दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की समग्र वायु गुणवत्ता में सुधार का रुख जारी है और वर्तमान वर्ष के दौरान जनवरी से नवंबर के बीच की अवधि में दिल्ली में आठ वर्षों के दौरान यानी 2018 से 2025 तक (2020 को छोड़कर – कोविड के कारण लॉकडाउन का वर्ष) जनवरी से नवंबर के बीच की अवधि के लिए अपना अब तक का सबसे कम औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) दर्ज किया है।
वर्तमान वर्ष के दौरान जनवरी-नवंबर की अवधि के लिए दिल्ली का औसत एक्यूआई 187 दर्ज किया गया है, जबकि इसी अवधि के दौरान 2024 में यह 201, 2023 में 190, 2022 में 199, 2021 में 197, 2020 में 172, 2019 में 203 और 2018 में 213 था।
जनवरी से नवंबर, 2025 के दौरान सिर्फ तीन दिन ऐसे रहे जब रोज का औसत एक्यूआई 400 से अधिक (‘गंभीर से अत्यधिक गंभीर’ की श्रेणी में) था। 2024 में ऐसे 11 दिन, 2023 में 12 दिन, 2022 में चार दिन, 2021 में 17 दिन, 2020 में 11 दिन, 2019 में 16 दिन और 2018 में ऐसे 12 दिन थे।
इसके अलावा, इस साल अब तक किसी भी दिन दैनिक औसत एक्यूआई 450 से अधिक (‘अत्यंत गंभीर श्रेणी में’) दर्ज नहीं किया गया। 2024 में ऐसे दो दिन (एक्यूआई 450 से अधिक), 2023 में दो दिन, 2022 में शून्य दिन, 2021 में तीन दिन, 2020 में दो दिन, 2019 में पांच दिन और 2018 में शून्य दिन ऐसे थे जब एक्यूआई 450 से अधिक था।
जनवरी से नवंबर (27 नवंबर तक) की अवधि में दिल्ली में पीएम 2.5 सांद्रता का स्तर 2018 के बाद से अब तक की समान अवधि की तुलना में सबसे कम रहा है, जो 2020 (कोविड लॉकडाउन का वर्ष) के बराबर है। दिल्ली में वर्तमान वर्ष में पीएम2.5 का औसत 85 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर देखा गया है, जबकि 2024 में यह 98, 2023 में 90, 2022 में 90, 2021 में 95, 2020 में 85, 2019 में 99 और 2018 में 103 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।
इसी तरह, जनवरी-नवंबर (27 नवंबर तक) की अवधि में भी दिल्ली में पीएम10 सांद्रता का स्तर 2018 के बाद से (2020 को छोड़कर – कोविड के कारण लॉकडाउन का वर्ष) इसी अवधि की तुलना में सबसे कम देखा गया। दिल्ली में इस साल पीएम10 सांद्रता का स्तर औसतन 183 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया है, जबकि 2024 में यह 205, 2023 में 193, 2022 में 202, 2021 में 200, 2020 में 167, 2019 में 210 और 2018 में 228 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और इसमें कमी लाने के उद्देश्य से प्रभावी कदम उठाने तथा दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए विभिन्न हितधारकों के साथ मिलकर कार्य कर रहा है। आने वाले दिनों में दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता की स्थिति को और बेहतर बनाने के प्रयासों को और अधिक तेज किया जाएगा।
राष्ट्रीय हितों व डिजिटल संप्रभुता की दीर्घकालिक रक्षा का विश्लेषण
– डॉ. सत्यवान सौरभ
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डिजिटल युग में वैश्विक शक्ति-संतुलन तेल से डेटा की ओर, भू-राजनीति से तकनीक-राजनीति की ओर और पारंपरिक व्यापार से डिजिटल व्यापार की ओर निर्णायक रूप से स्थानांतरित हो चुका है। ऐसे समय में भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे दो समानांतर दवाबों और अवसरों का सामना करना पड़ रहा है—एक ओर वैश्विक डिजिटल व्यापार समझौतों में सम्मिलित होकर तीव्र होती वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्वयं को एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर स्वदेशी डिजिटल क्षमताओं, डेटा संसाधनों, तकनीकी नीति-निर्माण और डिजिटल संप्रभुता की रक्षा करने की अनिवार्यता भी है। समस्या का केंद्रबिंदु यह है कि कई डिजिटल व्यापार समझौते ऐसे प्रावधानों से भरे हुए हैं जो सतही तौर पर मुक्त, सहज और त्वरित डिजिटल प्रवाह की वकालत करते हैं, किंतु वस्तुतः वे विकासशील देशों की नीति स्वायत्तता, घरेलू तकनीकी उद्योग, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और दीर्घकालिक रणनीतिक क्षमताओं को कमजोर करते हैं।
भारत की स्थिति विशेष रूप से इसलिए संवेदनशील है क्योंकि भारत एक विशाल डिजिटल बाजार, अत्यधिक उपभोग आधारित डेटा-संपदा, और वैश्विक मूल्य-श्रृंखला का उभरता हुआ तकनीकी केंद्र है। अतः डिजिटल व्यापार समझौते भारत की डिजिटल प्रगति के लिए अवसर भी हैं और जोखिम भी। यह समझना आवश्यक है कि कैसे ये समझौते भारत की स्वदेशी क्षमताओं को प्रभावित करते हैं और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए क्या संरचनात्मक सुधार अपेक्षित हैं।
डिजिटल व्यापार समझौतों का सबसे बड़ा प्रभाव भारत की नियामक स्वायत्तता पर पड़ता है। विकसित देशों द्वारा संचालित ऐसे समझौते अक्सर डेटा के मुक्त प्रवाह, डेटा स्थानीयकरण पर प्रतिबंध, डिजिटल सेवाओं पर गैर-भेदभाव, सोर्स कोड की सुरक्षा और स्वामित्व एल्गोरिदम के खुलासे पर रोक जैसी धाराओं को सम्मिलित करते हैं। ये प्रावधान भारत जैसे देश के लिए समस्यात्मक इसलिए हैं क्योंकि भारत अभी भी अपने डेटा शासन मॉडल, डिजिटल सुरक्षा ढाँचे और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की रणनीति को धीरे-धीरे विकसित कर रहा है। भारत को यह अधिकार होना चाहिए कि वह डेटा कहाँ संग्रहीत हो, कौन इसका उपयोग करे, और इसका वाणिज्यिक व सामरिक महत्व किस प्रकार परिभाषित हो। यदि ये अधिकार किसी बहुपक्षीय समझौते में सीमित हो जाते हैं, तो भारत की नीति-निर्माण क्षमता बाधित हो जाती है।
डेटा स्थानीयकरण भारत के लिए केवल एक तकनीकी या वाणिज्यिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, साइबर संप्रभुता, डिजिटल न्याय और आर्थिक अवसरों से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जब डिजिटल व्यापार समझौतों में यह शर्त होती है कि कोई देश डेटा स्थानीयकरण लागू नहीं कर सकता, या केवल सीमित परिस्थितियों में कर सकता है, तो इसका परिणाम यह होता है कि भारत अपने डेटा को विदेशी क्लाउड, विदेशी कंपनियों और विदेशी सर्वर संरचनाओं पर निर्भरता के साथ संचालित करने को बाध्य हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप एआई मॉडल, बिग डेटा एनालिटिक्स, नागरिक डिजिटल सेवाएँ और वित्तीय सुरक्षा प्रणाली विदेशी नियंत्रण-क्षेत्र में चली जाती हैं, जो दीर्घकाल में भारत की तकनीकी स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
स्वदेशी डिजिटल क्षमताओं पर दूसरा बड़ा प्रभाव डिजिटल औद्योगिक नीतियों पर लगने वाली सीमाओं के रूप में सामने आता है। डिजिटल व्यापार समझौते प्रायः यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी देश विदेशी डिजिटल सेवा प्रदाताओं या डिजिटल व्यापार कंपनियों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण नीति नहीं अपनाएगा। लेकिन भारत के संदर्भ में यह “भेदभाव” अक्सर नीतिगत प्रतिबंध बन जाता है। उदाहरण के लिए, यदि भारत घरेलू क्लाउड सेवा प्रदाताओं को बढ़ावा देना चाहता है, या घरेलू एआई अवसंरचना का विकास करना चाहता है, तो यह सुनिश्चित करना कठिन हो जाएगा यदि समझौतों में विदेशी कंपनियों के लिए अनिवार्य “नॉन-डिस्क्रिमिनेशन” या “नेशनल ट्रीटमेंट” जैसी शर्तें शामिल हों।
सोर्स कोड और एल्गोरिदमिक पारदर्शिता भी एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ डिजिटल व्यापार समझौते भारत की क्षमता-निर्माण को बाधित कर सकते हैं। कई समझौतों में यह शर्त होती है कि कोई भी सदस्य-देश विदेशी कंपनियों से सोर्स कोड या एल्गोरिद्मिक जानकारी की मांग नहीं करेगा। सतही तौर पर यह बौद्धिक संपदा की सुरक्षा जैसा प्रतीत होता है, परंतु वास्तविकता यह है कि इससे घरेलू प्रतिस्पर्धा, स्वदेशी तकनीकी नवाचार और नियामकीय पारदर्शिता प्रभावित होती है। भारत यदि एआई मॉडल, डिजिटल प्लेटफॉर्म, वित्तीय तकनीक या साइबर सुरक्षा ढाँचों को नियंत्रित करना चाहता है, तो उसे यह समझने की आवश्यकता है कि इन तकनीकों का मूल संरचनात्मक व्यवहार क्या है। लेकिन यदि समझौते इसे कानूनी रूप से असंभव बना दें, तो भारत एक सतही उपभोक्ता मात्र बनकर रह जाता है, निर्माता नहीं।
डिजिटल व्यापार समझौतों का एक और गंभीर प्रभाव वैश्विक तकनीकी कंपनियों से कराधान के अधिकार पर पड़ता है। कई समझौते डिजिटल सेवा कर, समानता कर या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लगाए जाने वाले अतिरिक्त भार को प्रतिबंधित कर देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनियाँ भारतीय बाजार से विशाल राजस्व अर्जित करती हैं, परंतु भारत को उनसे अपेक्षित कर नहीं मिल पाता। इससे न केवल भारत की वित्तीय क्षमता प्रभावित होती है, बल्कि घरेलू कंपनियों को भी असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
इसके अतिरिक्त, डिजिटल व्यापार समझौते भारत को भविष्य में अपनी डिजिटल रणनीति को लचीले रूप से बदलने से भी रोक सकते हैं। जब कोई देश किसी समझौते में कठोर प्रतिबद्धताएँ कर देता है, तो आने वाले वर्षों में उसके लिए तकनीकी क्षेत्र में बदलते खतरों और अवसरों के अनुसार नीतियों में संशोधन करना कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए, साइबर सुरक्षा, डीपफेक विनियमन, एआई नैतिकता, डिजिटल मुद्रा शासन या क्लाउड नियंत्रण जैसे क्षेत्र अत्यंत गतिशील हैं। लेकिन यदि समझौते में ऐसी शर्तें हों जो भारत की विवेकाधीन शक्ति को सीमित कर दें, तो भारत अपनी डिजिटल भविष्य-निर्माण क्षमता खो देता है।
दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए भारत को कई स्तरों पर सुधारों और रणनीतियों की आवश्यकता है। सबसे पहले, भारत को डिजिटल संप्रभुता के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से परिभाषित और संस्थागत रूप देना होगा। डेटा शासन, एआई नीति, डिजिटल प्लेटफॉर्म विनियमन और साइबर सुरक्षा ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ भारत को किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते से ऊपर घरेलू कानून की सर्वोच्चता सुनिश्चित करनी चाहिए। भारत ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम के माध्यम से इस दिशा में प्रारंभिक कदम उठाए हैं, परंतु इसे और व्यापक डिजिटल अधिकार-आधारित ढाँचे की आवश्यकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण सुधार स्वदेशी डिजिटल अवसंरचना के निर्माण में निहित है। भारत को सेमीकंडक्टर निर्माण, उन्नत चिप डिजाइन, घरेलू क्लाउड, एआई कम्प्यूट अवसंरचना, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को प्राथमिकता देनी चाहिए। डिजिटल अर्थव्यवस्था तभी स्वतंत्र और स्थायी हो सकती है जब उसकी नींव पराई तकनीक पर निर्भर ना हो। भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल—आधार, यूपीआई, डीआईजीआईलॉकर, ओएनडीसी—एक उदाहरण है कि कैसे सार्वजनिक नियंत्रण में निर्मित प्रणालियाँ वैश्विक स्तर पर नवाचार का आधार बन सकती हैं।
तीसरा, भारत को बहुपक्षीय और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में स्पष्ट “रेड लाइन्स” के साथ प्रवेश करना चाहिए। भारत को साफ-साफ यह बताना होगा कि वह किन मुद्दों पर समझौता नहीं करेगा—विशेषतः डेटा स्थानीयकरण, डिजिटल कराधान, एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता, राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी डेटा, संवेदनशील तकनीकें और स्वदेशी डिजिटल उद्योगों के संरक्षण के मुद्दे। यदि समझौते इन क्षेत्रों में अत्यधिक बाधात्मक हों, तो भारत को उनका हिस्सा बनने से इंकार करने का भी अधिकार होना चाहिए, जैसा कि भारत ने कई बार वैश्विक ई-कॉमर्स नियमों में अनुचित शर्तों के कारण किया है।
चौथा, भारत को डिजिटल व्यापार वार्ता में केवल एक उपभोक्ता या बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक तकनीकी शक्ति के रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहिए। भारत के पास विश्व का सबसे बड़ा डिजिटल कौशल-आधार, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों का विशाल समूह और उभरती हुई स्टार्टअप प्रणाली है। भारत को तकनीकी प्रतिभा को वार्ता की शक्ति में परिवर्तित करना चाहिए। यह एक निर्यात योग्य क्षमता है—भारत तकनीकी सेवाओं, डिजिटलीकरण विशेषज्ञता और एआई मॉडल-ट्रेनिंग क्षमताओं का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है, बशर्ते उसकी नीति स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।
पाँचवाँ सुधार संप्रभु कंप्यूटिंग प्रणाली के निर्माण से संबंधित है। भविष्य में डेटा ही नहीं, बल्कि कम्प्यूटिंग शक्ति भी राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बनेगी। भारत को सुरक्षित, स्वदेशी और उच्च क्षमता वाली क्लाउड प्रणाली, सैन्य-ग्रेड साइबर नेटवर्क, एआई कम्प्यूट स्टैक और सेमीकंडक्टर फेब्रिकेशन की दिशा में निवेश बढ़ाना चाहिए। चीन का उदाहरण स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि जब कोई देश अपने कंप्यूट स्टैक पर नियंत्रण कर लेता है, तब वह डिजिटल अर्थव्यवस्था में निर्णायक रूप से आत्मनिर्भर हो जाता है।
सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण सुधार एक सुदृढ़ डिजिटल कूटनीति नीति का निर्माण है। डिजिटल व्यापार केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है; यह भू-राजनीति, रणनीति, गठबंधन, वैश्विक मानकों और तकनीकी प्रभुत्व का विषय भी है। भारत को वैश्विक डिजिटल मानकों के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ताकि वैश्विक नियम विकसित देशों के हित में नहीं, बल्कि व्यापक, समावेशी और बहुध्रुवीय डिजिटल व्यवस्था के हित में बनें।
इन सभी पहलुओं को एक साथ देखने से स्पष्ट होता है कि डिजिटल व्यापार समझौते और भारत की स्वदेशी डिजिटल क्षमताएँ
इसलिए, भारत को संतुलन की उस सूक्ष्म रेखा पर स्थिरता से चलना होगा जहाँ वह वैश्विक व्यापार का हिस्सा भी बने, परंतु अपनी डिजिटल आत्मनिर्भरता और संप्रभुता को खोए बिना। यही भविष्य के भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक विकल्प है। डिजिटल व्यापार समझौते तभी भारत के लिए उपयोगी होंगे जब भारत उनका हिस्सा अपनी शर्तों पर बने—न कि विकसित देशों की शर्तों पर।
डिजिटल युग में संप्रभुता केवल सीमा या सैन्य शक्ति का प्रश्न नहीं है, बल्कि डेटा, एआई, कंप्यूटिंग शक्ति, साइबर सुरक्षा और स्वदेशी तकनीक पर नियंत्रण का प्रश्न है। यदि भारत अपने इन संसाधनों की रक्षा कर पाता है और स्वदेशी क्षमताओं को सुदृढ़ बनाता है, तो भविष्य में वह न केवल डिजिटल अर्थव्यवस्था का उपभोक्ता रहेगा, बल्कि उसकी दिशा तय करने वाली प्रमुख शक्ति भी बनेगा। यही दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की सच्ची रक्षा है।
– डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
काशी–तमिल संगमम् 4.0 के अंतर्गत आयोजित काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में सुबह आयोजि ‘रन फॉर केटीएस 4.0’ में सैकड़ों युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सुबह 7:30 बजे मालवीय भवन से शुरू होकर रविदास गेट तक जाने वाली इस दौड़ ने न केवल परिसर को ऊर्जा से भर दिया बल्कि ‘विविधता में एकता’ के संदेश को भी प्रभावी रूप से प्रसारित किया। तमिलनाडु और काशी की सांस्कृतिक एकता को सशक्त करने वाले इस कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को जोड़ना और उन्हें राष्ट्र की विविध विरासत के प्रति जागरूक करना रहा!
बीएचयू कुलपति श्री अजित कुमार चतुर्वेदी ने मैराथन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने कहा कि युवाओं की इतनी संख्या देखकर हमें भी उत्साह आ गया है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हर राज्य के लोग रहते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा विश्वविद्यालय काशी तमिल संगमम्-4.0 को मना रहा है इससे हमारे प्राचीन सभ्यता, आध्यात्मिक और संगीत का भी एक संगम हो रहा है।
कार्यक्रम के मुख्य संयोजक प्रो.भुवन चंद्र कपरी, विभाग- फिजिकल एजुकेशन, कला संकाय, बीएचयू ने बताया कि इस दौड़ का मकसद केवल खेल को बढ़ावा देना नहीं बल्कि काशी और तमिलनाडु की ऐतिहासिक साझेदारी को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से युवाओं की ऊर्जा सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है और राष्ट्रीय एकता का संदेश मजबूत होता है।
सह-संयोजक डॉ. राजीव कुमार सिंह, असिस्टेंट डायरेक्टर, फिजिकल एजुकेशन एवं स्पोर्ट्स (रैकेट गेम्स) ने बताया कि इस बार मैराथन में बीएचयू के छात्रों के साथ-साथ आस-पास के कॉलेजों और समुदाय से भी बड़ी संख्या में युवाओं ने भाग लिया। उन्होंने कहा कि प्रतिभागियों में जोश और अनुशासन दोनों देखने को मिला जो विश्वविद्यालय की खेल संस्कृति की पहचान है।
इस पूरे कार्यक्रम की निगरानी और समन्वय नोडल ऑफिसर प्रो. अंचल श्रीवास्तव ने की। उन्होंने बताया कि काशी–तमिल संगमम् बीएचयू का एक प्रमुख सांस्कृतिक सेतु है जो दक्षिण और उत्तर भारत के प्राचीन संबंधों को वर्तमान में जीवंत करता है। ‘रन फॉर केटीएस 4.0’ इसी कड़ी का एक महत्वपूर्ण प्रयास है जिसमें युवाओं ने बड़े उत्साह के साथ हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया!
दौड़ शुरू होने से पहले सभी प्रतिभागियों को कार्यक्रम के उद्देश्यों, सुरक्षा दिशा-निर्देशों और मार्ग के बारे में जानकारी दी गई। जैसे ही संकेत मिला, सैकड़ों युवक-युवतियों ने दौड़ की शुरुआत की। इस आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि काशी और तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत कितनी मजबूत है।
रविवार को दंतेवाड़ा में 37 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की। आत्मसमर्पण करने वालों में 12 महिलाएं भी शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, इनमें से 27 नक्सलियों पर कुल 65 लाख रुपये का इनाम घोषित था।
दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक गौरव राय ने बताया कि लगातार चलाए जा रहे ऑपरेशनों और मुठभेड़ों के बाद नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति का फायदा उठाया है। इन सभी नक्सलियों ने बस्तर रेंज पुलिस की ‘पूना मारगेम’ (स्थानीय बोली में ‘नया रास्ता’) पहल के तहत स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण किया।
पूना मारगेम’ अभियान उग्रवाद छोड़ने वालों को पुनर्वास से लेकर सामाजिक मुख्यधारा में शामिल होने तक पूरा सहयोग प्रदान करता है।
SP राय ने जानकारी दी कि पिछले 20 महीनों में कुल 508 माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं। आत्मसमर्पण करने वाले सभी नक्सली अब सरकार की पुनर्वास योजनाओं के तहत सम्मान और विकास की राह पर आगे बढ़ेंगे।
नवयुग खादी फैशन शो का आयोजन शनिवार, 29 नवंबर को राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय एवं हस्तकला अकादमी, प्रगति मैदान में किया गया। इस शो में “नए भारत की नई खादी” को आधुनिक और नए तरीके से प्रस्तुत किया गया। इस कार्यक्रम में खादी के आधुनिक और नए रूप को आधुनिक तरीके से प्रदर्शित किया गया।
इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के अध्यक्ष मनोज कुमार थे। उन्होंने रैंप पर प्रदर्शित परिधानों की सराहना की और खादी के कारीगरों के समर्पण एवं शिल्प कौशल की प्रशंसा की।
अपने संबोधन में, अध्यक्ष ने खादी को नया जीवन देने का श्रेय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व को दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने खादी को महज एक कपड़े से ऊपर उठाकर देशभक्ति के प्रतीक के साथ-साथ आधुनिक भारतीय जीवनशैली का प्रतीक बना दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री के मार्गदर्शक मंत्र – “खादी राष्ट्र के लिए, खादी फैशन के लिए और खादी परिवर्तन के लिए” को दोहराया। इसने खादी को एक नई पहचान दी है।
उन्होंने कहा, “आज की खादी न केवल पूज्य बापू की विरासत को आगे बढ़ा रही है बल्कि आधुनिक डिज़ाइन और वैश्विक फ़ैशन में भी तेज़ी से अपनी जगह बना रही है। खादी अब केवल गाँवों तक सीमित नहीं रही; शहरों, फ़ैशन बाज़ारों और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी इसकी लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ रही है।”
श्री मनोज कुमार ने कहा कि नए ज़माने की खादी डिज़ाइन, तकनीक और परंपरा का एक अनूठा संगम है। उन्होंने कहा कि खादी युवा पीढ़ी की पहली पसंद बन गई है और यह रोज़गार सृजन, पर्यावरणीय अनुकूलता और देश की आत्मनिर्भरता की यात्रा से जुड़ी हुई है।
यह कार्यक्रम केवीआईसी, खादी उत्कृष्टता केंद्र (सीओईके), राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईएफटी) और भारतीय फैशन डिज़ाइन परिषद (एफडीसीआई) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। रैंप पर खादी परिधानों और उत्पादों की विविध श्रृंखला प्रदर्शित की गई। इसे दर्शकों की भरपूर सराहना मिली। विशेष रूप से प्रेरक क्षण तब आया जब देश भर से खादी संस्थानों और कारीगरों के प्रतिनिधियों ने रैंप पर वॉक किया। केवीआईसी के अध्यक्ष श्री मनोज कुमार भी कारीगरों के साथ शामिल हुए। इससे यह संदेश गया कि खादी की असली ताकत उसके बुनकरों और निर्माताओं में निहित है – जो “गाँव से ग्लैमर तक” की यात्रा का एक सशक्त अभिव्यक्ति है।
इस कार्यक्रम में केवीआईसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, एमएसएमई मंत्रालय के संयुक्त सचिव (ए एंड आरई), एमएसएमई मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार और केवीआईसी के वित्तीय सलाहकार, सीओईके के निदेशक और अन्य वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित थे।
विश्व एड्स दिवस हर वर्ष 1 दिसंबर को एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूकता बढ़ाने, इससे जुड़े मिथकों को मिटाने और एड्स से प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त करने के उद्देश्य से मनाया जाता है। यह दिवस हमें न केवल इस वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती को समझने का अवसर देता है, बल्कि उन प्रयासों को भी सलाम करता है जो सरकारें, स्वास्थ्य संगठन, स्वयंसेवी समूह और समाज मिलकर इस बीमारी से लड़ने के लिए कर रहे हैं। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह दिवस और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि एचआईवी/एड्स के मामले और उनके समाधान समाज के व्यापक स्वास्थ्य ढांचे से जुड़े हुए हैं
भारत ने पिछले दो दशकों में एचआईवी/एड्स नियंत्रण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। 2000 के दशक की शुरुआत में देश में संक्रमित व्यक्तियों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) और विभिन्न राज्य सरकारों के सतत अभियानों से संक्रमण दर में उल्लेखनीय कमी आई। आज भारत विश्व में एचआईवी संक्रमणों के बोझ वाले शीर्ष देशों में होते हुए भी संक्रमण को नियंत्रित करने के सफल उदाहरणों में शामिल है। देश के कुछ राज्यों—जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, मणिपुर और नागालैंड—में संक्रमण दर अपेक्षाकृत अधिक रही है, लेकिन जागरूकता, परीक्षण सुविधाओं और इलाज की उपलब्धता बढ़ने से स्थिति धीरे-धीरे सुधर रही है।
भारत में एचआईवी संक्रमण का सबसे बड़ा कारण असुरक्षित यौन संबंध हैं। इसके अलावा संक्रमित सीरिंजों का उपयोग, रक्त संक्रमण, जन्म के दौरान मां से बच्चे में संक्रमण और असुरक्षित चिकित्सा प्रक्रियाएं भी इसके प्रसार के कारण हैं। जोखिम समूहों में हाई-रिस्क व्यवहार वाले समूह प्रमुख हैं—जैसे वाणिज्यिक यौनकर्मी, ट्रक चालक, इंजेक्शन द्वारा नशीले पदार्थ लेने वाले लोग, ट्रांसजेंडर समुदाय तथा पुरुष-से-पुरुष यौन संबंध रखने वाले पुरुष (MSM)। सरकार और गैर-सरकारी संगठन इन समूहों के लिए विशेष जागरूकता और उपचार कार्यक्रम चलाते हैं।
भारत में एचआईवी/एड्स नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (NACP) सबसे प्रमुख सरकारी योजना है। यह कार्यक्रम जागरूकता अभियान, एचआईवी परीक्षण केंद्र, काउंसलिंग सेवाएं, ART (एंटी-रेट्रो वायरल थेरेपी) उपचार, गर्भवती महिलाओं की जांच और संक्रमण को रोकने के उपायों पर केंद्रित है। सरकार ने देशभर में हजारों ART केंद्र स्थापित किए हैं, जहां संक्रमित व्यक्ति जीवनभर मुफ्त उपचार प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा ‘90-90-90’ लक्ष्य (90% संक्रमित व्यक्तियों की पहचान, 90% को उपचार, और 90% में वायरल लोड नियंत्रण) को हासिल करने की दिशा में लगातार प्रगति की जा रही है।
एड्स के प्रति समाज में मौजूद भ्रांतियां और भेदभाव संक्रमित व्यक्तियों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं। आज भी कई क्षेत्रों में एचआईवी संक्रमित लोगों को सामाजिक दूरी, रोजगार में भेदभाव, रिश्तों में अस्वीकार और स्वास्थ्य सुविधाओं में उपेक्षा झेलनी पड़ती है। विश्व एड्स दिवस जैसे अवसर इस भेदभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और शहरी क्षेत्रों में रैलियां, पोस्टर अभियान, स्वास्थ्य शिविर और संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनसे जागरूकता फैलती है और समाज को वैज्ञानिक जानकारी मिलती है।
एचआईवी से बचाव पूरी तरह संभव है, बशर्ते आवश्यक सावधानियों का पालन किया जाए। असुरक्षित यौन संबंध से बचना, कंडोम का नियमित उपयोग, नशीले पदार्थों के लिए साझा सुई का प्रयोग न करना, केवल प्रमाणित रक्त का ही उपयोग करना और गर्भवती महिलाओं की समय पर जांच कराना प्रमुख उपाय हैं। सरकार और संगठनों द्वारा कंडोम वितरण, टेस्टिंग कैंप और पीपीटीसीटी (Prevention of Parent to Child Transmission) जैसी योजनाओं से संक्रमण रोकथाम के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं।
आज एचआईवी संक्रमित व्यक्ति भी पूर्ण जीवन जी सकता है। ART दवाओं की वजह से वायरस की मात्रा शरीर में इतनी कम हो जाती है कि रोगी स्वस्थ जीवन जी सकता है और दूसरों को संक्रमण फैलने का खतरा भी कम हो जाता है। भारत में चिकित्सा अनुसंधान संस्थान वैक्सीन और दीर्घकालीन उपचार पद्धतियों पर काम कर रहे हैं। दवाओं की किफायती कीमत और सरकारी सहायता ने उपचार को और आसान बनाया है। इससे मृत्यु दर और संक्रमण दर दोनों में कमी आई है।
यह दिन न केवल एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर है बल्कि समाज में दया, सम्मान और समर्थन का संदेश भी देता है। यह अवसर उन लाखों लोगों को याद करने का भी है जिन्होंने एड्स के कारण अपनी जान गंवाई और उन स्वास्थ्य योद्धाओं को सम्मानित करने का जिनके अथक प्रयासों ने लाखों जीवन बचाए हैं। भारत में इस दिन सरकारी भवनों, अस्पतालों, स्कूलों और संस्थानों में कार्यक्रम आयोजित होते हैं। लाल रिबन पहनने की परंपरा भी इसी दिन की पहचान है, जो जागरूकता और समर्थन का प्रतीक है।
भारत ने एचआईवी/एड्स से लड़ाई में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं—खासकर सामाजिक भेदभाव और जागरूकता की कमी के क्षेत्र में। आवश्यकता है कि समाज, सरकार और स्वास्थ्य सेवा प्रदाता मिलकर एक ऐसी वातावरण का निर्माण करें जहाँ एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों को सम्मान, सहायता और उचित उपचार मिले। विश्व एड्स दिवस हमें यही संदेश देता है कि शिक्षा, जागरूकता, सहानुभूति और वैज्ञानिक उपायों के माध्यम से हम एचआईवी-मुक्त भारत की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ सकते हैं।
मुरादाबाद के पास दिल्ली-लखनऊ नेशनल हाईवे पर एक भीषण सड़क दुर्घटना में शादी समारोह में जा रहे एक ही परिवार के छह लोगों की मौत हो गई। मेरठ डिपो की अनियंत्रित रोडवेज बस कह ऑटो से हुई जोरदार टक्कर में पांच लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। एक ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। इस हादसे में छह अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए । घायलों को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
गांव कुंदरकी क्षेत्र के अब्दुल्लापुर गांव निवासी संजू, सीमा पत्नी करन सिंह, आरती पुत्री मुरारी, अभय पुत्र ओमवीर, सुमन पत्नी हरदीप और करन सिंह की एक अन्य पुत्री, संजू के ऑटो में सवार होकर कटघर क्षेत्र के रफतापुर गांव में भात (शादी की रस्म) लेकर जा रहे थे। जैसे ही उनका ऑटो जीरो पॉइंट के पास पहुंचा कि पीछे से आ रही मेरठ डिपो की एक रोडवेज बस अनियंत्रित हो गई और ऑटो को अपनी चपेट में ले लिया।
टक्कर इतनी भीषण थी कि ऑटो पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया। हादसे में संजू, आरती,सीमा, अभय, और सुमन की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई।। अस्पताल में उपचार के दौरान अनन्या नामक परिवार की एक और सदस्य ने दम तोड़ दिया। इससे मृतकों की संख्या बढ़कर छह हो गई है। घायलों का इलाज जारी है और उनकी स्थिति गंभीर बताई जा रही है।
सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस और बचाव दल मौके पर पहुंच गए। घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया और शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और बस चालक की तलाश शुरू कर दी है। यह घटना सड़क सुरक्षा पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करती है।
लेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सी-डैक, भारतीय खिलौना उद्योग और लेगो समूह ने परियोजना ‘डेवलपमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड आईटी बेस्ड कंट्रोल और ऑटोमेशन सॉल्यूशन फॉर कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक गुड्स (टॉय इंडस्ट्री)’ के अंतर्गत एक वर्ष का प्रशिक्षण पूरा करने वाले इंजीनियरिंग स्नातकों के दूसरे बैच का दीक्षांत समारोह आयोजित किया। यह परियोजना मंत्रालय के अनुसंधान एवं विकास समूह की एक विशेष पहल है जिसका उद्देश्य प्रोटोटाइप विकसित करके और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों सहित युवा इंजीनियरों को ऐसे खिलौने डिज़ाइन करने हेतु आवश्यक कौशल से सुसज्जित करके भारतीय इलेक्ट्रॉनिक खिलौना उद्योग के विकास को बढ़ावा देना है।
इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की इस पहल के अंतर्गत, पूरे भारत से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और पूर्वोत्तर क्षेत्र की पृष्ठभूमि से युवा इंजीनियरों का चयन किया गया और उन्हें एक वर्ष तक अनुसंधान एवं विकास कार्यों में लगाया गया। पहले छह महीने तक उन्हें सी-डैक-नोएडा स्थित ई-खिलौना प्रयोगशाला में काम करने और सीखने का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ। इसके बाद, उद्योग जगत की ज़रूरतों के अनुसार खिलौनों के प्रोटोटाइप बनाने के लिए उन्हें छह महीने का प्रशिक्षण दिया गया। प्रतिभागियों को एक वर्ष के लिए 25,000 रुपये का मासिक वृति दी गई।
इस कार्यक्रम के दौरान, इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अपर सचिव, श अमितेश कुमार सिन्हा ने सी-डैक, नोएडा में स्थापित इलेक्ट्रॉनिक खिलौना प्रयोगशाला का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा, “भारत इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों का एक बढ़ता हुआ बाजार है और भारतीय खिलौना उद्योग के तंत्र के निर्माण में इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। मुझे बहुत खुशी है कि इसके लिए आधारशिला तैयार हो रही है और इंजीनियरों की अगली पीढ़ी इस दिशा में काम कर रही है। इस कार्यक्रम को और बड़े पैमाने पर औपचारिक रूप दिया जा सकता है ताकि अधिक विद्यार्थियों को लाभ मिल सके और खिलौना उद्योगों को समग्र रूप से बढ़ावा देने में अधिक प्रभावी हो। ई-खिलौनों के लिए सी-डैक-नोएडा में स्थापित उत्कृष्टता केंद्र में राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, एमएसएच और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों पर केंद्रित अन्य संस्थान शामिल होंगे। इससे उद्यमिता/स्टार्टअप शुरू करने में मदद मिलेगी। मैं स्नातक करने वाले विद्यार्थियों को उनके भविष्य के लिए शुभकामनाएं देता हूँ।”
29 नवंबर को इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में आयोजित इस दीक्षांत समारोह में श्री अमितेश कुमार सिन्हा, इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अपर सचिव, इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में जीसी आर एंड डी श्रीमती सुनीता वर्मा, सी-डैक, नोएडा के ईडी श्री विवेक खनेजा, टॉयज़ एसोसिएशन ऑफ इंडिया के निदेशक श्री अनिर्बान गुप्ता, , जीपीए, भारत में लेगो समूह, इलेक्ट्रॉनिक्स खिलौना उद्योग के सदस्य शामिल हुए।
भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए वृद्धजन दिवस (आईडीओपी)-2025 के समारोहों की श्रृंखला के क्रम में वृद्धावस्था के प्रति जागरूकता बढ़ाने और अंतर-पीढ़ीगत संबंधों को बढ़ावा देने के लिए 28 नवंबर को जनपथ, नई दिल्ली स्थित डीआईएसी के भीम हॉल में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम “आराधना” का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का विषय “अनुभव से ऊर्जा तक” था।
इस सत्र में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री श्री बी.एल.वर्मा, सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के सचिव, सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, विद्यार्थी, वरिष्ठ नागरिक और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 41 के अंतर्गत, राज्य को वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए प्रभावी प्रावधान करने का अधिकार दिया गया है। इसी भावना से माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 लागू किया गया था। यह ऐतिहासिक कानून हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक है—देखभाल, कर्तव्य और प्रेम को प्रवर्तनीय अधिकारों में परिवर्तित करता है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित मामलों के लिए नोडल विभाग है।
2011 की जनगणना के अनुसार, देश में लगभग 10 करोड़ वरिष्ठ नागरिक हैं। 2036 तक यह संख्या बढ़कर 22 करोड़ होने का अनुमान है। यह बढ़ती जनसंख्या एक चुनौती के साथ-साथ वरिष्ठ नागरिक केंद्रित नीतियों पर अपना ध्यान केंद्रित करने का अवसर भी प्रस्तुत करती है। हमारे देश ने नीतिगत और कानूनी ढाँचे, दोनों स्तरों पर इस दिशा में पहले ही कई पहल की हैं।
सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान वायुसेना बैंड ने स्पेस फ़्लाइट, सुजलाम सुफलाम, रिजॉइस इन रइसाना, इवनिंग स्टार, वंदे मातरम और सारे जहाँ से अच्छा जैसे गीतों की धुनें बजाईं। वायुसेना बैंड द्वारा बजाई गई धुनों ने उपस्थित लोगों में भारत माता के प्रति गौरव, राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना जगाई। इसने एक बार पुन: मातृभूमि के प्रति प्रेम को जागृत कर दिया।
पद्मश्री गीता चंद्रन ने अपनी टीम के साथ भरतनाट्यम का प्रदर्शन किया। लवंगी राग में त्रिधारा, नमः शिवाय, ओंकार कारिणी और संकीर्तन का प्रदर्शन किया। भारतीय नृत्य शैलियों की इन भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अपने संबोधन में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री, श्री बी.एल. वर्मा ने कहा कि हमारे वरिष्ठ नागरिकों को सदैव ज्ञान, धैर्य और मूल्य-आधारित जीवन का प्रतीक माना गया है। उनके जीवन का प्रत्येक अध्याय—कड़ी मेहनत, संघर्ष, त्याग और उपलब्धियों से भरा—युवा पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक का काम करता है। यह सांस्कृतिक कार्यक्रम इसलिए विशेष है क्योंकि संगीत, नृत्य और कला मिलकर अनुभवों को अभिव्यक्त करते हैं और ऊर्जा को एक सुंदर रूप प्रदान करते हैं, जैसा कि भारतीय वायु सेना के संगीत बैंड द्वारा प्रस्तुत किया गया—सेवा और एकता की मधुर अभिव्यक्ति—और भारत की सुप्रसिद्ध नृत्यांगना पद्मश्री सुश्री गीता चंद्रन का सम्मानित नृत्य और संगीत प्रदर्शन।
यह आयोजन इसलिए यादगार है क्योंकि आज तीन पीढ़ियाँ इस मंच पर एक साथ हैं—हमारे बुजुर्गों की संगीतमय प्रस्तुतियाँ, हमारे युवाओं की कलात्मक अभिव्यक्तियाँ और बच्चों की आनंदमय उपस्थिति। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय इसी दिशा में कार्यरत है, क्योंकि इसका प्रत्येक कार्यक्रम हमारे वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान, सुरक्षा, सक्रिय जीवन और भागीदारी को सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता से प्रेरित है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम “आराधना” ने वृद्धावस्था के प्रति जागरूकता और अंतर-पीढ़ीगत संबंधों को बढ़ावा देने के लिए वरिष्ठ नागरिकों, विद्यार्थी, नीति निर्माताओं, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को एक मंच पर एकत्रित किया।
भारत निर्वाचन आयोग ने 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए प्रासंगिक तिथियों को एक सप्ताह बढ़ाकर संशोधित कार्यक्रम की घोषणा की है, जिसमें 01.01.2026 को अर्हक तिथि माना गया है।
विशेष गहन पुनरीक्षण का संशोधित कार्यक्रम इस प्रकार है:
क्रमांक
गतिविधियां
अनुसूची
1
गणना अवधि
11.12.2025(गुरुवार) तक
2
मतदान केंद्रों का युक्तिकरण/पुनर्व्यवस्थापन
11.12.2025 (गुरुवार) तक
3
नियंत्रण तालिका का अद्यतनीकरण और ड्राफ्ट रोल की तैयारी
12.12.2025 (शुक्रवार)15.12.2025 (सोमवार) तक
4
मसौदा मतदाता सूची का प्रकाशन
16.12.2025 (मंगलवार) को
5
दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अवधि
16.12.2025 (मंगलवार)15.01.2026 (गुरुवार) तक
6
नोटिस चरण (जारी करना, सुनवाई और सत्यापन); गणना प्रपत्रों पर निर्णय और दावों तथा आपत्तियों का निपटान ईआरओ द्वारा साथ साथ किया जाएगा
16.12.2025 (मंगलवार) से07.02.2026 (शनिवार)
7
मतदाता सूची के स्वास्थ्य मापदंडों की जांच करना तथा अंतिम प्रकाशन के लिए आयोग की अनुमति प्राप्त करना।