वीर और सुरुज ने दमदार कहानी और विश्वसनीयता से दिल जीता
दायरों से आगे, पहचान और स्वीकृति को समेटती बातचीत
मुंबई की धड़कन में जन्मी कोमल ट्रांसजेंड प्रेम कथा ‘लाला एंड पॉपी’ की टीम ने आज इफी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस फिल्म की यात्रा, इसकी सामाजिक अनुगूंज और ईमानदार निरूपण के लिए अपनी प्रतिबद्धता पर बेबाक बातचीत की। निर्देशक कैजाद गुस्ताद, निर्माता बॉबी बेदी तथा अदाकारों वीर सिंह और सुरुज राजखोवा ने चहारदीवारियों से प्रेम को, दोहरेपन से मानवता को और शोशेबाजी से प्रामाणिकता को ऊपर रखने का साहस दिखाने वाली अपनी इस फिल्म पर दिल खोल कर चर्चा की।
ईमानदार दास्तानगोईः इंसान पहले, लिंग भेद बाद में
बॉबी बेदी ने बातचीत की शुरुआत करते हुए बताया कि उन्होंने दशकों तक बड़ी फिल्में प्रोड्यूस करने के बाद इस प्रोजेक्ट से जुड़ने का फैसला क्यों किया। उन्होंने कहा कि हर बड़ी फिल्म दर्शकों के साथ से ही बड़ी बनती है। ईमानदारी और लगाव को अपने दिल में समेटे ‘लाला एंड पॉपी’ भी इसी दिशा में बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि भारत का समाज करवट ले रहा है। कानून ने ट्रांसजेंडर पहचानों को कबूल कर लिया है। लेकिन इन्हें आम सामाजिक मंजूरी अभी नहीं मिल सकी है। उनके अनुसार इस फिल्म का एक सीधासादा सा विश्वास है। इंसानियत पहले आती है, लिंग भेद बाद में। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर इंसान को आजाद रहने, प्रेम करने और भय के बिना जीने का हक है।
कैजाद गुस्ताद ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उनका इरादा एक ऐसी ईमानदार फिल्म बनाने का था जो सिर्फ एक एलजीबीटीक्यू प्लस कहानी होने के बजाय समूचे विश्व से संवाद कर सके। वह एक ऐसी प्रेम कथा कहना चाहते थे जिससे दर्शक खुद को जोड़ सकें। इसका दो ट्रांसजेंडर के बीच होना तो बस एक संयोग है। वह जिस दुनिया की बात कह रहे हैं उसे वह शुरुआत में बहुत कम जानते थे। इसलिए कहानी को कागज पर उतारने से पहले उन्हें बरसों के शोध, ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ आत्मीय बातचीत और बारीकियों को सही ढंग से समझने की प्रतिबद्धता की दरकार थी।
वीर और सूरज की सफरनामा चर्चा के केंद्र में
ट्रांसजेंडर कलाकारों, वीर सिंह और सुरुज राजखोवा ने चर्चा को एक अंतरंग निजी रंग दे दिया। वीर ने कहा कि वह जब बड़े हो रहे थे उस समय परदे पर उन जैसे लोगों की मौजूदगी नहीं थी। उनकी तमन्ना थी कि वह अपने जैसे लोगों का प्रतिनिधि बनें। उन्होंने कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि मेरे जैसे लोग मुझे परदे पर देखें। वे सोचें कि अगर मैं यह सब कर सकता हूं तो उनके लिए भी ऐसा करना मुमकिन है। सूरज ने कहा कि बेशक, एलजीबीटीक्यू प्लस चरित्र भारतीय सिनेमा में लंबे समय से मौजूद रहे हैं। लेकिन उनका इस्तेमाल सिर्फ हास्य पैदा करने के लिए ही किया गया है। ‘लाला एंड पॉपी’ उन्हें परदे पर इंसानों की तरह जीने का मौका देती है जो अपनेआप में अभूतपूर्व है।
कहानी को मुख्यधारा में लाना
बॉबी बेदी से पूछा गया कि यह फिल्म एलजीबीटीक्यू प्लस दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई गई है या मुख्यधारा को। इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘यह समारोहों के लिए नहीं बल्कि अवाम के वास्ते बनाई गई फिल्म है।’’ उन्होंने कहा कि यह आम लोगों की फिल्म है। इसलिए वह इसे मुख्यधारा के समारोहों, सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स तक ले जाएंगे।
कैजाद ने इस बात को दोहराया कि ‘लाला एंड पॉपी’ कोई उपदेश देने वाली फिल्म नहीं है। वह जरूरत से ज्यादा नैतिकता का पाठ पढ़ाने के बजाय उम्मीद करते हैं कि फिल्म की भावनात्मक सचाई अपनी बात खुद बयान करेगी। उन्होंने कहा, ‘‘किसी भी फिल्म को अपने दर्शकों के साथ संवाद करना होता है। प्रेम लिंग भेद से पर है। इस सच के बारे में चीख कर बताने की नहीं, बल्कि इसे महसूस करने की जरूरत है।’’
दोनों अदाकारों, वीर सिंह और सुरुज राजखोवा के लिए यह फिल्म दुनिया के सामने गरिमामय मौजूदगी की उम्मीद है। यह एक ऐसी सिनेमाई यात्रा की शुरुआत है जिसमें ट्रांस लोग सिर्फ इंसान के तौर पर देखे जा सकते हैं। सूरज ने कहा, ‘‘यह इतिहास की तरह महसूस होता है।’’
बातचीत के अपने मुकाम तक पहुंचते-पहुंचते ‘लाला एंड पॉपी’ के संदेश की गूंज सुनी जा सकती थी। यह सिर्फ लिंग परिवर्तन के बारे में फिल्म नहीं है। यह प्रेम, साहस और जीने के हक के बारे में फिल्म है। मौजूदा समय में दुनिया बदलती पहचानों को कबूल करना सीख ही रही है। ऐसे में यह फिल्म याद दिलाती है कि प्रेम के सभी रूपों को खिलने के लिए मौके की दरकार होती है।
धर्मेंद्र का जाना सिर्फ एक अभिनेता का जाना नहीं, बल्कि एक युग का शांत हो जाना है। गाँव की मिट्टी से उठकर सिनेमा के आसमान तक पहुँचे इस कलाकार ने अपने अभिनय से नहीं, बल्कि अपनी सादगी और मानवीयता से करोड़ों दिल जीते। रोमांस से लेकर एक्शन और कॉमेडी तक—हर भूमिका में वे जीवन की सच्चाई लेकर आए। “शोले” का वीरू, “चुपके चुपके” का प्रोफेसर, “मेरा गाँव मेरा देश” का नायक—ये सारे सिर्फ किरदार नहीं, हमारी यादों का हिस्सा हैं। धर्मेंद्र चले गए, लेकिन उनका उजाला हमेशा रहेगा।
– डॉ. सत्यवान सौरभ
हिंदी सिनेमा ने अपने लंबे सफर में कई सितारों को जन्म दिया, पर उनमें कुछ ऐसे हैं जिनकी रोशनी समय के साथ कम नहीं होती, बल्कि हर पीढ़ी की आँखों में एक नई चमक लेकर जीवित रहती है। धर्मेंद्र उन्हीं दुर्लभ सितारों में से थे, जो सिर्फ अभिनेता नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज के भावनात्मक ताने-बाने का हिस्सा बन चुके थे। उनका जाना एक ऐसी खामोशी छोड़ गया है, जिसे शब्दों में बाँध पाना मुश्किल है। वे सिर्फ पर्दे पर दिखने वाली एक छवि नहीं थे; वे एक ऐसे इंसान थे, जिनकी गर्माहट और विनम्रता ने दर्शकों को अपने परिवारों के किसी सदस्य की तरह उनसे जोड़ दिया था।
धर्मेंद्र की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। पंजाब के एक छोटे से गांव नसराली से शुरू हुई यह यात्रा संघर्ष, मेहनत और सपनों की शक्ति का जीवंत उदाहरण है। एक साधारण किसान परिवार में जन्मा लड़का जब फिल्मों की दुनिया की चमक-दमक में पहुंचता है, तो आमतौर पर व्यक्ति अपनी मूल पहचान खो बैठता है, लेकिन धर्मेंद्र ऐसे नहीं थे। उन्होंने अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ा। वही सादगी, वही देसीपन, वही अपनापन उनकी हर मुस्कान में दिखाई देता था। यही कारण है कि वे सिर्फ ‘स्टार’ नहीं बने, वे ‘दिलों का हीरो’ बने।
1960 के दशक में जब उन्होंने सिनेमा के परदे पर कदम रखा, तब दर्शकों ने यह अंदाज़ा नहीं लगाया होगा कि यह युवक अगले कई दशकों तक हिंदी फिल्मों का सबसे प्रिय चेहरा बनने वाला है। शुरुआत भले ही धीमी रही हो, पर उनकी आँखों में मौजूद मासूमियत और व्यक्तित्व में छिपा गहरा आत्मविश्वास बहुत जल्द ही लोगों के दिलों तक पहुँच गया। उनकी शुरुआती फिल्मों ने यह दिखाया कि उनमें संवाद की सरलता, भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति और अपने किरदार के प्रति ईमानदार दृष्टिकोण जैसी विशिष्ट खूबियाँ हैं।
समय के साथ धर्मेंद्र ने दिखा दिया कि वे सिर्फ एक रोमांटिक हीरो नहीं, बल्कि हर शैली में फिट बैठने वाले अभिनेता हैं। उन्होंने अभिनय के हर रंग को जीया—रोमांस की कोमलता, कॉमेडी की सहजता, एक्शन की तीव्रता और भावुक दृश्यों की गहराई। “अनुपमा” और “अनपढ़” में उनकी रोमांटिक छवि दर्शकों का दिल चुरा लेती थी, तो “मेरा गांव मेरा देश” और “शोले” में उनका एक्शननुमा अंदाज़ उन्हें ‘ही-मान’ की उपाधि दिलाता था। यह उपाधि किसी फैशन के कारण नहीं, बल्कि उनके स्वाभाविक दृढ़ व्यक्तित्व का प्रमाण थी।
“शोले” का वीरू भारतीय सिनेमा के इतिहास का वह चरित्र है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं। वीरू की मस्ती, दोस्ती, बेफिक्री और दिल की गहराई ने इस किरदार को अमर बना दिया। धर्मेंद्र कोई भूमिका निभाते नहीं थे, वे उसे जीते थे। यही कारण है कि वीरू आज भी दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान ला देता है। लेकिन धर्मेंद्र का जादू सिर्फ वीरू तक सीमित नहीं था। “चुपके चुपके” में उनकी गंभीर-स्वभाव वाली कॉमेडी यह साबित करती है कि हास्य अभिनय हमेशा उछल-कूद या अतिरंजना से नहीं आता; वह शालीनता और समयबद्ध संवादों से भी पैदा हो सकता है। धर्मेंद्र इस बात का जीता-जागता उदाहरण थे।
उनके अभिनय का आधार हमेशा ‘सच्चाई’ रहा। वे अभिनय नहीं करते थे, वे सत्य को अभिव्यक्त करते थे। यह सत्य कभी प्रेम की कोमलता के रूप में जागता था, कभी संघर्ष की तल्ख़ी के रूप में। आज के समय में जब अभिनय तकनीक और बाहरी सजावट पर अधिक निर्भर होता जा रहा है, धर्मेंद्र हमें याद दिलाते हैं कि अभिनय का सबसे बड़ा केंद्र ‘दिल’ होता है। यही वह विशेषता है, जिसने उनकी फिल्मों को समय की सीमाओं से मुक्त कर दिया।
धर्मेंद्र की एक और महानता थी—उनकी जमीन से जुड़ाव। उन्होंने कभी खुद को महान या बड़ा साबित करने की कोशिश नहीं की। सैकड़ों फिल्मों की सफलता, लाखों प्रशंसक और दशकों की लोकप्रियता के बाद भी वे एक साधारण ग्रामीण की तरह बात करते थे। उनकी विनम्रता किसी बनावटी विनम्रता का परिणाम नहीं थी; वह उनके स्वभाव का हिस्सा थी। यही कारण है कि वे उद्योग के भीतर और बाहर—दोनों जगह समान आदर के पात्र बने रहे।
धर्मेंद्र ने अपनी निजी और राजनीतिक जिंदगी में भी अपने मूल्यों को नहीं छोड़ा। वे वर्ष 2004 में लोकसभा के लिए चुने गए और अपने तरीके से जनता की सेवा की। हालाँकि वे राजनीति में गहराई से सक्रिय नहीं रहे, लेकिन यह साफ समझ आता है कि वे समाज के प्रति एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी भूमिका को समझते थे। उनका चरित्र उतना ही सीधा और स्पष्ट था जितना उनका अभिनय।
उनकी जीवनशैली की सादगी ने भी लोगों को हमेशा प्रभावित किया। मुंबई की भीड़भाड़ से दूर उनका फार्महाउस, धरती पर काम करना, खेतों को सींचना, पशुओं के साथ समय बिताना—ये सब उनकी आत्मा को सुकून देते थे। यह उस अभिनेता की तस्वीर है जो चमकते पर्दे से परे, असली जिंदगी में प्रकृति की गोद में अपने आप को पूरा महसूस करता था। यह गुण किसी अभिनेता में शायद ही देखने मिलता हो।
उनका योगदान सिर्फ उनके समय तक सीमित नहीं। आज की पीढ़ी भी धर्मेंद्र की फिल्मों में वही ताजगी, वही मानवीय संवेदना और वही संवादशक्ति महसूस करती है, जो 40-50 साल पहले दर्शक महसूस करते थे। यह बहुत कम कलाकारों के हिस्से आता है कि उनकी फिल्मों की ताकत पीढ़ियों की सीमाएँ लांघ जाए। धर्मेंद्र यह विरासत अपने साथ लेकर नहीं गए; वे इसे समाज में छोड़ गए हैं।
आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो उनके चेहरे की वह सहज मुस्कान तुरंत आँखों के सामने आ जाती है। ऐसा लगता है जैसे वह अभी भी किसी दृश्य की तैयारी कर रहे हों, या किसी इंटरव्यू में अपनी प्रसिद्ध विनम्रता के साथ कह रहे हों—“अरे, मैं कौन सा बड़ा कलाकार हूँ, बस अपनी कोशिश करता हूँ।” उनकी यह बात ही उन्हें बड़ा बनाती थी।
धर्मेंद्र का जाना भारतीय सिनेमा के लिए सिर्फ एक कलाकार की विदाई नहीं; यह एक युग का अवसान है। वह युग जिसमें सादगी, भावनाएँ और मानवीयता अभिनय की रीढ़ हुआ करती थीं। वह दौर जब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज, परिवार और रिश्तों का आईना होता था। धर्मेंद्र उस आईने की सबसे चमकदार किरण थे।
लेकिन हर महान कलाकार की तरह धर्मेंद्र भी यह सिद्ध करके गए हैं कि शरीर भले चला जाए, कला कभी नहीं जाती। उनकी आवाज़, उनकी हँसी, उनकी आँखों की चमक, उनकी फिल्मों के दृश्य—यह सब कहीं न कहीं हमारे भीतर जीते रहेंगे। वह इसलिए नहीं कि उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने लोगों के दिलों में जगह बनाई। सिनेमा की असली शक्ति यही है—जब दर्शक अभिनेता को सिर्फ अभिनेता न मानकर परिवार का हिस्सा मानने लगें।
आज, जब हम श्रद्धांजलि देते हुए यह पंक्ति याद करते हैं—“अभी न जाओ छोड़ के…”—तो यह सिर्फ एक गीत की पंक्ति नहीं रह जाती। यह एक युग की पुकार जैसी लगती है। लेकिन महान कलाकार कभी सचमुच नहीं जाते। धर्मेंद्र भी नहीं गए। वे हमारे गीतों में हैं, संवादों में हैं, फिल्मों में हैं, और सबसे बढ़कर, हमारे दिलों में हैं।
भारतीय सिनेमा के उस ‘ही-मान’ को शत-शत नमन, जिसकी सादगी ने हमें इंसान होना सिखाया और जिसकी मुस्कान ने पीढ़ियों को जीवन की सुंदरता का एहसास कराया।
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र का 89 साल की उम्र में निधन हो गया है। वे कुछ दिनों से उम्र संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। सोमवार को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा ।
कई सेलेब्स उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए हैं।
उनके परिवार के लोग और उनके करीबी इस मौत से सदमे में हैं। आठ दिसंबर 1935 को जन्मे धर्मेंद्र कुछ दिन पहले ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती थे। कई दिनों तक अस्पताल में इलाज चला। इसके बाद उनका इलाज घर पर ही किया जाने लगा। लेकिन वक्त के साथ तबीयत नहीं सुधरी और आज सोमवार यानी 24 नवंबर 2025 को धर्मेंद्र का निधन हो गया।
89 साल की उम्र में भी धर्मेंद्र एक्टिंग में सक्रिय थे। अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा की आगामी फिल्म ‘इक्कीस’ इस दिग्गज अभिनेता की आखिरी फिल्म होगी। फिल्म ‘इक्कीस’ की कहानी एक यंग आर्मी ऑफिसर अरुण खेतरपाल की है। महज 21 साल की उम्र में देश के लिए इस सैन्य अधिकारी ने बलिदान दिया था। फिल्म में अभिनेता धर्मेंद्र ने आर्मी ऑफिसर के पिता का किरदार निभाया। वहीं अरुण खेतरपाल के रोल में अगस्त्य नंदा नजर आएंगे। यह फिल्म 25 दिसंबर को रिलीज होने वाली है
ऐसे में धर्मेंद्र के फैंस उनके परिवार के बारे में जानना चाहते हैं।धर्मेंद्र के निधन से बॉलीवुड में शोक की लहर दौड़ पड़ी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और पीएम मोदी से लेकर बॉलीवुड के कई सेलेब्स ने दिग्गज अभिनेता को श्रद्धांजलि दी है। धर्मेंद्र का परिवार बॉलीवुड के सबसे बड़े परिवारों में से एक है। उन्होंने दो शादियां की थीं और उनके कुल छह बच्चे हैं।धर्मेंद्र ने दो शादियां की थी। 19 साल की उम्र में उन्होंने 1954 में प्रकाश कौर के साथ पहली शादी की थी। तब धर्मेंद्र ने बॉलीवुड में अपनी शुरुआत नहीं की थी। प्रकाश कौर से धर्मेंद्र के 2 बेटे और 2 बेटियां हुईं। यानी वह चार बच्चों के पिता बन गए।धर्मेंद्र के इन चारों बच्चों के नाम सनी देओल, बॉबी देओल, विजेता देओल और अजीता देओल है। सनी देओल और बॉबी देओल बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता हैं। उनकी दोनों बहनें विजेता देओल और अजीता देओल लाइमलाइट से दूर रहती हैं। धर्मेंद्र और उनकी पहली पत्नी के बच्चे सेटल हैं।
धर्मेंद्र ने प्रकाश कौर से तलाक लिए बिना 1980 में अभिनेत्री हेमा मालिनी से शादी कर ली थी। हेमा मालिनी उनसे 13 साल छोटी हैं। एक्ट्रेस के साथ सात फेरे लेने के बाद कपल की दो बेटियां हुईं। इन दोनों के नाम एशा देओल और अहाना देओल है।
धर्मेंद्र, जिन्हें दुनियाभर के सिनेमाप्रेमी प्यार से ही-मैन ऑफ बॉलीवुड कहते हैं। अपनी सादगी, सहज अभिनय, आकर्षक व्यक्तित्व और बहुमुखी कला के कारण धर्मेंद्र भारतीय फिल्म उद्योग के सबसे प्रिय और प्रभावशाली अभिनेताओं में गिने जाते हैं। छह दशक से भी अधिक के लंबे करियर में उन्होंने एक्शन, रोमांस, कॉमेडी और ड्रामा—हर शैली में अपनी छाप छोड़ी।
धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसंबर 1935 को पंजाब के लुधियाना जिले के नसराली गाँव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम धरम सिंह देओल है। पिता स्कूल टीचर थे, इसलिए शिक्षा का माहौल मिला, परंतु धर्मेंद्र की रुचि हमेशा फिल्मों की दुनिया में थी। बचपन से ही दिलीप कुमार और सुरैया जैसी हस्तियों की फिल्में देखकर वह बड़े पर्दे पर आने का सपना संजोते रहे।1958 में फिल्मफेयर मैगज़ीन द्वारा आयोजित टैलेंट सर्च प्रतियोगिता में धर्मेंद्र चुने गए और यही उनके करियर का मोड़ साबित हुआ। आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत और धैर्य के बल पर मुंबई में जगह बनाई।
फिल्मी करियर की शुरुआत
1960 में आई फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे धर्मेंद्र की पहली फिल्म थी। शुरुआत में उन्हें एक रोमांटिक हीरो के रूप में पहचान मिली। उनकी कोमल अदाकारी, गंभीर संवाद शैली और मासूम चेहरा दर्शकों को तुरंत पसंद आने लगा। 1960 के दशक में अनपढ़, हासिल, काजल, आन मिलो सजना जैसी फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता की ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया। धीरे-धीरे वह ऐसे कलाकार के रूप में पहचाने जाने लगे जो हर तरह की भूमिका को निभाने की क्षमता रखते हैं ।1970 के दशक में धर्मेंद्र का करियर अपने स्वर्णिम दौर में था। इस दशक ने उन्हें ऐसी प्रतिष्ठित फिल्मों का हिस्सा बनाया, जिनका भारतीय सिनेमा पर अमिट प्रभाव है। इनमें सबसे खास है—शोले (1975)।वीरू के किरदार में धर्मेंद्र ने रोमांस, ह्यूमर, एक्शन और भावुकता—सब कुछ इतने सहज रूप में निभाया कि यह भूमिका आज भी उनके सर्वोत्तम अभिनय में गिनी जाती है। उनकी और हेमा मालिनी की ऑन-स्क्रीन कैमिस्ट्री, जैसे सीता औरगीता, शोले, ड्रीम गर्ल, दिल्लगी आदि फिल्मों में देखने को मिलती है, दर्शकों के दिलों में आज भी ताज़ा है।
धर्मेंद्र ने सिर्फ रोमांटिक और कॉमिक भूमिकाएँ ही नहीं निभाईं बल्कि एक्शन फिल्मों के भी वह राजा माने जाते हैं। उनके मजबूत व्यक्तित्व, दमदार संवाद और मर्दाना छवि ने उन्हें बॉलीवुड का पहला ‘ही-मैन’ बना दिया। यादों की बारात, प्रतिज्ञा, धर्मात्मा, चुपके चुपके, शालीमार जैसी फिल्मों में उनका अभिनय उनके बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण है।
धर्मेंद्र ने 2004 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के टिकट पर राजस्थान के बीकानेर से लोकसभा चुनाव जीता और सांसद बने। हालांकि राजनीति में वह सक्रिय रूप से अधिक समय नहीं दे पाए, परंतु जनता से उनके निकट संबंध हमेशा चर्चा में रहे।
पुरस्कार और सम्मान
धर्मेंद्र को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए—
फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
पद्म भूषण (भारत सरकार द्वारा)
अन्य कई राज्य और राष्ट्रीय स्तर के सम्मान
उनका नाम “सर्वाधिक सफल अभिनेताओं” की सूची में अक्सर शामिल होता है। फिल्मों में उनकी लोकप्रियता और लंबे करियर ने उन्हें भारतीय सिनेमा के महानतम दिग्गजों में स्थान दिया है। नई पीढ़ी के दर्शक भी धर्मेंद्र को उतना ही सम्मान देते हैं जितना पुराने समय के लोग। उन्होंने हाल के वर्षों में यमला पगला दीवाना, अपने, चरणजीत, और रॉकी और रानी की प्रेम कहानी जैसी फिल्मों में काम किया। उम्र के इस पड़ाव में भी उनकी ऊर्जा, सकारात्मकता और स्क्रीन प्रेज़ेंस वही पुरानी करिश्माई चमक बिखेरती है।
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि हम ऐसे किसी भी व्यक्ति की निंदा करते हैं जो किसी शैक्षणिक संस्थान में बैठकर बम बनाने की साजिश रचता है… (दिल्ली विस्फोट में) हिंदुओं और मुसलमानों समेत 14 लोग मारे गए। हमें ऐसे सभी लोगों की खुलकर निंदा करनी चाहिए।
श्री असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद में एक भाषण के दौरान दिल्ली के लाल किले के पास हुई आतंकी घटना की खुलकर निंदा की। इसमें कम से कम 10 लोग मारे गए थे। उन्होंने कहा कि देश के दुश्मन हमारे दुश्मन हैं। उन्होंने मुसलमानों को गाली देने और उनसे वफादारी का प्रमाणपत्र मांगने वालों को भी संदेश देते हुए कहा कि हमने कभी अपने देश से नफरत नहीं की। उल्लेखनीय है कि लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास हुए कार विस्फोट में शामिल मुख्य चार आरोपी, जिसमें 15 लोग मारे गए थे, अल फलाह विश्वविद्यालय के डॉक्टर थे, जिनमें डॉ. उमर नबी भी शामिल थे, जो विस्फोटक से लदी हुंडई आई20 कार चला रहा था।
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि हम ऐसे किसी भी व्यक्ति की निंदा करते हैं जो किसी शैक्षणिक संस्थान में बैठकर बम बनाने की साजिश रचता है… (दिल्ली विस्फोट में) हिंदुओं और मुसलमानों समेत 14 लोग मारे गए। हमें ऐसे सभी लोगों की खुलकर निंदा करनी चाहिए। देश के दुश्मन हमारे दुश्मन हैं। अगर ऐसा किया जाता है, तो हम इन क्रूर लोगों को जो चाहें करने की खुली छूट दे रहे होंगे। लेकिन जो लोग सोचते हैं कि मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जाएगा, लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा। जब तक दुनिया रहेगी, भारतीय मुसलमान देश में सम्मानित नागरिक के रूप में रहेंगे।
उन्होंने कहा कि (दिल्ली विस्फोट में) हिंदू और मुसलमान समेत 14 लोग मारे गए। हमें ऐसे सभी लोगों की खुलकर निंदा करनी चाहिए। देश के दुश्मन हमारे दुश्मन हैं। अगर ऐसा किया जाता है, तो हम इन क्रूर लोगों को मनमानी करने की खुली छूट दे रहे होंगे।
श्री अरविंदो आधुनिक भारत के उन विलक्षण चिंतकों, दार्शनिकों, कवियों और आध्यात्मिक गुरुओं में से हैं जिन्होंने भारतीय संस्कृति को एक नई वैचारिक दिशा प्रदान की। उनका व्यक्तित्व जितना बहुआयामी था, उनका दर्शन उतना ही गहरा, व्यापक और आधुनिक चेतना से संवाद करता हुआ था। वे न केवल स्वतंत्रता संग्राम के तेजस्वी नेता रहे बल्कि मानव चेतना के उत्कर्ष और आध्यात्मिक विकास के प्रणेता भी बने। उनका विश्वास था कि मनुष्य केवल भौतिक सत्ता नहीं, वह एक दिव्य संभावना है जिसे आत्मविकास और साधना के माध्यम से उच्चतर चेतना तक पहुँचाया जा सकता है। श्री अरविंदो का पूरा जीवन इसी खोज और प्रयोग का अद्भुत उदाहरण है।
श्री अरविंदो का जन्म 15 अगस्त 1872 को कोलकाता में हुआ। आधुनिक शिक्षा के लिए उन्हें कम उम्र में ही इंग्लैंड भेज दिया गया। यह उनकी प्रतिभा का परिणाम था कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए वे ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच और कई अन्य भाषाओं में पारंगत हो गए। पश्चिमी दर्शन, साहित्य, राजनीति और इतिहास पर उनकी पकड़ गहरी हो गई। लेकिन इस बीच उनके भीतर भारत के प्रति प्रेम और भारतीय संस्कृति के प्रति आकांक्षा भी प्रबल होती चली गई। भारत लौटने पर वे बरोडा राज्य में सेवाकाल के दौरान भारतीय ग्रंथों, विशेष रूप से वेद, उपनिषद, गीता और संस्कृत साहित्य का गहन अध्ययन करने लगे। इसी चरण में उनके भीतर दार्शनिक चेतना का बीज अंकुरित हुआ जिसने आगे चलकर एक महान आध्यात्मिक प्रणाली का रूप लिया।
राजनीतिक जीवन में उनका प्रवेश अत्यंत प्रखर और प्रभावशाली था। बंगाल विभाजन के बाद जब देश में उग्र राष्ट्रवाद का भाव उभर रहा था, श्री अरविंदो उसके अग्रदूत बने। उन्होंने स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे विचारों को संगठित ढंग से आगे रखा। “वंदी मातरम्” और “कर्मयोगिन” जैसे पत्रों के माध्यम से उन्होंने युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया। उनका लेखन न केवल राजनीतिक था बल्कि उसमें राष्ट्रीय अस्मिता का दार्शनिक आधार भी मिलता है। अलिप्तता और निर्भीकता से भरे उनके विचार अंग्रेजों को खटकने लगे और 1908 में उन्हें अलीपुर बम केस में गिरफ्तार कर लिया गया।
अलीपुर जेल श्री अरविंदो के जीवन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। जेल में उन्होंने अद्वैत अनुभव, तप और ध्यान के माध्यम से दिव्य चेतना का गहन साक्षात्कार किया। बाद में उन्होंने लिखा कि जेल में भगवान ने उन्हें हर जगह, हर वस्तु और हर व्यक्ति में दिव्य स्वरूप दिखाया। इसी अनुभव ने उनके राजनीतिक पथ को आध्यात्मिक दिशा दे दी। वे समझ चुके थे कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि मानवता के आध्यात्मिक उत्कर्ष का माध्यम बनेगी। इसीलिए जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने राजनीति से स्वयं को अलग कर लिया और पांडिचेरी चले गए।
पांडिचेरी प्रवास में श्री अरविंदो ने महान दार्शनिक और आध्यात्मिक ग्रंथों की रचना की जिनमें द लाइफ डिवाइन, सिंथेसिस ऑफ योगा, सेवेन क्वाट्रेट्स ऑफ योगा, सायव मैटर्स और सेविलाइजेशन एंड कल्चर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाएँ केवल दार्शनिक चिंतन नहीं हैं बल्कि वे मानव जीवन को परिवर्तनकारी शक्ति प्रदान करने का मार्ग दिखाती हैं। उनका योग “पूर्ति का योग” या “इंटीग्रल योग” कहलाता है जिसमें जीवन के किसी भी पक्ष को त्यागे बिना साधना को जीवंत रूप में जीने पर बल दिया गया है।
श्री अरविंदो के इंटीग्रल योग का केंद्रीय विचार यह है कि जीवन स्वयं दिव्य है और मनुष्य के भीतर एक सुप्त दिव्यता विद्यमान है। ध्यान, साधना और आत्मसंयम के माध्यम से मनुष्य चेतना की विभिन्न सीढ़ियों—मनस, बुद्धि, अंतरात्मा, अतिमानस—से ऊपर उठकर सुपरमाइंड अर्थात् ‘अतिचेतना’ तक पहुँच सकता है। उनका कहना था कि मानव का विकास अभी अधूरा है। जैसे प्रकृति ने पशु से मनुष्य की उत्पत्ति की, उसी प्रकार मनुष्य से आगे दिव्य मनुष्य (डिवाइन ह्यूमन) का विकास संभव है। यह एक आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया है जिससे पृथ्वी पर नई चेतना का अवतरण होगा।
श्री अरविंदो का साहित्य मानव मन की व्यापकता और आध्यात्मिक यात्रा का अद्भुत संगम है। उनका महाकाव्य ‘सावित्री’ इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। यह केवल एक काव्य कृति नहीं, बल्कि दार्शनिक, आध्यात्मिक और मानवीय चेतना की एक विराट साधना है जिसमें प्रकाश और अंधकार, जीवन और मृत्यु, प्रकृति और पुरुष—सभी का अद्भुत समन्वय मिलता है। सावित्री में उन्होंने मानव आत्मा के संघर्ष और विजय को अत्यंत सुन्दर रूप में व्यक्त किया है।
उनकी राजनीतिक दृष्टि भी उतनी ही व्यापक थी। श्री अरविंदो मानते थे कि भारत की स्वतंत्रता एक ऐतिहासिक आवश्यकता है, क्योंकि भारत आध्यात्मिक नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता रखता है। वे कहते थे कि भारत का उत्थान मानवता के उत्थान से जुड़ा है। पांडिचेरी में रहते हुए भी वे भारत के राजनीतिक भविष्य पर नजर रखते थे और समय-समय पर अपनी टिप्पणियाँ देते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के समय उन्होंने मित्र राष्ट्रों का समर्थन किया, क्योंकि उन्हें लगा कि नाजीवाद का विस्तार मानवता के लिए खतरा है।
श्री अरविंदो का सम्पूर्ण दर्शन यह सिखाता है कि मनुष्य को अपने भीतर की दिव्यता को पहचानना होगा। इससे व्यक्तिगत जीवन में समृद्धि, समाज में सद्भाव और विश्व में शांति स्थापित हो सकती है। उनका विश्वास था कि चेतना का विकास ही मानव की सभी समस्याओं का समाधान है। उनका जीवन तप, मनन, ज्ञान और कर्म का अद्भुत संतुलन था।
5 दिसंबर 1950 को श्री अरविंदो का महापरिनिर्वाण हुआ, लेकिन उनका आध्यात्मिक प्रभाव आज भी जीवंत है। पांडिचेरी का श्री अरविंदो आश्रम और ‘द मदर’ द्वारा विकसित ‘ऑरोविल’ उनके दर्शन का अनूठा प्रतीक है—एक ऐसी वैश्विक नगरी जहाँ मानवता का एकत्व, सहयोग और चेतना का विकास लक्ष्य है।
भारत के आध्यात्मिक इतिहास में श्री अरविंदो का स्थान अत्यंत ऊँचा है। उन्होंने आधुनिक समय में आध्यात्मिकता को केवल पूजा-पाठ या संन्यास का विषय नहीं रहने दिया बल्कि उसे जीवन, समाज, राजनीति और विज्ञान के साथ जोड़ दिया। उनका दर्शन अतीत में नहीं, भविष्य में झांकता है। उन्होंने मानवता को बताया कि जीवन में दिव्यता संभव है और पृथ्वी पर दिव्य जीवन का आविर्भाव मानव का अंतिम लक्ष्य है।
इस प्रकार श्री अरविंदो एक दार्शनिक, योगी, कवि, राष्ट्रवादी और दूरदर्शी महामानव थे जिनका चिंतन विश्व को आज भी नई दिशा देता है।
रामलला के दर्शन के लिए यदि अयोध्या जी जा रहे हैं तो निश्चित होकर जाएं। ये मानकर जाए कि भगवान के घर जा रहे हैं। उनकी शरण में जा रहे हैं। बस फिर किसी चिंता की जरूरत नहीं। दर्शन के लिए किसी की सिफारिश मत कराइए। सीधे जाइए। दर्शन करिए और 20 से 30 मिनट में दर्शन कर मंदिर से बाहर आ जाइए। हमारा दावा है विश्व के किसी भी धर्म के तीर्थस्थल से इससे ज्यादा सुलभ दर्शन कहीं संभव नही हैं।
राम मंदिर आज हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ बन गया है। प्रतिदिन 80 हजार से एक लाख भक्त राम लला के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करते हैं। कई अवसर पर तो ये संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा हो जाती है। आज दुनिया भर में बसे लगभग हर सनातनी के मन में एक ही इच्छा है किसी तरह वह अयोध्या जाकर राम मंदिर के दर्शन कर सके। भगवान राम को शीष नवाए। हाल ही में हम पत्रकारों के एक सम्मेलन में अयोध्या जी में थे। रामलला के दर्शनों के लिए आ रही श्रद्धालुओं की भीड़ को देख मेरे एक साथी लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश शर्मा ने कहा था कि अयोध्या जी आने वाले समय में हिंदुओं का प्रमुख श्रद्धा का केंद्र होगा। यहां प्रत्येक हिंदू − सनातनी आकर शीश नवाना अपने जीवन का एक लक्ष्य बनाएगा। शीश नवाकर अपने को कृतार्थ मानेगा।
अयोध्या में राम मंदिर बनने से पहले कभी श्रद्धालुओं को संकरी गलियों से गुजरने के बाद टेढ़े मेढ़े और उभर खाबड़ रास्तों सेगुजरकर मंदिर तक पहुंचना होता था। आम श्रद्धालुओं के लिए ये यात्रा और कितनी दुरूह रहती होगी, यह समझते बनता है। इस सबके बावजूद यहां आने वाले श्रद्धालुओं का उत्साह और जोश देखते बनता था।अब मंदिर परिसर बन गया। भव्य मंदिर बन गया। 25 नंवबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदिर पर भव्य ध्वजारोहण करेंगे। भव्य समारोह होगा। इस आयोजन के प्रत्यक्षदर्शी बनने के लिए दुनिया भर से हजारों प्रमुख व्यक्ति आ रहे है। उम्मीद है कि ध्वजारोहण के दिन अयोध्या में वीवपीआई पी के एक सौ के आसपास जेट आएंगे।
अयोध्या आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु इस बात को लेकर आंशकित होता हैं, कि इतनी भीड़ में दर्शन कैसे होंगे? पूजा कैसे होगी ? प्रसाद कैसे चढ़ेगा? सब चाहते हैं कि मंदिर आगमन की स्मृति फोटो के रूप में अपने पास सुरक्षित रखें। यहां स्थिति अन्य मंदिर से बिल्कुल भिन्न है। यहां न पूजा की व्यवस्था है, न प्रसाद चढ़ने का प्रबंध। यहां पूजन कराने वाले पुजारी भी नही है। यहां तो बस मंदिर आइए। राम लला के दर्शन करिए। प्रभु को शीश नवाइए और बाहर आ जाइए। यहां प्रसाद लेकर जाने की जरूरत नही है। मंदिर की ओर से प्रत्येक श्रद्धालु को प्रसाद मिलता है। मंदिर परिसर में मोबाइल वर्जित है । परेशानी उन्हें होती है जो सुरक्षा कर्मियों की नजर बचाकर मोबाइल मंदिर में लेकर जाना चाहते हैं। सुरक्षा जांच में मोबाइल पकड़ा जाता है। इन मोबाइल ले जाने वालों को लौटकर मंदिर के गेट पर आकर लॉकर में फोन रखकर फिर दर्शन को जाना पड़ता है। इस तरह इन्हें अन्य श्रद्धालुओं से एक डेढ़ किलोमीटर ज्यादा चलना होता है। मंदिर में अपना सामान करने के लिए लॉकर की व्यापक व्यवस्था है, किंतु इस काम में लगभग आधा घंटा लग जाता है। अच्छा यह है कि अपना पर्स, लैदर की बैल्ट, मोबाइल और कैमरा अपने कमरे पर छोड़ कर आए। अपनी आईडी और जरूरत के लिए रुपये अपनी जेब में रखलें । हमने ऐसा ही किया । इससे मंदिर के लॉकर में सामान जमा करने का हमारा आधे से एक घंटा बच गया। हम दर्शन कर 20 से 25 मिनट में मदिर से बाहर आ गए। व्हील चेयर लेने वालों और दिव्यांग के लिए तो और सुविधा है। उनका जाने का रास्ता अलग से है।
भारत के उत्तर-प्रदेश राज्य में स्थित अयोध्या, जो पारंपरिक रूप से एक अलग त्वरित तीर्थ-नगर थी, अब आधुनिकता और भक्ति के संगम का उदाहरण बनती जा रही है। खास कर राम जन्मभूमि (जिसके अंतर्गत राम मंदिर का निर्माण हुआ) के बाद इस नगर में बड़े पैमाने पर विकास कार्य चल रहे हैं। ये कार्य सिर्फ धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं। यहां 15− 16 करोड़ के करीब यात्री अब प्रतिवर्ष आने लगे हैं। आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ेगी ही। इस बढ़ती संख्या ने होटल, गेस्ट-हाउस, परिवहन-सेवाएँ, स्थानीय व्यापार व स्मृति-चिंतन (souvenir) उद्योग को गति दी है। अतः अयोध्या अब सिर्फ भक्ति-की जगह नहीं बल्कि एक सेवा-आधारित अर्थव्यवस्था (हॉस्पिटैलिटी, रिटेल, परिवहन) का केन्द्र बनती जा रही है। इस प्रकार मंदिर-के पश्चात् अयोध्या की पहचान बदल रही है। अब अयोध्या “भक्ति नगर” से “भक्ति + विकास नगर” की ओर बढ़ रही है।विकास-यात्रा में पहुँचना और सहज अनुभव देना अहम है। इसलिए अयोध्या में कई बुनियादी संरचना-परियोजनाएँ लाई गई हैं।
एयर-कनेक्टिविटी के लिए महर्षि वाल्मीकि अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा का निर्माण हुआ है।इसमें आने वाले चरणों में टर्मिनल विस्तार व रनवे विस्तार भी शामिल है। अयोध्या में रेलवे स्टेशन व आधुनिकीकृत सड़कें बनायी गई हैं। अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन विश्व का श्रेष्ठतक रेलवे स्टेशन बनाने का प्रयास है। यहां यात्रियों के लिए तीन सौ के आसपास डार्मेट्री और कुछ रिटायरिंग रूम बनाये गए हैं। अन्य काम जारी है।
राम मंदिर के आसपास के तीर्थ स्थलों के लिए पैदल जाने के लिए मार्ग विकसित किया जा रहा है । इसे भक्ति पथ नाम दिया गया यह मार्ग, रामपथ से निकलता हुआ मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं के चलने-वाले हिस्सों को सजाता है एवं पैदल यात्रियों के लिए खास व्यवस्था करता है। इसमें दुकानों-घरों को अलग रंग-रूप दिया गया है।भक्ति पथ वाले हिस्सों में ‘सफ़ेद एवं भोरका’ रंग के बजाय एक विशिष्ट सजावट का उपयोग हुआ है। भक्ति पथ मंदिर-मार्ग के उन हिस्सों को सूचीबद्ध करता है जहाँ पैदल-यात्रा अधिक होती है, अतः इस तरह से इसका उद्देश्य अभ्यागतों को आरामदायक एवं सुरक्षित चलने-वाले मार्ग देना है।
राम मंदिर तक पंहुच के मार्ग का नाम राम पथ दिया गया है।यह एक प्रकार से रिंग रोड जैसा है।इस मार्ग को भव्य रूप दिया जा रहा। यह मार्ग लगभग 13 किलोमीटर लंबा है और प्रमुख रूप से सहादतगंज से लेकर नया घाट (या नायाघाट) तक जाता है। इस मार्ग के दोनों किनारों पर दुकानों-घरों की एकरूप रूप से मरम्मत एवं पेंटिंग की गई है।सभी को एक समान रंग-रूप में सजाया गया है। सड़क को चौड़ा किया गया है और मुख्य रूप से 40 फीट या उससे अधिक चौड़ाई वाला बना कर बनाया गया है ताकि भीड़-भाड़ व आने-जाने में आराम हो सके। लाईटिंग-सिस्टम, फावड़े-प्लांटर्स, पेड़-पौधे, फुटपाथ, मिडियन में धार्मिक प्रतीक-स्तंभ जैसी सुविधाएं लगाई गई हैं। स्थानीय प्रशासन ने श्रद्धालुओं के लिए इस मार्ग पर गोल्फ कार्ट (इलेक्ट्रिक बग्गी) चलाई है। इसका प्रतियात्री किराया 20 रुपया रखा गया है।इस किराए के से आप इस मार्ग के किसी भी स्थान तक जा सकतें हैं।इन सरकारी गोल्फ कार्ट के कारण ई−रिक्शा चालक भी मनमाने दाम नही वसूल कर पाते।
पुरानी परंपरा के हिस्से के रूप में 84 कोसी परिक्रमा मार्ग को श्रद्धा-परिक्रमा मार्ग नाम दिया गया है। इसे राष्ट्रीय राजमार्ग − का दर्जा (एनएच-227B) मिला है ।इससे अयोध्या और आसपास के तीर्थस्थलों का जुड़ाव बढ़ा है। इसको भी भव्य रूप दिया जा रहा है। इसके पुलों और फ्लाई ओवर के दोनों ओर भगवान राम के जीवन से संबधित झांकी बनाई जा रही है । नगर के बीच से एक पंचकोसी प्रतिक्रमा के विकास पर भी काम चल रहा है।
इन परिवहन सुधारों से न केवल तीर्थ-यात्रियों की सहजता बढ़ी है बल्कि स्थानीय व्यापार-संवाद व रोजगार-अवसरों में भी इजाफा हुआ है। आधुनिक विकास सिर्फ बड़ी इमारतें या सड़कें नहीं बल्कि बेहतर जीवन-मान और पर्यावरण-संगत विकास भी है। अयोध्या में इस दिशा में कई कदम उठाए गए हैं। अयोध्या को ‘मॉडल सोलर सिटी’ घोषित किया गया है। ४० मेगावाट का सौर संयंत्र सरयू नदी के किनारे स्थापित किया गया है। इससे शहर की मांग की लगभग २५-३० प्रतिशत ऊर्जा पूरा हो रही है। यहां ५५० एकड़ के “नव्या अयोध्या” टाउनशिप का विकास हुआ है, जिसमें स्मार्ट बिजली-डक्स, भूमिगत नाली-प्रणाली है। सरयू नदी के घाटों का सौंदर्यीकरण व लॉन्ग वॉक-वे बनाए गए हैं, जिससे पर्यटक अनुभव बेहतर हुआ है। सरयू घाट की आरती देखने को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रोड उमड़ती है। इस आरती को देखने का अभी सही प्रबंध नही है। उसे बनाने की जरूरत है।बड़े बड़े टीवी भी इसे देखने के लिए लगाए जा सकते हैं। इनसे श्रद्धालु सरयू किनारे कहीं भी बैंच या फर्श पर बैठकर आराम से आरती देख ले।
मंदिर-के बाद अयोध्या में अब सिर्फ दर्शन तक सीमित नहीं रही बल्कि सांस्कृतिक और अनुभव-आधारित पर्यटन पर भी ध्यान गया है।नए संग्रहालय व सांस्कृतिक केंद्र बनाएं जा रहे हैं। मंदिर परिसर के आस-पास संग्रहालय, रामायण अध्ययन संस्थान जैसी योजनाएं चल रही हैं।
उत्सव व कार्यक्रम को रोचक बनाया जा रहा है। दीपोत्सव में लाखों दीये, ड्रोन-शो आदि का आयोजन हुआ है जो सिर्फ स्थानीय नहीं बल्कि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय आकर्षण बना है। पारंपरिक हस्तशिल्प व पर्यटन-वस्तुओं को बढ़ावा मिल रहा है।इससे स्थानीय कारीगरों को नए −नए अवसर मिल रहे हैं।
राम मंदिर के बाद अयोध्या में जो विकास गति पकड़ी है, वह सिर्फ पूजा-पथ नहीं बल्कि समृद्धि-पथ है। तीर्थयात्रा से बढ़कर यह अब अनुभव-और-उद्यम-नगर बनता जा रहा है। लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि यह विकास वैश्विक दर्जे का होने के साथ-साथ स्थानीय अनुभव-सक्षम और पर्यावरण-अनुकूल भी बने।
अयोध्या का प्राचीन समय नाम साकेत है। साकेत भगवान राम के समय का भव्य नगर । आज का नगर उससे भी विशाल आकार ले रहा है। भगवान राम के साकेत( अयोध्या जी) पर महाकविमैथिलीशरण गुप्त का काव्य साकेत की ये पंक्तियां इस नगर का भव्यचित्रण करती हैं।−
देख लो, साकेत नगरी है यही, स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही।
केतु-पट अंचल-सदृश हैं उड़ रहे,कनक-कलशों पर अमर-दृग जुड़ रहे।
सोहती हैं विविध-शालाएँ बड़ी; छत उठाए भित्तियाँ चित्रित खड़ी।
गेहियों के चारु-चरितों की लड़ी, छोड़ती हैं छाप, जो उन पर पड़ी!
स्वच्छ, सुंदर और विस्तृत घर बने,इंद्रधनुषाकार तोरण हैं तने।
देव-दंपती अट्ट देख सराहते; उतरकर विश्राम करना चाहते।
फूल-फलकर, फैलकर जो हैं बढ़ी, दीर्घ छज्जों पर विविध बेलें चढ़ी
पौरकन्याएँ प्रसून-स्तूप कर, वृष्टि करती हैं यहीं से भूप पर।
फूल-पत्ते हैं गवाक्षों में कढ़े, प्रकृति से ही वे गए मानो गढ़े।
दामनी भीतर दमकती है कभी, चंद्र की माला चमकती है कभी।
सर्वदा स्वच्छंद छज्जों के तले,प्रेम के आदर्श पारावत पले।
केश-रचना के सहायक हैं शिखी, चित्र में मानो अयोध्या है लिखी !
25 नवम्बर को अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस हम ऐसे समय मना रहे है जब महिलाएं लगातार हिंसा की शिकार हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है वैश्विक प्रयासों के बावजूद इस दिशा में कोई साथक सुधर नहीं हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की नई रिपोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा की भयावह तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग तीन में से एक महिला, यानी करीब 84 करोड़ महिलाओं ने अपने जीवनकाल में कभी न कभी यौन हिंसा का शिकार होने का दर्द झेला है। यह आंकड़ा मानवता के सबसे पुराने और व्यापक अन्याय को उजागर करता है, जिस पर अभी भी पर्याप्त कार्रवाई नहीं हो रही है। हाल ही जारी इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि पिछले एक वर्ष में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की 31.6 करोड़ महिलाओं और लड़कियों को उनके इंटीमेट पार्टनर द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ा। यह संख्या वैश्विक स्तर पर इस आयु वर्ग की सभी महिलाओं और लड़कियों के 11 प्रतिशत के बराबर है। यह रिपोर्ट 2000 से 2023 के बीच 168 देशों से एकत्रित डेटा पर आधारित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा मानवता की सबसे पुरानी और सबसे व्यापक ज्यादतियों में से एक है, फिर भी इस पर सबसे कम कार्रवाई की जाती है। कोई भी समाज खुद को निष्पक्ष, सुरक्षित या स्वस्थ नहीं कह सकता जब तक कि उसकी आधी आबादी भय के माहौल में जी रही हो। इस हिंसा को समाप्त करना केवल नीतिगत मामला नहीं है; यह सम्मान, समानता और मानवाधिकारों का मामला है।
भारत की बात करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की हाल ही में आई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साल 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4 लाख 48 हजार 211 मामले दर्ज किए गए थे, जो पिछले दो सालों यानी 2022 और 2021 की तुलना में काफी ज्यादा है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि प्रति 1 लाख महिलाओं पर अपराध की राष्ट्रीय दर 66.2 है. तो वहीं, दूसरी तरफ रिपोर्ट के मुताबिक, बलात्कार के 29 हजार 670 मामले (दर 4.4 प्रतिशत ) और महिलाओं पर शील भंग करने के इरादे से हमले के 83 हजार 891 मामले दर्ज किए गए हैं। भारत को संस्कार, संस्कृति और मर्यादा की त्रिवेणी कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में नारी अस्मिता को बहुत महत्व दिया गया है। संस्कृत में एक श्लोक है- यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता। अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। मगर आज सब कुछ उल्टा पुल्टा हो रहा है। न नारी की पूजा हो रही है और देवताओं की जगह सर्वत्र राक्षस ही राक्षस दिखाई दे रहे है। समाज के नजरिए में भी महिलाओं के प्रति अब तक कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। ऐसा लगता है जैसे हमारा देश भारत धीरे-धीरे बलात्कार की महामारी से पीड़ित होता जा रहा है। यौन अपराध चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहे हैं।
आजकल रोज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर महिलाओं के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ की खबर दिखाई जाती रहती है परंतु इसकी रोकथाम के उपाय पर चर्चा कहीं नहीं होती है। इस तरह के अत्याचार कब रुकेंगें। क्या हम सिर्फ मूक दर्शक बन खुद की बारी का इंतजार करेंगे। लड़कियों पर अत्याचार पहले भी हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं अगर इसके रोकने के कोई ठोस उपाय नहीं किये गये। आज भी हमारे समाज में बलात्कारी सीना ताने खुले आम घूमता है और बेकसूर पीड़ित लड़की को बुरी और अपमानित नजरों से देखा जाता है । न तो समाज अपनी जिम्मेदारी का माकूल निर्वहन कर रहा है और न ही सरकार। ऐसे में बालिका कैसे अपने को सुरक्षित महसूस करेगी यह हम सब के लिए बेहद चिंता की बात है।
सच तो यह है कि एक छोटे से गांव से देश की राजधानी तक महिला सुरक्षित नहीं है। अंधेरा होते-होते महिला प्रगति और विकास की बातें छू-मंतर हो जाती हैं। रात में विचरण करना बेहद डरावना लगता है। कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित घर पहुँचने की चिंता सताने लगती है। देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में कमी नहीं आरही है। भारत में आए दिन महिलाएं हिंसा और अत्याचारों का शिकार हो रही हैं। घर से लेकर सड़क तक कहीं भी महिला सुरक्षित नहीं है। देश में महिला सुरक्षा को लेकर किये जा रहे तमाम दावे खोखले साबित हुए है। महिला सुरक्षा को लेकर देशभर से रोजाना अलग-अलग खबरें सामने आती रहती हैं। देश में महिलाओं की स्थिति पर हमेशा ही सवाल खड़े होते रहे हैं। महिलाओं की सुरक्षा के तमाम दावों और वादों के बाद भी उनकी हालत जस की तस है। महिलाएं रोज ही दुष्कर्म, छेड़छाड़, घरेलू हिंसा और अत्याचार से रूबरू होती है।
उमा देवी खत्री, जिन्हें पूरा देश प्यार से टुनटुन के नाम से जानता है, हिंदी फिल्म जगत की पहली और अत्यंत लोकप्रिय महिला कॉमेडियन थीं। उन्होंने अपने विशिष्ट अंदाज़, अनोखी आवाज़, खास व्यक्तित्व और हास्य से भरे अभिनय से एक ऐसा मुकाम बनाया, जिसे आज भी कोई नहीं भूल सकता। वे केवल हंसी की दुनिया की सितारा ही नहीं थीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और प्रतिभा की मिसाल भी थीं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कठिन परिस्थितियाँ भी यदि मन में दृढ़ निश्चय हो तो महान सफलता की राह रोक नहीं सकतीं।
उमा देवी का जन्म 11 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश में हुआ। बचपन अत्यंत कठिनाइयों से भरा था। कम उम्र में ही माता-पिता का साया उठ गया और वे अनाथ हो गईं। गरीबी, अकेलापन और जीवन की संघर्षपूर्ण परिस्थितियों ने उन्हें समय से पहले ही बड़ा बना दिया। लेकिन इन कष्टों के बीच भी उमा देवी के मन में संगीत और कला के प्रति गहरा प्रेम बना रहा। उनकी आवाज़ अत्यंत अनूठी थी—मधुरता और भारीपन का एक ऐसा संगम, जो पहली ही बार सुनने पर ध्यान खींच ले।
जीवन में संघर्ष करते हुए वे मुंबई पहुंचीं और फिल्मों में काम पाने का प्रयास किया। शुरुआती दिनों में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन प्रतिभा और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने अपना रास्ता स्वयं बनाया। सबसे पहले उनका नाम उभरकर सामने आया एक गायिका के रूप में। 1947 में उनकी गायकी ने फिल्म जगत को चौंका दिया। “अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का” जैसे गीतों ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया। उस समय की महान गायिका लता मंगेशकर द्वारा उन्हें अत्यंत सम्मान दिया गया और माना जाता है कि लता जी ने उमा देवी को सम्मानपूर्वक यह समझाया कि उनकी आवाज़ का उपयोग एक सीमित दायरे में ही संभव है, और अभिनय की ओर बढ़ना उनके लिए बेहतर राह हो सकती है।
उसी समय से उमा देवी ने अभिनय को अपनी नई दिशा बनाया। उनका भारी-भरकम शरीर, अलग अंदाज़ और सहजता से किए गए हास्य ने उन्हें दर्शकों का सबसे चहेता कलाकार बना दिया। वे कॉमिक भूमिकाओं में इस तरह रच-बस जाती थीं कि कई बार दर्शक केवल उनकी एक झलक से ही हंस पड़ते थे। निर्देशक और कलाकार उन्हें सेट पर “टुनटुन” कहकर बुलाने लगे और यही नाम बाद में उनकी पहचान बन गया। उनका नया नाम टुनटुन फिल्म इतिहास में अमिट हो गया।
1950 और 1960 के दशक में टुनटुन उस दौर की लगभग हर बड़ी फिल्म में हास्य भूमिका में दिखाई देती थीं। वे गुरु दत्त, देव आनंद, दिलीप कुमार, किशोर कुमार, मेहमूद और राज कपूर जैसे सितारों के साथ काम कर चुकी थीं। “आर-पार”, “मिस्टर एंड मिसेज 55”, “अड़चनें”, “सीआईडी”, “दिल्ली का ठग” और “कश्मीर की कली” जैसी फिल्मों में उनके हास्य प्रदर्शन को दर्शक आज भी याद करते हैं। उनकी विशेषता केवल मज़ाक करना ही नहीं थी, बल्कि वे दैनंदिन जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी हास्य ढूंढ लेती थीं और उसे पर्दे पर इस तरह प्रस्तुत करती थीं कि किरदार जीवंत हो उठता था।
टुनटुन का हास्य कभी भी भद्दा नहीं होता था। वे शालीन, मधुर और स्वाभाविक अभिनय से हंसी पैदा करती थीं। महिलाओं के लिए हास्य भूमिका निभाना उस दौर में आसान नहीं था। समाज, फिल्म उद्योग और दर्शकों की दृष्टि में महिला कलाकारों के लिए एक तय दायरा था। लेकिन टुनटुन ने इस दायरे को तोड़ा और साबित किया कि चाहे अभिनय का कोई भी क्षेत्र हो—महिलाएं उसमें उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं। वे बताती थीं कि हंसाने वाला कलाकार लोगों के मन में सबसे गहरा असर छोड़ता है, क्योंकि वह दुखों के बीच मुस्कान पैदा करता है।
टुनटुन का निजी जीवन भी संघर्षों से भरा था, परंतु उन्होंने कभी इसे अपने करियर पर हावी नहीं होने दिया। वे एक समर्पित पत्नी और मां थीं। अपने परिवार के प्रति उनका प्रेम और जिम्मेदारी भी उतनी ही दृढ़ थी जितनी उनकी कला के प्रति समर्पण। काम के साथ वे हर परिस्थिति में अपने परिवार को सँभालती रहीं और अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दी।
अपने लंबे करियर में टुनटुन ने लगभग 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि निर्माता-निर्देशक फिल्में लिखते समय विशेष रूप से हास्य दृश्यों में टुनटुन का चरित्र जोड़ देते थे। उनका नाम ही दर्शकों को थिएटर तक खींच लाने के लिए काफी होता था। 1990 के दशक तक वे फिल्म जगत से कुछ दूर हो गईं, लेकिन उनकी पहचान, लोकप्रियता और सम्मान में कभी कोई कमी नहीं आई।
24 नवंबर 2003 को टुनटुन का निधन हो गया। उनके जाने के बाद भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया, जिसने न केवल हंसी दी, बल्कि फिल्म जगत में महिलाओं के लिए हास्य भूमिकाओं का मार्ग भी प्रशस्त किया। वे एक ऐसी कलाकार थीं जिनका योगदान सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि संघर्ष किसी भी सपने को रोक नहीं सकता।
अंततः, उमा देवी खत्री ‘टुनटुन’ भारतीय फिल्मों की वह धरोहर हैं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा में हास्य अभिनय को नए आयाम दिए। वे हंसी की रानी थीं—एक ऐसी रानी, जिसकी मुस्कान और आवाज़ आज भी लोगों के दिलों में गूंजती है। उनका जीवन प्रेरणा है कि प्रतिभा, साहस और आत्मविश्वास से हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है।
हीरालाल शास्त्री का जन्म 24 नवम्बर 1899 को जयपुर जिले में जोबनेर के एक किसान परिवार में हुआ था। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी तथा राजनेता तथा वनस्थली विद्यापीठ के संस्थापक थे। वे राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री बने।
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा जोबनेर में हुई। 1920 में उन्होंने साहित्य-शास्त्री की डिग्री प्राप्त की। 1921 में जयपुर के महाराज कालेज से बी.ए. किया और वे इस परीक्षा में सर्वप्रथम आए।
हीरालाल की बचपन से ही यह उत्कट अभिलाषा थी कि वे किसी गाँव में जाकर दीन-दलितों की सेवा सेवा में अपना सारा जीवन लगा दें। हालाँकि 1921 में वे जयपुर राज राज्य सेवा में आ गए थे और बड़ी तेजी से उन्नति करते हुए गृह और विदेश विभागों में सचिव बने थे, फिर भी 1927 में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। प्रशासनिक सेवा के दौरान उन्हेंने बड़ी मेहनत, कार्यकुशलता और निर्भीकता से काम किया था।
हीरालाल शास्त्री, वनस्थली विश्व विद्वालय के संस्थापक थे
सेलीना जेटली का जन्म 24 नवंबर 1981 को शिमला , हिमाचल प्रदेश , भारत में हुआ था। वे एक भारतीय सौंदर्य प्रतियोगिता की खिताब धारक और पूर्व अभिनेत्री हैं। उन्होंने मुख्य रूप से हिंदी सिनेमा में काम किया है। उन्होंने फेमिना मिस इंडिया 2001 का खिताब जीता और मिस यूनिवर्स 2001 में चौथी रनर-अप बनीं ।
उनके पिता पंजाबी हिंदू थे, कर्नल विक्रम कुमार जेटली और मां ईसाई थीं, मीता फ्रांसिस मनोविज्ञान और साहित्य की प्रोफेसर थीं। उनके नाना कर्नल एरिक फ्रांसिस भारतीय सेना की राजपूताना राइफल्स में सेवारत थे। उनकी नानी उषा एक पंजाबी ईसाई परिवार से थीं, और अपनी अफगान हिंदू दादी के माध्यम से दूसरी पीढ़ी की अफगान-भारतीय भी थीं ।
वह बड़ी होकर अपने पिता की तरह सेना में भर्ती होना चाहती थी, या तो पायलट या डॉक्टर के रूप में। उनके बचपन का अधिकांश समय उनके पिता के भारत भर के शहरों और कस्बों में स्थानांतरित होने के कारण अलग-अलग स्थानों पर बीता – परिणामस्वरूप उन्होंने एक दर्जन से अधिक विभिन्न स्कूलों में पढ़ाई की। उन्होंने सिटी मॉन्टेसरी स्कूल, स्टेशन रोड, लखनऊ और कैनोसा कॉन्वेंट स्कूल, रानीखेत में पढ़ाई की, जबकि उनका परिवार संबंधित शहरों में था। उन्होंने इग्नू ( खल्लिकोट कॉलेज अध्ययन केंद्र) से अकाउंटेंसी (ऑनर्स) के साथ वाणिज्य में डिग्री हासिल की, जबकि उनका प्रवास ब्रह्मपुर, ओडिशा में था । उनकी माँ ने वहाँ डेपॉल स्कूल में पढ़ाया। स्नातक होने के बाद, जेटली ने कोलकाता , पश्चिम बंगाल में एक सेल फोन कंपनी में मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव के रूप में कुछ समय के लिए काम किया। परिवार अब महू में बस गया है।
उन्होंने 2003 की थ्रिलर जानशीन से अभिनय की शुरुआत की । उनकी उल्लेखनीय भूमिकाओं में नो एंट्री (2005), अपना सपना मनी मनी (2006), गोलमाल रिटर्न्स (2008) और थैंक यू (2011) शामिल हैं, जिनमें से पहले तीन बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं।
जेटली एलजीबीटीक्यू समुदाय के अधिकारों और समानता की समर्थक हैं और भारत में समलैंगिक अधिकार आंदोलन का समर्थन करती हैं। वह मानवाधिकारों और महिलाओं के अधिकारों से संबंधित गतिविधियों में भी शामिल रही हैं।
जेटली भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को समाप्त करने की समर्थक थीं , जिसने भारत में समलैंगिकता को अपराध घोषित कर दिया था , जब तक कि 2018 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला नहीं आ गया । 2014 में, जेटली ने समलैंगिक अधिकारों पर एक संगीत वीडियो में गायन की शुरुआत की। ‘ द वेलकम ‘ शीर्षक वाला यह वीडियो अप्रैल 2014 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा होमोफोबिया के खिलाफ एक अभियान के रूप में लॉन्च किया गया था।