सर्राफा बाजार में चमका सोना, चांदी के भाव में बदलाव नहीं

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नई दिल्ली, 12 फरवरी (हि.स.)। घरेलू सर्राफा बाजार में आज लगातार दूसरे दिन सोने के भाव में तेजी का रुख नजर आ रहा है। सोना आज 750 रुपये प्रति 10 ग्राम से लेकर 820 रुपये प्रति 10 ग्राम तक महंगा हो गया। दूसरी ओर,चांदी के भाव में आज कोई बदलाव नहीं हुआ है। कीमत में आई तेजी के कारण देश के ज्यादातर सर्राफा बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान 24 कैरेट सोना आज 1,59,610 रुपये से लेकर 1,59,760 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है। इसी तरह 22 कैरेट सोना आज 1,46,310 रुपये से लेकर 1,46,460 रुपये प्रति 10 ग्राम के बीच बिक रहा है। जबकि चांदी के भाव में बदलाव नहीं होने के कारण ये चमकीली धातु दिल्ली सर्राफा बाजार में आज भी शुरुआती कारोबार में 2,89,900 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर ही बिक रही है।

दिल्ली में आज 24 कैरेट सोना 1,59,760 प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है, जबकि 22 कैरेट सोने की कीमत 1,46,460 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई है। वहीं देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में 24 कैरेट सोना 1,59,610 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना 1,46,310 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है। इसी तरह अहमदाबाद में 24 कैरेट सोने की रिटेल कीमत 1,59,660 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोने की कीमत 1,46,360 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई है।

इन प्रमुख शहरों के अलावा चेन्नई में 24 कैरेट सोना आज 1,59,610 रुपये प्रति 10 ग्राम की कीमत पर और 22 कैरेट सोना 1,46,310 रुपये प्रति 10 ग्राम की कीमत पर बिक रहा है। वहीं कोलकाता में 24 कैरेट सोना 1,59,610 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना 1,46,310 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है। भोपाल में 24 कैरेट सोने की कीमत 1,59,660 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर है, जबकि 22 कैरेट सोना 1,46,360 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है।

लखनऊ के सर्राफा बाजार में 24 कैरेट सोना आज 1,59,760 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर और 22 कैरेट सोना 1,46,460 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है। पटना में 24 कैरेट सोने की कीमत 1,59,660 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर है, जबकि 22 कैरेट सोना 1,46,360 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है। जयपुर में 24 कैरेट सोना 1,59,760 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोना 1,46,460 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है।

देश के अन्य राज्यों की तरह कर्नाटक, तेलंगाना और ओडिशा के सर्राफा बाजार में भी आज सोने के भाव में तेजी दर्ज की गई है। इन तीनों राज्यों की राजधानियों बेंगलुरु, हैदराबाद और भुवनेश्वर में 24 कैरेट सोना 1,59,610 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार कर रहा है। इसी तरह इन तीनों शहरों के सर्राफा बाजारों में 22 कैरेट सोना 1,46,310 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बिक रहा है।

वायु सेना के लिए फ्रांस से 114 राफेल जेट्स खरीदने को केंद्र सरकार ने दी मंजूरी

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– सीसीएस से अंतिम मंजूरी के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे पर डील होगी पक्की

नई दिल्ली, 12 फरवरी (हि.स.)। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे से पहले केंद्र सरकार ने लंबे इंतजार के बाद वायु सेना के लिए फ्रांस से 114 राफेल फाइटर जेट खरीदे जाने को गुरुवार को मंजूरी दे दी। इसमें 18 विमान सीधे फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन कंपनी से निर्मित होकर भारत आएंगे। शेष 96 विमान भारत में निजी कंपनियों के साथ साझेदारी में बनाए जाएंगे। इनमें से कई ट्विन-सीटर ट्रेनिंग वर्जन भी होंगे। रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) से गुरुवार को आवश्यकता की स्वीकृति (एओएन) मिलने के बाद व्यावसायिक वार्ता शुरू होगी, फिर अंतिम मंजूरी प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) देगी।

रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में आज डीएसी की बैठक साउथ ब्लॉक में हुई, जिसमें सशस्त्र सेनाओं के लिए कई अहम फैसले हुए। केंद्र ने फ्रांस के साथ सरकार से सरकार सौदे के तहत वायु सेना के लिए 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने को मंजूरी दे दी है। इन विमानों में 40-50 फीसदी मेक इन इंडिया हथियारों को इंटीग्रेट करने का पूरा अधिकार होगा। फ्रांस के साथ 3.25 लाख करोड़ रुपये का यह सैन्य हार्डवेयर सौदा किसी भी देश के साथ अब तक हुए अनुबंध से कम से कम पांच गुना बड़ा है। भारत के पास अभी 36 राफेल हैं और इस सौदे से 150 विमान हो जाने पर देश की हवाई ताकत कई गुना बढ़ने की उम्मीद है।

वायु सेना के उप प्रमुख एयर मार्शल नागेश कपूर ने एक दिन पहले ही प्रेस कांफ्रेंस में बताया था कि ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के दौरान भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमला किया, जिसमें राफेल एक ‘हीरो’ था। अब इस सौदे के लिए मंजूरी मिलने के बाद भारत के पास कुल राफेल ऑर्डर 186 जेट्स हो जाएंगे, क्योंकि भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल-एम का 63 हजार करोड़ का पहले ही ऑर्डर दिया जा चुका है। भारत में लगभग 100 जेट्स बनाए जाएंगे, जिसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, डसॉल्ट-टाटा पार्टनरशिप और मेक इन इंडिया को बड़ा बढ़ावा मिलेगा। इनकी डिलीवरी 2030 तक होने की उम्मीद है

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की अध्यक्षता वाले डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड ने 16 जनवरी को ही फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन से 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। अब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में डीएसी की मंजूरी मिलने के बाद अंतिम मंजूरी प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी देगी। इसके बाद यह डील इसी माह फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के भारत दौरे पर पक्की हो जाएगी। वायु सेना के अंबाला एयरबेस पर पहले से ही राफेल फ्लाइट-ट्रेनिंग और मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सुविधा चालू है। ये जेट्स ‘मेक इन इंडिया’ स्कीम के तहत खरीदे जाएंंगे, जिसमें राफेल बनाने वाली कंपनी डसॉल्ट एविएशन एक भारतीय फर्म के साथ साझेदारी करेगी।

विपक्षी सांसदों ने किया ससंद भवन परिसर में विरोध प्रदर्शन

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नई दिल्ली, 12 फ़रवरी (हि.स.)। संसद के बजट सत्र के 12वें दिन गुरुवार को कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने संसद भवन परिसर के मकर द्वार के समक्ष विरोध प्रदर्शन किया। विपक्षी सांसदों ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते, लोकसभा अध्यक्ष के चैंबर में विपक्षी सांसदों पर लगे अभद्रता के आरोपों और कई अन्य मुद्दों को लेकर नारेबाजी की।

प्रदर्शन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल, प्रमोद तिवारी, राजीव शुक्ला, दीपेंद्र हुड्डा, समाजवादी पार्टी के सांसद रामगोपाल यादव, धर्मेंद्र यादव, जया बच्चन, प्रिया सरोज समेत बड़ी संख्या में विपक्षी सांसद मौजूद रहे। प्रदर्शनकारी सांसदों ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के खिलाफ नारेबाजी की। उनके हाथों में बैनर और पोस्टर थे जिन पर “एमएसपी बचाओ”, “क्राइम हटाओ”, “ट्रैप डील” जैसे नारे लिखे थे।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के विपक्षी सांसदों पर लोकसभा अध्यक्ष के चैंबर में घुसकर अभद्रता करने के आरोप लगाने पर सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि हमने किसी को गाली नहीं दी। एक-दो सांसद आक्रोशित थे और उन्होंने अपनी बात रखी। प्रियंका ने कहा, “रिजिजू ने कहा कि मैं उन्हें उकसा रही थी, यह झूठ है। मैं शांत बैठी थी और अंत में कुछ बातें शांति से कही थीं। “

राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पर कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने कहा कि भाजपा राहुल गांधी के पीछे इसलिए पड़ी है क्योंकि उन्होंने इतने मुद्दे उठाए हैं जिनका भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है। इसलिए वह उन्हें निशाना बनाते रहते हैं, कभी विशेषाधिकार प्रस्ताव लाते हैं, कभी संसद से निष्कासित करते हैं। पंडित नेहरू ने देश बनाया, इंदिरा जी ने देश बनाया, राजीव गांधी ने देश बनाया। आज जो मोबाइल फोन और आईटी सेक्टर है, उसमें राजीव गांधी का योगदान है। मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधार किए। कांग्रेस ने देश बनाया और भाजपा उसे बेच रही है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर कांग्रेस सांसद जेबी माथर ने कहा कि क्या आपने कश्मीर से खबर सुनी? वहां के सेब उत्पादक पहले ही कह चुके हैं कि उनका कारोबार प्रभावित हुआ है। देश के अलग-अलग हिस्सों से इसी तरह की प्रतिक्रियाएं आएंगी। जब सभी सेक्टर प्रभावित होंगे तो क्या विपक्ष चुप रहेगा? हम जनता की आवाज उठा रहे हैं। यही कारण है कि राहुल गांधी ने संसद में स्पष्ट भाषण दिया।

संभल में सरकारी जमीन पर बने मदरसे पर बुलडोजर कार्रवाई

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संभल, 12 फरवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के संभल में सरकारी जमीन पर अवैध रुप से बनाए गए मदरसे पर प्रशासन ने बुलडोजर की कार्रवाई की है। यह मदरसा बनियाठेर के नरौली नगर पंचायत में 285 वर्ग मीटर जमीन पर कब्जा करके बनाया गया था।

मदरसे के अलावा खाद के गड्ढे और रास्ते की भूमि पर 8 से 10 मकान भी बने हुए हैं, जिन्हें खाली करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अवैध रूप से बने ये मकान भी गिराए जाएंगे।

कार्रवाई के दौरान चंदौसी उपजिलाधिकारी आशुतोष तिवारी, नायब तहसीलदार सतेंद्र चाहर और चंदौसी सीओ मनोज कुमार सिंह मौके पर मौजूद हैं। सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स को भी तैनात किया गया है।

उपजिलाधिकारी आशुतोष तिवारी ने बताया कि खाद के गड्ढे की जमीन पर बने मदरसे को हटाने के लिए यह कार्रवाई की गई है।

उप्र बजट : 12 लाख करोड़ से अधिक यूपी में आया निवेश

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15 लाख से अधिक लोगों को मिला रोजगार

लखनऊ, 12 फरवरी (हि. स.)। उत्तर प्रदेश विधानसभा बजट सत्र के चौथे दिन गुरुवार को प्रश्नकाल के दौरान समाजवादी पार्टी की सदस्य डॉ. रागिनी के सवाल पर औद्योगिक विकास मंत्री नंदगोपाल गुप्ता ‘नंदी’ ने जवाब दिया। सवाल करने वाली सदस्य ने सरकार के उत्तर से असहमति जताई तो संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने उत्तर दिया।

वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने बताया निवेश में तीन स्टेज होती है। पहली स्टेज एमओयू, फिर ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी और उसके बाद धरातल पर उतारने की बारी आती है। निवेश के लिए जो आता है वह हर प्रकार से तैयारी करता है। खोजबीन करता है। कानून व्यवस्था देखते हैं। कच्चे माल की उपलब्धता देखते हैं। फिर निवेश करते हैं।

संसदीय कार्य मंत्री ने सदन को अवगत कराया कि 12 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आ गया। चार लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव धरातल पर आ गए हैं। 15 लाख से अधिक कर्मकारों को रोजगार मिला है। रोजगार मिलने का प्रमाण है। कमर्चारी भविष्य निधि संगठन 2017 के पहले 21 लाख 24 हजार थी। आज 40 लाख 20 हजार हो गयी है।

राष्ट्रीय स्तर पर इंडस्ट्रियल ग्रोथ 11.9 है। यूपी की यही ग्रोथ 25 फीसदी है। यह सब आंकड़े कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की क्या स्थिति है। सदस्य के निजी क्षेत्र में दलितों, पिछड़ों को नौकरी मिलने के सवाल पर खन्ना ने कहा कि निजी उद्योग क्षेत्र में कंपनियां अपनी जरूरत के हिसाब से नौकरी देती हैं। यहां आरक्षण के तहत किसी को नौकरी पर नहीं रखा जाता लेकिन सरकार के यह आंकड़े कहते हैं कि निवेश आये हैं और लोगों को नौकरियां मिली हैं। उल्लेखनीय है कि कल 11 फरवरी काे राज्य का बजट पेश किया गया था।

उप्र विधानसभा में उठा किन्नर समुदाय का मुद्दा

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मंत्री असीम अरुण ने दिया जवाब

लखनऊ, 12 फरवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश विधानसभा में गुरुवार को किन्नर समुदाय का मुद्दा उठा। समाजवादी पार्टी के विधायक सचिन यादव ने कहा कि किन्नर समाज के लोगों को शिक्षा, राशनकार्ड, स्वास्थ्य, नौकरी जैसी सुविधाएं नहीं मिलती हैं। सरकार ने ट्रांसजेंडर कल्याण आयोग बनाया लेकिन उसका अध्यक्ष, सचिव, उपाध्यक्ष पुरुष हैं। ऐसे में उन्हें न्याय नहीं मिल सकता।

प्रश्नकाल के दौरान उठे सवाल के जवाब में सरकार का पक्ष रखते हुए समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण ने कहा कि लोकतंत्र के इस मंदिर में इस प्रकार का पहला सवाल है। किन्नर समाज के बारे में जैसा सदस्य कह रहे हैं, ऐसा नहीं है। सरकार ने बहुत कुछ किया है। आगे भी करने वाली है।

उन्होंने बताया कि 2014 में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ जजमेंट से इसकी यात्रा शुरू हुई। मंत्री ने सरकार का पक्ष रखते हुए बताया कि थानों में अलग से एक सेल बनाई गई है। किन्नर समुदाय के साथी आज स्कूलों में, विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं। बहुत से ऐसे हैं जो अपने पहनावे से अलग दिख जाते हैं लेकिन बहुत से अलग नहीं हो पाते। वे सब में शामिल हैं। उनकी पहचान नहीं हो पाती। पहचान हो पाए, इसके लिए सभी किन्नरों के लिए पहचान पत्र (ट्रांसजेंडर कार्ड) बनाये गए हैं और बनाये जा रहे हैं। स्वास्थ्य के लिए आयुष्मान कार्ड उनके लिए भी हैं। सरकार ट्रांसजेंडर महोत्सव का आयोजन करती है। उसमें समाज से जुड़े विषय पर चर्चा, परिचर्चा, फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है। उनके लिए मंच मुहैया कराया जाता है। इस समाज को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए सरकार कार्य कर रही है।

राहत कैंप से लौट रही बिजली टीम पर प्रधान ने छोड़ा जर्मन शेफर्ड, पांच कर्मचारी घायल

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बांदा, 12 फ़रवरी (हि.स.)। सरकारी काम में बाधा डालने और दबंगई का एक सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में सामने आया है। यहां विद्युत बिल राहत योजना के तहत कैंप लगाकर लौट रही टीम पर ग्राम प्रधान ने अपने समर्थकों के साथ जानलेवा हमला कर दिया। हद तो तब हो गई जब आरोपिताें ने बिजली कर्मियों पर अपना जर्मन शेफर्ड कुत्ता भी छोड़ दिया। मौके पर पुलिस के पहुंचने के बाद ही कर्मचारियों की जान बच सकी।

अवर अभियंता कमासिन के नेतृत्व में विद्युत विभाग की टीम ग्राम बंथरी के मजरा जमरेही नाथ में 11 फरवरी 2026 काे कैंप लगाया था। कैंप लगाकर ओटीएस पंजीकरण और राजस्व वसूली का कार्य कर रही थी। कार्य शांतिपूर्ण ढंग से निपटाकर जब टीम वापस लौट रही थी, तभी बाबूपुरवा मोड़ के पास ग्राम प्रधान बंथरी सोमनाथ शुक्ला ने चार पहिया वाहन से आकर टीम का रास्ता रोक लिया।

​आरोप है कि प्रधान और उसके समर्थकों ने टीम को घेरकर लाठी-डंडों से पीटना शुरू कर दिया। दहशत फैलाने के लिए आरोपिताें ने अपना पालतू जर्मन शेफर्ड कुत्ता भी कर्मचारियों पर छोड़ दिया। इस हिंसक हमले में 5 कर्मचारी बुरी तरह घायल हुए हैं। इनमें ​कल्लू (संविदा कर्मी),​ रामचरण, ​दिनेश,​मिठाई लाल और ​बच्छराज शामिल है।

इस संबंध में गुरुवार को बांदा के देहात काेतवाली के थानाध्यक्ष भास्कर मिश्रा ने बताया कि संविदा कर्मी कल्लू तहरीर पर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। इनमें सोमनाथ शुक्ला (ग्राम प्रधान),​ राम प्रकाश यादव,​ दयाराम यादव व एक अज्ञात व्यक्ति शामिल है। ​थाना प्रभारी का कहना है कि आरोपिताें की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है। वहीं, विद्युत विभाग ने दोषियों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की मांग की है ताकि कर्मचारी भविष्य में निडर होकर अपना काम कर सकें।

कब कटेगी सांसदों और विधायकों की सुविधाएं कब?

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(बोझ हमेशा बुज़ुर्गों और आम परिवारों पर ही क्यों? नेताओं पर कब?)

— डॉ. सत्यवान सौरभ

सरकार जब भी आर्थिक अनुशासन, बजट संतुलन या खर्च घटाने की बात करती है, तो सबसे पहले निशाने पर सामाजिक पेंशन योजनाएँ आ जाती हैं। विशेष रूप से बुढ़ापा पेंशन को लेकर बार-बार समीक्षा, कटौती और पात्रता की शर्तें सख्त करने की चर्चाएँ सामने आती रही हैं। हालिया बयानबाजी ने एक बार फिर यह मूल सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर आर्थिक सुधारों का भार हमेशा समाज के सबसे कमजोर वर्ग—बुज़ुर्गों, किसानों और मजदूर परिवारों—पर ही क्यों डाला जाता है?

बुढ़ापा पेंशन कोई सरकारी कृपा या रियायत नहीं है। यह उस सामाजिक अनुबंध का हिस्सा है, जिसमें राज्य यह स्वीकार करता है कि जिन नागरिकों ने अपनी पूरी उम्र देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में लगा दी, उन्हें बुढ़ापे में न्यूनतम सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए। खेतों में पसीना बहाने वाले किसान, ईंट-भट्टों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर, असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी—इनमें से अधिकांश के पास न तो कोई पेंशन फंड होता है और न ही स्थायी बचत। ऐसे में बुढ़ापा पेंशन उनके लिए दवा, राशन और रोज़मर्रा की ज़रूरतों का आधार बनती है।

इसके बावजूद जब भी सरकारी खजाने पर दबाव की बात आती है, तो सबसे आसान रास्ता बुज़ुर्गों की पेंशन पर कैंची चलाना मान लिया जाता है। कभी फसल का बहाना, कभी ज़मीन का रकबा, कभी पारिवारिक आय और कभी बैंक खाते की तकनीकी खामियाँ—इन सब कारणों से हजारों पात्र बुज़ुर्ग पेंशन से वंचित कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया प्रशासनिक कम और अमानवीय अधिक प्रतीत होती है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि फसल, ज़मीन और आमदनी की ये सख्त कसौटियाँ केवल आम नागरिकों पर ही क्यों लागू होती हैं? क्या यही मानक विधायकों और सांसदों की पेंशन पर भी लागू होते हैं? क्या कभी यह जाँच की जाती है कि जनप्रतिनिधियों की वास्तविक आर्थिक स्थिति क्या है और उन्हें पेंशन की आवश्यकता है भी या नहीं?

वास्तविकता यह है कि जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली पेंशन और सुविधाएं उस वर्ग को प्राप्त होती हैं जो पहले से आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत सुरक्षित है। कई विधायक और सांसद एक से अधिक बार निर्वाचित होने के बाद कई-कई पेंशन के हकदार बन जाते हैं। इसके अलावा उन्हें वेतन, भत्ते, सरकारी आवास, वाहन, सुरक्षा और अन्य विशेष सुविधाएँ भी मिलती हैं। इसके बावजूद इन पेंशनों पर न तो कोई स्पष्ट सीमा तय है और न ही इस पर गंभीर सार्वजनिक बहस होती है।

यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के भी खिलाफ है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत समानता है—नीति और कानून सबके लिए समान होने चाहिए। यदि आम नागरिक से उसकी मामूली आय का हिसाब माँगा जा सकता है, तो जनप्रतिनिधियों से क्यों नहीं? यदि बुज़ुर्ग किसान की दो बीघा ज़मीन के आधार पर उसकी पेंशन रोकी जा सकती है, तो करोड़ों की संपत्ति वाले नेताओं की पेंशन पर सवाल क्यों नहीं उठते?

सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि सामाजिक योजनाओं में अपात्र लोग शामिल हो जाते हैं, इसलिए सख्ती आवश्यक है। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि जरूरतमंदों को ही व्यवस्था से बाहर कर दिया जाए। अपात्रता की आड़ में पात्र लोगों को दंडित करना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

यदि सरकार वास्तव में पेंशन व्यवस्था को पारदर्शी और टिकाऊ बनाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले उन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए जहाँ खर्च और सुविधाएं सबसे अधिक हैं। विधायकों और सांसदों की पेंशन पर स्पष्ट सीमा तय करना, बार-बार चुनाव जीतने पर अलग-अलग पेंशन देने की व्यवस्था समाप्त करना और एक समान पेंशन नीति लागू करना इस दिशा में एक ठोस कदम हो सकता है।

यह भी समझना ज़रूरी है कि सामाजिक पेंशन पर किया गया खर्च कोई बोझ नहीं, बल्कि निवेश है। बुज़ुर्गों के हाथ में थोड़ी-सी आर्थिक सुरक्षा न केवल उन्हें सम्मानजनक जीवन देती है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देती है। यह राशि सीधे बाज़ार में जाती है—दवा की दुकानों, किराना स्टोरों और स्थानीय सेवाओं में खर्च होती है। इसके विपरीत, पेंशन बंद होने का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव कहीं अधिक नकारात्मक होता है।

लोकतंत्र में नीतियों का उद्देश्य कमजोर को मजबूत बनाना होना चाहिए, न कि मजबूर को और कमजोर करना। जब बुज़ुर्गों से उनकी आखिरी आर्थिक सहायता भी छीन ली जाती है, तो यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि एक गंभीर नैतिक प्रश्न बन जाता है। क्या एक सभ्य समाज अपने बुज़ुर्गों को इस तरह असहाय छोड़ सकता है?

अंततः सवाल केवल पेंशन का नहीं, बल्कि नीति की प्राथमिकताओं का है। क्या सरकार का ध्यान सबसे कमजोर नागरिकों पर है या सबसे सुविधासंपन्न वर्ग पर? जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं दिया जाएगा, तब तक पेंशन पर कटौती का मुद्दा एक आर्थिक बहस से अधिक, सामाजिक अन्याय का प्रतीक बना रहेगा।

इतिहास में 13 फरवरी :इंकलाब की आवाज -फैज अहमद फैज का जन्म हुआ

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13 फरवरी इतिहास की एक अहम तारीख है, क्योंकि इसी दिन उर्दू के महान शायर फैज अहमद फैज का जन्म हुआ था। फैज सिर्फ मोहब्बत के शायर नहीं थे, बल्कि उनकी शायरी में सामाजिक न्याय, प्रतिरोध और इंकलाब की गूंज भी सुनाई देती थी। उनकी नज़्मों ने आम लोगों को आवाज दी और सत्ता से सवाल करने का हौसला भी।

इंकलाबी तेवर ही वजह बने कि पाकिस्तान के तत्कालीन शासक जियाउल हक के दौर में उनकी शायरी पर पाबंदियां लगाई गईं। मगर कला और विचारों को रोक पाना आसान नहीं होता। मशहूर गायिका इकबाल बानो ने जब फैज की नज़्म “हम भी देखेंगे” गाई, तो वह सिर्फ एक गीत नहीं रहा, बल्कि विरोध और अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतीक बन गया।

फैज आज भी हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों में बराबर पढ़े और सराहे जाते हैं—एक ऐसे शायर के रूप में, जिसने प्यार और इंकलाब को एक ही कलम से लिखा।

महत्वपूर्ण घटनाचक्र

1542 – इंग्लैंड की रानी कैथरीन हवाई को मौत के घाट उतार दिया गया।

1575 – फ्रांस के राजा हेनरी तृतीय का रेम्स में राज्याभिषेक।

1601 – लंदन में ईस्ट इंडिया कम्पनी की पहली यात्रा का नेतृत्व जान लैंकास्टर ने किया।

1633 – इटली के खगोलशास्त्री गैलीलियो को रोम पहुंचने पर गिरफ्तार कर लिया गया।

1633 – वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीलि अपने मुकदमे के लिए रोम आए।

1688 – स्पेन ने पुर्तग़ाल को एक अलग राष्ट्र स्वीकार किया।

1689 – विलियम और मैरी इंग्लैंड के संयुक्त शासक घोषित हुए।

1693 – अमेरिका के वर्जीनिया में विलियम एंड मैरी कॉलेज खुला।

1713 – दिल्ली के सुल्तान जहाँदारशाह की हत्या गला घोंट कर की गई।

1739 – करनाल के युद्ध में नादिरशाह की फौज ने मुगल शासक मुहम्मद शाह की सेना को हराया।

1788 – भारत में ज्यादतियों के लिए वारेन हेस्टिंग्स पर इंग्लैंड में मुकदमा चलाया गया।

1795 – अमेरिका में पहला स्टेट यूनिवर्सिटी उत्तरी कैरोलिना में खुला।

1820 – फ़्रांसीसी तख्त के दावेदार डक की बेरी की हत्या कर दी गई।

1856 – ईस्ट इंडिया कम्पनी का लखनऊ सहित अवध पर भी कब्ज़ा।

1861 – नेपल्स के फ़्रांसीसी द्वितीय ने ग्यूसेपी गैरिबाल्डी के आगे हथियार डाले।

1880 – थॉमस एडिसन ने एडिसन इफैक्ट पुष्ट किया।

1920 – अमेरिका में बेसबॉल की नीग्रो नेशनल लीग स्थापित हुई।

1931 – नई दिल्ली भारत की राजधानी घोषित हुई।

1941 – जर्मनी में नाजियों ने डच यहूदी परिषद पर हमला किया।

1945 – सोवियत संघ ने जर्मनी के साथ 49 दिन तक चले युद्ध के बाद हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट पर कब्जा किया, जिसमें एक लाख 59 हजार लोग मारे गये।

1959 – बच्चों की पसंदीदा बार्बी डॉल की बिक्री शुरू हुई।

1961 – द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों ने बुडापोस्ट पर कब्जा किया।

1961 – सुरक्षा परिषद ने कांगों में गृहयुद्ध रोकने के लिए बल प्रयोग की स्वीकृति दी।

1966 – सोवियत संघ ने पूर्वी कजाखस्तान में परमाणु परीक्षण किया।

1974 – असंतुष्ट नोबेल विजेता अलेक्जेंडर सोलजेनिट्सिन को सोवियत संघ से निकाला गया।

1975 – तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी भाग में अलग प्रशासन की स्थापना की।

1984 – पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नौसेना के लिए मुंबई स्थित मझगांव डॉक का शुभारंभ किया।

1988 – बांग्लादेश में राष्ट्रपति हुसैन मुहम्मद इरशाद को हटाने के लिए विपक्षी आंदोलनकारियों की मुहिम में सैकड़ों लोग घायल हुए।

1989 – सोवियत सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से हटने शुरू हुए।

1990 – अमेरिका, ब्रिटेन तथा फ्रांस ने जर्मनी को फिर से एकीकृत करने की सहमति दी।

1991 – अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने बगदाद में अनेक बंकर नष्ट किए, जिसमें सैकड़ों सैनिक मारे गए।

2000 – बहुचर्चित पीनट्स कॉमिक पट्टी के सर्जक चार्ल्स शुल्ज का निधन।

2001 – अंतरिक्ष में क्षुद्रग्रह ‘इरोस’ पर पहला मानव रहित यान उतरा।

2001 – मध्य अमेरिकी देश अल सल्वाडोर में 6.6 तीव्रता वाले भूकंप से कम से कम 400 लोगों की मौत हुई।

2002 – पर्ल अपहरण काण्ड का मुख्य अभियुक्त उमर शेख़ लाहौर में गिरफ़्तार, ईरान में हुई विमान दुर्घटना में 117 मरे।

2003 – यश चोपड़ा को दादा साहब फालके पुरस्कार मिला।

2004 – भारतीय टीम ने क्वालालम्पुर में दसवीं एशियाई निशानेबाजी चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।

2005 – इराक में सद्दाम हुसैन के बाद हुए पहले चुनाव में शिया इस्लामिक मोर्चे की जीत।

2007 – उत्तर कोरिया परमाणु कार्यक्रम बंद करने पर सहमत।

2008 – पाकिस्तान न कम दूरी की मारक क्षमता वाली मिसाइल ग़ज़नवी का सफल परीक्षण किया।

2009 – रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव में 2009-10 के अंतरिम रेल बजट पेश किया।

2009 – उत्तर प्रदेश विधान सभा ने वित्तीय वर्ष 2009-10 के लिए 12,094 करोड़ रुपये के घाटे का बजट पेश किया।

2010 – महाराष्ट्र के पुणे में यहूदियों के प्रार्थना स्थल के नजदीक बेकरी में शाम को हुए बम विस्फोट में 5 महिलाओं और एक विदेशी नागरिक सहित नौ लोग मारे गए और 53 अन्य घायल हो गए।

2014 – चीन के कैली शहर में एक अवैध जुआ घर में विस्फोट में 14 लोगों की मौत हो गयी तथा 17 लोग घायल हो गये।

जन्म

1879 – सरोजिनी नायडू (भारत कोकिला) – स्वतंत्रता सेनानी (मृत्यु- 1949)

1911 – फैज अहमद फैज – प्रसिद्ध शायर, जिनको अपनी क्रांतिकारी रचनाओं में रसिक भाव (इंकलाबी और रूमानी) के मेल की वजह से जाना जाता है।

1915 – गोपाल प्रसाद व्यास – भारत के प्रसिद्ध कवियों, लेखकों और साहित्यकारों में से एक।

1916 – जगजीत सिंह अरोड़ा भारतीय सेना के कमांडर

1944 – ओडूविल उन्नीकृष्णनन – भारतीय अभिनेता (मृत्यु- 2006)

1945 – विनोद मेहरा – भारतीय सिनेमा के अभिनेता।

1958 – रश्मि प्रभा – समकालीन कवयित्री

1959 – कमलेश भट्ट कमल – समकालीन कवि

1995 – वरुण भाटी – भारत के ऊंची कूद के खिलाड़ी हैं।

निधन

1832 – बुधु भगत – प्रसिद्ध क्रांतिकारी तथा ‘लरका विद्रोह’ के आरम्भकर्ता।

1918 – सर सुंदर लाल – प्रसिद्ध विधिवेत्ता और सार्वजनिक कार्यकर्ता थे।

1964 – असित कुमार हाल्दार – कल्पनाशील, भाव-प्रवण आधुनिक चित्रकार थे।

1974 – उस्ताद अमीर ख़ाँ – भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध गायक (जन्म- 1912)

2008 – राजेंद्र नाथ – हिंदी सिनेमा के हास्य कलाकार थे।

2012 – अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान ‘शहरयार’ – उर्दू के मशहूर शायर थे।

2015 – डॉ. तुलसीराम – दलित लेखन में अपना एक अलग स्थान रखने वाले साहित्यकार थे।

2016 – ओ. एन. वी. कुरुप – प्रसिद्ध मलयाली कवि और गीतकार थे।

2020 – राजेन्द्र कुमार पचौरी – अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित प्रसिद्ध पर्यावरणविद थे।

2024 – दत्ताजी राव गायकवाड़ – भारतीय क्रिकेटर थे।

महत्वपूर्ण दिवस

-विश्व रेडियो दिवस।

-उत्पादकता सप्ताह।

मन की बात ने बढ़ाया रेडियो का मान सम्मान

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                                             बाल मुकुन्द ओझा

विश्व रेडियो दिवस प्रतिवर्ष 13 फरवरी को मनाया जाता है। कोई माने या न माने मगर यह बिलकुल सच है की भारत में अपनी पहचान खोते जा रहे रेडियो को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक कार्यक्रम ने पुनर्जीवित कर नया जीवनदान दिया है। मोदी के लोकप्रिय शो ’मन की बात’ ने रेडियो की लोकप्रियता बढ़ा दी है। एक वक्त था जब रेडियो पर  यह आकाशवाणी है, ये शब्द सुनते ही बच्चे से बुजुर्ग तक रेडियो को घेर कर खड़े हो जाते थे। यह हर कोई जानता है  रेडियो जनसंचार का  एक सशक्त माध्यम है, जिसके जरिए गावं गुवाड़ के लाखों करोड़ों लोगों तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। भारत में अपनी पहचान खोते जा रहे रेडियो को अपने नवाचार कार्यक्रम के माध्यम से नयी पहचान और जीवनदान देने का श्रेय निश्चित रूप से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जाता है। आठवें दशक तक या यूँ कहे दूरदर्शन के आगमन तक रेडियो ही शिक्षा, संचार और मनोरंजन के क्षेत्र की सिरमौर था । उस दौरान घर घर में ही नहीं अपितु हर हाथ में रेडियो था और लोग इससे चिपके रहते थे। हर प्रकार की सूचना का संवाहक था रेडियो। 1980 के बाद संचार के आधुनिक साधनों के प्रादुर्भाव के साथ रेडियो  का प्रभाव घटता गया। लोगों ने रेडियो के स्थान पर टीवी को अपनाना शुरू कर दिया। इसी बीच 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मन की बात नामक एक क्रान्तिकारी कार्यक्रम शुरू हुआ। इसी नवाचार के साथ रेडियो का एक तरह से पुनर्जन्म हुआ।

दूरदर्शन के प्रादुर्भाव से पूर्व यानि अस्सी के दशक तक रेडियो पर सुनाई देने वाली यह आवाज संचार के आधुनिक साधनों के बीच गायब सी हो गई थी। पहले भारतीय प्रसारण सेवा फिर आल इंडिया रेडियो और इसके बाद आकाशवाणी के रूप में रेडियो अस्तित्व में रहा। दूरदर्शन के बढ़ते प्रभाव ने इसकी उपयोगिता पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया, रही सही कसर निजी चैनलों और मोबाइल ने पूरी करदी।  मगर हाल के वर्षों में जहां लोगों में रेडियो की चाह बढ़ी है, वहीं इसकी बिक्री भी तेज हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक कार्यक्रम ने रेडियो की लोकप्रियता बढ़ा दी है। कह सकते है इसे नया जीवन मिला है। यह सच है कि  रेडियो  की साख कमजोर हुई है मगर आज भी यह अब भी देश में सबसे ज्यादा एरिया कवर करता है। ऑल इंडिया रेडियो की पहुंच देश की 99.20 प्रतिशत आबादी तक है। देश के 92.6 प्रतिशत भूभाग को यह कवर करता है।

ऑल इंडिया रेडियो भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन संचालित सार्वजनिक क्षेत्र की रेडियो प्रसारण सेवा है। इस सेवा का नाम भारतीय प्रसारण सेवा रखा गया था। देश में रेडियो प्रसारण की शुरुआत मुंबई और कोलकाता में सन 1927 में दो निजी ट्रांसमीटरों से की गई। 1930 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ। 1957 में इसका नाम बदल कर आकाशवाणी रखा गया। सरकारी प्रसारण संस्थाओं को स्वायत्तता देने के इरादे से 23 नवंबर 1997 को प्रसार भारती का गठन किया गया, जो देश की एक सार्वजनिक प्रसारण संस्था है और इसमें मुख्य रूप से दूरदर्शन और आकाशवाणी को शामिल किया गया है।

आकाशवाणी या रेडियो को हिंदी भाषा को जन जन तक पहुँचाने का श्रेय दिया जा सकता है। आजादी से पूर्व आकाशवाणी अनेकता में एकता का सशक्त माध्यम थी। एक दूसरे के पास इसी माध्यम से सारी जानकारी पहुँचती थी। आजादी के बाद प्रगति और विकास का एक मात्र सजीव माध्यम बना आकाशवाणी। बड़े बड़े नेता और महत्वपूर्ण व्यक्ति अपनी बात आकाशवाणी के माध्यम से देशवासियों के समक्ष रखते थे। प्रसारण का एक मात्र साधन होने से देश में इसकी महत्ता और स्वीकार्यता थी। मगर धीरे धीरे निजी क्षेत्र में प्रसारण माध्यम शुरू हुए। निजी चैनलों से चौबीसों घंटे समाचार और मनोरंजन की सामग्री प्रसारित होने लगी फलस्वरूप लोगों ने आकाशवाणी से मुंह मोड़ लिया। इससे आकाशवाणी बहुत थोड़े क्षेत्रों में सिमट कर रह गयी। मगर जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और उन्होंने इसकी सुध बुध ली तब से इसका महत्त्व एक बार फिर बढ़ा। विशेष रूप से प्रधानमंत्री का मन की बात कार्यक्रम प्रसारित होना शुरू हुआ तब से एक बार फिर आकाशवाणी लोगों के सिर चढ़ गयी। रेडियो अब फिर से आमजन व घरों तक पहुंचने लगा है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर