कि कोई भी आगंतुक गाँव में प्रवेश करते ही आत्मिक शांति का अनुभव करता है।

यह गाँव हरियाणवी और राजस्थानी संस्कृति के सुंदर संगम का अद्भुत प्रमाण है। यहाँ के लोग सहज, शरीफ़, धार्मिक प्रवृत्ति के और अत्यंत विनम्र स्वभाव के हैं। सरल जीवन और ऊँचे विचार इस समुदाय की पहचान हैं। जीवन को त्यौहार की तरह जीने की कला, हर पल में आनंद ढूँढ लेने का दृष्टिकोण और मिल-जुलकर रहने की परंपरा इस गाँव की सामाजिक आत्मा है। बड़वा का सामुदायिक माहौल इतना सौहार्दपूर्ण है कि यह गाँव केवल एक बस्ती नहीं, बल्कि एक विस्तृत परिवार की तरह दिखाई देता है।

गाँव के उत्तर भाग में स्थित माँ दुर्गा मंदिर नवरात्रों का प्रमुख केंद्र है। नवरात्रों के दिनों में यहाँ प्रतिदिन सवा मणि भोग का वितरण भक्तिभाव और परंपरा का अनुपम उदाहरण है। मंदिर में उमड़ने वाली श्रद्धा, रोज़ाना कीर्तन और सामूहिक सहभागिता गाँव की आध्यात्मिकता को सजीव करती है। चारों दिशाओं में फैले मंदिरों का विस्तार बड़वा की धार्मिक विरासत को और भी उजागर करता है। उत्तर दिशा में पुराना ठाकुर जी मंदिर, श्रीकृष्ण मंदिर, शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, पक्का (केसर) जोहड़, दुर्गा मंदिर और सती दादी मंदिर स्थित हैं। दक्षिण दिशा में बाबा रामदेव मंदिर, बाबा गोगा पीर मंदिर, विश्वकर्मा मंदिर, गाँव का स्टेडियम और पशु चिकित्सालय है। पूर्व दिशा में शनि देव मंदिर, निर्माणाधीन श्री श्याम मंदिर तथा कई छोटे मंदिरों की शृंखला है। पश्चिम दिशा में गोरी दादी मंदिर और झांग आश्रम गाँव की पवित्र पहचान को और भी गहरा करते हैं।

बड़वा की प्राचीनता उसकी हवेलियों से झलकती है। यहाँ की २० से अधिक भव्य और कलात्मक हवेलियाँ गाँव के सुनहरे अतीत की प्रतिनिधि हैं। इन्हें देखकर स्पष्ट होता है कि यह गाँव कभी समृद्ध व्यापारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र रहा होगा। पुराने समय में यहाँ कई प्रतिष्ठित और बड़े सेठ रहते थे, जिनमें श्री परशुराम सेठ और श्री लायक राम सेठ के नाम विशेष सम्मान और श्रद्धा के साथ स्मरण किए जाते हैं। हवेलियों की विशालता, स्थापत्य कला और परिवारों की विरासत आज भी इस गाँव की गरिमा को उजागर करती हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़वा अग्रणी है। गाँव में १०+२ राजकीय बालक विद्यालय, राजकीय बालिका उच्च विद्यालय, शिवालिक हाई स्कूल, टैगोर सीनियर सेकेंडरी स्कूल, दयानंद हाई स्कूल तथा उच्च शिक्षा प्रदान करने वाला टैगोर कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन स्थित है। यह शैक्षणिक विस्तार ग्रामीण परिवेश में शिक्षा के सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करता है। गाँव के मध्य में अवस्थित रामलीला मैदान सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है, जहाँ हर वर्ष अत्यंत विधि-विधान और भक्ति के साथ रामलीला का मंचन किया जाता है। वर्षभर सत्संग-किर्तन का सिलसिला गाँव की आध्यात्मिक ऊर्जा को निरंतर सक्रिय बनाए रखता है।

गौशाला का संचालन ग्रामीणों के सहयोग, दान और सेवा-भाव पर आधारित है, जो बड़वा के सामुदायिक संस्कारों का सच्चा प्रतीक है। गाँव के भीतर व आसपास के धार्मिक स्थलों में बाबा कमलगिरी की कुटिया, गुरु जाम्बेश्वर मंदिर, जमानी बुआ स्थित श्रीकृष्ण मंदिर, मुख्य बाज़ार का श्री रघुनाथ मंदिर और रोषड़ा (स्थानीय उच्चारण–रोहसड़ा) जोहड़ के समीप स्थित भभूता मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दक्षिण दिशा में सीवानी मार्ग पर स्थित काली माई मंदिर (महावतार धाम) अपनी दिव्य ऊर्जा और आस्था के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

पिछले बीस वर्षों से सतत साहित्य-साधना में रत तथा पच्चीस से अधिक कृतियों के रचनाकार, गाँव के युवा साहित्यकार एवं सामाजिक चिंतक दम्पति — डॉ. सत्यवान सौरभ और डॉ. प्रियंका सौरभ — के अनुसार बड़वा केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना, परंपरा, अध्यात्म और आधुनिकता के संतुलन का जीवंत उदाहरण है। उनके शब्दों में, “बड़वा हरियाणा के उन विरल गाँवों में से है, जहाँ संस्कृति केवल संरक्षित नहीं, बल्कि प्रतिदिन जी जाती है।”

इसी सांस्कृतिक जीवंतता का प्रमाण है कि पिछले ३० वर्षों से रोषड़ा (स्थानीय उच्चारण–रोहसड़ा) जोहड़ पर कलयुग के अवतार माने जाने वाले ‘रुन्चे वाले बाबा रामदेव महाराज’ का विशाल मेला और खेल प्रतियोगिताएँ निरंतर आयोजित होती आ रही हैं। यह मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह खेल भावना, सामाजिक सहभागिता और सामुदायिक एकजुटता का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। इसी प्रकार गोगा पीर मंदिर प्रांगण में आयोजित डफ प्रतियोगिता हर वर्ष क्षेत्रीय लोक-संस्कृति को जीवंत करती है, जिसमें दूर-दराज़ के कलाकार और श्रद्धालु बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।

बड़वा की पहचान केवल मंदिरों, मेलों और परंपराओं से ही नहीं बनती, बल्कि यहाँ की जनता के संस्कार, व्यवहार, शिक्षा-स्तर और सरलता भी इसे विशेष बनाती है। लोग अत्यंत शालीन, शिक्षित, व्यवस्थित और आपसी सहयोग की भावना से परिपूर्ण हैं। यहाँ की सामाजिक एकता, पारिवारिक संस्कृति और आपसी सम्मान का वातावरण एक आदर्श ग्रामीण जीवन की छवि प्रस्तुत करता है।

अंततः, बड़वा हरियाणा की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पहचान का एक उज्ज्वल प्रतीक है — एक ऐसा गाँव, जहाँ परंपरा और आधुनिकता सहज संतुलन में सह-अस्तित्व रखती हैं; जहाँ धर्म, लोक-जीवन, शिक्षा और सामाजिक सौहार्द एक ही धारा में प्रवाहित होते हैं; और जहाँ हर आने वाला व्यक्ति अपनत्व और शांति का अनुभव करता है।

बॉक्स आइटम

बड़वा गाँव एक नज़र में

हरियाणा का प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध गाँव

‘छोटी काशी’ के नाम से प्रसिद्ध

२० से अधिक भव्य हवेलियाँ — ‘हवेलियों का गाँव’

प्रत्येक दिशा में प्रतिष्ठित मंदिरों का विशाल विस्तार

माँ दुर्गा मंदिर में नवरात्रों के दौरान प्रतिदिन सवा मणि भोग

पिछले ३० वर्षों से रोषड़ा (रोहसड़ा) जोहड़ पर बाबा रामदेव महाराज का विशाल मेला

गोगा पीर मंदिर प्रांगण में वार्षिक डफ प्रतियोगिता

उत्कृष्ट शैक्षणिक संस्थान: १०+२ विद्यालय, हाई स्कूल, टैगोर कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन

साहित्यकार दम्पति डॉ. सत्यवान सौरभ एवं डॉ. प्रियंका सौरभ का प्रेरक योगदान

अत्यंत शालीन, शिक्षित, धार्मिक और सुसंस्कृत ग्रामीण समाज

केसर तालाब और ‘मुक्तिधाम’ — बड़वा गाँव की सांस्कृतिक धरोहर

बड़वा गाँव की पहचान उसके ऐतिहासिक केसर तालाब से गहराई से जुड़ी है। कहा जाता है कि सेठ परशुराम ने अपनी बहन केसर की मर्यादा की रक्षा हेतु यह तालाब बनवाया था। उस समय गाँव की स्त्रियाँ गोबर चुनने जाती थीं, और यह कार्य सम्पन्न तथा उच्च जाति के लोगों के लिए अपमानजनक माना जाता था। बहन को इस अपमान से बचाने के लिए सेठ ने वहाँ एक विशाल, पक्का तालाब निर्माण करवाया, जो आगे चलकर केसर तालाब के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

तालाब के ठीक पास एक गहरा कुंड स्थित है, जिसे मुक्तिधाम के नाम से जाना जाता है। लोककथाओं के अनुसार दुखी महिलाएँ कभी-कभार यहाँ कूदकर अपनी जीवनयात्रा समाप्त कर लेती थीं। इसी कारण यह स्थान लोकमानस में ‘मुक्तिधाम’ कहलाया। कुंड के किनारे बनी छतरियों की दीवारों पर राधा-कृष्ण की रासलीला के अद्भुत चित्र आज भी सुरक्षित हैं। इन चित्रों में ढोलक, नगाड़े, बांसुरी, हारमोनियम जैसे लोकवाद्य सुंदरता से उकेरे गए हैं। लाल, पीले और नीले रंगों की चमक चित्रों को जीवंत बनाती है—श्रीकृष्ण नीले रंग में और राधा गोरे रंग में अंकित की गई हैं। मोर, तोता, चिड़िया जैसे पशु-पक्षियों की आकृतियाँ भी चित्रकला की शोभा बढ़ाती हैं।

बड़वा की सांस्कृतिक समृद्धि इतनी पुरातन और आकर्षक रही है कि हरियाणवी सिनेमा भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। प्रसिद्ध हरियाणवी फिल्मों ‘चंद्रावल’ और ‘बैरी’ के कई दृश्य इसी गाँव के केसर और रूसहड़ा जोहड़ और आसपास के कुओं के पास फिल्माए गए थे। आज भी वे पनघट, जहाँ कभी ‘चंद्रो’ के दृश्य फिल्माए गए थे, गाँव की सामूहिक स्मृतियों में गर्व का स्थान रखते हैं। गाँववाले उन स्थानों को आज भी अपने इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक मानते हैं।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

जब कानून और समाज आमने–सामने खड़े हों

0

व्यक्ति की स्वतंत्रता, पारिवारिक मर्यादा और एक त्रासदी का गहन सामाजिक विश्लेषण

“स्वतंत्रता और परंपरा—दोनों अपने-अपने स्थान पर सही, पर जब टकराते हैं तो सबसे पहले टूटता है एक सामान्य परिवार। कानून अपना काम करता है, समाज अपनी जिद पर अड़ा रहता है, और बीच में पिस जाता है वह घर जिसने न विद्रोह किया, न अपराध—फिर भी वही सबसे बड़ा शिकार बन जाता है।”

– डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत जैसे विशाल और विविध सामाजिक ढाँचे वाले राष्ट्र में व्यक्ति के अधिकार और समाज की सामूहिक मर्यादाएँ एक-दूसरे से लगातार टकराती रहती हैं। संविधान व्यक्ति को स्वतंत्रता देता है, अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है, लेकिन सामाजिक परम्पराएँ यह स्वीकार नहीं कर पातीं कि कोई लड़की या लड़का परिवार की इच्छा और बिरादरी की मान्यताओं से अलग कोई जीवननिर्णय ले। यह संघर्ष नया नहीं है, लेकिन आज की जमीनी हकीकत में इसका तनाव कहीं अधिक विकराल रूप ले चुका है।

हाल ही की एक त्रासदी में यही टकराव खुलकर सामने आया, जब एक युवती ने अपने ही गाँव के युवक से विवाह कर लिया—ऐसा विवाह जो पूरी तरह कानूनी था, लेकिन समाज की दृष्टि में सर्वथा अस्वीकार्य। सामाजिक विरोध, पंचायत की मनाही, परिवार की पीड़ा और प्रतिष्ठा के दबाव के बीच लड़की शहर चली गई थी, पर कुछ समय बाद वापस अपने ही पैतृक गाँव में बहू बनकर लौट आई। यही वापसी समाज को चुनौती की तरह दिखाई दी और परिवार पर अत्यन्त तीव्र मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ा। वही दबाव परिस्थितियों को उस कगार तक ले गया जहाँ भाई ने अपनी ही बहन की हत्या कर दी। इस एक क्षण ने न केवल एक जीवन छीना, बल्कि पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया।

यह घटना सिर्फ मानवता पर एक चोट नहीं है, यह एक ऐसा दर्पण भी है जिसमें हम अपने समय की सबसे बड़ी विडंबना को साफ देख सकते हैं—कानून कुछ कहता है, समाज कुछ और। व्यक्ति की स्वतंत्रता एक दिशा में जाती है, जबकि परंपराएँ दूसरी दिशा में खींचती हैं। इन दोनों के बीच जो परिवार खड़ा होता है, वह अक्सर दोनों ओर से घायल होता है। कानून वयस्कता की उम्र तय कर देता है, पर वह ग्रामीण समाज की संवेदनात्मक संरचना, परिवार की प्रतिष्ठा, और सामुदायिक दबाव को नहीं समझता। वहीं समाज स्वतंत्रता के अधिकार को “अवज्ञा” या “विद्रोह” की तरह देखता है और परिवार पर ऐसी जिम्मेदारियाँ डाल देता है जिन्हें निभाना असंभव है।

परिवार ही इस संघर्ष का सबसे बड़ा पीड़ित बनता है। बेटी का गांव छोड़कर जाना, रिश्तेदारों की टिप्पणियाँ, पंचायत का दबाव, सामाजिक प्रतिष्ठा का संकट—ये सभी घटनाएँ एक घर को भीतर से हिलाकर रख देती हैं। कानून परिवार से लड़की को स्वीकार करने का संदेश देता है, जबकि समाज उसे अस्वीकार करने का दबाव डालता है। ये दोनों ताकतें परिवार को दो हिस्सों में चीर देती हैं—एक हिस्सा जिसे मन ने स्वीकार कर लिया है, और दूसरा हिस्सा जिसे समाज स्वीकार नहीं करने देता। ऐसे में विवेक धुंधला पड़ जाता है और भावनाएँ निर्णयों पर हावी होने लगती हैं।

इस घटना का सबसे भयावह पहलू यह था कि सोशल मीडिया पर 95 प्रतिशत टिप्पणियाँ इस हत्या को “सही” ठहरा रही थीं। यह केवल कुछ व्यक्तियों की राय नहीं, बल्कि समाज में पनप रही एक खतरनाक सामूहिक सोच का संकेत है। जब कोई समाज अपनी भावनाओं और परंपराओं के दबाव में हत्या जैसे अपराध को भी न्याय मानने लगे, तो यह किसी भी सभ्य व्यवस्था के लिए अत्यन्त गंभीर स्थिति है। कानून की शक्ति तभी तक है जब तक समाज उसे नैतिक समर्थन देता है। जब समाज हिंसा को नैतिक ठहराने लगे, कानून कमजोर नहीं, बल्कि अप्रासंगिक हो जाता है। और यही स्थिति किसी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी चेतावनी है।

विवाह की स्वतंत्रता का प्रश्न भी इस घटना में नए दृष्टिकोण से उभरता है। भारतीय कानून मानता है कि 18 और 21 वर्ष की उम्र में व्यक्ति परिपक्व और स्वतंत्र निर्णय लेने योग्य होता है। पर क्या वास्तव में यह उम्र जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय बिना परिवार के अनुभव, बिना सामाजिक समझ, बिना भविष्य की जिम्मेदारियों को समझे लेने के लिए पर्याप्त है? भारतीय परिवार व्यवस्था में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मामला नहीं होता, यह दो परिवारों, रिश्तों और समाजों का मामला होता है। ऐसे में कम आयु में किया गया आवेगपूर्ण निर्णय केवल व्यक्ति नहीं, पूरे परिवार को प्रभावित करता है।

यही कारण है कि कई लोग तर्क देते हैं कि विवाह के लिए माता-पिता की सहमति आवश्यक होनी चाहिए—कम से कम 30 वर्ष की आयु तक। यह विचार सामाजिक अनुभवों से उत्पन्न है, पर संवैधानिक दृष्टि से कठिन है। यदि माता-पिता की सहमति अनिवार्य कर दी जाए, तो यह युवाओं पर अत्यधिक दबाव और कई मामलों में दमन को भी जन्म दे सकता है। फिर भी यह भी सच है कि परिवार से विमुख होकर किए गए विवाहों के परिणामों का सबसे बड़ा बोझ परिवारों को ही उठाना पड़ता है। यह द्वंद्व इतना गहरा है कि कोई भी पक्ष न पूरी तरह सही ठहराया जा सकता है, न पूरी तरह गलत।

समाज अक्सर कहता है कि लड़की ने “परिवार की कई हत्याएँ कर दीं”—यह भाषा कानूनी नहीं, बल्कि भावनात्मक है। कानून भावनात्मक मृत्यु को अपराध नहीं मान सकता। पर परिवार इसे वास्तविक समझता है क्योंकि वे इसे प्रत्यक्ष जीते हैं। यही वह खाई है जिसे पाटना सबसे कठिन है। कानून कहता है निर्णय व्यक्तिगत है; समाज कहता है निर्णय सामूहिक है। और इन्हीं दो कथनों के बीच वह परिवार टूट जाता है जिसके इर्द-गिर्द इस तरह की घटनाएँ जन्म लेती हैं।

इस मामले में सबसे अधिक नुकसान उसी परिवार का हुआ जिसने न अपराध चुना, न विद्रोह। लड़की की जान चली गई, भाई का जीवन जेल में समाप्त, माता-पिता ने एक बेटी और एक बेटे दोनों को खो दिया, घर की आर्थिक-सामाजिक नींव हिल गई, बच्चों का भविष्य अनिश्चित हो गया। जबकि समाज के लिए यह महज चर्चा का विषय रह गया, और सरकार के लिए सिर्फ एक केस फाइल।

प्रश्न यह है कि सरकार क्या कर सकती है? भागकर विवाह पर रोक समाधान नहीं है, पर इस प्रक्रिया में सुधारों की आवश्यकता है। विवादित विवाह से पहले अनिवार्य परामर्श, परिवार–युवा मध्यस्थता, पंचायतों के अधिकारों पर स्पष्ट सीमा, और स्कूल-कॉलेजों में सामाजिक जिम्मेदारी की शिक्षा—ये सभी कदम जरूरी हैं। न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं को भी परिवार की सामाजिक पीड़ा को समझने की आवश्यकता है।

फिर भी सरकार और कानून दोनों अकेले समस्या हल नहीं कर सकते। जब तक समाज संवाद को हिंसा से ऊपर नहीं रखेगा, जब तक परिवार गुस्से से ऊपर संवाद को नहीं चुनेगा, और जब तक युवा आवेग को निर्णय का आधार बनाना बंद नहीं करेंगे—तब तक ऐसी त्रासदियाँ रुकने वाली नहीं हैं।

आज़ादी का अर्थ स्वेच्छाचार नहीं, और परंपरा का अर्थ दमन नहीं। दोनों के बीच संतुलन ही सभ्यता का आधार है।

अंततः यही समझना होगा कि कानून और समाज की लड़ाई में जीत किसी की नहीं होती—हार हमेशा एक इंसान और एक परिवार की ही होती है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

आर्य समाज नेता और सांसद प्रकाशवीर शास्त्री : धर्म, राष्ट्र और संस्कृति के तेजस्वी पुरोधा

0

प्रकाशवीर शास्त्री भारतीय राजनीति, धर्म और समाज-सुधार की उन दुर्लभ विभूतियों में से थे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, विद्वता और तेजस्वी वाणी के बल पर न केवल आर्य समाज को नई दिशा दी, बल्कि भारतीय संसद में भी भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद की सशक्त आवाज बनकर उभरे। वे एक ऐसे नेता थे जिनका संपूर्ण जीवन वेद-मार्ग, राष्ट्र-सेवा और सामाजिक जागरण के लिए समर्पित रहा। विद्वान, संत, विचारक और कर्मयोगी — इन सभी विशेषणों को वे सही अर्थों में सार्थक करते थे।

प्रकाशवीर शास्त्री का जन्म 30 दिसंबर 1924 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के मवाना क्षेत्र के टिटोली गांव में हुआ। उनका मूल नाम प्रकाश चंद्र था। बचपन से ही उनमें अध्यात्म, अध्ययन और वाक्चातुर्य की अद्भुत प्रवृत्ति दिखाई देती थी। घर का वातावरण धार्मिक था और परिवार का झुकाव वैदिक परंपरा की ओर था। उन्हें संस्कृत और वेदों का अध्ययन कराने हेतु गुरुकुल भेजा गया, जहाँ उनकी प्रतिभा तेज़ी से निखरती चली गई। बाद में उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय और गुरुकुल कांगड़ी से उच्च शिक्षा प्राप्त की और संस्कृत साहित्य में “शास्त्री” की उपाधि के साथ वे एक सिद्धहस्त विद्वान के रूप में सामने आए।

आर्य समाज की सुधारवादी, तार्किक और वैदिक विचारधारा ने प्रकाशवीर शास्त्री को गहराई से प्रभावित किया। वे केवल अनुयायी नहीं रहे, बल्कि संगठन के अग्रणी चिंतक और प्रवक्ता बने।
उनकी प्रवचन शैली अत्यंत ओजस्वी थी। वेद, उपनिषद, संस्कृत साहित्य और तर्क—इन सभी विषयों पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि वे पूरे देश में आर्य समाज के सबसे प्रभावशाली वक्ताओं में गिने जाने लगे।

आर्य समाज के मंचों से उन्होंने—अस्पृश्यता के उन्मूलन,समानता, शिक्षा के प्रसार, नशाबंदी,स्वदेशी,और वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना जैसे मुद्दों पर प्रभावी अभियान चलाए। उनकी वाणी में सत्य और तर्क की ताकत थी, इसलिए वे आम लोगों से लेकर विद्वानों तक सब पर गहरा प्रभाव डालते थे।


सामाजिक सुधारों के योद्धा

प्रकाशवीर शास्त्री ने अपना अधिकांश जीवन समाज में व्याप्त कुरीतियों को चुनौती देने में लगाया। उन्होंने जाति-विभेद, अंधविश्वास, बाल-विवाह, पाखंड और वैदिक मार्ग से हटकर चली आ रही विकृतियों के खिलाफ लगातार आवाज उठाई।

उनका मानना था कि भारत की असली शक्ति उसकी संस्कृति है, और यह शक्ति तभी प्रकट होगी जब समाज शिक्षित, संगठित और नैतिक मूल्यों से संपन्न बनेगा।
वे युवाओं को वैदिक ज्ञान, वैज्ञानिक सोच और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा देने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।

राजनीतिक जीवन का आरंभ

उनकी लोकप्रियता, विद्वत्ता और समाज में प्रभाव के कारण उन्हें राजनीति में आने का निमंत्रण मिला, परंतु वे सत्ता से ज्यादा सेवा को महत्व देते थे। फिर भी, जब महसूस हुआ कि संसद देश की निर्णायक संस्था है और वहां भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवादी विचारधारा की सशक्त आवाज की आवश्यकता है, तब उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा।वे 1967 में तीसरी लोकसभा के लिए चुने गए। शास्त्री जी आर्य समाज, वेद-धर्म और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों पर संसद में अत्यंत तार्किक, प्रभावी और निर्भीक ढंग से अपनी बात रखते थे।उनके भाषण न सिर्फ तथ्यपूर्ण होते थे, बल्कि उनमें वैदिक संस्कृति का ओज भी होता था। यही कारण है कि शत्रु-दल के नेता भी उनका सम्मान करते थे।


प्रकाशवीर शास्त्री ने संसद में—धर्मांतरण रोकने, कश्मीर नीति, शिक्षा सुधार, भारतीय भाषाओं के संवर्धन,गौ-रक्षा,और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण जैसे मुद्दों पर अपनी प्रभावी आवाज उठाई।

वे हिंदी के प्रबल समर्थक थे। उनका मत था कि भारत की पहचान उसकी मातृभाषा से है और शासन-प्रशासन में भारतीय भाषाओं का उपयोग बढ़ाना आवश्यक है। संसद में कई बार उन्होंने संस्कृत और हिंदी के पक्ष में ऐतिहासिक भाषण दिए, जिन्हें आज भी विद्वान लोग उदाहरण के रूप में उद्धृत करते हैं।

वेद-धर्म और भारतीयता के प्रचारक

शास्त्री जी ने देश के कोने-कोने में जाकर वैदिक धर्म और संस्कृत साहित्य के पुनर्जागरण का अभियान चलाया। वे कहते थे—
“भारत की आत्मा वेदों में है; यदि हम वेदों से दूर हो गए तो हमारी संस्कृति खो जाएगी।”उनकी प्रवचन शैली लोगों के मन में वैदिक आस्था का संचार करती थी। वे logic-based spirituality के पक्षधर थे—जहां धर्म अंधविश्वास नहीं, बल्कि ज्ञान और अनुशासन का मार्ग है।

लेखन और विचारधारा

प्रकाशवीर शास्त्री केवल वक्ता ही नहीं, उच्चकोटि के लेखक भी थे।
उनकी कई पुस्तकें, निबंध और भाषण आज भी आर्य समाज और वैदिक साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथों में गिनी जाती हैं।

उनका लेखन—प्रखर तर्क,सरल भाषा, और गहरी राष्ट्रीय चेतना से भरा हुआ होता था।

असमय निधन पर शोक

1977 में अचानक उनका निधन हो गया। वे मात्र 52 वर्ष के थे। इतने कम जीवन में उन्होंने जितना काम किया, वह किसी बड़े आंदोलनकारी या आध्यात्मिक नेता के लिए भी प्रेरणा है। उनके जाने से भारतीय राजनीति, आर्य समाज और धर्म-सुधार आंदोलनों को अपूरणीय क्षति पहुँची।

प्रकाशवीर शास्त्री एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके व्यक्तित्व में धर्म, राष्ट्र, विद्या और सेवा चारों एक साथ प्रवाहित होती थीं।
वे आर्य समाज के अग्रणी नेता, तेजस्वी वक्ता, विद्वान संस्कृताचार्य, सामाजिक सुधारक और सशक्त सांसद थे।आज भी भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रवाद और वैदिक परंपराओं की चर्चा जब भी होती है, प्रकाशवीर शास्त्री का नाम सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि स्पष्ट विचार, उच्च चरित्र और समर्पण से कोई भी व्यक्ति समाज और राष्ट्र के लिए महान कार्य कर सकता है। वे सचमुच भारत के तेजस्वी दीप थे, जिनकी ज्योति आज भी वैदिक सत्य और राष्ट्रभक्ति का प्रकाश फैलाती है।

भारतीय संगीत की मधुर आत्मा, पाश्र्वगायिका गीता दत्त

0

भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णयुग में जो आवाज सबसे अलग, सबसे भावपूर्ण और सबसे जीवंत होकर उभरती है, वह गीता दत्त (जन्म 23 नवंबर 1930 – निधन 20 जुलाई 1972) की आवाज है। वह सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी कलाकार थीं जिन्होंने गीतों में भावनाओं का संचार अपने सहज और स्वाभाविक अंदाज़ से किया। बंगाल के फरीदपुर जिले में जन्मी गीता दत्त का बचपन संगीत के वातावरण में बीता। उनके पिता देबेंद्रनारायण राय चौधरी उन्हें उच्च शिक्षा के लिए मुंबई लाए और यहीं से उनके संगीत का सफर शुरू होता है।

मुंबई आने के कुछ समय बाद ही संगीतकार हनुमान प्रसाद ने गीता की मधुर आवाज सुनकर उन्हें 1946 की फिल्म भक्त प्रह्लाद में गाने का अवसर दिया। हालांकि यह शुरुआत छोटी थी, लेकिन असली पहचान मिली एस.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म दो भाई (1947) के गीत “मेरा सुंदर सपना बीत गया” से। यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि फिल्म संगीत जगत में गीता दत्त एक रात में मशहूर हो गईं। उस समय किशोर उम्र की इस लड़की की आवाज में जो दर्द, मासूमियत और सहजता थी, वह किसी भी स्थापित गायिका से कम नहीं थी।

गीता दत्त का गायन किसी औपचारिक तकनीकी जटिलता पर निर्भर नहीं था, बल्कि उनका अंदाज़ अत्यंत प्राकृतिक था। उनकी आवाज में रुआब भी था, नज़ाकत भी, दर्द भी और शरारत भी। रोमांटिक गीत हों तो वे पूर्ण कोमलता के साथ दिल में उतर जाते थे। भावपूर्ण गीतों में उनकी आवाज किसी जलधारा-सी बहती थी ।भक्ति गीतों में उनकी आस्था का गहरा रंग सुनाई देता । उनके गाने सुनते समय यह सहज लगता है कि वह गीत को जी रही हैं, गा नहीं रही।

1940 और 50 का दशक गीता दत्त के फिल्मी सफर का स्वर्णकाल माना जाता है। एस.डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, हेमंत कुमार, और मदन मोहन जैसे संगीतकारों ने गीता की आवाज का भरपूर उपयोग किया। 1950 के दशक में उनके कुछ गीत, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में नई पहचान दी, ये हैं—

“बाज़ी” का तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले

“आर-पार” का बाबूजी धीरे चलना

“सीआईडी” का जाते हो जाते हो

“प्यासा” का जाने क्या तूने कही

इन गीतों में गीता दत्त की अदायगी ने उन्हें उस दौर की सबसे प्रिय पसारू गायिका बना दिया—यानी वह गायिका जिसकी आवाज हर तरह के भाव और सुरों में समान रूप से फैलती, बहती और असर छोड़ती।

प्यासा और गीता दत्त का अनंत योगदान

1957 में आई गुरु दत्त की फिल्म प्यासा ने गीता दत्त की कला को चरम सीमा पर दिखाया।
“जाने क्या तूने कही”, “आज सजन मोहे अंग लगा लो” जैसे गीत अनंत काल तक संगीत प्रेमियों के दिलों में रहेंगे। गीता दत्त की आवाज में दर्द, तड़प, प्रेम और अधूरी इच्छा—all blended perfectly.

यह वह दौर था जब गीता दत्त निजी जीवन के संघर्षों से भी गुजर रही थीं। पति गुरु दत्त के साथ संबंधों में तनाव और पारिवारिक उलझनों के बावजूद उनकी आवाज में जो भाव की गहराई आई, उसने उनके गायन को और अधिक परिपक्व बनाया।

गीता दत्त की शादी 1953 में फिल्म निर्देशक व अभिनेता गुरु दत्त से हुई थी। शुरुआत में यह रिश्ता बेहद खुशहाल रहा, पर बाद में गुरु दत्त और अभिनेत्री वहीदा रहमान के समीकरणों ने पारिवारिक व संगीत जीवन को प्रभावित किया। मानसिक तनाव, हुनर की बेइज्जती, असुरक्षा और टूटे पारिवारिक वातावरण ने गीता दत्त के मन को लगातार परेशान किया। इन स्थितियों का प्रभाव उनके स्वास्थ्य और पेशे पर भी पड़ा। शराब की ओर झुकाव और लगातार तनाव से उनका जीवन धीरे-धीरे अवसाद और बीमारी की ओर चला गया। संघर्षों के बावजूद उन्होंने कई यादगार गीत दिए 1960 के बाद जब उनका फिल्मी करियर प्रभावित होने लगा, तब भी बंगाली आधुनिक गीतों में उनका योगदान अद्भुत रहा।

“तुमि जे आमार”

“ए बार जोदी जाएगो चुले”
आज भी बंगाल में गीता दत्त को उतनी ही श्रद्धा से सुना जाता है जैसे लता मंगेशकर और हेमंत कुमार को।

असमय मृत्यु, लेकिन अमर आवाज

1972 में मात्र 41 वर्ष की आयु में गीता दत्त इस दुनिया से चल बसीं। लेकिन उनकी आवाज, उनकी मधुरता, और गीतों में उतारा गया उनका भाव—आज भी उतना ही ताज़ा है जितना उनके जीवनकाल में था।

उनके गाए हुए गीत समय की सीमा को पार कर चुके हैं। वह गायिका, जिसने कभी तकनीक पर भरोसा नहीं किया, बल्कि दिल और आत्मा से गाया, उनकी आवाज भारतीय संगीत की आत्मा बन गई।

निष्कर्ष

गीता दत्त सिर्फ एक पसारू गायिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत की वह कशिश थीं जो सहजता, आत्मीयता और नारी-संवेदनाओं का अद्भुत मेल थीं। उनके गीत आज भी रेडियो, मंचों और स्मृतियों में उसी मिठास के साथ गूंजते हैं।

उनका जीवन भले संघर्षों से भरा रहा, पर उनकी कला—अमर, अविरल और अनुपम है। गीता दत्त हिंदी सिनेमा का वह अध्याय हैं जिसे पढ़ना मन को भीगे बिना संभव नहीं।

कोई बड़ी बात नही, कल फिर सिंध भारत में आ जाएः राजनाथ सिंह

0

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सीमाएं कभी भी बदल सकती हैं और हो सकता है कि सिंध फिर भारत में लौट आए। एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने सिंध के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को याद किया।

 सिंध क्षेत्र 1947 के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में चला गया था। वहां रहने वाले ज्यादातर सिंधी हिंदू भारत आ गए। राजनाथ सिंह ने कहा कि एलके आडवाणी ने अपनी किताब में लिखा है कि उनकी पीढ़ी के सिंधी आज भी सिंध के भारत से अलग होने को स्वीकार नहीं कर पाए हैं।

उन्होंने बताया कि भारत के हिंदुओं के लिए सिंधु नदी हमेशा पवित्र रही है और सिंध के कई मुसलमान भी इसकी पवित्रता को आब-ए-जमजम जितना पवित्र मानते थे।

इससे पहले, 22 सितंबर को मोरक्को में भारतीय समुदाय के साथ बातचीत में, राजनाथ सिंह ने पीओके पर भी विश्वास जताया था। उन्होंने कहा था कि भारत को कोई आक्रामक कदम उठाए बिना ही पीओके वापस मिल जाएगा, क्योंकि पीओके के लोग खुद ‘कब्जा करने वालों से आजादी’ की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘पीओके अपने आप हमारा होगा। पीओके में मांगें उठनी शुरू हो गई हैं, आपने नारे सुने होंगे।’

राजनाथ सिंह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में भारत ने आतंकवादी ढांचे और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया था। इस दौरान कुछ रक्षा विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि भारत को पीओके में आगे बढ़कर उस क्षेत्र को सुरक्षित कर लेना चाहिए जो भारत का है।