सड़क हादसे में पिता-पुत्र समेत तीन की मौत,दो घायल

रायबरेली, 18 फरवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में बुधवार को सड़क हादसे में कार सवार पिता-पुत्र समेत तीन लाेगाें की मौत हो गई है। पुलिस ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा है। घायलों का जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है।

डीह थाना प्रभारी जितेंद्र मोहन ने बताया कि गोपालपुर बिजली पावर हाउस के पास एक अनियंत्रित कार पेड़ से टकराकर पलट गई। हादसे में कार सवार तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो युवक घायल हो गए हैं। मृतकों की पहचान बुलंदशहर निवासी मुकेश (40), उनका पुत्र कुणाल (20) और कुणाल के मामा अलीगढ़ निवासी रामू (20) के रूप में हुई है। घायल प्रतापगढ़ निवासी चंदर मिश्रा और अभिषेक सिंह का इलाज जिला अस्पताल में चल रहा है।

थाना प्रभारी जितेंद्र मोहन ने बताया कि कार सवार लाेग रायबरेली रेलवे स्टेशन से अपने तीन रिश्तेदारों को लेकर वापस प्रतापगढ़ के सांगीपुर जा रहे थे। कार की तेज रफ्तार और संभवतः नींद या नियंत्रण खोने के कारण यह दुर्घटना हुई। शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजकर मामले की जांच की जा रही है।

उप्र : 2027 में बसपा अकेले दम पर लड़ेगी चुनाव : मायावती

लखनऊ, 18 फरवरी (हि.स.)। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने बुधवार को कहा है कि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी। वह किसी भी दल से गठबंधन नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि गठबंधन से बसपा से नुकसान होता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे भ्रामक खबरों पर ध्यान न देकर पार्टी को मजबूत करने में अपना सहयोग दें।

बसपा प्रमुख मायावती ने एक पत्रकारवार्ता में कहा है कि मीडिया में चर्चा है कि आगामी 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बसपा गठबंधन में लडेंगी। उन्होंने कहा कि यह विशुद्ध रूप से पार्टी कार्यकर्तओं और लोगों को गुमराह करने के लिए फेक न्यूज चलवाई गई हैंं। यह बिल्कुल गलत, झूठ और मनगढ़ंत खबर है। ऐसे में नेताओं के साथ-साथ मीडिया को भी इस प्रकार की कटी पतंग जैसी उड़ान भरके अपना मजाक खुद उड़ाने से बचना चाहिए।

मायावती ने कहा कि वह एक बार नहीं बल्कि हर बार पार्टी की बैठक में यहां तक बीते नौ अक्टूबर को लखनऊ में आयोजित विशाल रैली में भी इसकी खुली घोषणा की थी कि बसपा अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी। लेकिन कुछ लोग और मीडिया भी इनकी घिनौनी साजिश में पड़कर इस प्रकार की गलत खबर प्रचारित करके अपना समय और छवि दोनों बर्बाद कर रहे हैं। इस पर लोगों को बिल्कुल ध्यान देने की जरूरत नहीं है।

मायावती ने कहा कि बसपा के लोग अपने 2027 के मिशन में अकेले पूरे जी-जान से लगे हुए हैं। जिस पर से उन लोगों को ध्यान भटकाने के लिए इस प्रकार की साजिश करते रहते हैं। पार्टी पदाधिकारियों से अपील है कि ऐसी मनगढ़ंत बातों पर कतई ध्यान न दें और वे हाथी के मस्त चाल चलते रहे और 2007 की तरह अकेले ही यह चुनाव लड़कर फिर से बसपा की, पूर्ण बहुमत की अपनी सरकार बनाए।

बसपा प्रमुख ने दिल्ली में आवंटित टाइप-8 सरकारी बंगले को लेकर हो रही चर्चाओं पर अपनी बात रखते हुए कहा कि उन्हें सुरक्षा कारणों और प्रोटोकॉल के तहत यह सरकारी बंगला आवंटित हुआ है। इसको लेकर किसी भी तरह की भ्रामक जानकारी फैलाना गलत है।

बसपा प्रमुख ने कहा कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आयेगा तो विरोधियों के साम, दाम, दण्ड, भेद आदि के हथकंडे और बसपा को सत्ता से दूर रखने के षड्यंत्र बढ़ते ही जायेंगे, जैसा कि हमेशा से होता रहा है।

इसलिए केवल यूपी ही नहीं बल्कि पूरे देश भर में सभी अम्बेडकरवादियों को विरोधियों के दांत खट्टे कर देने वाली केवल एकमात्र अपनी पार्टी व उसके नेतृत्तव पर भरोसा करके बाबा साहेब के आत्मसम्मान व स्वाभिमान के मूवमेंट को मजबूती प्रदान करने के लिए मिशनरी भावना के साथ इन्हें पूरे तन, मन, धन से लगे रहना बहुत जरूरी है।—————

सूरजपुर में सिगड़ी के धुएं से  दंपति और मासूम सहित तीन की मौत

0

नींद में ही थम गई सांसें

सूरजपुर, 18 फ़रवरी (हि.स.)। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में ठंड से बचने की कोशिश में जलाई गई कोयले की सिगड़ी ने एक ही परिवार के तीन जिंदगियां छीन लीं। पति, पत्नी और उनकी तीन वर्षीय बच्ची की दम घुटने से मौत हो गई।

कोतवाली थाना क्षेत्र अंतर्गत चंद्रपुर गांव में यह दर्दनाक हादसा सामने आया। जानकारी के अनुसार, कवल अपनी पत्नी कुन्ती और तीन वर्षीय बेटी ममता के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने एक कमरे में बीते रात सो रहे थे। परिवार के अन्य सदस्य घर के दूसरे हिस्से में थे। ठंड से राहत पाने के लिए कमरे के भीतर कोयले की सिगड़ी जलाई गई थी।

रात बीती, लेकिन सुबह दरवाजा नहीं खुला। परिजनों को शंका हुई तो दरवाजा तोड़ा गया। भीतर का दृश्य देख सभी सन्न रह गए तीनों अचेत अवस्था में पड़े थे। तत्काल उन्हें जगाने की कोशिश की गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

प्राथमिक आशंका है कि बंद कमरे में कोयला जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड गैस भर गई। कमरे में न तो खिड़की थी, न रौशनदान नतीजतन जहरीली गैस बाहर नहीं निकल सकी। नींद में ही तीनों की सांसें थम गईं। विशेषज्ञों के मुताबिक, कार्बन मोनोऑक्साइड रंगहीन और गंधहीन होती है, जिससे खतरे का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।

घटना की सूचना मिलते ही कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची। शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। पुलिस टीम घटनास्थल का परीक्षण कर पूरे मामले की जांच कर रही है।

प्रशासन की चेतावनी

प्रशासन ने नागरिकों से अपील की है कि बंद कमरों में सिगड़ी, अंगीठी या कोयले का प्रयोग न करें। पर्याप्त वेंटिलेशन के बिना ऐसा करना जानलेवा साबित हो सकता है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

यह हादसा न केवल एक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है, बल्कि ठंड के मौसम में सावधानी बरतने की गंभीर चेतावनी भी है। थोड़ी सी लापरवाही जिंदगी की आखिरी रात साबित हो सकती है।

शिवाजी ने‌ मुगल और बीजापुर सल्तनत की नींव को खोखला कर दिया था

शिवाजी महाराज की जयंती (19 फरवरी) पर विशेष -डॉ. लोकेश‌ कुमार

छत्रपति शिवाजी महाराज एक साहसी, कुशल रणनीतिकार और दूरदर्शी शासक के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने मराठा पहचान दी। वे मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे, जिन्होंने मुगलों और बीजापुर सल्तनत की नींव को खोखला कर दिया। उन्होंने गोरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) नीति का उपयोग कर मराठा साम्राज्य की स्थापना की। माना‌ जाता है‌‌ कि‌ गोरिल्ला युद्ध महाराणा प्रताप की खोज थी, उन्होंने मुगल शासक अकबर के खिलाफ छापामार युद्ध अपना कर उनको घुटनों के बल ला दिया था।‌

शिवाजी को उनकी मां जीजाबाई ने न्याय, धर्म और रामायण-महाभारत की कहानियां सुनाकर एक धर्मपरायण योद्धा के‌ रुप में तैयार किया था। समर्थ गुरु रामदास और दादाजी कोणदेव ने भी उनके व्यक्तित्व को निखारने में हरसम्भव कोशिश की। 16 साल की आयु में उन्होंने बीजापुर सल्तनत के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाकर तोरण दुर्ग पर अधिकार जमा लिया। सन 1659 में बीजापुर के सेनापति अफजल खान को कूटनीति से मार गिराया, जो उनकी पहली बड़ी सैन्य सफलता मानी गई। उनका जन्म 19 फरवरी, 1630 को हुआ था। इस कारण उनकी जयंती 19 फरवरी को मनाई जाती है।

उन्होंने गुरिल्ला युद्ध, मजबूत नौसेना और कुशल प्रशासन के साथ तोरना, प्रतापगढ़ और रायगढ़ जैसे किले जीतकर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की‌ थी। 1674 में रायगढ़ में छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक के बाद धर्म, न्याय और प्रगतिशील शासन के प्रतीक बन गए, जिन्होंने भारत के इतिहास में वीरता और स्वतंत्रता की मिसाल कायम की। वे एक उत्कृष्ट प्रशासक थे। एक सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखीं। शिवाजी का मराठा साम्राज्य महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु तक फैला हुआ था। प्रशासन को सुदृढ़ करने के लिए, शिवाजी ने जागीर प्रथा को समाप्त कर दिया और अपने अधिकारियों को नकद वेतन देना प्रारंभ किया। जागीरदारी व्यवस्था समाप्त करने के बावजूद उन्होंने विद्यालयों और मंदिरों के लिए भूमि अनुदान देना प्रारंभ किया। उनका प्रशासन एक केंद्रीकृत, सुव्यवस्थित और जनकल्याणकारी माना जाता है, जिसका मुख्य केंद्र ‘अष्टप्रधान’ (आठ मंत्री) नामक मंत्रिपरिषद थी। उनके शासन की मुख्य विशेषताओं में मलिक अंबर पर आधारित भू-राजस्व प्रणाली (33-40 प्रतिशत कर), चौथ (1/4 रक्षा कर) और सरदेशमुखी (1/10 कर) वसूली, अनुशासित स्थायी सेना, किलों का विशेष महत्व, नागरिक अधिकारियों की सर्वोच्चता और धार्मिक सहिष्णुता का गुण शामिल था।

छत्रपति के प्रशासन की विशेषताएं

शिवाजी का शासन केन्द्रीयकृत शासन था। उनके पास ही सारी शक्तियाँ निहित थी। उन पर किसी प्रकार का प्रतिबंध अथवा नियंत्रण नहीं था। उनके आदेशों का पालन सभी को करना पड़ता था। उनके पास पदाधिकारियों की नियुक्ति एवं पदच्युति करने का पूर्ण अधिकार था। व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखें तो पता चलता है कि अपनी समकालीन तानाशाहों से बिल्कुल भिन्न थे। उन्होंने कभी भी अपने स्वार्थ के लिए आम जनता की उपेक्षा नहीं की और न जनता के अधिकारों का हनन किया। कभी भी सत्ता का दुरूपयोग नहीं किया। हरसंभव तरीके से जनता की उत्थान की चेष्टा की। प्रजा के लिए कत्याण किया और प्रजाहित, प्रजा‌ सुरक्षा, न्याय, नैतिकता और धर्म के लिए उदार भावना थी। प्रशासनिक कार्यों में सलाह के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद का गठन किया, जिसमें पेशवा (प्रधानमंत्री) सर्वोच्च माना जाता था। अन्य मंत्री अमात्य, वकनीस, सचिव, सुमंत, सेनापति, पंडितराव और न्यायाधीश थे।

आमात्यः- शिवाजी के अष्टप्रधान में दूसरा मंत्री आमात्य कहलाता था। आमात्य अर्थ विभाग का प्रधान होता था इसे मजूमदार भी कहा जाता था इसका कार्य राज्य के आय-व्यय का ब्योरा और विभिन्न प्रांतों के हिसाब-किताब की जांच पड़ताल करना था।

पैदल सेनाः- पैदल सैनिकों में नवपायिकों की सबसे छोटी इकाई होती थी इसका मुख्य नायक कहलाता था। इसका वेतन साधारण होता था पांच नायकों पर एक हवलदार होता था। दो या तीन हवलदार पर एक जुमलदार होता था।

जल सेनाः- शिवाजी ने अपने राज्य की रक्षा एवं जंजीरा के विरुद्ध युद्ध करने के लिए एक जल सेना का भी गठन किया था। शिवाजी के पास 400 जहाज थे, इनमें पांच प्रकार के युद्धपोत और कुछ बड़ी-बड़ी नावें भी थीं।

अंगरक्षक की सेनाः उनके पास दो हजार चुने हुए अंगरक्षक थे, जो बड़े साहसी एवं वीर होते थे। अंगरक्षक की सेना पर पूरा व्यय राज्य वहन करता था।

भू-राजस्व और कृषक कल्याणः-भूमि की पैमाइश (माप) के लिए ‘काठी’ का उपयोग किया जाता था। उपज का 33 प्रतिशत (बाद में 40 प्रतिशत ) कर लिया जाता था। अकाल के समय किसानों को बीज और पशु खरीदने के लिए ‘तकावी’ (ऋण) देने की व्यवस्था कर रखी थी।

सैन्य व्यवस्थाः- उन्होंने एक मजबूत, अनुशासित और स्थायी सेना बनाई। सैनिकों को जागीर के बदले नकद वेतन देना प्रारंभ किया। सेना में ‘पागा’ (नियमित) और ‘सिलहदार’ (अस्थायी) दो प्रकार के घुड़सवार थे। शिवाजी ने किलों को सामरिक महत्व का केंद्र मानते हुए प्रत्येक किले में हवलदार, सबनीस और कारखानिस नामक तीन समान रैंक के अधिकारी बनाए, ताकि एक व्यक्ति निरंकुश नहीं हो सकें। प्रशासन का केंद्र बिंदु स्वयं शिवाजी थे। वे सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु भी थे और उनकी सेना व प्रशासन में मुस्लिम अधिकारी भी महत्वपूर्ण पदों आसीन थे। न्याय व्यवस्था सरल थी, जिसमें ग्राम पंचायतें स्थानीय विवादों का निपटारा करती थीं और उच्च स्तर पर न्यायधीश व पंडितराव न्याय करते थे।

सैनिक अनुशासनः – शिवाजी के शासनकाल में मराठा सैनिक को एकत्रित करते हुए राष्ट्रीय सेना की स्थापना की थी, सैनिक राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत थे। वे अपने देश की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। बहरहाल, हम यही कह सकते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज दूरदर्शी थे। शक्तिशाली होने के साथ उन्होंने जनकल्याण के कार्य किए। उनका विचार अंतिम व्यक्ति के कल्याण पर टिका था।

(लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

मीठे पानी का संकट: कमी नहीं, कुप्रबंधन

0

(दुनिया आज मीठे जल की उपलब्धता और पहुँच—दोनों से जूझ रही है। मीठे जल की कमी से अधिक, उसकी पहुँच क्यों आज वैश्विक संकट है?)

डॉ. प्रियंका सौरभ

वैश्विक मीठे जल संकट: उपलब्धता और पहुँच की दोहरी चुनौती

आज विश्व जिस सबसे गंभीर संसाधन संकट का सामना कर रहा है, उनमें मीठे जल का संकट अत्यंत गहन और बहुआयामी है। पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का लगभग 97 प्रतिशत खारा है और केवल लगभग 3 प्रतिशत मीठा जल है, जिसमें से भी बहुत छोटा भाग ही मानव उपयोग के लिए सुलभ है। इसके बावजूद, आज विश्व की 2–3 अरब आबादी वर्ष के किसी न किसी समय जल संकट से जूझती है। यह संकट केवल जल की भौतिक कमी का नहीं, बल्कि जल की घटती उपलब्धता और समान व सुरक्षित पहुँच—दोनों का संयुक्त संकट है, जो पर्यावरणीय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आयामों को एक साथ प्रभावित करता है।

पिछले कुछ दशकों में मीठे जल की उपलब्धता में निरंतर गिरावट देखी गई है। इसका एक प्रमुख कारण भूजल का अत्यधिक दोहन है। कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग की बढ़ती माँग ने जलभृतों पर असहनीय दबाव डाला है। हरित क्रांति के बाद सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और बोरवेल पर बढ़ती निर्भरता ने प्राकृतिक पुनर्भरण की क्षमता को पीछे छोड़ दिया है। भारत, चीन और अमेरिका जैसे देशों में भूजल स्तर का तीव्र पतन भविष्य की जल सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी है। कई क्षेत्रों में जलभृत स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए जल उपलब्धता और भी अनिश्चित हो गई है।

जल स्रोतों का प्रदूषण मीठे जल संकट का दूसरा बड़ा कारण है। नदियों, झीलों और भूजल में बिना शोधन के छोड़ा गया घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, भारी धातुएँ और कृषि रसायन जल को अनुपयोगी बना रहे हैं। विकासशील देशों में यह समस्या और भी गंभीर है, जहाँ शोधन अवसंरचना का अभाव है। परिणामस्वरूप, कई स्थानों पर जल उपलब्ध होते हुए भी पीने योग्य नहीं रह जाता, जिससे स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है और जल की प्रभावी उपलब्धता घट जाती है।

जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमनदों का तीव्र पिघलना, वर्षा के पैटर्न में अनिश्चितता और सूखे-बाढ़ की बढ़ती आवृत्ति देखी जा रही है। हिमालय, आल्प्स और एंडीज़ जैसे क्षेत्रों में हिमनदों का सिकुड़ना दीर्घकाल में नदियों के प्रवाह को अस्थिर कर रहा है। अल्पकाल में यह बाढ़ का कारण बनता है, जबकि दीर्घकाल में स्थायी जल संकट को जन्म देता है। मानसूनी क्षेत्रों में अनियमित वर्षा ने जल भंडारण और कृषि योजना को भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

इसके साथ ही, आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक पुनर्भरण क्षेत्रों का तेजी से क्षरण हुआ है। शहरीकरण, अवैज्ञानिक भूमि उपयोग और रियल एस्टेट विकास ने झीलों, तालाबों, बाढ़ मैदानों और दलदलों को नष्ट कर दिया है। ये पारिस्थितिक तंत्र न केवल जल संग्रह और भूजल पुनर्भरण में सहायक होते हैं, बल्कि बाढ़ और सूखे के प्रभावों को भी संतुलित करते हैं। इनके विनाश से जल चक्र का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है।

जनसंख्या वृद्धि और उपभोग के बदलते पैटर्न ने भी मीठे जल पर दबाव बढ़ाया है। शहरी जीवनशैली, जल-गहन उद्योग और भोजन की बदलती आदतें—विशेषकर मांसाहारी आहार—ने प्रति व्यक्ति जल पदचिह्न को बढ़ाया है। परिणामस्वरूप, जल की माँग प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से कहीं अधिक हो गई है।

जहाँ एक ओर जल की उपलब्धता घट रही है, वहीं दूसरी ओर कई क्षेत्रों में जल उपलब्ध होते हुए भी लोगों की पहुँच उससे वंचित है। इसका प्रमुख कारण अपर्याप्त अवसंरचना है। कई देशों में जल संग्रहण, शोधन और वितरण की व्यवस्थाएँ कमजोर हैं। पुराने पाइपलाइन नेटवर्क, उच्च लीकेज और अपर्याप्त भंडारण के कारण बड़ी मात्रा में जल उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाता है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार विकासशील देशों में शहरी जल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा वितरण के दौरान ही नष्ट हो जाता है।

इसके अतिरिक्त, जल गुणवत्ता की समस्या भी पहुँच को सीमित करती है। जहाँ जल भौतिक रूप से उपलब्ध है, वहाँ भी प्रदूषण के कारण वह पीने योग्य नहीं रहता। दूषित जल से होने वाली बीमारियाँ आज भी कई देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती हैं, जिससे गरीब और हाशियाकृत समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

राजनीतिक और कानूनी बाधाएँ भी जल तक पहुँच को सीमित करती हैं। जल एक साझा संसाधन है, जिसके कारण अंतर-राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय विवाद उत्पन्न होते हैं। नदियों के बँटवारे, संघीय ढाँचे में अधिकारों के टकराव और अंतरराष्ट्रीय नदी समझौतों की जटिलताओं के कारण कई बार जल-समृद्ध क्षेत्रों में भी समान पहुँच संभव नहीं हो पाती।

सामाजिक असमानता इस संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। जल संकट का सबसे बड़ा बोझ समाज के कमजोर वर्गों—ग्रामीण गरीबों, शहरी झुग्गी बस्तियों, महिलाओं और बच्चों—पर पड़ता है। कई स्थानों पर सामाजिक भेदभाव, गरीबी और वहन क्षमता की कमी के कारण सुरक्षित जल तक समान पहुँच नहीं मिल पाती, जिससे असमानता और गहरी हो जाती है।

कमजोर जल शासन भी समस्या को जटिल बनाता है। जल प्रबंधन से जुड़ी संस्थाओं में समन्वय की कमी, विश्वसनीय डेटा का अभाव और अल्पकालिक नीतियाँ दीर्घकालिक समाधान के मार्ग में बाधा बनती हैं। कई देशों में जल से जुड़े अधिकार और जिम्मेदारियाँ अनेक मंत्रालयों और एजेंसियों में बँटी होती हैं, जिससे एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण विकसित नहीं हो पाता।

मौसमी असंतुलन भी जल पहुँच की समस्या को बढ़ाता है। मानसूनी क्षेत्रों में वर्षा कुछ महीनों तक अत्यधिक होती है, जबकि शेष वर्ष जल अभाव बना रहता है। अपर्याप्त भंडारण और प्रबंधन के कारण यह मौसमी जल स्थायी उपलब्धता में परिवर्तित नहीं हो पाता। चेन्नई और केप टाउन जैसे शहर इस विरोधाभास के प्रमुख उदाहरण हैं, जहाँ बाढ़ और सूखा एक ही वर्ष में देखने को मिलते हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें लगातार चेतावनी देती रही हैं कि मीठे जल का संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और वैश्विक शांति से भी गहराई से जुड़ा है। जल की कमी आज संघर्ष, प्रवासन और आजीविका संकट का एक उभरता कारण बन रही है।

अंततः, मीठे जल का संकट मानवता के सामने खड़ी सबसे बड़ी साझा चुनौतियों में से एक है। यह स्पष्ट है कि यह समस्या केवल प्राकृतिक सीमाओं की नहीं, बल्कि मानव निर्मित नीतिगत और प्रबंधन विफलताओं की भी है। यदि समय रहते सतत जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन, आर्द्रभूमि संरक्षण, समावेशी जल शासन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राथमिकता दी जाए, तो इस संकट को अवसर में बदला जा सकता है। जल सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा अनिवार्य दायित्व है।

न्यूज़ चैनलों पर हेट स्पीच का भोकाल

0

बाल मुकुन्द ओझा

देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर हेट स्पीच कर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने  कहा, सियासी दलों को अपने नेताओं पर लगाम लगानी चाहिए और मीडिया को भी ऐसे नफरती भाषणों को बार-बार दिखाने से बचना चाहिए। देश के बहुत से लोगों ने आजकल टीवी देखना लगभग बंद कर दिया है। इसका एक बड़ा कारण हमारे स्वनामधन्य न्यूज़ चैनल है। टीवी पर जैसे ही आप देश और दुनिया के ताज़ा हालचाल जानने के लिए न्यूज़ सुनना चाहेंगे तो आपका दिल और दिमाग झनझना उठेगा। एक दूसरे को गाली का सम्बोधन जैसे आम हो गया है। देश के नामी गिरामी न्यूज़ चैनलों पर अभद्रता, गाली गलौज और मारपीट की घटनाएं अब आम हो गई है। न्यूज चैनल्स की डिबेट्स की भाषाई मर्यादाएं और गरिमा तार तार हो रही है। ऐसा लगता है डिबेट्स में झूठ और नफरत का खुला खेल खेला जा रहा है। डिबेट्स और चैनलों का ये गिरता स्तर लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। प्रमुख पार्टियों के प्रवक्ता जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर रहे है वह निश्चय ही निंदनीय और शर्मनाक है। देश में कुकुरमुत्तों की तरह न्यूज़ चैनलों की बाढ़ सी आ गई है। इन चैनलों पर प्रतिदिन देश में घटित मुख्य घटनाओं और नेताओं की बयानबाजी पर टीका टिप्पणियों को देखा और सुना जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों के चयनित प्रवक्ता और कथित विशेषज्ञ इन सियासी बहसों में अपनी अपनी पार्टियों का पक्ष रखते है। न्यूज़ चैनलों पर इन दिनों जिस प्रकार के आरोप प्रत्यारोप और नफरती बोल सुने जा रहे है उससे लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ते देखा जा सकता है। बड़े बड़े और धमाकेदार शीर्षकों वाली इन बहसों को सुनकर किसी मारधाड़ वाली फिल्मों की यादें जाग्रत हो उठती है। एंकर भी इनके आगे असहाय नज़र आते है। कई बार छीना झपटी, गाली गलौज और मारपीट की नौबत आ जाती है। सच तो यह है जब से टीवी न्यूज चैनलों ने हमारी जिंदगी में दखल दिया है तब से हम एक दूसरे के दोस्त कम दुश्मन अधिक बन रहे है। समाज में भाईचारे के स्थान पर घृणा का वातावरण ज्यादा व्याप्त हो रहा है। बहुत से लोगों ने मारधाड़ वाली और डरावनी बहसों को न केवल देखना बंद कर दिया है अपितु  टीवी देखने से ही तौबा कर लिया है। लोगों ने एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक के स्थान पर प्रिंट मीडिया की ओर लौटना शुरू कर दिया है। आज भी अखबार की साख और विश्वसनीयता अधिक प्रामाणिक समझी जा रही है। डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अपेक्षा आज भी प्रिंट मीडिया पर लोगों की विश्वसनीयता बरकरार है। आज भी लोग सुबह सवेरे टीवी न्यूज़ नहीं अपितु अखबार पढ़ना पसंद करते है। प्रबुद्ध वर्ग का कहना है प्रिंट मीडिया आज भी अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन कर रहा है।

इस समय देश के न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया पर नफरत और घृणा के बादल मंडरा रहे है। देश में हर तीसरे महीने कहीं न कहीं चुनावी नगाड़े बजने शुरू हो जाते है। चुनावों के आते ही न्यूज़ चैनलों की बांछें खिल जाती है। चुनावों पर गर्मागरम बहस शुरू हो जाती है। राजनीतिक दलों के नुमाइंदे अपने अपने पक्ष में दावे प्रतिदावे शुरू करने लग जाते है। इसी के साथ ऐसे ऐसे आरोप और नफरत पैदा करने वाली दलीले दी जाने लगती है कि कई बार देखने वालों का सिर शर्म से झुक जाता है। यही नहीं देश में दुर्भाग्य से कहीं कोई घटना दुर्घटना घट जाती है तो न्यूज़ चैनलों पर बढ़चढ़कर ऐसी ऐसी बातों की झड़ी लग जाती है जिन पर विश्वास करना नामुमकिन हो जाता है। इसीलिए लोग इलेक्ट्रॉनिक के स्थान पर प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता को अधिक प्रमाणिक मानते है। इसी कारण लोगों ने टीवी चैनलों पर होने वाली नफरती बहस को देखनी न केवल बंद कर दी अपितु बहुत से लोगों ने टीवी देखने से ही तौबा कर ली।

नफरत और घृणा के इस महासागर में सभी सियासी पार्टियां डुबकी लगा रही है। न्यूज चैनलों पर विभिन्न सियासी दलों के प्रतिनिधि जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते है उन्हें देखकर लगता नहीं है की यह गाँधी, सुभाष, नेहरू, लोहिया और अटलजी का देश है। देश की सर्वोच्च अदालत कई बार इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर नियामकीय नियंत्रण की कमी पर अफसोस ज़ाहिर कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने नेताओं के भाषण और टीवी चैनलों को नफरती भाषण फैलाने का जिम्मेदार ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच मामले में कई बार टेलीविजन चैनलों को जमकर फटकार लगाई।

गंगा जमुनी तहजीब से निकले भारतीय घृणा के इस तूफान में बह रहे हैं। विशेषकर नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद घृणा और नफरत के तूफानी बादल गहराने लगे है। हमारे नेताओं के भाषणों, वक्तव्यों और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सुचिता के स्थान पर नफरत, झूठ, अपशब्द, तथ्यों में तोड़-मरोड़ और असंसदीय भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से होता देखा जा सकता हैं। हमारे नेता अब आए दिन सामाजिक संस्कारों और मूल्यों को शर्मसार करते रहते हैं। स्वस्थ आलोचना से लोकतंत्र सशक्त, परंतु नफरत भरे बोल से कमजोर होता है, यह सर्व विदित है। आलोचना का जवाब दिया जा सकता है, मगर नफरत के आरोपों का नहीं।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

बाबा बासुकीनाथ में तमिलनाडु के राज्यपाल ने की पूजा-अर्चना

0

दुमका, 17 फ़रवरी (हि.स.)। तमिलनाडु के राज्यपाल रविंद्र नारायण रवि ने मंगलवार को बासुकीनाथ धाम में सपरिवार पूजा अर्चना कर भोलेनाथ से आशीर्वाद प्राप्त किया।

तीर्थ नगरी में जिला प्रशासन के आला अधिकारियों ने राज्यपाल का स्वागत किया। इसके बाद राज्यपाल ने बाबा मंदिर के गर्भ गृह में विधि-विधान से पूजा अर्चना की। पूजा के बाद मंदिर प्रांगण में बाबा भोलेनाथ और माता पार्वती सहित अन्य देवी देवताओं की आरती उतारी। इसके बाद डीसी अभिजित सिन्हा ने राज्यपाल को बाबा बासुकीनाथ का स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।

मौके पर मंदिर के पंडा धर्म रक्षिणी सभा ने राज्‍यपाल को बाबा बासुकीनाथ का फोटो और रुद्राक्ष को भेंट किया।

उल्‍लेखनीय है कि पूर्व आईपीएस अधिकारी रविंद्र नारायण रवि नागालैंड के राज्यपाल भी रह चुके हैं। इधर, राज्यपाल के तीर्थ नगरी में आगमन को लेकर जिला और स्थानीय प्रशासन ने मुकम्मल तैयारी कर रखी थी। प्रशासन की ओर से सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम किया गया था।

—————

इंडो-नेपाल व्यापार मेला’ नई दिल्‍ली में 20 से 22 फरवरी तक पीएचडी चैंबर भवन में लगेगा

नई दिल्‍ली, 17 फरवरी (हि.स)। ‘इंडो-नेपाल व्यापार मेला’ 20 से 22 फरवरी तक नई दिल्ली के पीएचडी चैंबर भवन में लगाया जायेगा। व्यापार मेला के इस दूसरे संस्करण में 65 प्रदर्शनी स्टॉल होंगे। यह ऐतिहासिक द्विपक्षीय मेला भारत–नेपाल आर्थिक कूटनीति को और सुदृढ़ करते हुए दीर्घकालीन क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देगा।

प्रेस क्लब में मंगलवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में एवरेस्ट चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (ईसीसीआई) के अध्यक्ष युवराज बराल ने इंडो-नेपाल व्यापार मेला के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस व्यापार मेला के उद्घाटन सत्र में भारत में नेपाल के राजदूत शंकर प्रसाद शर्मा, मुख्य अतिथि भारत सरकार के पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा नेपाल उद्योग वाणिज्य महासंघ (एफएनसीसीआई) के अध्यक्ष चंद्र प्रसाद ढकाल सहित अन्य विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति रहेगी।

युवराज बराल ने बताया कि इंडो–नेपाल ट्रेड फेस्टिवल को व्यापार, पर्यटन, संस्कृति और नवाचार के माध्यम से द्विपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करने वाले एक परिवर्तनकारी मंच के रूप में परिकल्पित किया गया है। उन्होंने कहा कि नेपाल और भारत के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सार्थक साझेदारी विकसित करने, निवेश के अवसरों का विस्तार करने और दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को और अधिक मजबूत बनाने में यह महोत्सव सहायक सिद्ध होगा।

एवरेस्ट चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के महासचिव डॉ. मोहन कार्की ने बताया कि ये व्‍यापार मेला भारत–नेपाल के बीच द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग, पर्यटन एकीकरण, सांस्कृतिक आदान–प्रदान तथा निवेश साझेदारी को सुदृढ़ करने वाले एक प्रमुख मंच के रूप में स्थापित हो चुका है। इस वर्ष के ‘इंडो-नेपाल व्यापार मेला’ में जलविद्युत एवं ऊर्जा साझेदारी, सीमा-पार व्यापार एवं कनेक्टिविटी, रामायण और बौद्ध सर्किट सहित पर्यटन एकीकरण, बैंकिंग, फिनटेक एवं डिजिटल अर्थव्यवस्था सहयोग, मीडिया एवं सांस्कृतिक कूटनीति, युवा सहभागिता, शिक्षा एवं नवाचार साझेदारी, स्टार्टअप इकोसिस्टम तथा इंडो–नेपाल सहयोग ‘विजन 2030’ जैसे विषयों पर 10 से ज्‍यादा उच्चस्तरीय सत्र और नीतिगत संवाद आयोजित किए जाएंगे, जिनमें 60 से अधिक विशेषज्ञ भाग लेंगे।

डॉ. कार्की ने बताया कि इसके अलावा व्यावसायिक नेटवर्किंग कार्यक्रमों तथा नीति-निर्माताओं, मंत्रियों, राजनयिकों, उद्योगपतियों, निवेशकों और उद्यमियों के बीच बी2बी और बी2जी बैठकों का भी आयोजन किया जाएगा। उन्‍होंने कहा कि आयोजकों का विश्वास है कि ये सत्र दोनों देशों के विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत के हितधारकों को साझा विकास और सतत क्षेत्रीय सहयोग के नए अवसर तलाशने के लिए एक ही मंच पर लाएंगे। उन्‍होंने कहा कि महोत्सव में भारत और नेपाल के 60 से अधिक स्टॉल लगेंगे। आयोजकों का अनुमान है कि महोत्सव का अवलोकन 25 हजार से अधिक लोग करेंगे।

इंडो-नेपाल व्यापार मेला’ भारत में नेपाली उद्योगपतियों और व्यवसायियों के संगठन एवरेस्ट चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (ईसीसीआई), नेपाली दूतावास, नेपाल पर्यटन बोर्ड तथा व्यापार एवं निर्यात प्रोत्साहन केंद्र के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। वर्ष 2008 में स्थापित ईसीसीआई में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से 800 से अधिक उद्योगपति और व्यवसायी सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं।

बाबा महाकाल का शाही रिसेप्शन और नगर भोज 26 फरवरी  को

उज्जैन, 17 फ़रवरी (हि.स.)। मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाशिवरात्रि पर्व के बाद आगामी 26 फरवरी को शाही रिसेप्शन और नगर भोज का आयोजन किया जाएगा। उज्जैन, 17 फ़रवरी (हि.स.)। मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाशिवरात्रि पर्व के बाद आगामी 26 फरवरी को शाही रिसेप्शन और नगर भोज का आयोजन किया जाएगा।

दरअसल, महाशिवरात्रि पर्व के बाद हर वर्ष उनके भक्तों द्वारा नगर भोज का आयोजन किया जाता है। तय दिन नगर कोट से वर बने भगवान शिव की बारात निकलती है,जिसमें भूत-पलीत सदृश्य भक्त शामिल होते हैं। वहीं नगर भोज में पूरे शहर को आमंत्रित किया जाता है। इसके लिए अलग से आमंत्रण पत्र भी छपवाया जाता है।ै

महाकाल आरती परिवार द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम इस वर्ष यह आयोजन 26 फरवरी को नृसिंह घाट स्थित कुमावत समाज धर्मशाला में होगा। आयोजन के तहत बाबा महाकाल का 26वां शाही रिसेप्शन और नगर भोज रहेगा। आयोजन के तहत बाबा महाकाल की भव्य बारात नगरकोट से प्रारंभ होकर शहर के विभिन्न मार्गों से होकर सायं 7 बजे कुमावत धर्मशाला पहुंचेगी। बारात का स्वागत महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी रमन त्रिवेदी और दिनेश पुजारी करेंगे। रिसेप्शन के दौरान गायक किशन भगत, मनीष तिवारी और श्वेता जोशी भजनों की प्रस्तुति देंगे।

आयोजकों के अनुसार कार्यक्रम में सांसद अनिल फिरोजिया, समाजसेवी नारायण यादव, जमनालाल यादव, हरिसिंह यादव, रवि राय और पार्षद राजेश बाथम सहित गणमान्य नागरिक शामिल रहेंगे। आयोजन के पूर्व महाकाल मंदिर के मानसरोवर गेट पर महेंद्र कटियार मित्र मंडल द्वारा भजन प्रस्तुति के माध्यम से श्रद्धालुओं को नगर भोज का निमंत्रण दिया गया।

भोज में इंद्राणी, सीताफल रबड़ी, आम का रस, खीर, रसगुल्ला और काजू कतली शामिल होंगी। इसके अलावा तंदूरी रोटी, मिक्स वेज, पुरी, दाल-चावल, भजिया, आलू बड़ा और पापड़ कतरन का स्वाद भी भक्त लेंगे। आयोजन को खास बनाने के लिए कॉफी, आइस्क्रीम, पानी पतासी और अंत में पान की भी व्यवस्था की गई है।

महाकाल शयन आरती युवा शक्ति परिवारइधर रवि प्रदोष पर्व पर महाकाल शयन आरती युवा शक्ति परिवार के तत्वावधान में 1 मार्च को नरसिंह घाट मार्ग स्थित मांगलिक परिसर रघुकूल गार्डन में भंडारे का आयोजन किया जाएगा। आयोजकों ने बताया कि आयोजन के संरक्षक डॉ. रवि सोलंकी हैं। कार्यक्रम की जिम्मेदारी हरीश जोशी, शांतिलाल बैरागी, आदित्य जाट, राजेश खूबचंदानी, राजेश अग्रवाल और राजकुमार अग्रवाल संभाल रहे हैं। सहयोगी के रूप में घनश्याम चौधरी, राम राठौर, उज्जवल गोड़, संतोष सोलंकी, सतीश वर्मा, महेश वर्मा, आयुष नागर, अजय त्यागी, अभिजीत जाट, नीलेश हरोड़, हर्ष बागी, पंकज जैन, सावन रोचवानी, हेमंत खत्री, रोहित नागर, शैलू परमार और धर्मेन्द्र परिहार द्वारा निभाई जा रही है, वे तैयारियों में लगे हैं।

पश्चिम बंगाल कैबिनेट ने पदोन्नति नियमों में बड़े बदलाव को दी मंजूरी

कोलकाता, 17 फरवरी (हि.स.)। पश्चिम बंगाल कैबिनेट ने मंगलवार को राज्य सरकार के विभिन्न संवर्गों में लंबे समय से लंबित पदोन्नति संबंधी ठहराव को दूर करने और वरिष्ठ स्तर पर अनुभवी अधिकारियों की संख्या बढ़ाने के लिए पदोन्नति नियमों में बड़े बदलाव को मंजूरी दे दी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कैबिनेट बैठक के बाद यह जानकारी दी।

मुख्यमंत्री ने बताया कि पश्चिम बंगाल सिविल सेवा (डब्ल्यूबीसीएस) संवर्ग की पदोन्नति और ट्रांस्फर नियमों में संशोधन किया गया है, ताकि कैरियर प्रगति को सुव्यवस्थित किया जा सके और विभिन्न राज्य सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित हो।

नए प्रावधान के तहत डब्ल्यूबीसीएस अधिकारियों को दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि पूरी करनी होगी। इसके बाद उन्हें तीन वर्ष तक प्रखंड विकास अधिकारी (बीडीओ) के रूप में सेवा देनी होगी। कुल पांच वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद वे सीधे उपमंडल अधिकारी (एसडीओ) पद पर पदोन्नति के पात्र होंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पांच वर्ष की सेवा के बाद डब्ल्यूबीसीएस अधिकारी को एसडीओ बनने का अवसर मिलेगा। यह निर्णय उच्च स्तर पर अनुभवी अधिकारियों की संख्या बढ़ाने और विभिन्न राज्य सेवाओं के बीच समानता लाने के उद्देश्य से लिया गया है। उन्होंने बताया कि यह फैसला विभिन्न विभागों के पदोन्नति संबंधी अभिलेखों की समीक्षा के बाद लिया गया।

सरकारी सूत्रों के अनुसार इस निर्णय से पहले 46 विभागों के आंकड़ों की विस्तार से जांच की गई।

कैबिनेट ने अन्य राज्य गठित सेवाओं में भी पदोन्नति संबंधी अड़चनों को दूर करने के लिए 20 प्रतिशत अतिरिक्त पद सृजित करने का नीतिगत निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि केवल डब्ल्यूबीसीएस ही नहीं, बल्कि अन्य राज्य सेवाओं में भी चरणबद्ध तरीके से 20 प्रतिशत अतिरिक्त पद बनाए जाएंगे। इससे पदोन्नति में ठहराव कम होगा और विभिन्न संवर्गों के बीच संतुलन बना रहेगा।

सूत्रों के मुताबिक पुलिस सहित अन्य सेवाओं में भी इसी प्रकार के कदम उठाने पर विचार किया जा रहा है। प्रशासनिक हलकों में इस फैसले का स्वागत किया गया है और उम्मीद जताई गई है कि इससे विभिन्न विभागों में लंबे समय से लंबित पदोन्नति संबंधी समस्याओं का समाधान होगा।